टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

हिंग्लिश इज़ कूल यार!

हिंग्लिश इज़ कूल यार!

रवि रतलामी

पहले पहली बात. बधाई. हम महान भारत के वासियों ने हाल ही के दिनों में एक नई भाषा ईजाद कर ली है और गर्व से उसे अपना भी लिया है. और उसका नाम है – हिंग्लिश. यकीन नहीं होता? यह नीचे का स्क्रीनशॉट देखें –

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यह एक नवीनतम एप्पल उपकरण की भाषा सेटिंग का स्क्रीनशॉट है, जिसमें भाषा और कीबोर्ड सेटिंग में यह मौजूद है. विश्व की तमाम बड़ी भाषाओं के बीच गर्व से सीना उठाए अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए हुए – हिंग्लिश नाम की, अपनी नई भाषा, नया की-बोर्ड. न केवल एप्पल, बल्कि दो अन्य प्रमुख प्लेटफ़ॉर्म - एंड्रायड और विंडोज़ में भी हिंग्लिश कीबोर्ड की सम्मानित उपस्थिति लंबे समय से है.

मेरे बचपन की भाषा

आज कोई मुझसे पूछे कि मेरी मातृभाषा क्या है? तो, मैं शायद थोड़े से शर्म और झिझक से कहूंगा – हिंग्लिश.

क्योंकि मेरी भाषा में – लेखन और वाचन – दोनों में, अंग्रेज़ी के शब्दों की भरमार होती है. एक-2 वाक्य में 40-50 प्रतिशत तक शब्द अंग्रेज़ी के आने लगे हैं – ठीक आज के हिंदी अखबारों की भाषा के अनुरूप. अकसर हिंदी भाषा के अख़बारों को गरियाया जाता है कि उन्होंने हिंग्लिश अपना लिया है, मगर वास्तविकता यह है कि पाठकों ने हिंग्लिश पहले अपनाया, और मजबूरन, पाठकों में पैठ मचाने की होड़ और सर्कुलेशन बढ़ाने की तरतीब में अंततः हर हिंदी अखबार हिंग्लिश अपनाने को मजबूर हो गया. कोई अपवाद स्वरूप जनसत्ता का उदाहरण दे सकता है, मगर, फिर उसका सर्कुलेशन भी तो मायने रखता है.

आमतौर पर, भारत में रहने वाला हर शख्स भाषाई पहचान से, भाषाई समस्या से जब तब जूझता रहता है. और क्यों न जूझे – जब किसी देश में क्षेत्रवार 22 से अधिक प्रमुख भाषाएँ हों, हर प्रमुख भाषा (जैसे कि हिंदी) के भीतर उसकी दर्जनों उप-भाषाएं हों, तो समस्या तो आनी ही है.

बचपन में मेरी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी थी. मैं छत्तीसगढ़ क्षेत्र में पैदा हुआ, जहाँ ठेठ छत्तीसगढ़ी बोली जाती थी. तो जब तक स्कूल जाना प्रारंभ नहीं किया, छत्तीसगढ़ी के अलावा और कुछ नहीं बोलता-समझता था.

स्कूल में पहले ही दिन क – कमल का और ख – खरगोश का सिखाया गया. परंतु छत्तीसगढ़ी में नहीं. हिंदी में. तब पता चला कि हिंदी नाम की भी कोई भाषा होती है, और कमल और खरगोश के बारे में पढ़ने लिखने के लिए छत्तीसगढ़ी नहीं, हिंदी नाम की एक दूसरी, बाहरी भाषा सीखनी, उपयोग करनी पड़ी. ग़नीमत यह रही कि तब छत्तीसगढ़ प्रदेश नहीं बना था और छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखत-पढ़त का तंत्र उतना विकसित नहीं था और स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई देवनागरी हिंदी में होती थी. नहीं तो समस्या कुछ और बड़ी होती. या शायद नहीं होती? उस समय, मुझे अब भी याद है - मजेदार बात यह होती कि हम अपने स्कूली मित्रों से या शिक्षक से टूटी-फूटी हिंदी में बात करते और घर-परिवार तथा मोहल्ले के मित्रों से खांटी, लच्छेदार धाराप्रवाह छत्तीसगढ़ी में! यह सिलसिला आज भी जारी है. मां अभी भी हिंदी नहीं समझतीं. उनसे बात करने के लिए छत्तीसगढ़ी बोलना पड़ता है, जबकि उस क्षेत्र, माहौल और भाषा के उपयोग को छोड़े हुए कोई तीस साल से अधिक हो चुके हैं! लेखन में तथा कार्यस्थल पर भाषा उपयोग में छत्तीसगढ़ी कहीं पीछे छूट गई, और केवल हिंदी रह गई, जो अंततः हिंग्लिश में बदल रही है.

तो, मेरे बचपन में छत्तीसगढ़ी से शुरु हुई मेरी मातृ भाषा, आज कोई तीस साल गुजर जाने के बाद हिंग्लिश में कैसे बदल गई? कहानी जरा लंबी है और तफ़सील मांगती है.

बचपन का ही किस्सा है. हम जहाँ रहते थे, वहाँ एक भरा पूरा गुजराती परिवार रहता था. वह पूरा परिवार वाचाल और तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियों में संलग्न. हमारा परिवार भी जैसे उनके परिवार से घुल मिल गया था. दो-तीन वर्षों के सान्निध्य ने हम दोनों परिवारों के न केवल आचार-व्यवहार, बल्कि बोली और भाषा पर भी असर डाला. उस वक्त यदि कोई मेरी भाषा (वाचक) पूछता तो मैं कहता – हिंगुज (हिंदी-गुजराती मिक्स) – क्योंकि मेरी बोली में जाने अनजाने तमाम गुजराती शब्द और वाक्य-विन्यास घुस आए थे और अच्छे खासे घुस आए थे. और यदि कोई उस वक्त मेरी हम उम्र, सहपाठिन, गुजरातिन पड़ोसन से उसकी मातृभाषा पूछता तो शायद वो कहती – गुजहिंद (गुजराती-हिंदी मिक्स).

यानी, सीधा सा – न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है – भाषा का नियम – कोई भी दी गई एक भाषा अपने आस पड़ोस में प्रयोग में होने वाली दूसरी भाषा को अपनी ओर आकर्षित कर अंगीकार करने लग जाती है.

मेरे ब्लॉग की भाषा

मुझे याद है, मेरे ब्लॉग लेखन के शुरूआती दौर में मेरे ब्लॉग के एक पाठक की टिप्पणी आई थी जो कुछ यूं थी –

“आपकी भाषा समझने में कठिन होती है, कृपया सरल भाषा में लिखा करें”

टिप्पणीकार के प्रोफ़ाइल से पता चला कि वो कंप्यूटर प्रोग्रामर था, जाहिर है उसकी शिक्षा दीक्षा भी अधिकांशतः अंग्रेज़ी माध्यम में हुई होगी. मैंने प्रति टिप्पणी की, और पूछा कि भाई, मेरी भाषा में आपको कहाँ कठिनाई दिखती है? मैं तकनीकी आदमी हूँ, तकनीकी भाषा में थोड़ा मोड़ा अंग्रेज़ी के शब्द आ जाते हैं, जो जाहिर है कि हिंदी के उचित समानार्थी शब्द न होने के कारण अनिवार्य रूप से शामिल हो जाते हैं.

टिप्पणीकार का जवाब आया कि आपकी भाषा संस्कृत निष्ठ (सैंस्कृटाइज़्ड) होती है. जिसे समझने में दिक्कत आती है, अतः थोड़ी सरल हिंदी में लिखा करें.

