टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

2017

साराह से प्राप्त संदेशों को दुनिया सगर्व अपने फ़ेसबुक, वाट्सएप्प, ब्लॉग आदि आदि पर डाल रही है. प्रकटतः बड़ी ईमानदारी से. परंतु हमारे पास एआई (कृत्रिम बुद्धि) युक्त एक ऐसी हैकिंग मशीन आ गई है जिससे उनके साराह संदेशों में की गई छेड़छाड़ का पता लग जाता है. हमारी मशीन ने ये पता लगा लिया है कि अब तक सार्वजनिक प्रकाशित साराह संदेशों में से अधिकांश में छेड़छाड़ की गई है और नक़ली संदेश छापे गए हैं. हमारी हैकिंग मशीन ने साराह में सेध लगा ली है और असली संदेशों को प्राप्त कर लिया है.

प्रस्तुत है बिना छेड़छाड़, साराह से प्राप्त कुछ असली संदेश, जिसे, जाहिर है, लोगों ने सार्वजनिक जाहिर नहीं किया.


(दिया गया कोई भी)

एक वरिष्ठ कवि -

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एक और -

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एक वरिष्ठ व्यंग्यकार -

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एक वरिष्ठ कहानीकार -

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एक वरिष्ठ समीक्षक -

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एक और -

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एक वरिष्ठ उपन्यासकार -

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एक वरिष्ठ संपादक -

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एक और -

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(क्रमशः अगले अंकों में - साराह से छेड़छाड़ जारी है...)

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आइए, साराह (या, सारा या सराहा?) करें

यह तो स्वयंसिद्ध है कि दुनिया बड़ी पॉलिश्ड है. मुंह में राम बगल में छुरी टाइप. नहीं?

अभी की ही बात ले लो. सुबह आपकी दाल में नमक जरा ज्यादा हो गई थी. परंतु आपने कहा – वाह! दाल तो बहुत बढ़िया बनी है. भले ही यह बात कहते कहते आपका मुँह कसैला हो रहा होगा.

छोड़िए, चलिए, दूसरी बात करते हैं. हैरी साडू को कभी हैरी साडू बोला है? अरे भाई, अपने बॉस को कभी उसकी औकात दिखाई है?

या, कभी अपने मित्र को सीधे, उसके मुँह पर कभी बोला है कि यार थोड़ा सा डियो लगा लिया करो, या फिर – मोजे तो गाहे-बगाहे धो लिया करो!

नहीं न?

आपने जब भी वास्तविक, सही, ठोस, वाजिब बात कहने की सोची, आपके संस्कार, आपका संकोच और न जाने क्या क्या सामने आ गया. और आपने फ़ावड़े को फ़ावड़ा कहने की हिम्मत नहीं दिखाई. इसी तर्ज पर, लोग सत्य बात को पचाने, स्वीकारने की भी हिम्मत नहीं दिखा पाते.

अब आप पूरी हिम्मत कर सकते हैं. सच को सच कह सकते हैं, किसी के मुँह पर कह सकते हैं. एक बड़ी राहत की बात यह है कि आप अपनी पहचान, अपनी आइडेंटिटी जाहिर किए बगैर, बताए बगैर कह सकते हैं. साथ ही, सब को सही बात कहने के लिए आमंत्रित भी कर सकते हैं. पता तो चले कि आपमें क्या क्या खामियाँ हैं.

उदाहरण के लिए, क्या मेरे एक्टिव फैब्रिक कंडीशनर से ताज़ा धुले मोजे में भी बदबू आती है जो आपको असहनीय लगती है? तो कृपया अपनी जान-पहचान जारी किए बगैर मुझे मेरे साराह खाते पर जरूर बताएँ.

साराह. हाँ, एक नई सुविधा जो इंटरनेट/डेस्कटॉप पीसी और आपके स्मार्टफ़ोनों पर ऐप्प के माध्यम से हासिल हुई है और दुनिया दीवानी हुई जा रही है. आखिर दुनिया को भी हक है उसकी खुद की असलियत जानने का. चिकनी-चुपड़ी बातों से किनारा करने का.

साराह – भी वाट्सएप्प की तरह एक बेहद सरल किस्म का, नौ-नॉनसेंस मैसेंजिंग ऐप्प है, जो मूलतः संदेश प्राप्त करने के लिए बनाया गया है. इसमें संदेश पाने वाले के पास संदेश भेजने वाले का किसी तरह का सूत्र या अता पता नहीं होता, जब तक कि स्वयं भेजने वाला संदेश में न लिखे. यानी भेजने वाला पूरी तरह गुप्त रहता है. जो मर्जी संदेश भेजो, यदि आप नहीं चाहेंगे तो आपका पता कोई नहीं लगा सकेगा. इसका इंटरफ़ेस बहुत ही संक्षिप्त व सरल है, और इसमें खाता बनाना बेहद आसान. जल्द ही लोग – गूगल किया क्या? की तर्ज पर, साराह किया क्या कहने लगेंगे.  डेस्कटॉप पर खाता बनाने के लिए sarahah.com पर जाएँ अथवा स्मार्टफ़ोन पर प्लेस्टोर पर sarahah ऐप्प सर्च करें. यूँ स्मार्टफ़ोन पर डेस्कटॉप संस्करण भी बढ़िया काम करता है.

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मैंने अपना साराह खाता यहाँ बनाया है - जिस पर आप मुझे अपने बेबाक संदेश भेज सकते हैं -  https://raviratlami.sarahah.com/

वहां पर यूँ तो आपको लिखा मिलेगा कि कोई सृजनात्मक संदेश भेजें, परंतु आपके हर तरह के संदेशों का स्वागत है. दिल-खोल दीजिए. मैं भी जानना चाहूंगा कि मेरे बारे में लोगों की बेबाक, किस-किस्म की कैसी-कैसी राय हो सकती है, जिनसे मैं अब तक वंचित रहा था. :)

आप भी अपना एक साराह खाता बनाएँ, और मुझे उसका पता बताएँ. मुझे भी आपके बारे में बहुत सी बातें ऐसी कहनी हैं जो आज तक कह नहीं सका. अब अनामी बनकर तो मैं सफेद को सफेद कह सकूंगा.

आने वाले दिनों में, केवल और केवल दो किस्म की जनता होगी - एक जिसका साराह खाता होगा और दूसरा जिसका नहीं होगा. जिसका नहीं होगा, उसे लोग कहेंगे - देखो - वो जा रहा है, उसमें हिम्मत ही नहीं है सच सुनने की - उसका साराह खाता ही नहीं है!

आप किस किस्म के जीव हैं जी?

चहुँओर हल्ला मचने के बाद, जैसी कि संभावना थी, ताज़ा खबर ये है कि  आर्काइव.ऑर्ग पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है.

इस घटना से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है.

यहाँ, भारत में, जिसके पास पैसा है, पहुँच है, वो हाई-सुप्रीम-कोर्ट में पहुँच कर उल्टे-सीधे जिरह सामने रख कर माननीय न्यायाधीशों से मूर्खता भरे कोर्ट-आदेश निकलवा सकता है जिसमें शामिल है - आर्काइव.ऑर्ग के संपूर्ण डोमेन पर प्रतिबंध - बिना कोई आर्काइव.ऑर्ग की बात पहले से सुने, या उनके बारे में जाँच-पड़ताल किए या कोई साक्ष्य हासिल किए!

इस संबंध में आर्काइव.ऑर्ग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की तो मीडिया-नामा ने कोर्ट-ऑर्डर की प्रतिलिपियाँ सार्वजनिक रूप से, सबके डाउनलोड के लिए टांग दीं. (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ )

उस कोर्ट-ऑर्डर में आर्काइव.ऑर्ग समेत उन 2600 साइटों के वेब पते हैं जिन पर प्रतिबंध लगाया गया था.

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(मद्रास उच्चन्यायालय के वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश की प्रति का स्क्रीनशॉट)

आप देख सकते हैं कि मासूम वेब उपयोगकर्ता के पास अब एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, बल्कि छब्बीस सौ से अधिक ऐसी वेबसाइटों के पते हैं जहाँ से वो पायरेटेड फ़िल्में और गाने और गेम्स, प्रोग्राम आदि डाउनलोड कर सकता है!

ये है उलटे बांस बरेली को. कहाँ तो प्रतिबंध लगाने की बात हो रही थी, यहाँ तो प्रतिबंधित वेबसाइटों की मार्केटिंग हो रही है, प्रचार प्रसार हो रहा है! ये सभी साइटें वीपीएन, प्रॉक्सी आदि के माध्यम से बखूबी काम कर रही हैं.

प्रतिबंध तभी प्रभावी काम करेगा, जहाँ इंटरनेट हो ही नहीं. डिजिटल इंडिया के जमाने में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा लो अब!

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भारतीय सरकारी बाबुओं ने एकबार फिर से अपनी शुतुरमुर्गी जड़ता और मूर्खता को सार्वजनिक प्रतिपादित किया है.

आर्काइव.ऑर्ग जैसी एक शानदार वेबसाइट और संकल्पना को बंद कर उसने अपने आप को न केवल उपहास का पात्र बनाया है, बल्कि अपनी संकीर्ण सोच और मंद बुद्धि का एक और परिचय दिया है.

इसका चहुँओर प्रतिकार, हो हल्ला होना चाहिए ताकि इस तरह के अर्थहीन प्रतिबंधों पर लगाम लगे. इस मूर्खता भरे प्रतिबंध तो तत्काल हटाया जाना चाहिए.

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शुक्र है कि विभिन्न तकनीकों के सहारे हमारे-आपके लिए इस शानदार और खूबसूरत साइट (रचनाकार.ऑर्ग जैसी साहित्यिक साइटों की बहुत सी साहित्यिक सामग्री आर्काइव.ऑर्ग पर होस्टेड हैं) को अबाधित रूप से उपयोग करने के ढेरों, आसान तरीके उपलब्ध हैं. प्रॉक्सी, वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क, जिसमें किसी तरह की बंदिश आदि काम नहीं करती) आदि का प्रयोग कर आप आराम से इस प्रतिबंध का प्रतिकार कर सकते हैं - हालाकि यह समाधान नहीं होगा, फिर भी.

यदि आपको प्रॉक्सी, वीपीएन आदि की तकनीकी जानकारी  अधिक नहीं है, तो इसके लिए हम आपके लिए एक बहुत ही सरल सा समाधान लाए हैं. यह हर प्लेटफ़ॉर्म पर काम करेगा.


ओपेरा ब्राउज़र का नवीनतम संस्करण डाउनलोड करें. इस ब्राउज़र में वीपीएन अंतर्निर्मित है.

ओपेरा ब्राउजर को इंस्टाल करने के बाद इसकी सेटिंग में जाएँ. वहाँ प्राइवेसी और सेक्यूरिटी टैब में जाएं और वीपीएन शीर्षक के नीचे दिए गए इनेबल वीपीएन चेकबॉक्स पर सही का निशान लगाएँ. बस. हो गया.


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अब ओपेरा ब्राउजर में एड्रेस बार पर वीपीएन का चिह्न दिखेगा. उस पर क्लिक कर वीपीएन को चालू या बंद कर सकते हैं. वीपीएन चालू करें और आर्काइव.ऑर्ग या अन्य कोई भी बंद साइट का यूआरएल डालें.


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प्रतिबंधित आर्काइव.ऑर्ग का आनंद लें ! --- >

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वीपीएन से हो सकता है कि कुछ लोकेशन आधारित साइटें ठीक से काम न करें, मगर, तात्कालिक हल तो प्राप्त हो ही जाता है.

ओपेरा ब्राउज़र को आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -

http://www.opera.com/hi/download

लिंक को खोलने के लिए अपने ब्राउज़र में कॉपी पेस्ट करें. या गूगल / प्लेस्टोर में ओपेरा डाउनलोड सर्च करें. ओपेरा, मोबाइल के लिए ब्राउज़र तथा ऐप्प - दोनों रूप में उपलब्ध है.

How to visit blocked site archive.org through vpn प्रतिबंधित साइट आर्काइव.ऑर्ग को वीपीएन / ओपेरा ब्राउज़र से कैसे उपयोग करें


अपडेट - चहुँओर हो हल्ला मचने के बाद अब इस साइट पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया है. अलबत्ता आर्काइव.ऑर्ग के इस आलेख और मीडियानामा की इस पड़ताल (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ ) से सिद्ध होता है कि भारतीय कोर्ट और भारतीय बाबुओं ने मिलकर किस तरह से भारत का नाक इंटरनेट जगत में कटवाया है और ये सिद्ध किया है कि हम भारतीय निरे मूर्ख हैं !

उम्मीद करें, कि ऐसी मूर्खता भविष्य में देखने को न मिलें!

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इधर उसने चोटीकटवा की खबर पढ़ी, और उधर उसकी बांछें, शरीर में जहाँ कहीं भी हों, खिल गईं.

उसके दिमाग में बत्ती जो जल गई थी.

आदमी को कुछ चीजें, नामालूम रूप से, बिना किसी कारण, बेवजह, यूँ ही, बेहद पसंद होती हैं तो कुछ चीजें बेहद नापसंद.

मामला कुछ-कुछ मीठा, खट्टा या नमकीन नुमा होता है.

कोई मिठाई का दीवाना होता है तो कोई नमकीन का. किसी को घी की खुशबू बर्दाश्त नहीं होती तो किसी को पेट्रोल की, और इन खुशबुओं के दीवानों की भी कोई कमी, दुनिया में नहीं है.

