व्यंग्य जुगलबंदी - बजट

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व्यंज़ल

बजट

गड़बड़ाया मानवीयता का बजट

सर पे चढ़ा राष्ट्रीयता का बजट


चलो चलें किसी और दर, यहाँ

हो गया कम जीवटता का बजट


जहाँ चर्चे थे प्रेम और सौहार्द्र के

बढ़ गया उधर है कटुता का बजट


आज कुछ और होता, यदि होता

उनके कहने में स्पष्टता का बजट


फिक्र की बात नहीं रवि के देश में

बहुत है वहाँ अशिष्टता का बजट

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