मुझे झटका लगा था. कहाँ तो मैं समझ रहा था कि तकनीकी लेखों के वाक्यों में मेरे अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के प्रयोग से समस्या हो रही होगी, मगर मामला तो यहाँ उल्टा ही था. मेरी भाषा को जटिल, संस्कृत निष्ठ माना जा रहा था. वैसे, बता दूं कि मैं कोई साहित्य का आदमी नहीं था, हिंदी मैंने केवल काम भर की, ग्यारहवीं (उच्चतर माध्यमिक) कक्षा तक ही पढ़ी थी, और हिंदी में किताबें भी मैंने जासूसी और रोमांटिक पल्प साहित्य – सुरेंद्र मोहन पाठक, जेम्स हेडली चेईज़ और गुलशन नंदा जैसे लेखकों की ही पढ़ी थीं. काशी का अस्सी या वैशाली की नगर वधू जैसी साहित्यिक भाषा की साहित्यिक किताबें मैंने पढ़ने की कोशिश कई बार की थी, और मेरे लिए वे अपठनीय ही बनी रहीं. संस्कृत से पीछा तो आठवीं कक्षा में ही छूट गया था, क्योंकि वह हमारे विज्ञान संकाय में विकल्प भाषा के रूप में विषय में शामिल ही नहीं था.

मैंने अपने पुराने लेखों की आंतरिक ऑडिट की और ढूंढने की कोशिश की कि आखिर मामला कहाँ गड़बड़ है. मगर मेरे कुछ व्यंग्य और व्यंग्यात्मक दोहे, जिन्हें मैं व्यंज़ल कहता आया हूँ, में कुछ इक्का दुक्का कठिन हिंदी शब्दों के अलावा और जटिलता नहीं थी – ऐसा मेरा मानना है. उल्टे, मेरे तकनीकी आलेखों में अंग्रेज़ी के शब्दों की प्रचुरता थी, जो कि लाज़िमी था – क्योंकि कंप्यूटर टेक्नोलॉज़ी और संचार सूचना भारत में उसी समय लोकप्रिय होने लगी थी, और रोजमर्रा जीवन में वह शामिल होती जा रही थी. कंप्यूटर, कीबोर्ड, माउस, रैम, हार्ड-डिस्क, मदर-बोर्ड आदि-आदि अंग्रेज़ी शब्दों का न तो सटीक हिंदी पर्याय था, और न ही जनता हिंदी पर्याय अपनाने को आतुर थी, बल्कि वो तो मजे से इसे अपनाती जा रही थी जैसे कि ये सब शब्द उनकी अपनी हिंदी के ही हों.

अब जब अंग्रेज़ी भाषा की बात आ ही गई है तो थोड़ी सी उसकी भी बात कर लें. मुझे बखूबी याद है कि हमारे जमाने में अंग्रेज़ी स्कूल इक्का दुक्का ही होते थे, जिन्हें तब कॉन्वेंट स्कूल कहा जाता था, और उनमें कौन पढ़ने जाता था, यह पता ही नहीं चलता था क्योंकि उनका वर्ग अलग होता था – श्रेष्ठि वर्ग. मेरे समेत अधिकांश जनता हिंदी माध्यम स्कूलों में ही पढ़ती थी. तो, जब मैं माध्यमिक स्कूल में, आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, उस समय हमारे प्रदेश में अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन जोर शोर से चला था. तब त्रिभाषा फ़ार्मूले के तहत अंग्रेज़ी भाषा ग्यारहवीं (उच्चतर माध्यमिक) कक्षा तक अनिवार्य थी. उस राजनैतिक आंदोलन के फलस्वरूप उस वर्ष से पढ़ाई में अंग्रेज़ी भाषा की अनिवार्यता खत्म कर दी गई थी. मुझे याद है कि उस वर्ष अंग्रेज़ी भाषा की केवल छःमाही परीक्षा हुई थी, और वार्षिक परीक्षा में उसके नंबर नहीं जोड़े गए थे. तब हमें बहुत ही खुशी हुई थी और हम सालभर खुशियां मनाते हुए इसी तरह की बातें करते रहते थे कि अब विदेशी – अंग्रेज़ी भाषा नहीं पढ़नी पड़ेगी और इस बेकार की भाषा से हमारा पीछा छूटा. ऐसा नहीं था कि मैं अंग्रेज़ी में कमजोर होऊँ, मेरे साथ एक एंग्लोइंडियन लड़का पढ़ता था, और जाहिर है उसकी अंग्रेज़ी अच्छी, बहुत अच्छी थी, मगर परीक्षा में मैं हमेशा उससे बाजी ही मार ले जाता था और परीक्षा में सबसे अधिक नंबर लाता था. मगर पढ़ाई में अंग्रेज़ी हटी तो सबसे ज्यादा खुश होने वालों में मैं भी था! स्वदेशी अपनाने और अपनी भाषा में पढ़ने का गर्व कुछ अलग ही था.

मैं विज्ञान का विद्यार्थी था. पढ़ाई में अंग्रेज़ी भाषा हटने की खुशी महाविद्यालय में आते-आते गम में बदल गई. बल्कि यह तो एक तरह से सज़ा के रूप में बदल गई. तकनीकी की कक्षा में पहले दिन से ही अंग्रेज़ी से सामना पड़ गया. महाविद्यालय की मेरी पहली ही कक्षा में रसायन विज्ञान का प्राध्यापक आया और विशुद्ध अंग्रेज़ी में कोई पचास मिनट का वक्तव्य झाड़ गया. जाहिर है, जिसका एक भी शब्द पल्ले नहीं पड़ा. आप उस समय की मेरी स्थिति समझ सकते हैं. ऊपर से उन प्राध्यापक महोदय ने कहा कि जो आज लैक्चर झाड़ा है, उसका नोट बनाकर आप अपनी कॉपी कल लेकर आएंगे और मुझे दिखा कर मेरा हस्ताक्षर लेंगे. कोढ़ में खाज यह कि उसे अंग्रेज़ी भाषा में लिख कर ले जाना था. यानी जिस वक्तव्य का एक भी शब्द समझा नहीं, उसे अंग्रेज़ी में लिख कर ले जाना है और बाकायदा उसकी जांच भी करवानी है. रसायन विज्ञान की कक्षा में मैं कई दिनों तक नहीं गया क्योंकि पर्याप्त प्रयास के बावजूद भी मैं लिख नहीं पाता था. स्कूल में हम जिस रासायनिक वस्तु को ओसजन और नत्रजन (अंग्रेज़ी नाइट्रोजन का हिंदी में सरलीकृत नाम) कहते थे, अचानक वे हमारे लिए ऑक्सीजन और नाइट्रोजन हो गए. यही नहीं, दूसरे, गणित और भौतिकी में भी यही हाल हो गया. ज्या और त्रिज्या आदि साइन और कोसाइन बन गए. मेरे अपने जीवन में, हिंग्लिश की नींव यहीं पड़ी, जब हम अपनी पढ़ाई के दौरान बातचीत में इन अंग्रेज़ी शब्दों का उपयोग करते थे. इलेक्ट्रॉनिकी की प्रयोग शाला में प्रयोग शाला सहायक हमें निर्देश देता – इस सर्किट बोर्ड में जो एसी126 ट्रांजिस्टर लगा है उसके कलेक्टर में एक 2.5 माइक्रो फैराड का कैपेसिटर लगाना पड़ेगा और एमिटर में 100 ओम का रजिस्टर, तब उसको सही बायस मिलेगा. जो लोग अखबारों की हालिया हिंग्लिश होती भाषा पर हल्ला मचाते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए, कि मामला अभी का नहीं है, बल्कि तीस साल पहले का, नहीं, नहीं, यह तो दो सौ साल पहले का है!