इसे खुदा का कहर ही समझो, वो जिस जमात में जन्मी, जिस जमात में पली-बढ़ी उस जमात में उसने जन्म से ही, चहुँओर, अपने आसपास दाढ़ीजारों को देखा. अलबत्ता कुछ गिनती के तरक्कीपसंद भी आसपास होते थे जिनके न दाढ़ी होती थीं न मूछें. उसे, नामालूम रूप से, बेवजह, जन्मजात, दाढ़ीजारों की दाढ़ियों से सख्त नफ़रत थी जिनमें उनके प्रिय अब्बा भी शामिल थे. और, जब उसकी शादी एक ऐसे शख़्स से हुई जो सफाचट किस्म का था, तो उसने अपने भाग्य को सराहा था, ईश्वर का धन्यवाद किया था.

पर, इधर कुछ महीनों से उसका पति पता नहीं क्यों अपनी दाढ़ी बढ़ाए जा रहा था. और, वो उन्हीं महीनों से उसे कह रही थी दाढ़ी कटा ले दाढ़ी कटा ले. ऊपर से यह दाढ़ी उसके भरे चौड़े चेहरे पर बिलकुल नहीं जमती. उसकी दाढ़ी देखते ही उसे कुछ हो जाता था. तन-बदन में आग लग जाती थी. आसपास की सामान्य सी चीजें भी उसे उस्तुरा, ब्लेड, चाकू, कैंची आदि आदि नजर आने लग जाती थीं और वो उन्हें उठा लेती थी उसकी दाढ़ी काटने. पर, जाहिरा तौर पर यह प्रयास असफल ही होता क्योंकि चश्मे के केस, पेन, पेंसिल, कंप्यूटर के माउस आदि से दाढ़ियाँ नहीं कटतीं, और वो अपनी इस पागल-पन भरी हरकत पर खुद ही हंस पड़ती. हाँ, शायद वो दढ़ियलों की दाढ़ियों को लेकर जन्मजात पागल थी.

इधर, चोटीकटवा की घटनाएँ चहुँओर फैलती जा रही थीं. चोटी-कटवा तमाम औरतों की चोटियाँ काटे जा रहा था. उसके अपने  मुहल्ले में पिछली रात ये घटना हो गई थी. अब तो उसे भी कुछ-न-कुछ करना ही होगा, उसने सोचा. शाम होते होते उसने पुख्ता प्लानिंग कर ली.

अगली सुबह जब उसका प्यारा पति उठा तो उसने अपने बिस्तर के आसपास बालों के गुच्छों को बिखरा पाया. उसकी बीवी बेसुध सो रही थी. पहले तो उसे लगा कि उसकी बीवी की चोटी कट गई है. उसने ध्यान से देखा. उसकी बीवी की चोटी तो वैसी ही भरी पूरी लंबी है. फिर ये बाल कहाँ से आए?  बेसाख्ता उसके हाथ अपनी दाढ़ी पर चले गए. उसे अपनी दाढ़ी थोड़ी अजीब लगी. उसने टटोला तो पाया कि उसकी दाढ़ी के बाल गायब थे, जो जाहिरा तौर पर नीचे बिस्तर पर फैले हुए थे. उसने सोचा, कहीं उसकी बीवी ने तो नहीं... पर, जल्द ही उसने यह ख़याल अपने दिल से निकाल दिया, और जोर से चीखा.

चहुँओर हल्ला मच गया. घर में, मुहल्ले में, शहर में और फिर समाचार के जरिए देश में. चोटी-कटवा के बाद दाढ़ी-कटवा ने आमद दे दी थी. दाढ़ी-कटवा की घटनाएँ जल्द ही पूरे देश में फैल गईं. उधर, बहुत से दाढ़ी-जारों ने दाढ़ी-कटवों के डर के मारे, खुद ही अपनी दाढ़ियाँ साफ कर लीं.

उधर, वो हर बार अपनी हँसी दबाने में कामयाब रही - जब भी दाढ़ी-कटवों का जिक्र होता, या उनकी खबर चलती.

आपको क्या लगता है? इसी तर्ज पर, घूंघट-कटवा, जनेऊ-कटवा, बुरखा-कटवा आदि आदि की घटनाएँ नहीं होनी चाहिएँ?

क्या पता, किसी दिन ये भी शुरू हो जाएँ. इंतजार करें, शुभ दिन का!

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पवित्र भारत भूमि में, जुलाई के महीने में सदियों से बाढ़ आती रही है और आगे अनंत-काल तक आती रहेगी. तमाम सरकारें आईं और गईं, तमाम साम्राज्य आए और नेस्तनाबूद हो गए या भारत छोड़ गए, मगर हर वर्ष जुलाई में बाढ़ की स्थिति वही रही, और, जब से हवाईजहाज का आविष्कार हुआ है, अफ़सरों नेताओं का बाढ़ की स्थिति का हवाई सर्वेक्षण और जायजा लेने का चक्र भी बदस्तूर जारी है और जारी रहेगा. जहाँ एक ओर पर्यावरण को बचाने की, प्रकृति को बचाने की दुनियाभर में जमकर सफल-असफल कोशिशें हो रही हैं, भारत भूमि के अधिनायकों और भाग्य-विधाताओं ने कम से कम इस मामले में बढ़िया काम दिखाया है – उन्होंने प्रतिवर्ष-हरवर्ष की बाढ़ और उसकी संभावना को अक्षुण्ण बनाए रखा है, उसका विनाश नहीं किया है, उसे समाप्त नहीं किया है. इस तरह से हम भारतीयों ने प्रकृति को बचाने में बड़ी सफलता पाई है. संपूर्ण ब्रह्मांड इसके लिए हमारा सदैव शुक्रगुजार रहेगा.

जबकि, नदियों में जुलाई के महीने में आने वाली बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, जो भारत भूमि की साम्प्रदायिक सद्भाव, सर्वे भवन्तु सुखिनः को आदर्श मानने वाली जनता प्रतिवर्ष, और यदि टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो बड़े उत्साह से झेलती-स्वीकारती है, और अगले वर्षों के लिए फिर-फिर कमर कस लेती है; एक दूसरी आपदा इस वर्ष और आई है वो है राजनीतिक गठबंधनों की बाढ़. और, इसे भी भारतीय जनता, टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो, बड़े उत्साह से स्वीकार रही है.

जब बाढ़ आती है तो नदी के किनारे के छोटे मोटे पेड़ पौधे अपने जड़-जमीन से उखड़ जाते हैं और धारा में बहने लगते हैं. इतने में कहीं कोई बड़ा सा वृक्ष का तना या लट्ठ बहता हुआ आता है तो ये सब छोटे मोटे पेड़ पौधे और जीव जंतु अपनी जान बचाने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए उस बड़े लट्ठ के चहुँओर चिपक जाते हैं, उसके ऊपर बसेरा बना लेते हैं. राजनीतिक गठबंधनों के भी यही हाल हैं. किसी बड़े दल में यदि चुनावी वैतरणी पार करने की संभावनाएँ दिखती हैं तो छोटे मोटे दल, निर्दलीय, क्षेत्रीय दल उस बड़े दल में गठबंधन के नाम पर चिपक जाते हैं. लाइफ आफ पाई की तरह फिर एक दूसरे के जान के दुश्मन विरोधी पार्टियाँ – आदमी और शेर किस्म की पार्टियाँ – जो पहले एक दूसरे को देख कर गुर्राते थे, मारने – काटने को दौड़ते थे, वे भी प्रेम-पूर्वक साथ रह लेते हैं, मिल-बांट-कर खाने लगते हैं. गठबंधन के असर से एक दूसरे के लिए, पूर्व के साम्प्रदायिक दल राष्ट्रवादी बन जाते हैं, तो सामाजिकता का नारा बुलंद करने वाले दल भ्रष्टाचारी बन जाते हैं, आम आदमी आज विशिष्ट हो जाता है और कल का विशिष्ट, आज निरीह जनता बन जाता है.

इधर साहित्यिक गठबंधनों – यानी लेखकों-पाठकों-अनुसरणकर्ताओं की भी बाढ़ आई हुई है. सोशल मीडिया ने इस गठबंधनी बाढ़ को बड़ी हवा दी है. 1-1 लेखक के लाखों फॉलोअर हैं. लेखक को वर्तनी का व नहीं आता, कि और की कहाँ लगाना है वो यह नहीं जानता, नहीं और नही में फर्क (या, फ़र्क़?) नहीं कर सकता वो चार लाइन लिख देता है – बहुधा समकालीन राजनीति, या राजनीतिक व्यक्ति या धर्म के बारे में – और उसे मिलते हैं लाखों हिट्स, हजारों लाइक्स, सैकड़ों कमेंट. और, बेचारा सारगर्भित, शुद्ध, सुसंस्कृत, शोध-पूर्ण लेख लिखने वाला लेखक 1-1 पाठक को तरसता रहता है. कट-पेस्टिया और चुटकुलों-पंचतंत्रीय-कहानियों को नए रूप में ढालकर लिखने वाले लेखकों के तो और भी मजे हैं. कवियों का तो कहना ही क्या! आजकल व्यंग्यकारों के भी गठबंधन हैं – कुछ पंच मार उड़ा रहे हैं, कुछ सार तत्व, सरोकार और मार्मिकता ढूंढ रहे हैं तो कुछ को व्यवस्था को गरियाना व्यंग्य लगता है तो कुछ को नहीं! एक दूसरे की नजर में ये गठबंधन कुछ को एवरेज टाइप लगते हैं तो कुछ को श्रेष्ठ और कुछ को महा-श्रेष्ठ. जाहिर सी बात है, बहुतों को निकृष्ट भी लगते होंगे, पर, फिर, पंगा कौन मोल ले?

वैसे तो मेरे दिमाग में विचारों की बाढ़ आई हुई है इस मसले पर, परंतु दिमाग-और-उंगलियों का गठबंधन कीबोर्ड पर उन्हें टाइप नहीं करने दे रहा - एक टी ब्रेक मांग रहा है. इसलिए यहीं बंद करते हैं. और, इस बात का भी तो खतरा है कि अगर इस किस्से को एकता कपूर के सीरियल की तरह लंबा खैंच दूं तो मेरा आपका लेखक-पाठक गठबंधन टूट कर किसी और ब्लॉग के पन्ने की बाढ़ की ओर क्लिक/टैप तो न हो जाएगा!

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संदर्भ- अमेरिका के वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट का बच्चों पर किए शोध का नतीजा-

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भारत ही नहीं दुनिया के प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को साफ-सुथरा, सुरक्षा व कीटाणु रहित वातावरण देना चाहते हैं, जिससे उनके बच्चे गंदगी की चपेट में आकर बीमार न पड़ें। लेकिन अब माता-पिता इसे लेकर आश्वस्त हो सकते हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी बच्चों के लिए हानिकारक नहीं है, बल्कि उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं को टीम के अगुवा वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट ने मिट्टी और बच्चों पर यह शोध किया है। दो बच्चों के पिता गिलबर्ट ने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो से माइक्रोबॉयलॉजी परिस्थितिकी तंत्र की पढ़ाई की है। वे खोज कर रहे हैं कि मिट्टी और उसमें पाए जाने कीटाणु किस तरह बच्चों को प्रभावित करते हैं। गिलबर्ट ने मिट्टी में पाए जाने वाले ‘जीवाणुओं से फायदे, बच्चों का विकास और प्रतिरक्षा‘ नाम से एक किताब लिखी है। 

जी हां..., अब नई खोजों और प्रयोगों से यही हकीकत सामने आ रही है कि हाथ धोकर सफाई के पीछे पड़ना मानव जीवन के लिए खतरा है।  अब नए अनुसंधान तय कर रहे हैं कि हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से जो सूक्ष्म जीव, मसलन जीवाणु (बैक्टीरिया) और विषाणु (वायरस) प्रविष्ट होते हैं, वे बीमारियां फैलाने वाले दुश्मन न होकर बीमारियों को दूर रखने वाले मित्र भी होते हैं। इसीलिए गिलबर्ट ने कहा है कि कई बार जमीन पर खाना गिरने के बाद उसे फेंक देते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि वह गंदा हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। खाने में लगे कीटाणु बच्चे के लिए फायदेमंद होंगे। बच्चों को मिट्टी में खेलने से एलर्जी इसलिए होती हैं, क्योंकि हम उन्हें कीटाणु से बचाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। जीवाणु की कमी की वजह से बच्चे अस्थमा, फूड एलर्जी जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। 

प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव निवासरत हैं, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत व काया को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। हमारे शरीर में जितनी कोशिकाएं हैं, उनमें 10 प्रतिशत हमारी अपनी हैं, बाकी कोशिकाओं पर 9 करोड़ सूक्ष्म जीवों का कब्जा है। जो शरीर में परजीवी की तरह रहते हैं। तय है, हमें इनकी उतनी ही जरूरत है, जितनी की उनको हमारी। बल्कि अब तो वैज्ञानिक यह भी दावा कर रहे हैं कि मानव और सूक्ष्म जीवों का विकास साथ-साथ हुआ है। मनुष्य ने जीनोम को अब अक्षर-अक्षर पढ़ लिया गया है। इससे ज्ञात हुआ है कि हमारे जीनोम में हजारों जींस का वजूद जीवाणु और विषाणुओं की ही उपज है।

       नए अनुसंधान वैज्ञानिक मान्यताओं को बदलने का काम भी करते हैं और धीरे-धीरे नई मान्यता प्रचलन में आ जाती है। बीसवीं सदी के पहले चरण तक यह धारणा थी कि सूक्ष्मजीव ऐसे शैतान हैं, जो हमारे शरीर में केवल बीमारियां फैलने का काम करते हैं। इसीलिए इनसे दूरी बनाए रखने का आसान सा तरीका अपनाए जाने की नसीहत सामने आई कि यदि चिकित्सक अपने हाथों को साबुन से मल-मलकर धोने की तरकीब अपना लें तो इस एकमात्र उपाय से अस्पताल में इलाज के दौरान मर जाने वाले लाखों मरीजों की जान बचाई जा सकती है ? अलबत्ता नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी वैज्ञानिक इल्या मेचनीकोव ने अपने शोध से इस अवधारणा को बदलने का काम किया। जब 1910 के आसपास मेचनीकोव बुल्गारिया के निरोगी काया के साथ लंबी उम्र जीने वाले किसानों पर शोध कर रहे थे, तब किसानों की लंबी आयु का रहस्य उन्होंने उस दही में पाया जिसे आहार के रूप में खाना उनकी दिनचर्या में शामिल था।

