2016


स्टीफन हॉकिंग 75 साल के हो गए। कोई 50 साल पहले डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और कहा था कि हॉकिंग साल-दो-साल और जी पाएंगे।

परंतु उन सभी को धता बताते हुए वे जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वैसे, आधुनिक तकनीक और चिकित्सा सुविधा से भी यह संभव हो सका है। बहुतों के प्रेरणा स्रोत हैं हॉकिंग। खासकर गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए।
स्टीफन हॉकिंग को ढेर सारी शुभकामनाएं।

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और, यह इंडसैंज के हिंदी ओसीआर से भी अधिक शुद्ध है. यदि इसे कमांड मोड में बैच मोड में इस्तेमाल किया जाए, तो यह तेज भी है. बहरहाल, इसके इंस्टाल करने व इस्तेमाल करने के बारे में विस्तृत जानकारी श्रीदेवी कुमार ने गूगल तकनीकी हिंदी समूह में दी है, जिसे यहाँ दी जा रही है. मैंने इसे प्रयोग किया और पाया कि ठीक-ठाक इमेज फ़ाइल में अशुद्धि का प्रतिशत पांच (5) प्रतिशत से भी कम है. और यही बात इस निशुल्क, ओपनसोर्स ओसीआर को लाजवाब बनाती है. यह वस्तुतः ओपनसोर्स ओसीआर प्रोग्राम टैसरैक्ट का जीयूआई पोर्ट है.

इसे प्रयोग करने की विधि यह है -

 

1. निम्न लिंक में से अपने कंप्यूटर के हिसाब से प्रोग्राम को डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यदि आप सुनिश्चित नहीं हैं कि आपका कंप्यूटर 64 बिट का है या 32 बिट का तो आप नीचे वाली लिंक का प्रोग्राम डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यह सभी कंप्यूटरों में काम करेगा:

https://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_x86_64_tesseract-25fed52.exe

https://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_i686_tesseract-25fed52.exe

2. उसके बाद 4.0.0alpha Hindi traineddata यहाँ से डाउनलोड करें -

https://github.com/tesseract-ocr/tessdata/blob/master/hin.traineddata

3. इस hin.traineddata को यहाँ सहेजें - Start→All Programs→gImageReader→Tesseract language definitions. (वैसे यह डिफ़ॉल्ट डायरेक्ट्री होती है, जहाँ कॉपी करना होती है - C:\Program Files\gImageReader\share\tessdata)

4. अब Giamagereader प्रोग्राम को चालू करें

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5. यदि आपके प्रोग्राम में Recognize all मेनू के नीचे हिंदी नहीं दिखती है तो शीर्ष दाएं कोने में दिए  /Settings/Tools पर क्लिक करें और. Redetect languages चुनें. हिंदी दिखेगा. नहीं तो जहाँ डिफाल्ट English लिखा है वहां ड्रापडाउन मेनू से हिंदी चुनें. आपका प्रोग्राम हिंदी ओसीआर करने को तैयार है. यह द्विभाषी ओसीआर भी कर सकता है!

6. चित्र फ़ाइल जिसका ओसीआर किया जाना है उन्हें जोड़ने के लिए, ऊपरी बाएं कोने में सोर्सेस आइकन के नीचे  फ़ाइल को क्लिक करें.

7.  OCR किए जाने वाली फ़ाइल को चुनने पर यह चित्र प्रोग्राम के मुख्य विंडो में बीच में दिखने लगेगी.

8. यदि पहले से ही हिंदी नहीं है तो   प्रोग्राम मेनू में 'Recognize All' के नीचे हिंदी चुनें.

9. चित्र के किसी खास हिस्से को ओसीआर करने के लिए प्लस कर्सर से चित्र का क्षेत्र हाइलाइट करें और  recognize all बटन को क्लिक करें. या पूरा चित्र ओसीआर करना चाहते हैं तो क्षेत्र चुनने की आवश्यकता नहीं है. पास में मैजिक वेंड भी है जो स्वचालित क्षेत्र का चुनाव करता है, पर वह शुद्ध नहीं है.

