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March, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य जुगलबंदी 27 : आपने कभी गरमी खाई है?

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(कार्टून - साभार काजल कुमार ) गरमी अभी ठीक से आई नहीं है, और लोगों को गरमी चढ़ रही है. एक नेता इतनी गरमी खा बैठे कि सीधे हवाई जहाज से गिरे और ट्रेन में अटके. एक रोस्टिया कॉमेडियन सफलता की गरमी से इतने स्व-रोस्ट हुए कि उनके इनकम टैक्स में करोड़ों की कमी होने का अंदेशा है. गरमी केवल लोग नहीं खाते. अपने आसपास की तमाम चीजों, उपकरणों पर गरमी चढ़ जाती है. पिछले साल सेमसुंग गैलेक्सी नोट 7 को अपने नए-पन की इतनी गर्मी चढ़ी कि वो जहाँ तहाँ ही फटने ही लगी. पंखे में लगे कैपेसिटर का इलेक्ट्रोलाइट गरमी खाकर सूख जाता है तो पंखा मरियल चाल चलने लग जाता है. आपके कंप्यूटिंग उपकरणों में लगे इलेक्ट्रानिक कलपुर्जे गरमी खा जाते हैं तो वे उपकरण को बेकार कर देते हैं और फिर उन्हें रिपेयर या रीप्लेस करना पड़ता है. वाहन का इंजन गरमी खाकर ब्लॉक हो जाता है तो टायर गरमी खाकर बर्स्ट हो जाता है. [ads-post] साहित्यकारों, खासकर व्यंग्यकारों में गरमी खाने की अच्छी खासी परंपरा रही है. वैसे भी, बिना गरमी खाए कोई सरोकारी, चर्चित, लोकप्रिय, पसंदीदा आदि-आदि किस्म का व्यंग्यकार नहीं बना जा सकता. बिना गरमी खाए, कहीं से, किसी…

यहाँ तो, एंटीवायरस ही आपका दुश्मन है!

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सैंया भए दुश्मन तो अब निर्भय कैसे?

व्यंग्य जुगलबंदी 26 : जम्बूद्वीप में सन् 3050 के चुनाव के बाद

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आज मैं आपको एक ऐसा व्यंग्य सुनाने जा रहा हूँ जिसे आप एक सांस में पढ़कर वाह! वाह!! कह उठेंगे. आज नहीं तो कल, पर ये तय है कि रवि रतलामी के व्यंग्य सभी पढ़ने लगेंगे. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब जिंदगी का पाठ इन व्यंग्यों के माध्यम से पढ़ाया जाने लगेगा. ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आज जब हर ओर तकनीक, बिजनेस, धन, कामयाबी की ही बातें चल रही हैं तो रवि रतलामी के व्यंग्य जीवन के सत्य की बातें करती हैं. खैर, रवि रतलामी आज आपको चुनाव के बाद का हाल सुनाएगा. वो चुनाव, जो आगे, आपके जीवन के विकास क्रम में कभी-न-कभी तो आएगा! [ads-post] जम्बू द्वीप में सृष्टि के प्रारंभ से ही चुनावी व्यवस्था लागू थी. वैसे, एक धड़े के वैज्ञानिकों का कहना है कि, बिगबैंग की थ्योरी तो बकवास है,  चुनाव से ही, और चुनाव के लिए ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ. वैसे भी, कुछ लोग चुनाव में ही जीते मरते हैं – उनके लिए संपूर्ण सृष्टि, सपूर्ण ब्रह्मांड चुनाव और केवल चुनाव होता है – उनकी सृष्टि का आरंभ और अंत चुनाव से ही होता है. वे खाते-पीते-उठते-बैठते चुनावी चक्र में उलझे रहते हैं और अपना सारा कार्य चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही करते हैं. ब…

जब यहाँ कंप्यूटर नहीं था, स्मार्टफ़ोन नहीं था,

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यही था, यही था -

यह तो, पौराणिक आख्यान जैसा है!

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टेक्नोलॉजी की जय हो!

20 मार्च गौरैया दिवस पर विशेष... गौरैया की बनी रहे फुदकन / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