              दरअसल खमीर युक्त दुग्ध उत्पादों में ऐसे सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारे जीवन के लिए जीवनदायी हैं। सूक्ष्मजीव हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण पर होते हैं। ये समूह शरीर में प्रविष्ट होकर पाचन तंत्र प्रणाली में क्रियाशील हो जाते हैं। इस दौरान ये लाभदायी जीवाणुओं की वृद्धि को उत्तेजित करते हैं और हानिकारक जीवाणुओं का शमण करते हैं। इन्हें चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘अनुजीवी‘ या ‘प्रोबायोटिक्स‘ कहते हैं। अब अनुजीवियों को सुगठित व निरोगी देह के लिए जरूरी माना जाने लगा है। इन्हें प्रतिरोधक के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह भी आहार वैज्ञानिक देने लगे हैं। ‘प्रोबायोटिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है। जिसका सरल सा भावार्थ है ‘स्वस्थ्य जीवन के लिए उपयोगी’। प्रोबायोटिक्स शब्द को चलन में लाने की सबसे पहले शुरूआत लिली एवं स्टिलवैल वैज्ञानिकों ने की थी। इसका प्रयोग उन्होंने तब किया जब वे प्राटोजोआ द्वारा पैदा होने वाले तत्वों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि इसमें ऐसे विचित्र तत्व विद्यमान हैं, जो तत्वों को सक्रिय करते हैं। हालांकि यह कोई नया पहलू नहीं था। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रंथों में जीवाणुओं के संबंध में विस्तृत जानकारियां हैं। आयुर्वेद दुग्ध के सह-उत्पादों के गुण-लाभ से भरा पड़ा है। अर्थववेद और उपनिषदों में भी सूक्ष्म जीवों के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट के फारसी संस्करण में उल्लेख है कि अब्राहम ने खट्टे दूध व लस्सी के सेवन से ही लंबी आयु हासिल की थी। 76 ईसापूर्व टिलनी नामक रोमन इतिहासकार ने जठराग्नि (गेस्ट्रोइंटीराईटिस) के उपचार के लिए खमीर उठे दूध के उपयोग को लाभकारी बताया था। इन जानकारियों से तय होता है कि अनुजीवियों के अस्तित्व और महत्त्व से आयुर्वेद के वैद्याचार्य बखूबी परिचित थे।

       सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार होने से पहले तक हम इस वास्तविकता से अनजान थे कि 10 लाख से भी अधिक जीवन के ऐसे विविध रूप हैं, जिन्हें हम सामान्य रूप से देखने में अक्षम हैं। इस हैरतअंगेज जानकारी से चिकित्सा विज्ञानियों का साक्षात्कार तब हुआ, जब लुई पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने एक दल के साथ सूक्ष्मदर्शी उपकरण को सामान्य जानकारियां हासिल करने के लिए प्रयोग में लाना शुरू किया। जब इन सूक्ष्म जीवों को पहली मर्तबा सूक्ष्मदर्शी की आंख से देखा गया तो वैज्ञानिक हैरानी के साथ परेशान हो गए और वे इन जीवों को मनुष्य का दुश्मन मानने की भूल कर बैठे। जैसे इंसान की मौत का सबब केवल यही जीव हों। लिहाजा इनसे मुक्ति के उपाय के लिहाज से दूध उत्पादों से इनके विनाश की तरकीबें खोजी जाने लगीं। और विनाश की इस प्रक्रिया को ‘पाश्चरीकरण‘ नाम से भी नवाजा गया। प्रति जैविक या प्रतिरोधी एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण और उनके प्रयोग का सिलसिला भी इनके विनाश के लिए तेज हुआ। लेकिन 1910 में इस अवधारणा को इल्या मेचनीकोव ने बदलने की बुनियाद रखी और फिर मनुष्य के लिए इनके लाभकारी होने के शोधों का सिलसिला चल निकला।

       सूक्ष्मजीव इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक ग्राम मिट्टी में लगभग दो करोड़ जीवाणु आसानी से रह लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इनकी करीब 10 हजार प्रजातियां हैं। ये हरेक विपरीत माहौल में सरलता से रह लेते हैं। इसीलिए इनका वजूद धरती के कण-कण में तो है ही, बर्फ, रेगिस्तान, समुद्र और जल के गर्म स्रोतों में भी विद्यमान है। हाल ही में स्कॉटलैण्ड के सेंट एंड्रयूज विश्व विद्यालय के शोधकर्त्ताओं ने अफरीकन जनरल ऑफ साइंस में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि नमीबिया के ऐतोशा राष्ट्रीय उद्यान में जीवाश्मविदों ने खुदाई की। इस खुदाई के निष्कर्षों में दावा किया गया है कि उन्होंने सबसे पहले अस्तित्व में आए सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों को खोज निकाला है। ये जीवाश्म 55 करोड़ से लेकर 76 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं। ये ओटाविया ऐंटिक्वा स्पंज जैसे जीव थे। जिनके भीतर ढेर सारे छिद्र बने हुए थे, जो जीवाणु, विषाणु और शैवालों को खुराक उपलब्ध कराने में मदद करते थे। शोधकर्ताओं का दावा है कि हिमयुग से पहले के समय में पनपने वाले ये बहुकोशीय जीव हिमयुग के कठोर बर्फानी मौसम को भी बर्दाश्त करने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने इन जीवों को बेहद पुराना बताते हुए कहा है कि पृथ्वी पर सभी जीवों की उत्पत्ति इन्हीं जीवों से हुई होगी ? इससे तय होता है कि इनकी जीवन रक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है।

       मानव शरीर के तंत्र में अनुजीवियों का जीवित रहना जरूरी है। क्योंकि ये सहजीवी हैं और इनका संबंध भोजन के रूप में ली जाने वाली दवा से है। दही में ‘बाइफिडो बैक्टीरियम’ वंश के विषाणु पाए जाते हैं। इन्हें ही लेक्टोबेसिलस बाईफिडस कहते हैं। ये हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण मसलन आंतों में पल्लवित व पोषित होते रहते हैं। इसे ही आहार नाल कहा जाता है। यह लगभग 30 फीट लंबी व जटिल होती है। आहार को पचाकर मल में तब्दील करने का काम जीवाणु ही करते हैं। इस नाल में जीवाणुओं की करीब 500 प्रजातियां मौजूद रहती हैं। जिन्हें 50 विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। इन सूक्ष्म जीवों की कुल संख्या करीब 1011 खरब है। मनुष्य द्वारा शौच द्वार विसर्जित मल में 75 फीसदी यही जीवाणु होते हैं। शरीर में जरूरी विटामिनों के निर्माण में भागीदारी इन्हीं जीवाणुओं की देन है। यही अनुजीवी शरीर में रोग पैदा करने वाले पैथोजनिक जीवाणुओं को नष्ट करने का काम भी करते हैं। शरीर में रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद चिकित्सक जो प्रतिरोधक दवाएं देते हैं, उनके प्रभाव से बड़ी संख्या में शरीर को लाभ पहुंचाने वाले अनुजीवी भी मर जाते हैं। इसीलिए चिकित्सक दही अथवा ऐसी चीजें खाने की सलाह देते हैं, जिससे लेक्टोबेसिलस अनुजीवियों की बड़ी तादाद खुराक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाए।

       जिन जीवाणु और विषाणुओं को शरीर के लिए हानिकारक माना जाता था, वे किस तरह से फायदेमंद हैं, यह अब नई वैज्ञानिकों खोजों ने तलाश लिया है। कुछ समय पहले तक यह धारणा प्रचलन में थी कि छोटी आंत में अल्सर केवल तनावग्रस्त रहने और तीखा आहार लेने से ही नहीं होता, बल्कि इस रोग का कारक ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु है। इस सिद्धांत के जनक डॉ. बैरी मार्शल और रॉबिन वारेन थे। किंतु न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के स्कूल अॉफ मेडिसिन के डॉ. मार्टिन ब्लेसर ने इस सिद्धांत को एकदम उलट दिया। उन्होंने अपने अनुसंधान में पाया कि ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु मनुष्य जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं। यह करीब 15 करोड़ सालों से लगभग सभी स्तनधारियों के शरीर में एक सहजीवी के रूप रोग प्रतिरोधात्मक की भूमिका का निर्वहन करता चला आ रहा है। इसकी प्रमुख भूमिका पेट में तेजाब की मात्रा को एक निश्चित औसत अनुपात में बनाए रखना है। यह पेट में बनने वाली अम्लीयता का इस तरह से नियमन करता है कि वह जीवाणु और मनुष्य दोनों के लिए ही फलदायी होता है। किंतु जब जीवाणु का ही हिस्सा बने रहने वाला सीएजी नाम का जीव उत्तेजित हो जाता है तो शरीर में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं। बहरहाल,हेलिकोबैक्टर पायलोरी की आंतों में मौजूदगी,अम्ल के नियमन की प्रक्रिया जारी रखते हुए, प्रतिरक्षा तंत्र को ताकतवर बनाने का काम करती है। इसलिए ज्यादा मात्रा में प्रतिरोधक दवाएं लेकर इन्हें मारना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

       इस बाबत् एक और बानगी देखें। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में एक महिला उपचार के लिए आई। दस्तों के चलते इसके प्राण ही खतरे में पड़ गए थे और दवाएं बेअसर थीं। तमाम नुस्खे आजमाने के बाद चिकित्सा दल ने एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया और इस महिला को निरोगी व्यक्ति के मल में मौजूद जीवाणुओं की सिलसिलेवार खुराकें दीं। प्रयोग आश्चर्यजनक ढंग से सफल रहा। 48 घंटों के भीतर दस्त बंद हो गए। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञानियों में जिज्ञासा जगी कि अनुजीवियों और प्रतिरक्षा तंत्र के सह-अस्तित्व आधारित उपचार प्रणालियां विकसित की जाएं। इस परिकल्पना को ही आगे बढ़ाते हुए दमा रोग के उपचार का सिलसिला स्विस इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एण्ड अस्थमा रिसर्च में काम शुरू हुआ। इस संस्था के प्रतिरक्षा तंत्र वैज्ञानिकों ने उपचार के नए प्रयोगों में पाया कि टी कोशिकाओं में गड़बड़ी के कारण एलर्जी रोग उत्पन्न होते हैं। अब पौल फोरसाइथ जैसे वैज्ञानिक इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, इस कोशिश में लगे हैं कि वे कौन सी कार्य-प्रणालियां हैं जिनके जरिए अनुजीवी प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नियमन रखते हुए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसी कड़ी में 2010 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि क्लॉस्ट्रडियम परफ्रिंजेंस नाम का जीवाणु बड़ी आंत का निवासी है। यह जीवाणु जरूरत पड़ने पर टी कोशिकाओं में इजाफा करता है। यही कोशिकाएं रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों से लड़कर उन्हें परास्त करती हैं।

       अनुजीवियों के महत्व पर नए अनुसंधान सामने आने के साथ-साथ चिकित्सा-विज्ञानियों की एक शाखा कीटाणुओं पर अनुसंधान करने में जुट गई। हालांकि इसके पहले शताब्दियों से यह अवधारणा विकसित होती चली आ रही है कि शरीर में मुंह के जरिए प्रविष्ट हो जाने वाले कृमि मानव समाज में बीमारियों के जनक हैं ? 1870 में तो पूरा एक ‘कीटाणु सिद्धांत’ ही वजूद में आ चुका था। जिसका दावा था की प्रत्येक बीमारी की जड़ में वातावरण में धमा-चौकड़ी मचाए रखने वाली कृमि हैं। इस सिद्धांत के आधार पर ही बड़े पैमाने पर कीटाणुनाशक प्रतिरोधक दवाएं वजूद में आईं। पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने का काम करने वाले कीटाणुओं को रोग का कारक मानते हुए, इन्हें नष्ट करने के अभियान चलाए जाने लगे। परिवेश को संपूर्ण रूप से स्वच्छ बनाए रखने के साथ मानव अंगों को भी साफ-सुथरे रखने के अभियान इसी सिद्धांत की देन हैं। लेकिन इस सिद्धांत को पलटने का काम रॉबर्ट कोच, जोसेफ लिस्टर और फ्रांस्सेको रेडी जैसे वैज्ञानिकों ने किया। इन्होंने पाया कि कृमि प्रजातियों में कई प्रजातियां ऐसी भी हैं,जो रोगों को नियंत्रित करती हैं। अब तो यह दावा किया जा रहा है कि कोलाइटिस क्रोहन और ऑटिज्म जैसे रोग अतिरिक्त सफाई का माहौल रच दिए जाने के कारण ही बढ़ रहे हैं।

       इस सिलसिले में यहां एक अनूठे उपचार को बतौर बानगी रखना जरूरी है। अयोवा विश्वविद्यालय में कृमियों के महत्व पर शोध चल रहा है। यहां एक ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे को उपचार के लिए लाया गया। ऑटिज्म एक ऐसा बाल रोग है, जो बच्चों को बौरा (पगला) देता है। वे खुद के अंगों को भी नाखून अथवा दांतों से काटकर हानि पहुंचाने लगते हैं। अपनी मां के साथ भी वे ऐसी ही क्रूरता का व्यवहार अपनाने लग जाते हैं। जब दवाएं बेअसर रहीं तो ऐसे बच्चों के इलाज के लिए अयोवा विश्वविद्यालय में जारी कृमि-शोध को प्रयोग में लाया गया। चिकित्सकों की सलाह पर इन बच्चों को ‘ट्राइचुरिस सुइस’ कीटाणु के अण्डों की खुराकें दी गईं। बालकों के पेट में अण्डें पहुंचने पर ऑटिज्म के लक्षणों में आशातीत बदलाव दिखाई देने लगा और धीरे-धीरे इनके अतिवादी आचरण में कमी आती चली गई।