आप ठेठ हिंदी भाषी हों, अंग्रेज़ी की एबीसीडी नहीं जानते हों, मगर यदि आपने किसी विज्ञान/चिकित्सा या अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रवेश लिया, तो न केवल पढ़ाई अंग्रेज़ी में करनी होगी, बल्कि अंग्रेज़ी में परीक्षा भी देनी होगी (यह स्थिति अधिकांश हिंदी राज्यों में आज भी है). यह तो हमारे जैसे लोगों के लिए दोहरी मार वाली स्थिति थी. पहले अपनी अंग्रेज़ी सुधारो, अंग्रेज़ी पढ़ने समझने लायक तैयार होओ, फिर अंग्रेज़ी में पढ़ाई करो, और अंग्रेज़ी में परीक्षा दो. ग़नीमत यह थी कि तकनीकी की पढ़ाई अंग्रेज़ी भाषा में थी जरूर, मगर क्लिष्ट नहीं थी, और आमतौर पर अंग्रेज़ी के गलत-सलत वाक्य-विन्यास तथा व्याकरण दोषों को आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता था, यदि हम उत्तर पुस्तिकाओं में अपनी बात तकनीकी तौर पर सही-सही बताने में कामयाब हो जाते थे. उत्तर लिखते समय दिमाग में तब सोचते हिंदी में थे, उसका तर्जुमा मन ही मन अंग्रेज़ी में करते थे, और फिर उसे लिखते थे. आज भी यही स्थिति है – यदि कहीं पूरा अंग्रेज़ी में बोलने या लिखने कहा जाए तो मानसिक प्रक्रिया यही होती है.

ठीक इसी प्रकार, कंप्यूटरों के स्थानीयकरण में तो ख़ैर, हिंग्लिश अपने पूरे ठसके से मौजूद रही है क्योंकि बहुत से अंग्रेज़ी शब्दों का प्रचलित और सरल हिंदी शब्द मौजूद ही नहीं था, तो कहीं और कोई चारा ही नहीं था. जरा ये स्क्रीनशॉट देखें –

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हिंदी ने हिंग्लिश का यह नया रूप कैसे धरा?

भारतेंदु हरिश्चंद्र की नई हिंदी

भाषा-विज्ञान के आचार्यों ने भाषाओं की विभिन्नता में एकता ढूंढ कर उनका पारिवारिक वर्गीकरण किया है. इस वर्गीकरण के अनुसार, संस्कृत, प्राचीन फ़ारसी, प्राचीन ग्रीक तथा लैटिन आदि एक ही – भारतीय-योरोपीय (या भारोपीय) परिवार की भाषाएँ हैं. इस लिहाज से लैटिन से बनी अंग्रेज़ी तथा संस्कृत से निकली हिंदी वस्तुतः एक ही परिवार की भाषा मानी जाएगी. अब भले ही इन दोनों भाषाओं की लिपि व वाक्य विन्यास में जमीन आसमान का अंतर हो. भाषा परिवर्तनशील होती है. देश-काल और परिस्थिति के अनुसार भाषा में परिवर्तन होता है. शब्दों के अर्थ में परिवर्तन होता है, उपयोग में परिवर्तन होता है. पहले साहसिक शब्द डाकू के अर्थ में प्रयुक्त होता था पर अब वह उत्साही और साहसी के रूप में होता है. भाषा कठिनता की अपेक्षा सरलता का वरण करती है. मनुष्य का स्वभाव है कि वह प्रचलित और सरल से सरल शब्दों का उपयोग करना चाहता है. कालांतर में देवेन्द्र देव और विजयेन्द्र विजय बन जाते हैं. भाषा सामाजिक वस्तु है और वह समाज में विकसित और परिष्कृत होती है. भाषा का कोई रूप अन्तिम नहीं होता. भाषा लगातार समृद्ध होती रहती है. जब से मनुष्य का जन्म हुआ है, तभी से भाषा का प्रवाह भी निरन्तर चला आ रहा है. हिन्दी के बारे में कहा जाता है कि वह खड़ी बोली नाम की उत्तर-भारतीय भाषा का एक परिष्कृत रूप है. भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से आधुनिक समकालीन हिंदी का स्वरूप बनना प्रारंभ हुआ. भारतेंदु ने एक लेख में लिखा लिखा था – हिन्दी नई चाल में ढली – सन् 1873 ई. भारतेंदु की हिंदी वह हिंदी नहीं थी जो कोई पचास साल पहले थी.

सूरति मिश्र के हिंदी में लिखे बैताल पच्चीसी की प्रतिलिपि सन् १८२६ में मुनुवा पंडित ने की थी। उसकी एक कहानी का एक वाक्यांश कुछ तरह का है –

''बैताल बोला ए राजा मैं तेरा धीरज और साहस देखकर अति प्रसन्न हुआ परंतु एक बात मैं कहता हूँ सो सुन कि जिसके शरीर के रोम कांटों के समान और देह काठ सी और नाम शांतशील सो तुम्हारे नगर में आया है सो तुमको उसने मेरे लेने के लिए पठाया है ।

कोई तीस साल बाद यही हिंदी थोड़ी और परिष्कृत हो गई. लल्लू लाल की बैताल पचीसी (लंदन संस्करण, १८५७) में यह अंश इस प्रकार है,

''फिर बैताल खुश हो बोला कि ऐ राजा! मैं तेरा धीरज और साहस देख अति प्रसन्न हुआ पर एक बात मैं तुझसे कहता हूं, सो तू सुन; कि जिसके शरीर के रोम समान कांटों के, और देह काठ-सी, और नाम शांतशील, सो तेरे नगर में आया है और तुझे उनने मेरे लाने को भेजा है' ।

यही अंश अगर रवि रतलामी 2015 में लिखता तो?

यह कुछ इस तरह होता –

“फिर बैताल ने प्रसन्नता से कहा – ओ! किंग, आपके एंड्यूरेंस और ब्रेवरी को देख कर दिल खुश हो गया, परंतु मेरी बात सुनो. थॉर्नी बॉडी हेयर तथा वुडन बॉडी वाले शांतशील ने मुझे आपको उठा लाने का आर्डर दिया है।”

मुझे इस तरह लिखना ही होगा, नहीं तो लोग फिर मुझसे अर्थ पूछेंगे कि भाई, आखिर लिखा क्या है? यदि मैं आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछूं तो आप क्या उत्तर देंगे? बहुत संभव है, यह कहें – कि भाई, हिंदी में कहो न कि मोबाइल नंबर क्या है!

सवाल यह है कि अंग्रेज़ी शब्दों ने हिंदी में घुसपैठ कब शुरू की? विज्ञान और तकनालॉज़ी के क्षेत्र को, जहाँ अंग्रेज़ी शब्दों का उपयोग करना अनिवार्यता थी, को छोड़ भी दें, तो रोजमर्रा, बोलचाल अखबारी लेखन और यहाँ तक कि शुद्ध साहित्य में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रचलन, वह भी “हिंदी के हिंग्लिश होने की तादाद तक” कैसे आया?

