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व्यंग्य जुगलबंदी - बुढ़ापे या बीमारी से नहीं, मैं मरा अपनी शराफ़त से!

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ग़लती से मैं शराफ़त से पैदा हो गया, साथ में शराफ़त लेकर, शराफ़त से लबरेज़. अब देखिए ना, जिस दिन से मैंने होश सँभाला, अपने आप को निहायत ही शराफ़त से ओतप्रोत पाया. हर काम, जाने-अनजाने व चाहे-अनचाहे शराफ़त से करता आया. जैसे कि, स्कूल में जनगणमन गाते समय टाँग में भयंकर खुजली मचने पर भी, बिना किसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के, मैंने अपने आप को सदैव शराफ़त से खड़ा रखा – वह भी सावधान की मुद्रा में. शायद ये मेरी शराफ़त थी कि मैं वहीं का वहीं रह गया, जबकि मेरा एक सहपाठी जो टांगों में खुजली नहीं मचने पर भी जबरन खुजाता रहता था और इस तरह उसने कभी सावधान की मुद्रा का पालन नहीं किया, आगे चलकर बहुत बड़ा नेता बना और देश के लिए कानून बनाने का काम करने लगा.

कॉलेज में आए तो हमने अपनी शराफ़त में और पर लगा लिए. शराफ़त से कक्षा के और कॉलेज के सक्रिय समूह से जुड़े और अनगिनत कक्षा-बहिष्कारों में शामिल रहे. शिक्षकों के पढ़ाने का निहायत शराफ़त से तिरस्कार-बहिष्कार किया. जुलूस धरना प्रदर्शन आदि में शराफ़त से नारे लगाए और यदि कहीं उत्तेजना और भीड़-तंत्र में बावले होकर झूमा-झटकी व कुर्सी मेजों की उठापटक भी कभी की तो…

काटजू साहब, ऐसे तो, भारत में हर रोज एक मौत मरोगे!

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और, मैं भी!

व्यंग्य जुगलबंदी 22 - होली, चुनाव और बाबा; बोलो सा रा रा रा रा रा

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शौचालय तीन ताले में
जनता निपटे मैदान में
    बोलो सा रा रा रा रा रा

मुर्दा पूछे है कहाँ जाए
श्मशान या कब्रिस्तान में
           बोलो सा रा रा रा रा रा

करिए अंधेरा एक समानदीवाली औ रमजान में
    बोलो सा रा रा रा रा रा


गुजराती गधे चले दिल्ली
और सैफई के नखलऊ में
    बोलो सा रा रा रा रा रा

जाति-धर्म के टोले में
बाबा वोटों की लाइन में
    बोलो सा रा रा रा रा रागाय, भैंस हो या सूअर सब बराबर, मिले पौंड मेंबोलो सा रा रा रा रा रा

व्यंग्य जुगलबंदी 21 - प्रेम दिवस / वेलेंटाइन डे विशेष : मरफी के प्रेम प्यार के नियम

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(व्यंग्य जुगलबंदी 21 - प्रेम दिवस - वेलेंटाइन डे के अवसर पर प्रेममय है, तो इस अवसर पर नियमावलि को धो-पोंछ कर चमका कर फिर से प्रस्तुत किया गया है -) • प्यार अंधा होता है- परंतु दिव्य दृष्टि के साथ. • प्यार, बटुए में छेद का दूसरा नाम है. • जो आपसे जितना ही दूर होता है वो उतना ही प्यारा होता है. • प्यार में पड़ने के बाद बुद्धिमान तथा मूर्ख में कोई अंतर नहीं रह जाता. • दिमाग़ x सुंदरता x उपलब्धता = प्रेम स्थिरांक. और, यह स्थिरांक हर स्थिति में शून्य होता है. • किसी का आपके प्रति प्यार और आपका उसके प्रति प्यार का अनुपात अकसर व्युत्क्रमानुपाती होता है. • पैसे से कोई प्यार नहीं खरीदा जा सकता, परंतु वह आपको शानदार समझौते की स्थिति में तो ला ही देता है. • संसार की समस्त अच्छी वस्तुएँ – जिसमें प्रेम सम्मिलित है, मुफ़्त उपलब्ध हैं --- और वे आपको आपके पैसे का पूरा मूल्य चुकाती हैं. • प्रत्येक भद्र प्रेम क़िस्म की क्रिया की प्रतिक्रिया भद्र-प्रेम ही हो यह जरूरी नहीं. • प्यार का अंत, पहले होता है. • प्रिय/प्रेयसी की उपलब्धता समय का एक कारक है. जिस पल आपकी रुचि किसी में उत्पन्न होती है, उस…

व्यंग्य जुगलबंदी - हमारा बसंत

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हमारा वसंत

यूं तो यह ऋतुओं का राजा कहलाता है, परंतु किसलिए, यह बहुतों को पता नहीं. और, यह कब आता है और कब जाता है यह भी बहुतों को पता नहीं.  बहुत से अधिकारी-नेता किस्म के लोगों के लिए यह ऋतुओं में निकृष्ट है - यह किसी किस्म       के स्कीम  की संभावना लेकर ही नहीं आता है। इसके आने व जाने के बारे में मौसम विभाग की अपेक्षा कवियों लेखकों को अधिक सटीकता से पता रहता है. बहुधा मौसम विभाग फेल हो जाता है, परंतु प्रेम कविता रचने वाला दूर कहीं नामालूम सी क्षीण आवाज में कोयल के कूक की कल्पना कर घोषणा कर देता है कि वसंत आ गया है।

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अब देखिए न, जब वर्षा का मौसम आता है तो वो भयंकर गर्मी के बाद, तेज आंधी तूफानों के साथ आता है. और जब आता है तो सर्वत्र कीचड़ ले आता है. अब ये बात अलग है कि बहुत से लोग कीचड़, अधिक कीचड़ की कामना करते हैं ताकि वे अपने-अपने कमल खिला सकें. अरे बाबा, जितना अधिक पानी गिरेंगा उतना ही अधिक कीचड़ होएंगा और सड़कों में उतना ही अधिक गड्ढा होएंगा। तो उसे रिपेयर करने का उतना ही तगड़ा एस्टीमेट बनेंगा और उतना ही मोटा टेंडर निकलेंगा। देश में एक ही काम बिलकुल समय पे, चाक चौबं…

प्यार और युद्ध में नहीं, धंधे में !

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नए दौर में प्यार और युद्ध गौण हैं। बचा है तो केवल बिजनेस। यहां सब जायज है। और यह कोई रईस फिल्म का धांसू डायलॉग नहीं है। एप्पल कंपनी का सफलता का सूत्र - मंत्र है!

चोरी की पराकाष्ठा!

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अभिनव, नवोन्मेषी, नायाब!
फिर भी, दाढ़ी में तिनका? शायद इसीलिए तो पकड़े गए!

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