       इन प्रयोगों ने तय किया है कि धवल स्वच्छता के अतिवादी उपाय मनुष्य के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं ? मनुष्य और जीवों का विकास प्रकृति के साथ-साथ हुआ है। जिस तरह से खेतों में कीटनाशकों का बहुलता से प्रयोग कर हम कृषि की उत्पादकता और खेतों की उर्वरा क्षमता खोते जा रहे हैं, उसी तर्ज पर ज्यादा से ज्यादा एंटी बायोटिकों का प्रयोग कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करते हुए उसे बीमारियों का अड्ढा बना रहे हैं। जीवाणु, विषाणु और कीटाणु मुक्त जल और भोजन को जरूरी बना दिए जाने की मुहिमें भी खतरनाक बीमारियों को न्यौत रही हैं। दुर्भाग्य से सफाई का दारोमदार अब कारोबार का हिस्सा बन गया है और मनुष्य को जीवन देने वाले तत्वों को निर्जीवीकृत करके आहार बनाने की सलाह दी जा रही है। सूक्ष्मजीवों से दूरी बनाए रखने के ये उपाय दरअसल जीवन से खिलवाड़ के पर्याय बन जाने के नाना रूपों में सामने आ रहे हैं। लिहाजा ज्यादा स्वच्छता के उपायों से सावधान रहने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्री राम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

फोन- 09425488224&9981061100Qksu 07492 404524

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने पुनर्जन्म लिया और एक बार फिर वो भारत की यात्रा पर निकल लिया. पेश है उसकी सन् 2017 की भारत यात्रा का अति-संक्षिप्त विवरण –

जैसे ही मैं इंदिरा गांधी एयरपोर्ट टर्मिनल पर उतरा, सामने दैत्याकार बोर्ड पर चीनी मोबाइल ब्रांड वीवो का विज्ञापन लगा था और लिखा था – वीवो वेलकम्स यू इन इंडिया! मुझे तब से ही लग गया था कि इस बार की भारत यात्रा भी अच्छी खासी मजेदार, दिलचस्प रहने वाली है.

मैं एक्ज़िट गेट की तरफ आगे बढ़ा. एक बेहद विशालकाय, ह्यूआवेई के 4-K टीवी स्क्रीन पर कोई भारतीय पसंदीदा शो चल रहा था. देखने वालों की भीड़ लगी थी. सोचा मैं भी देखूं. जैसे ही देखने के लिए मैंने अपना मुंह घुसाया, एक ब्रेक आया और विज्ञापन आया – ओप्पो प्रेजेंट्स द अनलाफ़्टर शो!

अचानक मुझे याद आया कि चलो इंडिया पहुँच गए हैं यह बात घर वालों को बता दी जाए. मैंने एयरपोर्ट की मुफ़्त वाई-फ़ाई सेवा का लाभ उठाने के लिए साइट खोली. वहाँ प्रकट हुआ – वेलकम टू एयरपोर्ट फ्री हाई स्पीड वाई-फ़ाई सर्विसेज. स्पांसर्ड बाई अलीबाबा एंड मैनेज्ड बाई जेडटीई.

मैंने एयरपोर्ट का लंबा गलियारा पैदल नापने के बजाय उपलब्ध इलैक्ट्रिक व्हीकल से पार करना चाहा. साफ सुथरा और आरामदायक इलैक्ट्रिक वाहन था वो. उत्सुकतावश, वाहन के नाम-पट्ट पर स्वयमेव निगाह चली गई. नाम पत्र पर शेनडांग ज़ूफ़ेंग व्हीकल कं लिमिटेड चाइन का नाम नजर आया. ओह!

मेरे सामने एक सुंदरी अपने टैब पर यू-ट्यूब पर साई का नया डांस वीडियो देख रही थी. उसके टैब का रंग बड़ा अच्छा था. कुछ-कुछ नीली आभा लिए. मैंने यूँ ही पूछ लिया – कौन सा टैब है यह?

शियामी नोट 6 – उसने गर्व से उत्तर दिया.

सामने एक गिफ़्ट और सोवेनियर शॉप दिखा तो मैं वहाँ चला गया. की-रिंग व की-चेन से लेकर रिमोट कंट्रोल्ड ड्रोन व हेलिकॉप्टर खिलौने सब कुछ थे वहाँ. मैंने एक दो पैकेट उठाए और कीमतें और निर्माता आदि का नाम देखा. कीमतें तो विविध थीं, जेब-जेब के मुताबिक, परंतु निर्माता-देश एक ही छपा नजर आया – मेड इन चाइना. शायद इनके पैकेटों में प्रिंटिंग मिस्टेक आ गया होगा जिसकी वजह से हर पैकेट पर मेड इन चाइना छपा था. खिलौने भी, चॉकलेट भी, प्रतीक चिह्न भी – सबकुछ मेड इन चाइना. वो भी भारत में?

मैं बाहर निकला तो ट्रैफ़िक जाम में फंस गया. रक्षाबंधन का समय था तो सड़कों बाजारों में वैसे भी बहुत भीड़ पहले से थी, ऊपर से एक बड़ा भारी जुलूस भी निकल रहा था. जिसमें लोगों ने पोस्टर बैनर टांग रखे थे – स्वदेशी अपनाओ, चीनी रक्षाबंधन का बहिष्कार करो!

मेरी पिछली यात्रा में दिल्ली के ठगों की खूब धूम थी. पता नहीं इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद उन बिरादरी का क्या हाल हुआ होगा. एक से यूँ ही बातों बातों में पूछा, तो उसने संसद भवन का पता बताया और टीप दी कि अब वहाँ केवल दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के ठग मिलते हैं.

मैंने अपनी भारत यात्रा वहीं समाप्त कर दी – आगे की यात्रा में मेरी दिलचस्पी खत्म हो गई. हाँ, एकमात्र दिलचस्प बात यह मिली कि भारत विचित्रताओं का देश अभी भी बना हुआ है - नाम यूँ हिन्दुस्तान है, सामान सब चीनी भरा है, और भाषा अंग्रेज़ी है!









आपके हाथों में यह वाला स्मार्टफ़ोन यकीनन आपके लिए टेस्टी ही होगा परंतु सामने वाले को यह घोर नापसंद भी हो सकता है। इसलिए, जरा संभलकर और सोच विचार कर!

अब, इसका बैंगलुरु मेट्रो में चल रहे हिन्दी कन्नड़ विवाद से कोई लेना देना है या नहीं यह तो नहीं पता, मगर गूगल मानचित्र हिन्दी अक्षरों को ढंक कर उसके ऊपर कन्नड़ अक्षर छाप रहा है।
विश्वास नहीं होता?

नीचे का स्क्रीनशॉट देखें -


मोबाइल और गूगल मानचित्र की डिफ़ॉल्ट भाषा हिन्दी में सेट है। तो फिर यहां बैंगलुरु की सड़कों पर गूगल हिन्दी में दिशानिर्देश देने के बजाय कन्नड़ में क्यों दे रहा है? ये, बग तो शर्तिया नहीं हो सकता!
अब, मैं कैसे ड्राइव करुं? या, वापस अंग्रेजी में लौट आऊं?

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दुकालू नंबर 1

30 तारीख की कत्ल की रात है. आज से दुकालू का भाग्य बदलने वाला है. उसके साथ ही उसके मुहल्ले, शहर, प्रांत, देश का भाग्य बदलने वाला है. सबकुछ बढ़िया होने वाला है. न केवल एक देश एक टैक्स सिस्टम होने वाला है, बल्कि बहुत सी चीजों पर कर यानी टैक्स भी कम होने वाला है जिससे चीजें सस्ती होंगी. वह खुश है कि सरकार को 500 तरह के एंट्री टैक्स, वेट टैक्स आदि आदि भिन्न भिन्न करों के बजाय अब उसे केवल एक ही टैक्स देना होगा. नोटबंदी के बाद यह टैक्सबंदी सरकार का देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का सबसे बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक है.

अपनी झुग्गी झोपड़ी में आराम से लेटा, अपने अनगिनत बार रिपेयर किए गए, सीआरटी – पिक्चर ट्यूब वाली 14 इंची टीवी में बिजली की कंटिया फंसा कर और केबल टीवी में जम्फर लगा कर वो संसद में अर्धरात्रि का बजने वाला घंटा उत्साह से देखता-सुनता है और उसका मन प्रफुल्लित हो जाता है. टीवी के डिबेट में जब वह सुनता है कि ऑडी और मर्सिडीज़ की लक्झ़री कारें सस्ती होंगी, हाई एंड, डिजाइनर मोटरसाइकलें सस्ती होंगी तो वो गद्गद होकर बादशाह का नया ताजा जारी रैप गुनगुनाने लगता है. वो कल्पना करने लगता है कि अब पूरा देश का टैक्स सिस्टम बेहद ईमानदार, पारदर्शी हो गया है और उसका देश भी विकसित देशों की सूची में नंबर एक की स्थिति में आ गया है. वो मन ही मन जीएसटी के विरोधियों को गरियाता है और अपने सेकण्ड हैंड स्मार्टफ़ोन, जिसकी बैटरी कब की मर चुकी है, उसे चार्जिंग में डाल कर नए सिरे से, नए उत्साह से जीएसटी के फायदे वाले संदेशों को फारवर्ड मारने में जुट जाता है.

दुकालू नंबर 2

30 तारीख की कत्ल की रात है. आज से दुकालू [जो अभिजात्य वर्ग में डी.आर. सिंह साहब के नाम (पूरा नाम दुकालू राम सिंह,) से जाने जाते हैं] का भाग्य बदलने वाला है. सबकुछ गर्त में जाने वाला है. कितना बढ़िया टैक्स सिस्टम था देश में जिसका कबाड़ा होने वाला है. सरकार ग़रीबों पर यह नया टैक्स सिस्टम लाकर जुल्म कर रही है. मैन्यूफ़ैक्चरिंग बंद हो जाएगा, बाजार में माल खत्म हो जाएगा, जिस वजह से कीमतें आसमान छूने लगेंगी. देश में महंगाई बढ़ेगी, जीडीपी का कबाड़ा होगा और देश अंधकार युग में चला जाएगा.

12 कारों की कैपेसिटी वाले ऑटोमेटिक गैराज युक्त अपने 5 बीएचके विला के टॉप फ्लोर पर स्थित पेंटहाउस में प्रीमियम एज्ड वाइन नेकेड ग्रेप की चुस्कियां मारते हुए अपने आयातित, 107 इंची, 4के डॉल्बी विज़न टीवी पर जब वो संसद में अर्धरात्रि का बजने वाला घंटा देखता-सुनता है तो उसकी आंखें नम होकर धुंधली हो जाती हैं और वो गम में डूब जाता है. टीवी के डिबेट में जब वो सुनता है कि तमाम उत्पाद करों की मार से महंगे हो जाएंगे, सिनेमा टिकट महंगे हो जाएंगे, मनोरंजन महंगा हो जाएगा, तो वो मेहंदी हसन की गाई गमगीन ग़ज़ल स्वयमेव गुनगुनाने लगता है. वो कल्पना करने लगता है कि अब पूरा देश का टैक्स सिस्टम जो अभी ढंग से चालू भी नहीं हुआ है, कोलैप्स हो जाएगा और बिजनेस का भट्ठा बैठ जाएगा क्योंकि टैक्स तो भले ही एक हो पर अनुपालन और रिटर्न तो 500 से अधिक है. वो अपने देश को कतार में सोमालिया के पीछे खड़ा पाता है. वो मन ही मन जीएसटी के समर्थकों को गरियाता है और अपने लेटेस्ट फ़्लैगशिप स्मार्टफ़ोन, जिसमें एक्सटर्नल और फास्ट, डैश चार्ज की सुविधा भी है, को उठाता है और जीएसटी के विरोध में अगले दिनों होने वाले विरोध प्रदर्शनों, लाबीइंग आदि की तैयारी में जुट जाता है.

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अब आपसे एक जेनुइन सवाल है. आप किस किस्म के दुकालू हैं? नंबर 1 के या नंबर 2 के?

एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट का मतलब आप बता सकते हैं?
मैं (या हर कोई जिसके फोन में एंड्रॉयड नूगट और उबेर इंस्टाल है और इंटरफ़ेस हिंदी में है,)
बता सकता हूं।
इसका अर्थ है उबेर।
जी, हाँ, वही उबेर - टैक्सी सेवा प्रदान करने वाला ऐप्प।
भरोसा नहीं तो नीचे का स्क्रीनशॉट देखें -

पहले तो मैं भी चकराया, एक बार ऐप्प अनइंस्टाल किया, दोबारा इंस्टाल किया तो पाया कि उबेर मतलब एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट! 😁

यह अनुवाद / स्थानीयकरण में बग का क्लासिक उदाहरण है।
एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट से मैं टैक्सी सेवा का बखूबी आनंद लेता हूँ।

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हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण : परिणाम हाजिर हैं

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 08, 2009

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वैसे तो किसी सर्वेक्षण की सफलता या ये कहें कि उसकी परिशुद्धता उसके सैंपलिंग की मात्रा के समानुपाती होती है, तो इस आधार पर अनुमानित 10 हजार हिन्दी चिट्ठाकारों में से कम से कम 1 हजार चिट्ठाकार इस सर्वे में भाग लेते तो आंकड़ों पर दमदारी से कुछ कहा जा सकता था. फिर भी, इस सीमित सर्वेक्षण में कुछ ट्रैंड तो पता चले ही हैं. तो प्रस्तुत है हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम:(1) हिन्दी चिट्ठाकारी में अचानक टपक पड़ने वाले अधिकांश (57.4%) का मानना है कि वे इंटरनेट सर्च के माध्यम से यकायक इस दुनिया से परिचित हुए. बहुत से चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग का हर संभव प्रचार प्रसार अपने मित्रों के बीच किया, और वे भी अपने मित्रों (27.9%) को हिन्दी ब्लॉग दुनिया में खींच लाने में सफल हुए.एक चिट्ठाकार की मजेदार प्रतिक्रिया रही : हमें तो हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में पता ही नहीं था जी, अपने आप को फन्ने खां समझ रहे थे हिन्दी ब्लॉग चालू करके जब दूसरे लोगों ने आकर भ्रम तोड़ा!! ;)(2) चिट्ठाकारों के बीच हिन्दी में लिखने का सबसे सुलभ तरीका (52.5%), जाहिर है – फोनेटिक कुंजीपट ही बना हुआ है:(3) हिन्दी में लिखने के लिए चिट्ठ…

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विश्व के शीर्ष चिट्ठाकार क्या और कैसे चिट्ठे लिखते हैं....