भारत में अंग्रेज़ी – अभिजात्य वर्ग की भाषा या विदेशी भाषा की गुलामी

भारत में अंग्रेज़ों के राज के साथ-साथ एक और साम्राज्य स्थापित हो गया था. अंग्रेज़ी का साम्राज्य. और, अंग्रेज़ी का साम्राज्य ऐसा स्थापित हुआ कि स्लैंग बन गया – अँग्रेज़ चले गए, अपनी औलादें (अंग्रेज़ी भाषी) छोड़ गए. महात्मा गांधी भी भारत में अंगेज़ी के फैल रहे साम्राज्य से व्यथित थे. उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दिए अपने व्याख्यान में कहा था –

“अंग्रेज़ों को हम गालियां देते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तान को गुलाम बना रखा है, लेकिन अंग्रेज़ी के तो हम खुद ही गुलाम बन गए हैं. अंग्रेज़ों ने हिन्दुस्तान को काफी पामाल किया है. इसके लिए मैंने उनकी कड़ी से कड़ी टीका भी की है. परंतु अंग्रेज़ी की अपनी इस गुलामी के लिए मैं उन्हें जिम्मेदार नहीं समझता. खुद अंग्रेज़ी सीखने और अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाने के लिय़े हम कितनी-कितनी मेहनत करते हैं? अगर कोई हमें यह कहता है कि हम अग्रेज़ों की तरह अंग्रेज़ी बोल लेते हैं तो हम मारे खुशी के फूले नहीं समाते. इससे बढ़कर दयनीय गुलामी और क्या हो सकती है? ... कोई दूसरी जगह होती तो शायद यह सब बर्दाश्त कर लिया जाता, मगर यह तो हिन्दू विश्वविद्यालय है. .... रास्ते में विश्वविद्यालय का विशाल प्रवेश द्वार पड़ा. उस पर नजर गयी तो देखा – नागरी लिपि में “हिन्दू विश्वविद्यालय” इतने छोटे हरफों में लिखा है कि ऐनक लगाने पर भी वे पढ़े नहीं जाते. पर अंग्रेज़ी में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ने तीन चौथाई से ज्यादा जगह घेर रखी थी. मैं हैरान हुआ कि यह क्या मामला है?...”

बापू, आज मामला, इतना हैरानी भरा है कि अब अंग्रेज़ी रोमन लिपि से उतर कर नागरी लिपि पर सवार हो गई है और हिंग्लिश रूप धर चुकी है.

हिंग्लिश का इतिहास और आरंभिक रूप

सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति ने हिंग्लिश को भले ही हवा दी हो और स्थापित किया हो, मगर हिंग्लिश के पाँव सिनेमा और विज्ञापन के जरिए जमे. चटनीफाइंग इंग्लिश में हिंग्लिश के इतिहास के बारे में बताते हुए हवाला दिया गया है कि 1887 में अयोध्या प्रसाद खत्री ने अपनी ग़ज़ल में हिंग्लिश का प्रयोग किया –

रेंट लॉ का ग़म करें या बिल ऑफ़ इनकम टैक्स का?

क्या करें अपना नहीं है सेंस राइट नाऊ ए डेज़,

... डार्कनेस छाया हुआ है हिंद में चारों तरफ़

नाम की भी है नहीं बाकी ना लाइट नाउ ए डेज़.

वैसे, इस तरह के उदाहरण “आइसोलेटेड” किस्म के ही हैं, और आमतौर पर सामान्य आचार व्यवहार तथा साहित्य व अखबारों में हिंदी एक तरह से पवित्र ही बनी रही और टेक्निकल शब्दों के अलावा, अन्य बाकी चीजें हिंदी में ही प्रयोग में ली जाती रहीं.

मेरे अपने स्मरण के अनुसार, हिंग्लिश के सर्वत्र पहले पहल प्रयोग की याद में एक विज्ञापन प्रकट होता है. नब्बे दशक की शुरुआत में जब भारत में केबल टेलिविजन क्रांति हो रही थी, तब विज्ञापन जगत में भी क्रांति हो रही थी. टेलिविजन के विज्ञापन बाजार को आंदोलित करते थे और नया बाजार बनाते थे. विज्ञापनों के कॉपी राइटर नई/पुरानी चीज़ों के बारे में नए अंदाज में बताते थे. सर्फ और निरमा के साम्राज्य को तोड़ने के लिए एरियल का “माइक्रोसिस्टम” आया. जाहिर है, माइक्रोसिस्टम हिंदी में भी माइक्रोसिस्टम था. पर, इससे भी बढ़कर एक शीतल पेय का विज्ञापन आया. उसका टैग लाइन था – ये दिल मांगे मोर.

मोर – जंगल में मोर नाचा वाला नहीं था. वह और वाला मोर था. ये दिल मांगे और की जगह मोर ने ले ली. और क्या खूब ली. यह टैग लाइन कुछ इस तरह लोगों की जुबान चढ़ा कि लोगों का तकिया कलाम बन गया. अभी भी बहुधा प्रयोग में लिया जाता है. ठंडा ठंडा कूल कूल भी उसी दौरान आया और लोगों की जुबान पर चढ़ा.

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हीरो होंडा का लोकप्रिय विज्ञापन – हिंग्लिश में.

इससे पहले, जब उस जमाने की बेहद लोकप्रिय अंग्रेज़ी समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने अपना हिंदी संस्करण निकाला तो उसका ट्रांसलिट्रेटेड नाम ही रखा – “इंडिया टुडे”. हिंग्लिश नामों की स्वीकार्यता उसी समय स्थापित हो गई जब लोगों ने इस पत्रिका को हाथों हाथ लिया. उस समय प्रतिस्पर्धा में हिंदी समाचार पत्रिका माया थी, जिसका वर्चस्व था, और जिसने इंडिया टुडे हिंग्लिश नाम की बड़ी खिल्ली उडाई, मगर लोगों ने नोटिस नहीं लिया. माया अब बंद है, और इंडिया टुडे आज भी सर्कुलेशन में है. वैसे, मजेदार बात यह है कि नाम के अतिरिक्त, सामग्री परोसने में इंडिया टुडे में हिंग्लिश का तड़का आमतौर पर नगण्य ही रहता है.

इधर कुछ समय से अंग्रेज़ी अखबारों के शीर्षक हिंग्लिश या कि रोहिंदी (रोमन हिंदी) से सजने लगे हैं. एक उदाहरण नीचे है –

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अमूल का लोकप्रिय कार्टून-विज्ञापन सीरीज तो हिंदी – अंग्रेज़ी का पूरी तरह फेंट कर मक्खन निकाल कर ही परोसता रहा है. इसका ताजातरीन विज्ञापन (संदर्भ छोटा राजन की गिरफ्तारी का समाचार) देखें –

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ऐसा पंचलाइन हिंग्लिश में ही संभव है.

इंडियन एक्सप्रेस में एक रोहिंदी विज्ञापन –

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यह है टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2005 में छपा विज्ञापन –

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और, रोहिंदी या (देवइंग्लिश?) इतनी ख़ूबसूरत तो कभी नहीं रही –

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बहुत पहले, एक मोबाइल फ़ीचर फ़ोन ने पहले पहल हिंग्लिश कीबोर्ड का विज्ञापन कुछ यूँ दिया था –

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तब, स्मार्टफ़ोनों पर देवनागरी दिखती नहीं थी, और हिंग्लिश का अर्थ था रोमन में हिंदी! यानी – रोहिंदी.

और, भारत में हिंदी ही हिंग्लिश नहीं हो रही, बल्कि इंग्लिश भी इंडिश बन रही है –

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रीडर्स डाइजेस्ट के संपादक बता रहे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी बदल रही है और उसका रूप इंडिश या भांग्रेज़ी होता जा रहा है – डोंट एंग्री मी – इसका सटीक उदाहरण है.