आलेख रचनाकार पर यहाँ देखें -http://www.rachanakar.org/2017/03/20.html

रिफ़स्टेशन से किसी भी एमपी 3 गीत को बजाने का नोटेशन/कॉर्ड प्राप्त करें

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टेक्नोलॉज़ी की जय हो!यदि आप गीत संगीत गाने-बजाने में रुचि रखने हैं, तो रिफ़स्टेशन के बारे में जानते होंगे.यदि नहीं, तो यह आपके लिए बहुमूल्य टूल है.[ads-post]रिफ़स्टेशन को कंप्यूटर पर भी इंस्टाल किया जा सकता है और इसे ब्राउज़र के जरिए क्लाउड के द्वारा भी उपयोग में लिया जा सकता है.वैसे तो इसमें बहुत सी सुविधाएँ हैं, परंतु मूलभूत सुविधा ये है कि इस टूल से किसी भी एमपी 3 गीत का नोटेशन / कार्ड हासिल कर सकते हैं. गीत-संगीत साधकों और सीखने वालों के लिए यह शानदार और बेहद काम का है. नोटेशन की सटीकता 85 प्रतिशत तक आती है, जिसमें मामूली फेरबदल से सटीकता 100 प्रतिशत तक बनाई जा सकती है. पीसी टूल पर इसमें वांछित बदलाव कर अपना नया म्यूजिक भी अरेंज किया जा सकता है.वेबसाइट के जरिए इसका उपयोग तो और आसान है. अपने किसी गाने को इसके इंटरफ़ेस में सर्च करिए और बस आपके सामने नोटेशन हाजिर - यदि गीत लोकप्रिय किस्म का है, तब तो तुरंत हाजिर, नहीं तो थोड़ा खोजबीन करें, और नहीं तो अपलोड कर दें. मैंने लता मंगेशकर का गाया ठंडी हवाएँ लहरा के जाएँ आजमाया तो यह तुरंत हाजिर हो गया - यू-ट्यूब वीडियो एक तरफ चलता हुआ और दू…

आईफोन लें कि एंड्रॉयड?

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क्यों नहीं दोनों ही ले लिया जाए?


वैसे भी, मेरा काम किसी एक से तो होता ही नहीं है!

प्रस्तुत है, हिंदी कीबोर्ड की समस्या का एकमात्र, संपूर्ण हल - हिंदी देवनागरी भौतिक कीबोर्ड

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मित्र संजय बेंगाणी ने जब बताया कि उन्होंने हिंदी का भौतिक कीबोर्ड ऑनलाइन साइट से खरीदा है और उस पर काम करना सीख रहे हैं तो मुझे उत्सुकता हुई कि इस हिंदी के भौतिक कीबोर्ड में क्या कुछ सुविधा है यह देखा जाना चाहिए.हिंदी कंप्यूटिंग की दुनिया को तीस साल से ऊपर हो गए हैं, मगर, आज भी लोग कंप्यूटिंग उपकरणों, मोबाइल उपकरणों, ब्राउज़रों में हिंदी टाइपिंग के लिए जूझते दिखाई दे जाते हैं. रहा सहा कचरा नित्य होते सॉफ़्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टमों के अद्यतनों के कारण कचरा हो जाता है क्योंकि अच्छा खासा चलता सिस्टम फट जाता है और टाइपिंग की नई नई समस्याएँ पैदा हो जाती हैं.पर, अब एकमात्र यह समाधान आपकी तमाम समस्याओं का हल हो सकता है.मैं अभी भी कह रहा हूँ कि हो सकता है, है नहीं!बहरहाल, तो बात भौतिक कीबोर्ड की हो रही है.[ads-post]हिंदी का भौतिक, देवनागरी कीबोर्ड को स्थानीय कंप्यूटर बाजार में ढूंढना और खरीदना टेढ़ी खीर है.ऑनलाइन साइटों पर भी टेढ़ी खीर है. कहीं यह मिलता है कहीं नहीं. सर्च परिणाम उल्टे सीधे सामान दिखाते हैं.मैंने कोई दो दर्जन उल्टे सीधे सर्च किए, तब देवनागरी कीबोर्ड से इस कीबोर्ड की लिंक मिली…

व्यंग्य जुगलबंदी - 25 : हुड़दंग – होली बेहोली

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बेचारा होली बेकार ही बदनाम है हुड़दंग के लिए. जबकि इस देश में गाहे बेगाहे, जब तब, कारण बेकारण, बात बेबात, यत्र तत्र सर्वत्र हुड़दंग होते ही रहते हैं. हम होली की हुड़दंग की बात तो करते हैं, मगर दीवाली की हुड़दंग क्यों भूल जाते हैं? दीवाली के महीने भर पहले से हुड़दंग जो चालू हो जाता है उसकी बात कोई नहीं करता. सबसे पहले तो घर में साफ सफाई रँगाई पुताई का हुड़दंग मचता है, फिर नए कपड़े जूते पटाखे आदि खरीदने के लिए बाजारों में जो हुड़दंग मचता है वो क्या है? इधर पर्यावरणवादी हुड़दंग मचाए फिरते हैं – पटाखे मत फोड़ो, फुलझड़ी मत जलाओ. पटाखे जलाओ तो 10 डेसीबेल ध्वनि से कम वाला जलाओ, रात दस बजे से पहले जलाओ आदि आदि. इधर लेखकों-कवियों-संपादकों की टोली दीवाली में अपनी अपठनीय रचनाओं को हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म पर दीपावली विशेषांकादि के नाम पर दशकों से परोसती आ रही हैं, वे क्या किसी हुड़दंग से कम हैं? फिर दीपावली की शुभकामना संदेशों के हुड़दंग... बाप रे बाप! ये अपने किस्म के, साहित्यिक-सांस्कृतिक हुड़दंग हैं और किसी अन्य हुड़दंग प्रकार से किसी तरह से कमतर नहीं हैं. ईद-बकरीद-क्रिसमस में भी हुड़दंगों का क…

आईबस टाइपिंग बूस्टर से अपनी हिंदी टाइपिंग को बूस्ट कीजिए!