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 29, 2007

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(डिजिटल इंसपायरेशन में अमित अग्रवाल ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) (प्रोब्लॉगर में डेरेन रॉस ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) क्या आपको पता है कि विश्व के शीर्ष क्रम के चिट्ठाकार क्या और कैसे लिखते हैं? मेरा मतलब है कि वे अपना विषय कैसे चुनते हैं? कैसे वे सोचते हैं कि कौन सा विषय उनके पाठकों को सर्वाधिक आकर्षित करेगा? खासकर तब, जब वे नियमित, एकाधिक पोस्ट लिखते हैं. मैं पिछले कुछ दिनों से विश्व के कुछ शीर्ष क्रम के ब्लॉगरों (अंग्रेज़ी के) के चिट्ठों को खास इसी मकसद से ध्यानपूर्वक देखता आ रहा हूँ, और मुझे कुछ मजेदार बातें पता चली हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ. बड़े - बड़ों की कहानियाँ हथिया लें.इस बात की पूरी संभावना होती है कि शीर्ष क्रम के सारे के सारे चिट्ठाकार बड़ी कहानियों और बड़े समाचारों के बारे में चिट्ठा पोस्ट लिखें. बड़े समाचार को कोई भी शीर्ष क्रम का चिट्ठाकार छोड़ना नहीं चाहता. अब चाहे इससे पहले सैकड़ों लोगों ने उस विषय पर चिट्ठा लिख मारे हों, मगर फिर भी बड़े चिट्ठाकार उस विषय पर लिखते हैं कुछ अलग एंगल और अलग तरीके से पेश करते हुए – हालाकि वे कोई नई बात नहीं ब…

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ब्लॉगिंग एथिक्स बनाम कार्पेल टनल सिंड्रोम

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 09, 2007

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आप पूछेंगे कि दोनों में क्या समानता है?पहले पूरा आलेख तो पढ़िए जनाब. समानता है भी या नहीं आपको खुद-बख़ुद पता चल जाएगा.तो आइए, पहले बात करें कार्पेल टनल सिंड्रोम की. मेरे एक बार निवेदन करने पर ही फुरसतिया जी ने मेरी फ़रमाइश पूरी कर दी. उन्होंने दो-दो बार फ़रमाइशें दे कर मुझे शर्मिंदा कर दिया कि मैं कार्पेल टनेल सिंड्रोम के बारे में लिखूं. अब भले ही मैं कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में ज्यादा बोलने बताने का अधिकारी नहीं हूं, मैं स्वयं मरीज हूँ - चिकित्सक नहीं, मगर उनका आग्रह तो मानना पड़ेगा.मगर, फिर, कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में बात करने से पहले चर्चा कर ली जाए ब्लॉगों की - खासकर हिन्दी ब्लॉगों की. पिछला हफ़्ता हिन्दी ब्लॉगों के लिए कई महत्वपूर्ण मुकाम लेकर आया. एनडीटीवी पर हिन्दी चिट्ठों के बारे में नियमित क्लिप दिए जाने हेतु कुछ चिट्ठाकारों की बात अभी हुई ही थी कि याहू हिन्दी ने अपने पृष्ठ पर नारद के सौजन्य से हिन्दी चिट्ठों को जोड़ लिया. बीबीसी से भी प्रस्ताव आया है और इधर जीतू भाई बता रहे हैं कि उनकी सीक्रेट बातचीत गूगल से भी चल रही है. एमएसएन पिछड़ क्यों रहा है यह मेरी मोटी बुद…

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चिट्ठाकारों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जनवरी 02, 2008

प्रत्येक हिन्दी चिट्ठाकार को निम्न दस संकल्प लेने चाहिएँ. ये संकल्प उन्हें चिट्ठासंसार में प्रसिद्धि, खुशहाली व समृद्धि दिलाने में शर्तिया मददगार होंगे. मैं टिप्पणी करूंगा – हर तरह की, हर किस्म की, नियमित, नामी-बेनामी-सुनामी-कुनामी. शुरुआत इस चिट्ठे पर टिप्पणी देकर कर सकते हैं. प्रति दस टिप्पणियों पर एक प्रति-टिप्पणी की गारंटी, तथा साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस चिट्ठे पर टिप्पणी प्रदान करने पर सफलता की संभावना अधिक है. मैं नित्य कम से कम एक चिट्ठा पढूंगा – ठीक है, प्रतिदिन सौ दो सौ चिट्ठे प्रकाशित होने लगे हैं और इनकी संख्या 2008 में एक्सपोनेंशियली बढ़नी ही है और एक पाठक के रुप में कोई भी इनमें से सभी पोस्टों को अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पढ़ सकता मगर वो रोज कम से कम एक, इस चिट्ठे को तो पढ़ ही सकता है. तो, अच्छे प्रतिफल के लिए अपने संकल्प में इस चिट्ठे की हर प्रविष्टि को पढ़ने में अवश्य शामिल करें मैं सप्ताह में कम से कम एक पोस्ट लिखूंगा. वैसे तो कोई भी हिन्दी चिट्ठाकार नित्य न्यूनतम चार पोस्ट (अमित अग्रवाल और डेरेन रोज़ इसीलिए सफल हुए हैं, पर वो अंग्रेज़ी की बात है) ठेल सकता है, मग…

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अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 18, 2007

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पिछले दिनों चिट्ठों के आचार संहिता बनने बनाने व उन्हें अपनाने पर खूब बहसें हुईं. इसी बीच चिट्ठाकारों के अनाम -बेनाम-कुनाम मुखौटों पर भी खूब जमकर चिट्ठाबाजी हुई. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए इस ‘अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता' की रचना की गई है. सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को इन्हें मानना व पालन करना घोर अनिवार्य है. अन्यथा उन्हें चिट्ठाकार बिरादरी से निकाल बाहर कर दिया जाएगा और उनका सार्वजनिक ‘चिट्ठा' बहिष्कार किया जाएगा. चिट्ठे विवादास्पद मुद्दों पर ही लिखे जाएँ. मसलन धर्म, जाति, आरक्षण, दंगा-फ़साद इत्यादि. इससे हिन्दी चिट्ठों का ज्यादा प्रसार-प्रचार होगा. सीधे सादे सरल विषयों पर लिखे चिट्ठों को कोई पढ़ता भी है? अतः ऐसे सीधे-सरल विषयों पर लिख कर अपना व पाठकों का वक्त व नारद-ब्लॉगर-वर्डप्रेस का रिसोर्स फ़ालतू जाया न करें. इस तरह के सादे चिट्ठों की रपट ब्लॉगर और वर्ड प्रेस को एब्यूज के अंतर्गत कर दी जाएगी और उस पर बंदिश लगाने की सिफ़ॉरिश कर दी जाएगी.अखबारी-साहित्यिक-संपादित तरह की तथाकथित ‘पवित्र' भाषा यहाँ प्रतिबंधित रहेगी. हर तरह का …

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दशक के हिंदी चिट्ठाकार के लिए कृपया अवश्य वोट करें

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 15, 2012

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परिकल्पना पर दशक के हिंदी चिट्ठाकार व हिंदी चिट्ठा को चुनने के लिए एक पोल लगाया गया है. जिसमें आप अपना बहुमूल्य वोट देकर इनका चुनाव कर सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए (कृपया ध्यान दें, महज आपकी सुविधा के लिए,) वहाँ 10-10 चिट्ठाकार व चिट्ठों की सूची लगाई गई है. तो आप उनमें से चुन सकते हैं, या आपकी नजर में वे अनुपयुक्त हैं तो आप कोई अन्य उपयुक्त नाम सुझा सकते हैं, और उसे वोट दे सकते हैं. और, जैसा कि जाहिर है, इन पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही विरोध (और कहीं कहीं थोड़े बहुत समर्थन) के सुर चहुँ ओर टर्राने लगे हैं. रुदन, क्रंदन और विलाप प्रारंभ हो गए हैं. चिट्ठाकार पुरस्कारों (चिट्ठाकार क्या हर किस्म के पुरस्कारों पर यह लागू है) पर नाहक हो हल्ला और गर्दभ-रुदन की परंपरा पुरानी रही है. जो नाहक गर्दभ-रुदन करते हैं और मठाधीशी जैसी बातें करते हैं उनसे गुजारिश है कि वे भी अपने मठ तो बनाएं और ऐसा कुछ प्रकल्प प्रारंभ तो करें. ब्लॉगिंग पुरस्कार तमाम भाषाओं के ब्लॉगों में चलते हैं. अंग्रेज़ी भाषाई ब्लॉगों में तो सैकड़ों पुरस्कार हैं और सैकड़ों स्तर पर प्रदान किए जाते हैं – और, विवाद वहाँ भी होते हैं…

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आप कितने अच्छे चिट्ठा पाठक हैं?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 31, 2008

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आइए, जाँचिए अपने अंक.प्रस्तुत है आपके लिए चिट्ठाकार वर्ग पहेली
चिट्ठाकार और चिट्ठे.सीधे
3. बिस्मिल्लाहिर्रहमानुर्रहीम
5. मानसिक नॉलेज
7. अज्ञानी गुरू, दूसरे का लिखा कूड़ा समझे
8. दिल में, पेट में, मन में जहां कहीं भी हो न हो, उगलना तो पड़ेगा
9. छम्मकछल्लो
10. आदि चिट्ठाकार और वर्तमान व्यंग्यकार में समानता
12. डायरी वाला भारतीय
14. कस्बे का रहवासी
19. शब्दों के बीच सेतु बनाती हैं
20. जहां का हर सेर सस्ता होता है
21. नुकीली दृष्टि
23. आज के जमाने में ठुमरी कौन गाता है
24. हिन्दी का एक मात्र मालदार चिट्ठा
25. कह न सकने के बावजूद
नीचे
1. नेपाली हिन्दी चिट्ठाकार
2. एक यात्री जो अक्षरों का जोड़ घटाना करता है
4. लिखता तो है, कभी कभी, गाहे बगाहे
6. चिट्ठाजगत् की माता
9. इनके तो लब सचमुच आजाद हैं
11. जरा मुस्कुरा दो ब्रदर
12. कबाड़खाने का एक कबाड़िया
13. फटा मुँह, कुछ दूसरे तरीके से
15. राहुल उपाध्याय समेत हम सभी जिसमें लगे होते हैं
16. कीचड़ में मरीचिका देखने दिखाने का साहस
17. चार सौ बीस लेखक
18. चिट्ठाकार का पूरा नाम जो फुरसत में लंबी पोस्टें लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, अलबत्ता पाठकों के पास फुरसत हो न हो
19. हिन्दी ब्ल…

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करम करे तो फल की इच्छा क्यों न करे चिट्ठाकार?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava सितंबर 13, 2007

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कर्मा-फैन हमारे जैसे लोगों के लिए ही है. जो कर्म करते हैं तो लागत से दो-गुना, तीन गुना, कई-कई गुना फल की इच्छा पालते हैं. कर्मा-फैन इंटरनेट पर बेहद उम्दा, नया और नायाब विचार है. कम से कम चिट्ठाकारों के लिये तो है ही. वैसे तो यह दो तरफा  काम करता है, परंतु इसका टैग-लाइन है- गेट सपोर्ट फ्रॉम योर फैन्स!यानी अपने चिट्ठा फैनों से आप कर्मा-फैन के जरिए सहयोग व भरणपोषण स्वरूप नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं. जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें? इस काम के लिए कर्मा-फैन चिट्ठाकारों व चिट्ठापाठकों के सहयोग के लिए तत्पर है. आप कर्मा-फैन से जुड़कर अपने चिट्ठे में अपने पाठकों से सहयोग प्राप्त तो कर ही सकते हैं, आप अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों को नकद राशि देकर उनका उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं. तो, यदि आपको इस चिट्ठाकार को कुछ गिव-बैक, कुछ धन्यवाद स्वरूप वापस करना है तो कर्मा-फैन में अभी ही खाता बनाएँ. यदि आप चिट्ठाकार हैं और अपने पाठकों से कुछ आशीर्वाद (मात्र आशीर्वचन नहीं,) स्वरूप, …

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अभिकलन एवं प्रक्रमण के दौरान मुंबइया चिट्ठाकार संगोष्ठी