हिंदी साहित्य और अख़बारों में हिंग्लिश

कई बड़े अखबारों में संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ल अपने संस्मरण में हिंग्लिश के प्रथम प्रयोग के बारे में अपने मजेदार अनुभव यूं बताते हैं –

“भाषा को युवा ही बढ़ा पाते हैं। युवाओं ने अपनी पढ़ाई के लिए भले अंग्रेजी माध्यम को चुना हो मगर तमाम दबावों के बीच भी वे हिंदी को ही अपनी बातचीत का माध्यम बनाए रहे। इसके अलावा हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्द इतने सहज तरीके से प्रवेश पा गए कि आज लगता ही नहीं कि अंग्रेजी के तमाम शब्द हमारी मातृभाषा के शब्द नहीं हैं। जिंगल्स और हिंग्लिश के बढ़ते चलन ने भी हिंदी का बाजार बढ़ाया। आज मजबूरी यह है कि हिंदी हार्टलैंड के लगभग सारे अखबार अब शीर्षक तक में अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्द लिखने में हिचक नहीं दिखाते। मुझे याद है कि एक बार जब मैं अमर उजाला के कानपुर संस्करण का स्थानीय संपादक था तब लीड में ‘चक दित्ता इंडिया!’ लिखने पर कितना हंगामा मच गया था। मुझे अखबार के मुख्यालय से फोन आए और अखबार के प्रबंध निदेशक ने भी पूछा कि शुक्ला जी आपको यह शीर्षक अटपटा नहीं लगता। मैंने दृढ़तापूर्वक कहा नहीं मुझे यह बाजार का सबसे प्रचलित शब्द लगता है। तब मेरी बात को न चाहते हुए लोगों ने गले उतारा। मगर आज ऐसा शब्द किसी को भी अटपटा नहीं लगेगा। आज महानगरों में ही नहीं छोटे शहरों से निकलने वाले अखबार भी ऐसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भाषा अपने तत्सम रूप से नहीं बल्कि पारस्परिक बोलचाल में अपने इस्तेमाल से मजबूत होती है। और हिंदी आज बाजार की सबसे सक्षम भाषा है।“

साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने अपने संस्मरण “सरे राह चलते चलते” में लिखा है –

“शकुन (पत्नी) के साहस और क्रांतिकारी सोच का आभास होने लगा था... बेटी को भी उसने मम्मी डैडी कहना सिखाया था. यह कोई गौरव की बात नहीं थी, लेकिन आधी सदी पूर्व जब निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में संतान को मां, पिताजी, बाबूजी कहना सिखाया जाता था, पुराणपंथी सासुजी के समक्ष तब बेटी को डैडी-मम्मी कहना सिखाना बड़ी बात थी.”

परंतु अब यह बड़ी बात नहीं है. भारत के अधिकांश घरों में हिंग्लिश का पदार्पण “मम्मी डैडी” से ही होता है और नित्य फलता फूलता रहता है. और, वैसे भी, जब भारत का एक स्थापित हिंदी साहित्यकार हिंग्लिश मम्मी डैडी को कृपा पूर्वक, गर्व पूर्वक अपनाता है, तो फिर भारतीय जनता क्यों पीछे रहे?

अखबारों में हिंग्लिश का प्रचलन हाल ही के वर्षों में तेज़ी से हुआ है. हालात यह हैं कि समाचारों-आलेखों में चालीस-पचास प्रतिशत अंग्रेज़ी के शब्द लिए जा रहे हैं. कहीं कहीं तो केवल क्रिया आदि ही हिंदी के हैं, बाकी सारे शब्द अंग्रेज़ी के.

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जब इस तरह का पहला प्रयोग नई दुनिया इंदौर के युवा-केंद्रित पृष्ठों पर होने लगा तो रतलाम के पत्रकार-ब्लॉगर विष्णु बैरागी ने कड़ी आपत्ति दर्ज करवाई और संपादक के साथ साथ अपने ब्लॉग पर यह लिखा कि संवाददाता ने “मातृ भाषा हिंदी पर बलात्कार किया है”. विवाद इतना बढ़ा कि मामला लीगल नोटिस तक जा पहुँचा और विष्णु बैरागी को वह पोस्ट क्षमापूर्वक हटानी पड़ी. दरअसल, युवा संवाददाता गायत्री शर्मा को संपादकीय सलाह मिली थी कि वो अपने लेखों में चालीस प्रतिशत अंग्रेज़ी के शब्द इस्तेमाल करे ताकि युवाओं को लुभाया जा सके और इस तरह अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाया जा सके. इस विवाद में मैं भी पड़ा था और मैंने अपनी टीप दी थी –

मगर, मैं अरविन्द कुमार (हिन्दी थिसॉरस)के विचारों का समर्थन करता हूँ कि भाषा तो बहती हुई नदी की तरह होती है जो भू-भाग के ऊँच-नीच और मौसम के लिहाज से रूप बदलती रहती है. तो, इस तरह से मैं भी पूर्ण शुद्धतावादी नहीं हूँ. अख़बारों में अख़बारी, व्यवहारिक भाषा का चलन आपत्तिजनक नहीं है, अन्यथा अखबारों का रूप गूढ़ साहित्यिक होने में देर नहीं लगेगी...

प्रत्युत्तर में विष्णु बैरागी ने लिखा था –

शुघ्‍दतावादी तो मैं भी नहीं हँ और आपके जरिए अरविन्‍दकुमारजी से सहमत हँ। किन्‍तु ऐसी बातें शायद कहने/सुनने/लिखने में ही अच्‍छी लगती हैं। इसी तर्क के आधार पर यह कोई नहीं बताता कि सम्‍पादकीय अग्रलेखों और सम्‍पादकीय पृष्‍ठ पर प्रकाशित होनेवाले लेखों में यह 'बोलचाल की भाषा' अनुपस्थित क्‍यों रहती है। आप पाऍंगे कि बोलचाल की यह भाषा केवल समाचारों में ही प्रयुक्‍त होती है, आलेखों में नहीं।

विष्णु बैरागी का यह सूक्ष्म अवलोकन गौर करने लायक है. अखबारों में आप पाएंगे कि हिंग्लिश नुमा भाषा अकसर समाचारों या फिर युवा केंद्रित पन्नों पर ही मिलेगी. संपादकीय पन्नों में अभी भी शुद्ध हिंदी का साम्राज्य है. वहाँ न तो अखबारी हिंदी है और न ही हिंग्लिश. आप इसे अखबारों का दोगलापन भी कह सकते हैं, और एक्सपेरीमेंटेशन भी.

नब्बे के आखिरी दशक और दो हजार के शुरूआती वर्षों में हिंग्लिश ने अपने पैर पसारने प्रारंभ कर दिए. एक तो मशरूम की तरह उग आए अंग्रेज़ी स्कूलों ने, बरसाती नालों की तरह उफन आए तकनीकी (इंजीनियरी, कंप्यूटरी और प्रबंधन) महाविद्यालयों ने आग में घी डालने का काम किया. जनता जब हिंदी से किनारा करने लगी तो आसपास की दुनिया भी इस ओर हो ली. पूर्वी दिल्ली से एक समाचार पत्र निकला – हैलो ईस्ट. यहाँ तो हिंग्लिश अपने पराकाष्ठा में मौजूद थी – पूरे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप में. हैलो East. अब ये मत पूछें कि सामग्री कैसी रहती थी – रोमन में या नागरी में!

