मंगलवार, 26 सितंबर 2017

व्यंग्य जुगलबंदी 53 - बांध बनते हैं तभी तो ढहते हैं...

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... क्योंकि मेरे सब्र का बांध तो कब का टूट चुका है!


व्यंज़ल

जिनके सीपेज भी हैं पूरे सौ प्रतिशत
वे भी गर्व से लिए घूम रहे हैं बांध

जिन्हें मालूम नहीं जल-मृदा-विज्ञान
बना रहे हैं वे तमाम लोग नए बांध

कारनामा किया है मेरे देश ने दोस्तों
बिना फ़ाउंडेशन हवा में बनाए बांध

हो गई है दुनिया रबर पॉलीथीन की
टूटते नहीं अब लोगों के सब्र के बांध

अब हम भी सफल में शुमार हैं रवि
दूसरों के कैचमेंट में बनाया है बांध

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