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 29, 2007

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पिछले दिनों वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने सीडॅक मुंबई के तत्वावधान में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैंने भी भाग लिया था. विषय था - भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के भाषाई संसाधनों का निर्माण (क्रिएशन ऑफ़ लेक्सिकल रिसोर्सेज़ फ़ॉर इंडियन लेंगुएज कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग). वैसे, शुद्ध साहित्यिक भाषा में इसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं किया गया था -भारतीय भाषी अभिकलन एवं प्रक्रमण के लिए शाब्दिक संसाधनों का सृजनकम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग की जगह अभिकलन एवं प्रक्रमण का इस्तेमाल किया गया था, जो कि न तो प्रचलित ही है और न ही सुग्राह्य. परंतु यह क्यों किया गया था या जा रहा है - इसकी कथा बाद में. शब्दावली आयोग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. बिजय कुमार ने जब अपना प्रजेंटेशन देना प्रारंभ किया तो पावर-पाइंट में बनाए गए प्रजेंटेशन ने हिन्दी दिखाने से मना कर दिया. जाहिर है, यह प्रजेंटेशन प्रो. बिजय कुमार के कार्यालय-सहायकों ने तैयार किया था, और यूनिकोड में नहीं वरन् किसी अन्य फ़ॉन्ट में था, जो कि एलसीडी प्रोजेक्टर से जुड़े कम्प्यूटर में उस फ़ॉन्ट के संस्थापित नहीं होने से चला ही नहीं. प…

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देबाशीष चक्रवर्ती से खास साक्षात्कार

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 24, 2007

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मिलिए देबाशीष चक्रवर्ती से
"भारतीय कम्प्यूटिंग व भारतीय भाषाओं में सामग्री के विस्तार की संभावनाएँ."पुणे निवासी, सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती को भारत के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में गिना जाता है. वे कई चिट्ठे (ब्लॉग) लिखते हैं जिनमें भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग से लेकर जावा प्रोग्रामिंग तक के विषयों पर सामग्रियाँ होती हैं. हाल ही में वे भारतीय चिट्ठा जगत में अच्छी खासी सक्रियता पैदा करने के कारण चर्चा में आए. उन्होंने इंडीब्लॉगीज़ नाम का एक पोर्टल संस्थापित किया है जो भारतीय चिट्ठाजगत के सभी भारतीय भाषाओं के सर्वोत्कृष्ट चिट्ठों को प्रशंसित और पुरस्कृत कर विश्व के सम्मुख लाने का कार्य करता है. देबाशीष डीमॉज संपादकहैं, तथा भारतीय भाषाओं में चिट्ठों के बारे में जानकारियाँ देने वाला पोर्टल चिट्ठाविश्व भी संभालते हैं. देबाशीष ने न सिर्फ भारत का एकमात्र और पहला बहुभाषी चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ का भी शुभारंभ किया, बल्कि भारतीय ब्लॉग-दुनिया पर वे पैनी नजर भी रखते हैं. आपने बहुत सारे सॉफ़्टवेयर जैसे कि वर्डप्रेस, इंडिकजूमला, आई-जूमला, पेबल, स्कटलइत्यादि के स्थानीयकरण (सॉफ़…

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चिट्ठाकारों की नियमित, योग्यता जाँच

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 27, 2008

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क्या खयाल है? चलिए मान लिया, यहाँ कोई न न्यूनतम और न महत्तम मापदण्ड है, मगर योग्यता के नाम पर कुछ तो होगा? पर, अब आप कहेंगे कि एक चिट्ठाकार की योग्यता आखिर क्या होनी चाहिए जो जांची-परखी भी जा सके. और यदि कुछ तो ऐसा होगा जिसे चिट्ठाकार की योग्यता कहा जा सके तो फिर उसे जांचने में कोई हर्ज है क्या?मेरे एक चिट्ठे पर हाल ही में एक टिप्पणी आई – “*तिए ये तूने क्या लिखा है?” वो तो टिप्पणी मॉडरेशन का धन्यवाद कि मैंने उस टिप्पणीकार के *तियापे को प्रकाशित नहीं किया. मगर यहाँ पर सवाल यह उठता है कि मैंने जो कुछ लिखा था, वो तो मेरी अपनी नज़रों में महान था. तमाम इंटरनेटी दुनिया में तांक झांक कर मसाला उड़ाकर निचोड़ बनाकर मैंने लिखा था. मेरे अपने हिसाब से वो एक क्लासिक था. जितनी दफा और जितनी मर्तबा और जितनी बार, बार-बार मैं उसे पढ़ता, पढ़कर मुग्ध हो जाता और सोचता कि क्या गजब लिखा है. मुझे लगता कि उसने कहा था की तर्ज पर मेरा यह मात्र एक लेख मुझे चिट्ठासंसार में स्थापित कर सकने की क्षमता रखता है. मगर उस पर आई भी तो यह टिप्पणी!मगर, फिर मैंने अपने आप को दिलासा दिया - वह पाठक और वह टिप्पणीकार अवश्य ही *तिय…

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फंसने फंसाने का दैत्याकार नेटवर्क

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 22, 2007

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हिन्दी चिट्ठाजगत में फंसने-फांसने का नेटवर्क दूसरी बार आया है. और, खुदा करे, यह तिबारा-चौबारा, फिर कभी नहीं आए. फंसने-फांसने का क्यों? यह मैं आगे बताता हूं.उन्मुक्त ने मुझे फांसा (टैग किया) तो मैं नादान बनकर कि मैंने उसकी पोस्ट पढ़ी ही नहीं, पीछा छुड़ा सकता था. और छुड़ा ही लिया था...परंतु उन्होंने मुझे ई-मेल किया, और उनका ईमेल मेरे गूगल ईमेल के स्पैम फ़िल्टर से जाने कैसे बचता-बचाता मेरे इनबॉक्स में आ गया. उन्होंने लिखा था-Hi I have a request to make. It is contained here
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/02/blog-post_18.html
I hope you will not mind.मैंने वह पोस्ट दुबारा पढ़ी (उस पोस्ट को पहले पढ़ कर नादान बन कर भूल चुका था) और यह प्रत्युत्तर लिखा:well, I DO MIND, but will reply not-so-mindfully in my post :)जाहिर है, मैं फुल्ली माइंडफुली प्रत्युत्तर दे रहा हूँ.तो, सबसे पहले फंसने-फांसने का गणित.पहले स्तर पर एक चिट्ठाकार ने फांसा - 5 चिट्ठाकारों को.दूसरे स्तर पर पाँच चिट्ठाकारों ने शिकार फांसे - 25तीसरे स्तर पर पच्चीस चिट्ठाकारों ने फांसे - 125चौथे स्तर पर 125 चिट्ठाकारों ने फांसे -…

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थकेले दिग्गजों की तरफ से आपके लिए ब्लॉगिंग टिप्स...

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava अगस्त 31, 2009

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वैसे तो अपने तमाम हिन्दी चिट्ठाकारों ने समय समय पर ब्लॉग उपदेश दिए हैं कि चिट्ठाकारी में क्या करो और क्या न करो. परंतु अभी हाल ही में दो सुप्रसिद्ध, शीर्ष के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले भारतीय अंग्रेज़ी-भाषी ब्लॉगरों की गिनती में शामिल, अमित वर्मा (इंडिया अनकट) तथा अर्नाब –ग्रेटबांग (रेंडम थॉट्स ऑफ डिमेंटेड माइंड) ने अपने अपने ब्लॉगों में कुछ काम के टिप्स दिए हैं. उनके टिप्स यहाँ दिए जा रहे हैं. अमित वर्मा से विशेष अनुमति ली गई है तथा ग्रेटबांग के चिट्ठे की सामग्री का क्रियेटिव कामन्स के अंतर्गत प्रयोग किया गया है.तो, सबसे पहले, पहली बात. पेंगुइन की एक किताब – गेट स्मार्ट – राइटिंग स्किल्स के लिए लिखे अपने लेख में अमित वर्मा कहते हैं:ब्लॉग लेखन मनुष्य की सर्जनात्मकता का सर्वाधिक आनंददायी पहलू है. एक चिट्ठाकार पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता कि वो क्या लिखे, कैसे लिखे, कितना लिखे. आप चार शब्दों में अपना पोस्ट समेट सकते हैं तो चालीस पेज भी आपके लिए कम हो सकते हैं. इसी तरह, न तो विषयों पर कोई रोक है, और न आपकी शैली पर कोई टोक.(अमित वर्मा – चित्र – साभार http://labnol.org)अमित अपने ब्ल…

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कुछ और पुरानी यादें ताजा करना चाहते हैं? इस लिंक पर जाएँ .

तो, ज्यादा स्मार्ट बनें, और अपने स्मार्टफ़ोन को फेंक दें।
पर, शायद आप ऐसा नहीं कर पाएं।
तो? और अधिक बेवकूफियों के लिए तैयार रहें!

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भूमिका : जबकि हिंदी व्यंग्य की दुनिया व्यंग्य क्या है, व्यंग्यकार क्या है, क्या व्यंग्य केवल उंगली में गिने जाने वाले व्यंग्यकारों तक सिमट गया है, समकालीन टॉप 10 कितने व्यंग्यकार हैं, वन लाइनर को व्यंग्य मानें या नहीं, व्यंग्य में करुणा और सरोकार होने चय्ये कि नईं आदि आदि पर उलझी हुई है, इधर तकनीकी क्रांति अपनी रफ़्तार से चल रही है, और एक ऐसा ऐप्प ईजाद हो गया है जो महज एक टच पर व्यंग्य पैदा कर देता है. आपको विश्वास नहीं हो रहा? मुझे भी नहीं हो रहा था. तो मैंने इस ऐप्प की टेस्टिंग की. इस ऐप्प में गूगल एलो, अलेक्सा, सिरी आदि की सम्मिलित एआई की शक्ति है और यह सचमुच महज एक टच पर झकास व्यंग्य पैदा कर देता है. मैंने इस बार की जुगलबंदी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर इस ऐप्प को इंस्टाल किया और विषय दर्ज कर केवल एक टच मारा और इसने संपूर्ण ब्रह्मांड में से खोज खंगाल कर बढ़िया तरतीब से लाइनें जमाकर एक शानदार व्यंग्य लिख कर मेरे सामने पेश कर दिया. नीचे इस झकास व्यंग्य को पढ़ें – इस व्यंग्य आलेख में मेरा कोई योगदान नहीं है, बल्कि इस व्यंग्य-लेखक ऐप्प का योगदान है. यह ऐप्प किसी भी – जी हाँ, किसी भी (मेरे जैसे?) ऐरे-गैरे को व्यंग्यकार बना सकता है. ऐसा कि व्यंग्य और व्यंग्य क्या है आदि आदि की बहसें फ़िजूल हो जाएँ. नीचे व्यंग्य पढ़ें और व्यंग्य पसंद आने पर आप भी इस ऐप्प को अपने ऐप्प स्टोर से इंस्टाल करें और व्यंग्यकार बनें. सबसे बड़ी बात ये है कि ये ऐप्प पूरी तरह निःशुल्क है (ऐड सपोर्टेड – मुफ़्त खजूर की तरह की कोई चीज नहीं होती हुजूर! – बीयर अपने इधर नहीं चलता, सो तुकबंदी के लिए खजूर सही है ना?)

व्यंग्य -

योग करो, सुख से जियो
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हमने दोस्त के यहां फोन किया। उसके बच्चे ने उठाया।

मैंने पूछा -पापा कहां हैं।

वो बोला- पापा योग कर रहे हैं।

क्यों, क्या हुआ? कोई समस्या है क्या? -मैं योगी हो गया।

नहीं,नहीं अंकल कोई परेशानी नहीं। पापा तो आजकल रोज योग करते हैं। उनका डेली रूटीन है। कहते हैं इससे तबियत ठीक् रहती है। बच्चा शांत आवाज में बता कम समझा ज्यादा रहा था।

हम बच्चे की समझाइश के झांसे में आने ही वाले थे कि हमारे दिमाग में तुलसीदास् टुनटुनाये- जे न मित्र दुख होंहिं योगारी/ तिनहिं बिलोकत पातक भारी।

हमारा मित्र रोज डेली योग कर रहा है, माने कि सुखी है। उसके सुख में सुखी न हुये तो वो सुख हमारे पास पातक बनकर आयेग। भारी वाला। विलोकेगा। लफ़ड़ा होगा। आफ़त है।

हमने सोचा मित्र् के सुख में सुखी हो आते हैं। अपना पातक बचा लेते हैं। सावधानी सटा के , दुर्घटना घटा लें। प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योरे भी हो जायेगा। इतवार है, छुट्टी है।

चाहे जितना सुखी हो चाय-साय तो पिलायेगा ही। यहां तो अब कोई चौथी चाय पूछने से रहा।

पांच मिनट में हम सुख जाहिर करने के लिये दौड़े। पहुंचे दोस्त-द्वारे। सोचा पूछेंगे-क्या हाल हैं प्यारे। क्या हुआ अब हम इतने गैर हो गये कि बताते भी नहीं और अकेले-अकेले सुखी हो लेते हो। कम से कम हमारा तो सोचते क्या होगा! ये तो कहो हमने फोन कर लिया वर्ना हम तुम्हारे सुख में सुखी न हो पाते और हमें तो बड़ा सुख पकड़ लेता। तुम इतने खुदगर्ज निकलोगे, सोचा भी न था। तुमसे ऐसी आशा तो न थी।

लेकिन हम अपनी सोच को अमली जामा न् पहना पाये। हम कुछ पूछे इससे पहले ही दोस्त ढीले नाड़े वाला पायजामा संभालते हुये बोला- आओ, आओ। बैठो। इतनी सुबह। सब खैरियत तो है। बेटा मून्नू देखो अंकल आये हैं। चाय-पानी लाओ। मम्मी को बुलाओ। देखते आओ सूरज किधर निकला है।

हम जिसका हाल पूछने आये वह खुद हमारी खैरियत पूंछ रहा है। कौन कहता है दुनिया में साधुवाद युग का श्राद्ध हो गया। ये तो हमींअस्तो, हमीअस्तो वाला सीन है।

हमने पूछना शुरू किया-सुना है आजकल तुम रोज योग करते हो!

