व्यंग्य की जुगलबंदी -28 : लेखकीय और साहित्यकीय मूर्खता

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यूँ, देखा जाए, तो इस जग का आधार है मूर्खता. कल्पना कीजिए कि यदि दुनिया में मूर्खता नहीं होती तो क्या कैसा होता? मूर्खता के बगैर दुनिया का दृश्य क्या होता? एक ऐसी रसहीन, आनंदहीन, अति-जहीन दुनिया होती जहाँ जीने का कोई मज़ा, कोई स्वाद ही नहीं होता. एक तरह से, दुनिया बनाने वाले ने भी एक बड़ी भारी मूर्खता की है और इस दुनिया को बना डाला. या, उसके किसी मूर्खतापूर्ण कार्य की वजह से कहीं कुछ बिगबैंग जैसा गड़बड़ हो गया और दुनिया का निर्माण हो गया. इसीलिए तो कहीं आग उगलते सूरज है तो कहीं ठंडे चाँद और कहीं सबकुछ खा जाने वाले विशाल श्याम विवर हैं तो कहीं नित्य नए सूर्य बनाती नीहारिकाएँ.  फिर, जरा याद करें, ट्रम्प के बगैर, अभी साल भर पहले अमरीका कैसा था? किम जोंग उन के बगैर  उत्तरी कोरिया कैसा लगेगा?

परंतु आज एक अलग तरह की मूर्खता के बारे में बात हो रही है. लेखकीय मूर्खता. वह भी, खासतौर पर हिंदी भाषाई. आदमी (औरत भी समझा जाए, और थर्ड जैंडर भी, पढ़ने वाले अपनी सहूलियत और प्रेफ़रेंस से जैसा समझना चाहें, बवाल न काटें) जब तक लेखक नहीं होता या बनता या सिद्ध नहीं होता कि वो एक लेखक है, मूर्खता का प्रमाण उसमें ढूंढे नहीं मिलता. लेकिन जैसे ही वो लेखक बन जाता है उसके जीनोम में मूर्खता सर्वत्र छा जाती है, और उसके रग-रग में/से मूर्खता बसने-टपकने लग जाती है. दरअसल, मूर्खता का बग जब किसी अच्छे-भले आदमी को काटता है तो वो लेखक बन जाता है और यदि यह इन्फ़ैक्शन जरा ज्यादा हो जाता है तो वो एक कदम और आगे बढ़कर व्यंग्यकार बन जाता है.

आप कहेंगे यह क्या बकवास है? तो पहली बात, स्पष्ट कर दें कि इस देश में हर किसी को बकवास करने का हक है. यहाँ अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है, और असहिष्णुता बर्दाश्त नहीं की जाती. दूसरी बात, आदमी, अपनी मूर्खता में, ईश्वर-प्रदत्त अपना असली काम-धाम छोड़-छाड़कर कुछ रचने लग जाता है जिसे वो साहित्य कहता है. साहित्य रच कर फिर वह इसे प्रकाशित-प्रसारित करने-करवाने की मूर्खता करता है. इसके लिए वो ऐसा प्रकाशक ढूंढने की कोशिश करता है जो उसे उसकी रचना को न केवल बढ़िया कलेवर-काग़ज़ में छापे, विज्ञापित करे, विमोचन करे-करवाए, बल्कि छापने के एवज में तगड़ा रॉयल्टी भी प्रदान करे. है न और बड़ी मूर्खता?

कोढ़ में खाज ये कि लेखक अपने साहित्य को बेस्ट सेलर होने के मूर्खता भरे दिवा-स्वप्न भी देखता है और इस दिवा-स्वप्न को हकीकत में बदलने की मूर्खता में मित्र-साहित्यकारों से, जो पहले ही उसी तरह की, अपनी-अपनी मूर्खता में लिप्त-संलग्न होते हैं, बढ़िया समीक्षाएँ लिखवाता-छपवाता है. इधर पाठक, सर्वकालिक रूप से जनप्रिय लेखकों जैसे कि देवकीनंदन खत्री और सुमोपा (अरे, वही अपने पाठक जी,) आदि की रचनाओं में साहित्यानंद-पठनानंद ढूंढ लेता है.

लेखकीय मूर्खता के कई आकार-प्रकार-भेद-विभेद होते हैं. और इसीलिए, दिए गए किसी एक आलोचक की नजर में आए, किसी एक परिपूर्ण, मौलिक किस्म की कहानी में, दिए गए किसी अन्य आलोचक की नजर में “प्रेमचंदीय” भाषाई सहजता-सरलता-खूबसूरती, स्थानीयता, देशजता आदि-आदि का तो अभाव होता ही है, मौलिकता कहीं, किसी सूरत नजर नहीं आती. गजल ग़ज़ल नहीं बन पाती, व्यंग्य में सरोकार नहीं होता और पंच प्रपंच बन कर रह जाता है.

लेखकीय मूर्खता के उच्चस्तरीय उदाहरणों में शामिल होते हैं लेखक के स्वप्रकाशित, उच्च-मूल्यित, 200 प्रतियों के - फर्स्ट एंड लास्ट - प्रिंट रन वाली साहित्यिक किताब के नोबुल-बूकर पुरस्कार न मिल पाने की सूरत में, स्थानीय, तात्कालिक सृजित साहित्यिक संस्था से पुरस्कृति होना, जिसकी चर्चा 125 सदस्यों वाले अति सक्रिय साहित्यिक वाट्सएप्प ग्रुप में गर्व के साथ होती है और जिसकी खबर  स्थानीय साप्ताहिक अखबार के एक संस्करण में, एक पत्रकार मित्र के अतिमित्रवत् सहयोग से 1x1 कॉलम सेंटीमीटर में  छपती भी है.

और, लेखकीय मूर्खता की पराकाष्ठा का उदाहरण है यह लेख जिसके वायरल होने, सर्वत्र वाहवाही मिलने, सैकड़ा भर टिप्पणियाँ और हजार भर पसंद मिलने की आशा-प्रत्याशा में लिखा जा रहा है. मगर, हिंदी साहित्य का सार्वकालिक, सार्वभौमिक सत्य क्या है यह सबको खबर है, सबको पता है - भारतीय पाठक भारतीय लेखकों में से चेतन भगतों, अमीषों  जैसों को उनकी मूल भाषा अंग्रेज़ी में पढ़ता है, और यदि अंग्रेज़ी में हाथ तंग है तो उनका हिंदी अनुवाद पढ़ता है और या सुमोपा जैसों को पढ़ता है जो, हिंदी साहित्य कदापि नहीं होता है!

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