10. प्रोग्राम के नीचे दाएं बाजू में हो रहे ओसीआर की प्रगति की स्थिति प्रतिशत (%) में दिखेगी.

11. ओसीआर किया गया पाठ दाएं विंडो में कुछ इस तरह प्रकट होगा.

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आपने सही देखा, इसमें बेसिक किस्म का हिंदी वर्तनी जाँचक भी अंतर्निर्मित है.

 

12. आप नए चित्र का ओसीआर पाठ इसी पाठ के बीच में, ऊपर या नीचे जोड़ सकते हैं और इसे टैक्स्ट फ़ाइल के रूप में सहेज सकते हैं या कॉपी पेस्ट कर प्रयोग में ले सकते हैं.

 

बैच फ़ाइल के लिए श्रीदेवी जी ने निम्न कमांड का प्रयोग सुझाया है -

Commands followed under bash environment under windows 10 -

1. convert pdf to images using ghostscript

gs -q -dNOPAUSE -r300x300 -sDEVICE=tiffg4 -sOutputFile=WMH%03d.tif WMH.pdf -dFirstPage=10 -dLastPage=20

2. Use scantailor on windows

to automatically crop the images, deskew them

3. Run tesseract batch process for imagefiles 

#!/bin/bash

#run in anunad/out dir

export TESSDATA_PREFIX=/mnt/c/Users/User/shree

    img_files=${img_files}' '$(ls *.tif)

    for img_file in ${img_files}; do

       echo ${img_file}

        time tesseract ${img_file} ${img_file%.*} --psm 6 --oem 1 -l hin+eng

    done    

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इस बहुभाषी बहु-सुविधा युक्त शब्द संसाधक को भानुमति का पिटारा कह सकते हैं.

क्योंकि इसमें है -

 

हिंदी, गुरुमुखी, शाहमुखी और अंग्रेजी  लिपि में लिखने की सुविधा

प्रत्येक लिपि में दर्जनों कीबोर्ड में लिखने की सुविधा.

 

उदाहरण के लिए, हिंदी में -

 

इनस्क्रिप्ट

अनमोल हिंदी

चाणक्य

डेवलिस

कृष्णा

कृतिदेव

कुंडली

मुगल

नारद

पारस

शुषा

कीबोर्ड लेआउट से हिंदी यूनिकोड टाइपिंग की सुविधा. और, यह विंडोज़ 10 में शानदार काम करता है.

इसका अर्थ है कि विंडोज 10 में रेमिंगटन कीबोर्ड लेआउट से यूनिकोड टाइप करने की चिरकालिक समस्या का निदान.

सोने में सुहागा यह है कि इसमें हिंदी का अंतर्निर्मित वर्तनी जांचक (स्पेल चेकर) भी है. हालांकि चलाने में यह थोड़ा अजीब किस्म का है, और टाइप करते वर्तनी जांच की सुविधा नहीं है.

क्या इतने से ही इसे भानुमति का पिटारा कह सकते हैं? बिल्कुल नहीं.  आगे और भी सुविधाएँ हैं इसमें -

 

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बहुभाषी लिप्यंतरण (पुराने फ़ॉन्ट की सामग्री को यूनिकोड में) की सुविधा

हिंदी में -

तीन दर्जन से अधिक फ़ॉन्ट को यूनिकोड में बदलने की सुविधा. वह भी फार्मेटिंग, फ़ॉन्ट आकार, फ़ॉन्ट रंग आदि में बिना किसी बदलवा के, फ़ॉर्मेटिंग बनाए रखते हुए, और आमतौर पर शुद्ध.

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ट्रांसलिट्रेशन की सुविधा - हिंदी में - यूनिकोड देवनागरी से रोमनागरी तथा इसके उलट.