हां यार तुमको बताना भूल गया। आजकल रोज नियम् से योगी हो लेता हूं। बड़ा फ़ायदा है। -दोस्त ने बताया।

अबे योगी होने से फ़ायदा! ये क्या के रे हो? दिमाग तो नहीं फिर गया! क्या ताजमहल को वोट देने आगरा गये थे और वहीं टिक गये पागलखाने में कुछ दिन और कहीं जगह न मिलने के कारण।-हमने फ़ार्म में आने का प्रयास किया।

अरे हम भी यही सोचते थे। लेकिन जब से योगी होना शुरू किया है बहुत फ़ायदा है। वजन कंट्रोल में हैं। टाइम बचता है। घर बैठे सेहत चकाचक। -दोस्त के चेहरे पर हमको मूढ़मति मानने वाली दिव्य मुस्कान विराज रही थी।

योगी होने से फ़ायदा! ये क्या पहेलियां बुझा रहे हो? सबेरे से कोई मिला नहीं क्या? -हम पानी पीते हुये बोले।

हां भाई, सच कहता हूं। योगी होने से बहुत फ़ायदा होता है। दिखता नहीं तुमको कि मेरा वजन कितना कम हो गया। -दोस्त उवाचा।

हां सो तो देख रहा हूं पहले से आधे हो गये। ऐसा कैसे हुआ? हम जिज्ञासु बन गये।

ये इसी ‘योग थेरेपी’ से हुआ। हम रोज नियमित एक घंटा योगी हो लेते हैं।

नियमित योग करने मात्र से वजन कंटोल में है। पहले हम ये मत खाओ, वो मत छुओ, इत्ती कैलोरी, उत्ती वसा के झमेले में हलकान रहते थे। कैलोरी चार्ट रटते-रटते इतना दुखी हुयी जितना बचपन में पहाड़ा रटने में नहीं हुये। अब जब से योगी होना शुरू किया सब झंझट से मुक्ति। अब शान से खाते हैं, शान से सोते हैं। मार्निंग वाक, एवनिंग वाक को अपने रूटीन से डिलीट कर दिया। हम तो कहते हैं कि जिसको अपने स्वास्थ्य की रत्ती भर भी योग है उसे योग करना शुरू कर देना चाहिये। -दोस्त सूचना मोड से प्रवचन मोड में आ रहा था।

तुम यार पहेलिया मत बुझाऒ। सीधे-सीधे काम की बात पर आओ। अपनी बात के पीछे की थ्योरी बताओ। उदाहरण सहित समझाऒ। -दोस्त के सूचना ज्ञान से हम झल्लाने लगे।

यार, बताता हूं। योग का ऐसा है कि हमारे यहां सब पुराने लोग बता गये हैं। हम बुड़बक की तरह उसे देखते नहीं और सारी बातों के लिये विकसित देशों की तरफ़ ताकते रहते हैं।

हमारे यहां पहले बहुत से लोग बता गये हैं योग से आदमी दुबला होता है। कहावत में इशारा भी है- काजी शहर के अंदेशे में दुबला। बीरबल की कहानियों में भी बताया गया है न कि एक बकरे को खूब खिलाया-पिलाया और सामने शेर को बैठा दिया गया। शेर की योग में बकरे का वजन रत्ती भर नहीं बढ़ा। माल-मत्ता खाने से जितना बढ़ा उतना ही शेर को देखकर घटता गया। इसी सिद्धान्त पर योग थेरेपी की नींव टिकी है। आदमी नियमित योग करता रहे तो उसका वजन घटता रहता है। चाहे जो खाये नियंत्रण में रहता है।

इसीलिये ये देखो हमने अपने घर की दीवारों पर योग थेरेपी वाले पोस्टर लगा रखे हैं- योग करो, सुख से जियो। योग सरोवर में डुबकी लगायें, अपना वजन मनचाहा घटायें। बढ़ते वजन से परेशान, नियमित योग से तुरंत आराम। योगी होते ही वजन की चर्बी गायब।

लेकिन हमने तो देखा है लोग खूब योगी रहते हैं फिर भी दुबले नहीं होते। कैसे तुम्हारी बात सच मान लें। -हमने प्रतिवाद किया।

अब ये तो श्रद्धा-विश्वास की बात है। जिसको श्रद्धा होगी उसकी फ़ायदा मिलेगा। जिसको नहीं होगी नहीं मिलेगा। और फिर योग में भी ईमानदारी होनी चाहिये। श्रद्धा में खोंट होगी तो योग का फ़ायदा नहीं मिलेगा। योग शुद्ध होनी चाहिये, २४ कैरेट सोने की तरह तभी आपको लाभ मिलेगा।- दोस्त सांस लेने के लिये रुका।
यार पता नहीं तुम कैसी बातें करते हो। मुझे कुछ समझ में नहीं आता। -हम भ्रमित थे।

हमको भी पहले ऐसा ही लगता था। अच्छा ये बताओ कि ये अमेरिका के राष्ट्रपति इतना स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट छैला बाबू टाइप कैसे बने रहते हैं? -दोस्त अब सवाल करने लगा।

उनके खान-पान का ध्यान रखने के लिये डाक्टरों की फ़ौज लगी रहती है। दवा-दारू के लिये उनको किसी सरकारी अस्पताल में लाइन नहीं लगानी पड़ती। नियमित चेकअप होते हैं। व्यायाम-स्यायाम करते रहते हैं। यही कारण होंगे और क्या!

अरे भैया की बातें। ये सुविधायें तो किसी भी अमीर आदमी को मिल सकती हैं। लेकिन उससे वो अमेरिकी राष्ट्रपति के तरह स्मार्ट, स्लिम-ट्रिम, छैला बाबू टाइप थोडी़ हो जायेगा। और फिर समझने की बात है कि जो शख्स पूरी दुनिया को अपने ठेंगे रखने की ऐंठ रखता है। जरा-जरा सी बात पर दुनिया भर में जहां मन आये बम की कालीन बिछा देता है जिस देश को मन आये पाषाण युग में ठेले देता है वो भला डाक्टर-हकीम के इशारे पर चलेगा! हमें तुम्हारी अकल पर तरस आता है।- दोस्त हम पर दया भाव दिखाने लगे।

अच्छा तुम ही बताओ भला अमेरिकन राष्ट्रपति की स्लिमनेश का राज- हमने सवाल किया।

इसका राज यह है कि वह योगी रहता है। उसके जिनती योग खुदा भी नहीं करता होगा। वह एक देश में लोकतंत्र बहाल करने के लिये इतना योगी होता है कि उस देश को तहस-नहस कर देता है। एक अपराधी को पकड़ने की योग में पूरी दुनिया को जहां शक होता है रौंद देता है। पूरी दुनिया भर में शांति बहाल करने के लिये अपनी इतना योगी रहता है कि हर जगह अपने हथियार तैनात कर देता है। अपने पास हजारों बम होते हुये भी दूसरे देश के परमाणु परीक्षण को दुनिया भर के लिये खतरा मानकर योगी होता रहता है। इसी तरह के तमाम योगऒं के कारण ही वह दुबला-पतला, स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट-छैला बाबू टाइप बना रहता है।

इसके बाद न जाने कितने उदाहरण से हमारे दोस्त ने यह साबित करने का पूरा इंतजाम किया कि अगर हम ईमानदारी से योगी हो सकें तो सारे सुख हमारी झोली में होंगें। योग करना शुरू करते ही हम तड़ से खुशहाल हो जायेंगे। उनके वक्तव्य के कुछ अंश जो हमें याद रह गये वे यहां दे रहा हूं।

भगवान रामचंद्र पहले राज्य जाने के कारण योगी हुये, फिर पत्नी के अपहरण से, फिर धोबी द्वारा अपनी बदनामी से फिर अपने पुत्रों द्वारा अपनी सेना की पराजय से और बाद में सीतागमन से। इन्हीं तमाम बातों के चलते वे योगी होते रहे और कालांतर में मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये। यही बात कृष्णजी के बारे में सही है। पहले अनगिनत गोपियों की योग फ़िर सोलह हजार पटरानियों के चलते उनकी योग की कल्पना ही की जा सकती है। इसी योग के चलते वे सोलह कलाऒं युक्त सम्पूर्ण अवतार् माने गये। डबीरदास ने तो डंके की चोट पर कहा- सुखिया सब संसार है खावै अरु सोवै, योगी दास डबीर है जागै अरु रोवै। इसी योगीपने के कारण डबीर दुबले पतले बने रहकर सौ से ज्यादा साल जीये और इतने प्रसिद्ध हस्ती कहलाये।

योग करना आजकल स्वास्थ्य के लिये बहुत आवश्यक है। अगर हम ठीक से योगी होना सीख गये तो समझिये स्वस्थ हो गये। पुराने समय में भी जितने महान लोग हुये, जितने दीर्घायु हुये वे सब योग करने के ही कारण हुये।

आजकल भी देखिये ये जो जीवन अवधि बढ़ गयी है, लोग ज्यादा दिन तक जीने लगे हैं तो इसीलिये कि लोग तमाम तरह की योग मुद्राएँ करने लगे हैं। दुनिया की हालत से योगी बने हैं, अपने बच्चों की वजह से योगी हैं, बुढ़ापे में जवान पत्नी की बेवफ़ाई से योगी हैं, जवानी में किसी हसीन, अमीर बुढिया के इश्क में फ़ंसकर योगी हैं। इन सब योग मुद्राऒं के चलते आदमी दुबला होता है और उसकी जीवन अवधि बढ़ जाती है।

दुनिया जटिल हो रही है। लोगों की योग मुद्रायें भी जटिल हो रही हैं। हर समय अंग्रेजीपूर्ण माहौल में रहने वाला हिंदी की स्थिति के लिये योगी है। बात-बात पर गाली निकालने वाले को समाज में घटते भाईचारे की भावना योगी बनाती है। कुछ लोग अपनी योग का स्तर उठाकर देश तक ले जाते हैं। देश की योग के बाद भी जिनकी योग का स्टाक खतम नहीं होता वो अपनी योग का तंबू पूरे विश्व में तान देते हैं। ब्रह्मांड में अपनी योग मुद्राएँ छितरा देते हैं। वे योगी रहते हैं ताकि योग के चलते वे दुबले रह सकें और सुखी रह सकें। जो शख्स कायदे से योगी होना सीख गया उसकी सारी योग मुद्राएँ समाप्त हो जाती हैं।

योग थेरेपी की सम्भावनायें अनन्त हैं। अगर इसे मान्यता मिल सके तो सरकार की तमाम कमियां भगवान की कमियों की तरह छुप सकती हैं। अभी भूख से मरने वालों के लिये सरकार तमाम तरह से साबित करती है कि मरने वाला भूख से नहीं मरा। लेकिन इसके लिए उसकी बहुत छीछालेदर होती है। जैसे ही योग थेरेपी को मान्यता मिली सरकार हर मौत के लिये कह सकेगी ये भूख से नहीं अन्न की कमीं की योग से मरा है। यह अपनी यौगिक मौत मरा है। हजारों लाखों लोग जिनको आज असहाय होकर भूख से मरने के लिये बाध्य होना पड़ रहा है वे योगी होकर मरने लगेंगे। इससे सरकारें भी योगी हो जायेंगी। बिना किसी खर्च के मरने वाली की भावनाओं और सरकार की स्पिरिट के हो जायेगी।

दुनिया में आज जहां भी परिवर्तन हुये हैं वे सब के सब योगी लोगों के कारण हुये। अपने देश की आजादी की लड़ाई में जो भी महान नेता हुये वे देश के लिये योगी रहते थे। देश की योग में दुबले रहते थे तब जाकर हमें आजादी मिल पायी। गांधीजी देश की इतनी योग करते थे। देश की योग के ही कारण वे इतने दुबले-पतले थे कि सरपट चलकर हर क्षेत्र में पहुंचकर योगी हो जाते थे। इसीलिये देश को आजाद कराने में उनका नाम आदर से लिया जाता है।

इसीलिये यह योगी रहना बहुत जरूरी है। अगर अभी तक आप योगी रहना नहीं सीख पाये तो समझ लीजिये आपकी जीवन शिक्षा अधूरी है। आप तुरंत उठिये और योग करना शुरू कर दीजिये।

उद्बोधन इसके बाद समाप्त हो गया। हम उठकर चल दिये। रास्ते में हमने अपने साथ के युवा दोस्त, जो दोस्त के घर मेरे साथ गया था और जिसने अपने स्वभाव के विपरीत अब तक चुप रहकर अपनी समझदारी का परिचय से दिया था, से पूछा- क्यों यार ये योग थेरेपी के बारे में तुम्हारा क्या कहना, क्या विचार है?
भाई अगर आप बुरा न मानें तो मुझे तो आपका यह दोस्त सिरफ़िरा लगता है।-युवा साथी ने राय दी!

नहीं यार, इसमें बुरा मानने की क्या बात। जो सच है सो है। सच को कोई थोड़ी झुठला सकता है। लेकिन तुमको मेरा दोस्त क्यों सिरफिरा लगता है?-मैंने कारण जानना चाहा।

अरे उसको ये तक नहीं पता कि आजादी के समय यहां कोई गांधी नहीं थे। प्रियंका, राहुल, वरुण गांधी उस समय पैदा नहीं हुये थे। सोनिया गांधी, मेनका गांधी दोनों की उस समय शादियां हुयीं नहीं थी लिहाजा उनके आजादी दिलाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। फिर कहां से गांधीजी आजादी के समय आ गये। जबकि आपका दोस्त बताता है कि गांधीजी ने देश को आजाद कराने में योग-दान दिया। आपके जिस दोस्त की इतिहास की समझ इस हद दर्जे की माशाअल्लाह है उसकी किसी भी बात पर गौर करने के पहले से मैं हजार बार विचार करूंगा। मुझे तो योग होने लगी है कि कैसी-कैसी योग की समझ वाले निर्योगी लोग आपके दोस्त हैं।

अपने नौजवान दोस्त की बात सुनकर मैं भी योगी होने लगा।

आपके क्या हाल हैं? आपने योगी होना शुरू किया कि नहीं!