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बाद में इस नायाब हिंग्लिशिया विचार को तमाम अखबारों ने अपनाया. भारत के सर्वाधिक बिकने वाले हिंदी अखबारों में से एक दैनिक भास्कर का 4 पृष्ठीय पुलआउट सिटी भास्कर कहलाता है. नहीं, वह City भास्कर कहलाता है. वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय भाषा. यह न हिंदी है न अंग्रेज़ी, और न ही हिंग्लिश. यह तो एक अलग तरह की अंतर्राष्ट्रीय भाषा है – जिसमें abcd भी है और कखगघ भी.

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दैनिक भास्कर का रविवारी – सॉरी, Sunday संस्करण!

हिंग्लिश जब अपने उफनती शुरुआती दौर में अखबारों आदि में पैर जमा रही थी तब लोगों ने इस पर खूब तंज कसे, व्यंग्य मारे. मगर हिंग्लिश की बयार बहती ही रही और बहार बढ़ती ही गई. उस समय इन्द्र अवस्थी ने हिंग्लिश के बारे में अपने एक ब्लॉग पोस्ट (http://theluwa.blogspot.in/2004/12/blog-post.html) में यह व्यंग्य लिखा –

“इनविटेशन - आइये, अपनी नेशनल लैंगुएज को रिच बनायें

जस्ट अभी ब्रेकफास्ट फिनिश करके उठे थे. थोड़ा हेडेक था, प्राबेबली ओवरस्लीपिंग इसका रीजन था.

एक फ्रेंड का फोन आ गया, काफी इंटिमेट हैं, लेकिन अपने को टोटल अमेरिकन समझते हैं. पूरे टाइम इंगलिश में कनवरसेशन! अरे अपनी भी तो कांस्टिट्यूशन में रिकग्नाइज़्ड एक नेशनल लैंगुएज है. लेकिन एजुकेटेड होने का यही प्राब्लम है, स्टेटस सिंबल की बात हो जाती है. ब्रिटिश लोग तो चले गये बैग एंड बैगेज, स्लेव मेंटालिटी यहीं छोड़ गये.

इन मैटर्स में हम भी बहुत स्ट्रेटफारवर्ड है. हम कांटीन्युअसली अपनी मदर टंग में बोलते रहे. भई, हम तो इरिटेट हो जाते हैं इस काइंड के लोगों से.

अभी एक कमर्शियल वाच कर रहे थे बासमती राइस के बारे में जिसमें किट्टू गिडवानी अपनी डाटर से कहती है - 'होल्ड इट सीधा. इफ यू वांट टू डू इट प्रापरली, योर प्रेपरेशन हैज टू बी बिलकुल पक्का.' कैसी लंगड़ी लैंगुएज है ये! लोग प्राउडली इसे हिंगलिश बताते हैं. कितना रिडिक्युलस फील होता है जब कोई अपना फैमिली मेम्बर ही ऐसे बोलता है.

अरे ऐड को ऐसे भी प्रेजेन्ट कर सकते थे - 'इसको स्ट्रेट होल्ड करो, प्रापरली करने के लिये प्रेपरेशन बिलकुल सालिड होनी चाहिये.'

इसे कहते हैं 'मैकूलाल चले माइकल बनने'.

अब देखिये न, जैसे पंकज बहुत ही करेक्ट लिखते हैं कि अपनी लैंगुएज में टाक करना आलमोस्ट अपनी मदर से टाक करने के जैसा है. कितना अच्छा थाट है! यही होता है कल्चर या क्या कहते हैं उसको- संस्कार (अब इसके लिये कोई प्रापर इंगलिश वर्ड ही नहीं है, यही तो प्रूव करती है अपने कल्चर की रिचनेस ) ....”

कितनी नैचुरल हिंग्लिश है, है न?

इंटरनेटी हिंदी – हिंग्लिश, रोहिंदी या हिंडिश?

मोबाइल और कंप्यूटिंग टेक्नोलॉज़ी ने भाषाई दीवारों को ढहाने में ग़ज़ब का काम किया है. आप किसी का भी – जी हाँ, किसी भी हिंदी भाषी व्यक्ति का मोबाइल उठाकर उसके संदेश बक्से में, वाट्सएप्प वार्तालाप श्रृंखला में झांक लें. आपको ऐसे एसएमएस मिलेंगे जो न केवल मिली जुली भाषा, बल्कि रोमन हिंदी और देवनागरी अंग्रेजी >> कृपया ध्यान दें, रोमन हिंदी और देवनागरी अंग्रेज़ी << में लिखे होंगे. यूँ रोमन हिंदी को पढ़ने में कठिनाई होती है और कभी कभार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है, मगर मोबाइलों में हिंदी लिखने की अंतर्निर्मित सुविधा न होने पर भी लोग धड़ल्ले से रोमन लिपि में हिंदी में संदेशों का बखूबी आदान प्रदान कर रहे हैं. इधर अपने अखबारों के पन्ने तो देवनागरी अंग्रेज़ी की मिसाल बनते जा रहे हैं. बहुत से मोबाइलों में हिंदी (देवनागरी लिपि) में लिखने की सुविधा तो मिलती है, परंतु यह बाई डिफ़ॉल्ट अभी भी नहीं मिलता और हिंदी माने देवनागरी लिखने में लोगों को जरा ज्यादा ही समस्या होती है.

पुराने मोबाइलों में सीमित भौतिक कुंजी से समस्या और विकट रहती थी, और साथ ही एनकोडिंग के भ्रष्ट हो जाने से हिंदी के कचरा हो जाने की समस्या भी. आधुनिक टेक्नोलॉज़ी से समृद्ध स्मार्टफ़ोनों ने आज हिंदी लिखने पढ़ने में होने वाली समस्याओं से निजात तो दिला दी है, मगर उस रफ़्तार से हिंदी का उपयोगकर्ता आगे नहीं बढ़ा है और स्थिति ये है कि गर्व से तमाम उच्चस्तरीय स्मार्टफ़ोन लहराने वाले लोग भी अपने स्मार्ट मोबाइल उपकरणों में भी लोगबाग देवनागरी में हिंदी पढ़ने-लिखने में कोताही करते मिल जाते हैं. क्या आप जानते हैं कि आजकल भारत में मिलने वाले अधिकांशतः मोबाइल फ़ोनों का इंटरफ़ेस अब हिंदी में उपलब्ध हो गया है. और क्या आपने अपने मोबाइल का इंटरफ़ेस डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी से बदल कर हिंदी में कर लिया है? बहुत संभव है – नहीं!.

इंटरनेट पर यूनिकोड हिंदी आने के पहले एक तरह से रोमन हिंदी का ही साम्राज्य चलता था. स्थिति तेजी से बदली है और अब तो कम्प्यूटर पर हिंदी (यूनिकोड देवनागरी) टाइप करने के तमाम किस्म के अनगिनत आसान औजारों से इंटरनेट पर हिंदी प्रयोक्ताओं का एक तरह से महाविस्फोट हो गया है. इसमें डिजिटल इंडिया मिशन के तहत नित्य विस्तार ले रही विशाल हिंदी भाषी प्रयोगकर्ताओं का बहुत बड़ा हाथ है. इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों की संख्या अंग्रेज़ी व चीनी के बाद तीसरे नंबर पर जल्द ही पहुँच जाएगी. इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों में खासा इज़ाफ़ा ब्लॉगों, फ़ेसबुक, ओरकुट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों के हिंदी प्रयोक्ताओं के कारण हो रहा है. इन साइटों के प्रयोक्ता दिन दूनी रात चौगुनी के दर से बढ़ रहे हैं और सामग्री दिन चौगुनी रात नौगुनी की दर से. इंटरनेट से जुड़ा हर व्यक्ति अपनी बात, अपने विचार, अपना सृजन सबके के सामने रखना चाह रहा है. प्रश्न उठता है कि उसकी हिंदी कैसी है? हिंदी इन नए माध्‍यमों के आने से क्या कुछ बदल रही है और इन माध्‍यमों का हिंदी भाषा, शैली आदि पर क्‍या कोई प्रभाव पड़ रहा है?