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(आईबस हिंदी आईएमई में रेमिंगटन, फ़ोनेटिक, इनस्क्रिप्ट, आईट्रांस आदि आदि कीबोर्ड से हिंदी टाइपिंग की सुविधा)बहुत सी जनता विंडोज़ 10 में रेमिंगटन हिंदी टाइपिंग न हो पाने की समस्या से ग्रसित है, और बाकी बहुत सी जनता फ़ेसबुक में, तो क्रोम में, तो जीमेल आदि में यदा कदा हिंदी टाइपिंग की समस्याओं से ग्रस्त होती रहती है.इन सबका समाधान है, लिनक्स पर आईबस टाइपिंग टूल का उपयोग. पिछले कई वर्षों से यह टूल बिना किसी समस्या के लगातार बढ़िया परफ़ॉर्मेंस दे रहा है.अब इसमें एक और सुविधा जुड़ गई है.टाइपिंग बूस्टर.और, हिंदी टाइपिंग में भी आप इसे धड़ल्ले से उपयोग कर सकते हैं.यह कुछ कुछ अपने स्मार्टफ़ोनों में उपलब्ध टी-9 और प्रेडिक्टिव टैक्स्ट जैसा काम करता है और यह वर्तमान स्थापित शब्दकोश के साथ तो काम करता ही है, आपकी नित्य प्रति की टाइपिंग के साथ यह सीखते जाता है. यानी आप जितना अधिक टाइप करेंगे, उतना ही यह सीखता जाएगा और आपके लिए अधिकाधिक काम का होगा.उदाहरण -आपने विश्व लिखा तो आगे विश्वसनीय लिखने के लिए आगे सनीय लिखने की जरूरत नहीं 6 वां बटन दबाएं या शॉर्टकट कुंजी (डिफ़ॉल्ट - स्पेस बार दो बार दबाएँ) दबा…

व्यंग्य जुगलबंदी 24 - आधुनिक अभिव्यक्ति

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(चित्र - अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक वॉल से साभार) आदमी जितना सभ्य, टेक्नोलॉज़ी एडॉप्टिव होता जा रहा है, अपनी प्रकाशित-अप्रकाशित, व्यक्त-अव्यक्त अभिव्यक्ति से उतना ही परेशान होते जा रहा है. अभिव्यक्ति का मसला आने वाले समय में और समस्याएँ पैदा करेगा. जरा याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति दस साल पहले कहाँ थी? या फिर, याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति बीस साल पहले कहाँ थी? और, यदि आप अपने आप को बुजुर्ग कहते-समझते हैं तो आपकी अभिव्यक्ति पचास साल पहले कहाँ थी? कोई तीसेक साल पहले, हमारे जैसे लोगों की अभिव्यक्तियों के कोई लेवाल नहीं होते थे. हमारी अभिव्यक्तियाँ, प्रकाशित-प्रसारित होकर दुनिया तक पहुँचने की लालसा में, अक्सर लाइन वाली कॉपी के काग़ज़ में पेन से लिखी जाकर या यदा कदा, मेकेनिकल टाइपराइटर के जरिए टाइप होकर, लिफ़ाफ़े में बंद होकर, दो रुपए के डाक-टिकट के खर्चे पर, किसी पत्रिका या समाचार पत्र के संपादक के पास पहुँचती थी, और अकसर उसकी कुर्सी के नीचे रखे कचरे की टोकरी में अपनी वीर-गति को प्राप्त होती थी. क्योंकि हमारे पास अपनी अप्रकाशित अभिव्यक्ति को वापस अपने पास वापस बुलाने के लिए वापसी का, पता लिखा, पर…

लीजिए, खास आपके लिए पेश है हर्बल नॉनवेज

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हर्बल अंडे के बाद अब जल्द ही हर्बल चिकन, मटन, फिश, पोर्क आदि।
और बीफ़ तो शुरु से ही हर्बल है!

पढ़ेलिखों का अनपढ़

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भई, मैं तो, नित्य 300 ईमेल, 500 फ़ेसबुक स्टेटस पोस्ट, 1000 ट्वीट, 2500 वाट्सएप्प संदेश पढ़ता हूँ, मगर, कुछ स्टैण्डर्ड, कुछ मानकों के हिसाब से, हूँ अनपढ़ का अनपढ़!आप बताएँ, आप पढ़े लिखे हैं या अनपढ़? (स्वतः मूल्यांकन करें! )

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