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(अस्वीकरण – अनूप शुक्ल के चिंता विषयक आलेख से इस आलेख की समानता केवल फ़ाइंड-एंड-रीप्लेस तकनीकी संयोग मात्र है)

हास्य-व्यंग्य की जुगलबंदी 38 - खेती पर लिखी मेरी व्यंग्य रचना को अर्चना चावजी ने आवाज दी है. उनका धन्यवाद और आभार. व्यंग्य में, जाहिर है ड्रामा का आनंद भी जुड़ गया है. सुनें और आनंद लें -

अर्चना चावजी


पॉडकास्ट नीचे प्लेयर के प्ले बटन (बटन को प्रकट / लोड होने में कुछ समय लग सकता है, कृपया धैर्य बनाए रखें) पर क्लिक कर सुनें -


how to type in remington kritidev layout in 32 / 64 bit windows 10

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मरफ़ी का नियम यहाँ सत्य है - हर दिए गए सॉफ़्टवेयर का नया, उन्नत संस्करण तमाम नई, उन्नत समस्याएँ लेकर आता है.

विंडोज 10 में रेमिंगटन कीबोर्ड (कृतिदेव लेआउट) से यूनिकोड हिंदी टाइप करने की सुविधा ही छिन गई, और बहुत से लोग जिन्होंने अपने कंप्यूटर मुफ़्त में अपग्रेड किए (अपग्रेड के लिए विंडोज 10 मुफ़्त था) या नए कंप्यूटर लिए जो केवल विंडोज 10 प्रीइंस्टाल हैं, और केवल रेमिंगटन से टाइप करना जानते हैं उनके लिए बड़ी समस्या हो गई.

अंततः इसका समाधान आ गया है और विंडोज 10 के प्रायः हर संस्करण, यहाँ तक कि टैबलेट संस्करण के लिए भी ये समाधान काम करते हैं. आपको ट्रायल एंड एरर विधि अपना कर इनमें से कोई एक चुन कर इंस्टाल करना होगा. समाधान राजभाषा.नेट की साइट पर उपलब्ध है.

इस साइट पर तीन अलग तरह के समाधान हैं. एक पुराना इंडिक आईएमई हिंदी टूलकिट नाम  से है, जो संभवतः विंडोज 10 के 32 बिट संस्करण में बढ़िया काम करता है.

दूसरा समाधान है रेमिंगटन ईएक्सई नाम की एक इंस्टालर फ़ाइल जो कि विंडोज 10 के 32 बिट टैबलेट पर बढ़िया काम करता है (यह मेरे टैबलेट में बढ़िया काम कर रहा है)

तीसरा, एकदम नया समाधान है विंडोज के 64 बिट संस्करणों के लिए - हिंदी इंडिक इनपुट 3 - 64 बिट.

इन तीनों ही समाधानों को आप राजभाषा की साइट पर यहाँ जाकर आजमा सकते हैं. निश्चित रूप से इनमें से कोई न कोई आपके विंडोज 10 संस्करण के लिए काम अवश्य करेगा -

http://rajbhasha.net/drupal514/New+Remington+Unicode+Hindi+Keyboard+Layout


ऊपर दिए गए लिंक (लिंक क्लिक करने योग्य नहीं है) को कॉपी कर अपने ब्राउजर के एड्रेस बार में पेस्ट करें.

इस साइट पर इन औजारों को कैसे इंस्टाल करें व उपयोग में लें इस हेतु विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध है.

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वैधानिक चेतावनी – यदि आप क्रोमकास्ट, अमेजन फायर या एप्पल टीवी जैसे मीडिया रेंडरर का इस्तेमाल करते हैं, तो इस आलेख को पढ़ने के बाद उन्हें कचरे की टोकरी में फेंकना चाहेंगे तो इसके लिए यह आलेख कतई जिम्मेदार नहीं होगा.

बहुत दिनों के बाद टेक्नोलॉज़ी की दुनिया में हल्ला मचा है. हल्ला तो ख़ैर चालक-रहित कारों का भी हो रहा है, मगर वो बाजार में अभी उपलब्ध नहीं हैं. हाँ, तो हल्ला मचा है - टेक्नोलॉज़ी की दुनिया में, इतना कि अमेजन जैसी कंपनियों ने हाल ही में अपने प्लैटफ़ॉर्म पर इनकी बिक्री पर प्रतिबंध भी लगा दिया. जी हाँ, आपने सही अनुमान लगाया – फुल्ली लोडेड कोडी मीडिया बॉक्स. नया हल्ला, मगर वाकई काम का.

क्या है कोडी?

कोडी एक मुक्त-स्रोत मीडिया सेंटर ऐप्प है जो विंडोज़, लिनक्स, एंड्रायड और एप्पल के लिए बनाया गया है. इसका पुराना संस्करण एक्सबीएमसी मीडिया प्लेयर के नाम से बहुत पहले से आता रहा है, मगर हाल ही में इसने लोगों का ध्यान तब खींचना चालू किया जब कोडी प्रोग्राम की विशिष्ट सुविधा - थर्ड पार्टी एड ऑन - के जरिए लोगों को इंटरनेट के तमाम वैध और अवैध और चाइल्ड और एडल्ट हर किस्म के ऑडियो-वीडियो मीडिया को बेहद सस्ते फुल्ली लोडेड कोडी बॉक्स के जरिए निःशुल्क उपभोग की सुविधा मिली. जाहिर है, ग्राहकों से मासिक शुल्क लेने वाली ऑनलाइन मीडिया रेंडरिंग कंपनियां जैसे कि नेटफ्लिक्स, पेंडोरा आदि को यह नागवार गुजरना ही था. लिहाजा हल्ला मचा, खूब हल्ला मचा और नतीजतन ऐसे फुल्ली लोडेड मीडिया बाक्सों की मार्केटिंग पर कुछ ऑनलाइन स्टोरों ने प्रतिबंध लगा दिया.

तो, क्या कोडी का उपयोग गैरकानूनी है?

नहीं, बिल्कुल नहीं. कोडी का उपयोग कतई गैरकानूनी नहीं है. गैरकानूनी वह कार्य है जिसके जरिए आप अवैध प्लगइन के जरिए, कोडी की सहायता से नेटफ़्लिक्स पर वंडरवूमन फ़िल्म बिना रकम खर्च किए देखते हैं. पर, खैर, यह कार्य तो इंटरनेट के बाबा आदम के जमाने से चला आ रहा है और टोरेंटादि की सहायता से, दी गई कोई भी फ़िल्म रिलीज होने के सप्ताह भर पहले या बाद में इंटरनेट पर विचरने लग जाती है. इसलिए, यदि आपकी गीत-संगीत-फ़िल्मों में रूचि है तो कोडी पर एक बार जरूर हाथ आजमाएँ. अपने प्लेटफ़ॉर्म पर कोडी इंस्टाल करें. बेहतर ये होगा कि – यदि आपका टीवी पहले से ही स्मार्ट नहीं है तो – कोई बढ़िया एंड्रायड मीडिया बॉक्स ले आएँ (बहुतों में कोडी पहले से ही इंस्टाल रहता है और बहुतों में फुल्ली लोडेड कोडी संस्करण भी) और कोडी का ऑफ़ीशियल संस्करण इंस्टाल करें. यदि आपके पास विंडोज 8-10 कंप्यूटर है तो कोडी ऐप्प इंस्टाल करें. आप कोडी को शियामी एमआई बॉक्स, अमेजन फायर, रास्पबेरी पाई आदि में भी इंस्टाल कर सकते हैं. यदि आप कोई नया एंड्रायड मीडिया बॉक्स लेने की सोच रहे हैं तो इसमें आउटपुट-इनटपुट इंटरफ़ेस की उपलब्धता अवश्य देख लें. ब्लूटूथ और ऑप्टिकल आउट की सुविधा अवश्य होनी चाहिए नहीं तो अपने स्पीकरों को जोड़ने के लिए अलग जुगाड़ लगाने होंगे.

कोडी का उपयोग कैसे करें?

कोडी आपके तमाम मीडिया उपभोग के लिए एक केंद्रीयकृत ऐप्प है. आप इसके जरिए गाने सुन सकते हैं, अपने उपकरण पर मौजूद चित्रों को खोज-देख सकते हैं, वीडियो देख सकते हैं, इंटरनेट रेडियो सुन सकते हैं, यूट्यूब जैसे स्ट्रीमिंग वीडियो देख सकते हैं, आरएसएस फ़ीड से समाचार पढ़ सकते हैं, और हाँ, अपने मुहल्ले का मौसम का हाल भी जान सकते हैं. यानी, आपने ठीक समझा – पूरा भानुमती का पिटारा. असली वाला.

ऊपर दिए गए कोडी का स्क्रीनशॉट देखें. आपको उनमें मूलभूत प्रविष्टियाँ दिखेंगी – मूवीज़, टीवी शो, म्यूज़िक वीडियो, टीवी (जी हाँ, यदि आपके उपकरण में टीवी सिग्नल पकड़ने वाला चिप या यूएसबी उपकरण लगा हो तो ये भी!) रेडियो, पिक्चर, वीडियो, मौसम आदि आदि और जो छूट रहे हैं उनके लिए एड-ऑन.

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कोडी के साथ एक बड़ी सुविधा यह भी है कि इसे आप रिमोट कंट्रोल से चला सकते हैं. यदि आप मीडिया बॉक्स लेते हैं तो साथ में भौतिक रिमोट कंट्रोल भी आता है जो खासतौर पर कोडी के लिए डिजाइन किया गया होता है. यदि आप विंडोज कमप्यूटर आदि पर कोडी का प्रयोग करना चाहते हैं तो अपने मोबाइल फ़ोन में कोडी को रिमोट कंट्रोल करने वाला ऐप्प कोर इंस्टाल कर अपने फ़ोन को रिमोट कंट्रोलर की तरह उपयोग में ले सकते हैं. अपने मोबाइल फ़ोन से एक से अधिक कोडी (उदाहरण के लिए मैं अपने बैठक कक्ष में कोडी मीडिया बॉक्स को और अपने शयन कक्ष में डेस्कटॉप कंप्यूटर पर विंडोज 10 में स्थापित कोडी ऐप्प को) को आसानी से, और बेहतर तरीके से नियंत्रित करता हूँ.

कोडी का सेटअप कैसे करें

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कोडी का उपयोग करने से पहले इसे थोड़ा सेटअप करना होता है. कोडी को पहली बार चालू करने पर यदि आप किसी भी कैटेगरी में जाएंगे तो वहाँ यह लिखा मिलेगा - आपकी लाइब्रेरी अभी खाली है, इसे भरने के लिए आपको फ़ाइल खंड में जाना होगा और मीडिया स्रोत जोड़ना होगा और उसे कॉन्फ़िगर करना होगा. जब आपका स्रोत जुड़ जाएगा और सूचीबद्ध कर लिया जाएगा तो फिर आप अपनी लाइब्रेरी में ब्राउज़ कर उसका उपयोग कर सकेंगे.

जब आप एंटर फ़ाइल सेक्शन में क्लिक/टच कर आगे जाएंगे तो आपको मीडिया के लिए ब्राउज़ करने कहा जाएगा. आप चाहें तो स्थानीय फ़ाइलों/डिरेक्ट्री/फ़ोल्डर चुन सकते हैं अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध किसी रेपोसिटरी से एडऑन जोड़ सकते हैं. जैसे कि मैंने अपने संगीत में काम रेडियो और रेडियो सिटी फ़्यूजन को शामिल किया है.

कोडी – एडऑन की दुनिया

कोडी का असली मजा उसके एड-ऑन हैं. हर किस्म के एड-ऑन. हर मौके के लिए. गीत-संगीत-हँसी-मजाक-खाना-खजाना-खेल-खिलाड़ी-फ़िल्म-पर्यटन-कार्टून सबकुछ. यहाँ अलजजीरा भी है तो बीयर गीक्स भी. बस, थोड़ी शांति से खोजबीन की जरूरत है. वैध-अवैध सबकुछ. एक नजर नीचे दिए गए कोडी के संगीत के ऑफ़ीशियल एड ऑन के स्क्रीनशॉट पर मारें –

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पसंदीदा एडऑन इंस्टाल करें और अंतहीन, ब्रेक-रहित गीत-संगीत की दुनिया में खो जाएँ. कोडी – आपकी दुनिया बदल देगी.

कोडी की साइट पर यह भी लिखा है, और वाजिब लिखा है –

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विंडोज के लिए कोडी यहाँ से डाउनलोड करें - https://kodi.tv/

एंड्रायड के लिए गूगल प्लेस्टोर से कोडी (Kodi) तथा कोडी रिमोट कोर (kore) सर्च कर इंस्टाल करें.

यदि आपका टीवी स्मार्ट नहीं है, और उसमें एक अदद अतिरिक्त एचडीएमआई इनपुट है, तो बेहतर तो यह होगा कि ईबे या अपने शहर के इलेक्ट्रॉनिक मार्केट से एंड्रायड मीडिया बॉक्स (कोडी पूर्व स्थापित हो तो बेहतर) ले आएँ. यदि आपका स्मार्ट टीवी एंड्रायड / गूगल प्लेस्टोर सपोर्ट करता है तो प्लेस्टोर से कोडी ऐप्प इंस्टाल करें.

क्योंकि कोडी में सबकुछ है! और इसके सामने तो तथाकथित स्मार्ट-टीवी को भी शर्म आ जाए!

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