इंटरनेट पर अपने तरह के अनगिनत ‘हंस के अभिनव ओझा’ अवतरित हो गए हैं जो गाहे-बगाहे, ठहरते-विचरते लोगों की भाषा, व्याकरण और वर्तनी की ग़लतियों की ओर इंगित करते रहते हैं. यहाँ फर्क यह है कि मामला एकतरफा नहीं होता. हाल ही में तकनीकी हिंदी फोरम में शब्दकोश के ‘कोश’ या ‘कोष?’ को लेकर लंबी बहस छिड़ी जो हफ़्तों जारी रही और जब इस सिलसिले में हिंदी भाषा के इतिहास के पन्ने खुले तो तथाकथित बड़े साहित्यकारों समेत ऐसे ओझाओं के तथाकथित ज्ञान की परतें भी खुल गईं.

इंटरनेट में एक ओर भाषा में परिशुद्धता के पैरोकारों की कमी नहीं है तो वहीं दूसरी ओर मस्त-मौला चाल में अपनी भाषा, अपनी वर्तनी और अपने स्टाइल में लिखने वालों की भी कमी नहीं है. आपकी परिशुद्ध भाषा जाए भाड़ में हमारी तो अपनी शैली, अपनी भाषा के तर्ज पर. वैसे भी, जब आप ट्रांसलिट्रेशन जैसे औजारों की सहायता से लिख रहे हों तो ‘कि’ और ‘की’ में फर्क को पाठकों पर ही क्यों न छोड़ दें! बात यहीं तक थी तब तक भी ठीक-ठाक था. प्रयोगवादी तो लिपि का भी अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं – यानी तुक भिड़ानी हो तो धड़ल्ले से रोमन लिपि का प्रयोग. आपको ये बात भले ही ऊटपटांग लगे, मगर ऐसे ही एक प्रयोगवादी कवि राहुल उपाध्याय की ‘इंटरनेशनल हिंदी’ में ये ग़ज़ल देखिए जो उन्होंने अपने ब्लॉग पर छापी है –

21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिये

'graduate' को नौकरी ही नहीं 'green card' चाहिये

खुशियाँ मिलती थी कभी शाबाशी से

हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिये

जो करते हैं दावा हमारी हिफ़ाज़त का

उन्हें अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिये

घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों

कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिये

'blog, email' और 'groups' के ज़माने में

भुला दिये गये हैं वो जिन्हें सिर्फ़ 'postcard' चाहिये

एक और उम्दा उदाहरण – अभिषेक ओझा ने अपने ब्लॉग पर एक गणितीय प्रेमपत्र पोस्ट किया, जो उस समय बहुत वायरल हो चला था. प्रेमपत्र का एक हिस्सा आप भी पढ़ें –

“...अभिषेक ओझा का गणितीय प्रेमपत्र :

मेरा प्यार अगर कॉम्प्लेक्स है... तो इसमें इमाजीनरी पार्ट ज्यादा है ! अगर फंक्शन है तो अनबाउंडेड इंक्रीजिंग... सेट है तो जूलिया सेट से ज्यादा खूबसूरत।

अगर खूबसूरती का प्लॉट बनाऊँ तो तुम आउटलायर हो...किसी ग्राफ में तुम नहीं आ सकती। 'खूबसूरत' शब्द तुम्हें पाकर धन्य है ! गणित खूबसूरत जैसे शब्दों को अनडिफ़ाइंड कहता है... मैं कहता हूँ तुम मेरे लिए सुंदरता की परिभाषा हो ! मेरे लिए अगर ब्रह्मांड में ओयलर की आइडेंटिटी से ज्यादा खूबसूरत कुछ है तो वो बस तुम ही हो। सौंदर्यनुपात फिबोनाकी से क्या परिभाषित होगा? अगर तुम उस अनुपात में नहीं हो तो प्रकृति के अनुपातों को वैसे ही फिर से परिभाषित होना पड़ेगा जैसे क्वान्टम फिजिक्स से क्लासिकल।

(http://uwaach.aojha.in/2011/12/blog-post.html)

यहाँ लेखक ने अपने प्रेमपत्र में जो उपमाएं दी हैं, वे खूबसूरत गणितीय श्रृंखलाएं अथवा सूत्र हैं, साथ ही उनके विकिपीडिया लिंक भी हैं ताकि उन गणितीय सूत्रों को जरूरत के समय समझा जा सके कि लेखक इन उपमाओं से आखिर अपने प्रेम को किस तरीके से व्यक्त कर रहा है.

अब एक नजर मारते हैं हिंदी के एक बेहद लोकप्रिय फ़ेसबुकिए की पोस्ट की भाषा की ओर –

फ़ेसबुकिया भाषा में नई विधा की फ़ेसबुकी कहानी (लप्रेक की तर्ज पर?) का एक हिस्सा -

सारनाथ एक्सप्रेस में नवाज़उद्दीन की फिल्म

पिछले हफ्ते किसी काम से भोपाल गया था। पहुंचा ही था की खबर मिली की माँ बीमार है और अस्पताल में भर्ती है। सो सब काम छोड़ कर बनारस जाना पडा। जो भी पहली ट्रेन मिली पकड़ ली। southern express पकड़ के झांसी तक आया। वहाँ से रात तीन बजे संपर्क क्रांति मिली जिसने सुबह दस बजे मानिक पुर उतार दिया। दस मिनट बाद ही दुर्ग छपरा सारनाथ एक्सप्रेस आ गयी। उसमे स्लीपर क्लास में दरवाज़े के साथ जो एक अकेली सीट होती है TTE वाली , उस पे बैठ गया। सारनाथ एक्सप्रेस में PANTRY CAR नहीं होती। मानिक पुर की कैंटीन से खाना चढ़ता है। सो एक पैंट्री कर्मी वहाँ से सवार हुआ और उसने दरवाज़ा बंद कर वहीं सामने ज़मीन पे 30 - 40 प्लेट खाना रख दिया। ट्रेन चल पडी और वो अलग अलग डिब्बों में खाना , आर्डर के अनुसार पहुंचाने लगा। तभी वहाँ एक लड़का आया। उम्र रही होगी यही कोई तेरह चौदह साल। एक दम फटेहाल नहीं था। बहुत गंदा मैला कुचैला भी नहीं था। उसकी निगाह वहाँ रखे खाने की प्लेटों पे पडी। दो किस्म की प्लेटें थी। एक तो सामान्य थर्माकोल की प्लेट थी जिसपे silver foil चढ़ा था। उसके ऊपर कुछ hi fi किस्म की प्लेटें रखी थी। एकदम पारदर्शी। और उसमे रखा भोजन बड़ा आकर्षक था। दो तीन किस्म की सब्जी , परांठे ,पुलाव , रायता , सलाद……. और हाँ ……एक गुलाब जामुन भी था। ....

सामने रखा भोजन देख वो लड़का ठिठक गया।....

- अजित सिंह “करप्ट”

है न दमदार लेखनी? और, एक कोण से, लेखक का उपनाम भी दमदार है. बीच बीच में जो रोमन घुस रहा है वो शायद हिंदी टाइपिंग टूल के ट्रांसलिट्रेशन के ठीक से काम न कर पाने के कारण है, मगर इससे फ़ेसबुकी कहानी के भाषाई फ़्लो में कहीं कोई व्यवधान नहीं आ रहा है, और यह भेलपुरी में बीच-बीच में आ रहे अदरक के मजेदार स्वाद सा है.