शब्द से अंक तथा अंक से शब्द परिवर्तन की सुविधा

डिक्शनरी सुविधा

अंग्रेज़ी टैक्स्ट टू स्पीच सुविधा

ऑनस्क्रीन कीबोर्ड सुविधा

अंतर्निर्मित कैरेक्टर मैप

अनुवाद सुविधा (पंजाबी-हिंदी-उर्दू-मालवी)

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और, अंग्रेजी, उर्दू,  पंजाबी (गुरुमुखी)  में ओसीआर ( ऑप्टिकल कैरेक्टर रीकग्नीशन) की सुविधा.

है ना भानुमति का पिटारा?

यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -  http://akhariwp.com/

दिसम्बर में देश

(चित्र साभार - कस्बा ब्लॉग)

दिसम्बर की एक सुबह, कड़ाके की ठंड में ठिठुरता दुकालू देश का हाल जानने के लिए निकला।


सबसे पहले उसकी मुलाकात हल्कू से हुई। अपने खेत में हल्कू सदा सर्वदा की तरह आज भी जुटा हुआ था। मौसम की मार और बिगड़ी बरसात ने पिछली फसल खराब कर दी थी तो उसके लंगोट का कपड़ा प्रकटतः  इंच भर और छोटा हो गया था। और सदा की तरह उसकी छाती उधड़ी हुई थी, जिसे वस्त्र सुख वैसे भी वार-त्यौहार ही हासिल हो पाता था। ठंडी बर्फीली हवा जहाँ पूरी दुनिया में ठिठुरन पैदा कर रही थी, हल्कू के पसीने से चचुआते शरीर को राहत प्रदान कर रही थी ।


दुकालू आगे बढ़ा। सामने स्मार्ट  सिटी की नींव खुद रही थी। काम जोर शोर से चल रहा था। होरी नींव खोदने के दिहाड़ी काम में लगा था। होरी ने जब से होश संभाला है तब से उसने दैत्याकार भवनों की नींव ही खोदी है। अनगिनत भवनों को उनकी  नींव की मजबूती होरी के पसीने की बूंदों  से ही मिली है। लगता है जैसे सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर ने उसे खास इसी काम के लिए बनाया है। हां, उसी ईश्वर ने, जिसने ब्रह्मांड बनाया, निहारिकाएं बनाई और, और यह उबड़-खाबड़ धरती भी बनाई । नेता और अफसर भी बनाए। होरी भी पसीने से तरबतर था और बर्फीली ठंडी हवा उसे भी राहत प्रदान कर रही थी।

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चलते चलते दुकालू सचिवालय पहुंच गया। केंद्रीयकृत वातानुकूलन - हां, वही- सेंट्रलाइज्ड एयरकंडीशनिंग - से लैस पूरे सचिवालय परिसर में दिसम्बरी ठिठुरन का कहीं अता पता नहीं था। लग रहा था कि टेंडर निकाल कर दिसम्बर को यह ठेका दे दिया गया है कि वो यहाँ से फूट ले और अपना पूरा जलवा बगल के झोपड़पट्टी में दिखाए जहां होरी और हल्कू का डेरा है। सचिवालय के भीतर का बाबू जगत पसीने से तरबतर था। बजट वर्ष के खत्म होने में महज दो माह बचे थे और फंड का एडजस्टमेंट करना जरूरी था नहीं तो फंड के लैप्स हो जाने का खतरा था। फंड लैप्स हुआ तो साथ ही अपना हिस्सा भी तो होगा। आसन्न खतरे से निपटने के जोड़ जुगाड़ मैं जूझते बाबू लोग पसीना पसीना हो रहे थे। एसी की हवा भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी।