तो, एक तरफ इंटरनेटी हिंदी में तमाम किस्म के भाषाई घालमेल बहुतायत में नजर आते हैं, वहीं दूसरी तरफ छिटपुट तौर पर भाषा प्रयोग के नए अनगढ़ शिल्प भी देखने को मिलते हैं. प्रमोद सिंह पठन-पाठन में थकने की बात कुछ इस नए, नायाब अंदाज में कह रहे हैं –

“...लल्‍ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्‍वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?...”

ये एक ऐसी कौमार्य हिंदी है जिसमें आंचलिकता की छाप है, देसी मिट्टी की सुगंध है, नए शब्दों का छौंक है. जाहिर है इन सोशल नेटवर्किंग साइटों में एक ओर हिंदी का घोर इंटरनेशलाइजेशन हो रहा है तो दूसरी ओर हिंदी की आंचलिक भाषाओं को अपने पवित्र रूप में फलने फूलने और जमे रहने का सस्ता सुंदर और टिकाऊ वातावरण भी मिला है जहाँ अवधी भी है, मालवी भी है, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, हरियाणवी इत्यादि सभी हैं. और, यदि आप में क्रिएटिविटी हो तो इनमें घालमेल कर कोई नई सरसराती भाषा शैली भी ईजाद कर लें, और यकीन मानिए, आपके फालोअरों की कोई कमी भी नहीं होगी. इंटरनेट है ही ऐसा. सबके लिए स्पेस. वृहत्. अनंत. असीमित. यहाँ सब मिलेगा हिंदी भी, हिंग्लिश, रोहिंदी या हिंडिश भी!

पहली हिंग्लिश किताब

इसमें विवाद हो सकता है. परंतु मेरी पुख्ता जानकारी के मुताबिक इसका श्रेय दिव्य प्रकाश दुबे के हिंग्लिश कहानी संग्रह टर्म्स एंड कंडीशंस एप्लाई को दिया जा सकता है. दरअसल जब यह किताब प्रकाशित हुई तो अपनी हिंग्लिश भाषा के कारण यह शीघ्र ही बेस्टसैलर की सूची पर नजर आने लगी और कुछ दिनों तक तो यह इन्फ़ीबीम पर विक्रय आंकड़ों के लिहाज से शीर्ष पर भी बनी रही. इस किताब की समीक्षा में प्रशांत प्रियदर्शी लिखते हैं –

कहानियां साहित्यिक मामलों में कुछ भी नहीं है और बेहद साधारण है, मगर कहानियों की बुनावट और कसावट आपको किताब छोड़ने से पहले पूरा पढने को मजबूर कर दे.... मैं आपकी किताब से नए लोगों को पढ़ाना सिखा रहा हूँ. मेरे वैसे दोस्त जो कभी कोई किताब नहीं पढ़ते वे भी आपकी किताब बड़े चाव से पढ़े."
मैं यह बात अभी भी उतने ही पुख्ते तौर से कह रहा हूँ. अगर आप हिंदी पढना जानते हैं मगर कभी कोई किताब हिंदी की नहीं पढ़ी है तो यह आपके लिए पहला पायदान है..पहली सीढी... और दिव्य भाई, आपको यह जानकार और भी अधिक आश्चर्य होगा की आपकी पहली पुस्तक अभी मेरे एक कन्नड़ मित्र के पास है जो हिंदी बेहद हिचक-हिचक कर ही पढ़ पाती हैं. मगर थोड़ा पढने के बाद मुझे बोल चुकी हैं की यह तो मैं पूरा पढ़ कर ही वापस करुँगी, कम से कम दो महीने बाद...

इस किताब को दिव्य प्रकाश ने फुल हिंग्लिश में लिखा है. इस किताब की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि दिव्य प्रकाश को बैंगलोर टेडएक्स टॉक में हिंग्लिश में व्याख्यान देने आमंत्रित किया गया. अपने व्याख्यान में दिव्य प्रकाश कहते हैं –

“इस दुनिया में ‘शुद्ध हिन्दी जैसा’ कुछ भी exist नहीं करता है और न ही कभी करता था। यकीन मानिए ये हिन्दी की सबसे खराब नहीं बल्कि सबसे अच्छी बात है कि कि वो कभी भी pure नहीं रही, शुद्ध नहीं रही । मैं एक example देता हूँ आपको

मैं कमरे में गया मैंने कमीज़ उतार कुर्सी पर रख दी, खिड़की खोली टेलिविजन चला दिया आकाश की ओर देखा। छ भाषाएँ हैं इसमें, कमरा- इटालियन है, कमीज़ अरबी, कुर्सी पोर्टगीज़ से, टीवी इंग्लिश से, आकाश संस्कृत से और बाकी जो बचा वो है हिन्दी ! हिन्दी को ऐसे ही दिल की भाषा नहीं कहा जाता। हिन्दी का दिल इतना बड़ा है कि वो अपने घर में बाकी सभी भाषाओं को आराम से जगह दे देती है।

बंगलोरे मुंबई पुणे या दिल्ली में आप किसी चाय की टपरी पर जाकर कभी ऐसे ही बिना काम के खड़े हो जाओ तो वहाँ सुनोगे। एक frustrated employee दूसरे को बोल रहा होगा, अच्छा employee में frustrated silent होता है

क्या यार बॉस ने दिमाग का दही कर दिया, शाम को दारू पीकर दिमाग की battery रीचार्ज करनी पड़ेगी”

ये आज की हिन्दी है जो रोज़ जाने अनजाने में हम और आप बनाते हैं। कोई भी भाषा बना ही केवल वो सकता है जो उसका एक्सपेर्ट न हो। ....

मेरी किताब आने के बाद एक चीज सुनकर बड़ा अच्छा लगता है जब लोग बताते हैं कि मेरी किताब उनकी पहली हिंदी किताब है। लेकिन इससे भी अच्छा तब लगता है जब वही लोग किताब पढ़ने के बाद बोलते हैं-

हिंदी इज कूल यार, हिंदी की कुछ और किताबें बताओ।”

यहाँ दिव्य प्रकाश जिस कूल हिंदी की बात कर रहे हैं, वो दरअसल हिंग्लिश है.

हिंग्लिश इज़ कूल यार!

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This blog post is inspired by the blogging marathon hosted on IndiBlogger for the launch of the #Fantastico Zica from Tata Motors. You can apply for a test drive of the hatchback Zica today.

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हिन्दी में अंग्रेजी घर कर गयी है। जहाँ विकल्प है, हिन्दी के शब्द प्रचलित हैं और लोगों को अर्थ समझ आता भी, वहाँ पर अन्यथा प्रयोगवाद से क्या लाभ। अंग्रेजी संबद्ध उत्कृष्टता के भाव कब हमारा पीछा छोड़ंगे।

काफी खोजबीन भरी जानकारी से भरा लेख । वर्तमान हिन्दी में हिन्दी है कहाँ ?
पहले तो उर्दू शब्द बहुतायत में थे, अब अंग्रेजी के शब्द जम गए हैं । अजीब सी खिचड़ी बन गई है ।

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28 - 01 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा -2235 में दिया जाएगा
धन्यवाद

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - भारत भूषण जी की पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

हिन्दी इस भेरी कूल, वी शुड राइट ऐंड स्पीक मोर इन हिन्दी :)

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