दुकालू ने सोचा चलो  अब संसद का हाल चाल ले लिया जाए। संसद जिससे देश चलता है।   वहाँ तो हाल और भयंकर था। नेता एक दूसरे पर पिले पड़े थे। कोई किसी की सुन नहीं रहा था। सब अपनी अपनी सुनाने की जुगत में लगे हुए थे। कोई अपने मन की बात कह रहा था तो कोई दूसरे के मन की। कोई अपनी बात से जलजला का खतरा लाने की बात कर रहा था तो कोई अपने एक इशारे से। भयंकर गर्मागर्मी थी। विस्फोटक।  नाभिकीय संलयन की अवधारणा वैज्ञानिकों को संसद से ही मिली होगी। जाहिर है, दिसम्बरी जाड़े का यहाँ दूर दूर तक अता पता नहीं था।  वहां जो कुछ था वह यह था कि चुनावी दंगल में उलझे नेता एक दूसरे को पटखनी देने दांव पर दांव लगाए जा रहे थे और इस खेल में पसीना पसीना हुए जा रहे थे।


दुकालू वापस लौटा। गली के मुहाने पर ओवरफ्लो हो रहे कचरे के डिब्बे के पास एक आवारा कुतिया अपने पिल्लों के साथ कचरे में मुंह मार रही थी। पास ही दीवार पर स्वच्छ भारत अभियान का पोस्टर चिपका था जिसे किसी मनचले ने किनारे से फाड़ दिया था।  दुकालू को बड़ी जोर की ठंड लगी। वह जल्दी से अपनी झोपड़ी में घुसा और कथरी ओढ़ कर सो गया।


कहते हैं कि तब से दुकालू उठा नहीँ है। वह विस्फरित आंखों से कथरी ओढ़े लेटा हुआ है। उसका देश दिसम्बर में ही कहीं अटक कर रह गया है।


व्यंज़ल

तूने किया कैसा ये कर्म है

देश दिसम्बर में भी गर्म है

.

सियासत में मानवता नहीं

कोई और दूसरा ही धर्म है

.

झंडा उठाने की चाह तो है

पर तबीयत जरा सी नर्म है

.

छोड़ दो हमें हमारे हाल पे

जड़ों ने पकड़ लिया जर्म है

.

राजनीति में सफल है रवि

छोड़ी उसने अपनी शर्म है


संगीत के दीवानों के लिए - आपके एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन पर आ गया है - डॉल्बी एटमॉस। लिनोवो तथा मोटोरोला के कुछ फोन पर यह उपलब्ध है और खबर है कि अगले साल यह विंडोज व एक्सबाक्स में भी उपलब्ध हो जाएगा। मैंने इस तकनीक को हाल ही में जांचा परखा और पाया है कि यह वास्तव में अविश्वसनीय रूप से उत्तम है। हालांकि संगीत का यह उत्तम अनुभव तभी मिलेगा जब आपके संग्रह में आधुनिक, उच्च गुणवत्ता के गीत संगीत हों।
उदाहरण के लिए, राजकपूर के गाने में अनुभव सही नहीं मिलता है क्योंकि तब रिकार्डिंग तकनीक अच्छी नहीं थी। परंतु हृतिक रौशन, जाकिर हुसैन, ब्रिटनी स्पीयर्स के गीत डॉल्बी एटमॉस से सुनने में एक नया समां बांध देते हैं।

कार्टूनिस्टों की नजर में वर्ष 2016 कैसा रहा? लेखा जोखा दिसम्बर 2016 के हिंदी फ़ेमिना में उपलब्ध है. इस्माइल लहरी, मन्जुल, कीर्तीश भट्ट और अजीत नैनन मौजूद हैं यहाँ. मेरे पसंदीदा कार्टूनिस्ट काजल कुमार को भी होना चाहिए था यहाँ, मगर ख़ैर.

मैंने फ़ेमिना के इस अंक को अपने स्मार्टफ़ोन में मुफ़्त जियो मैग्स ऐप्प के जरिए पढ़ा है और इसके कुछ पन्ने आपसे नीचे साझा किए हैं - ऐप्प पर वहाँ मौजूद साझा विकल्प के जरिए. यदि आपके पास रिलायंस जियो कनेक्शन है तो आप भी जियो मैग्स ऐप्प डाउनलोड कर यह अंक मुफ़्त में डाउनलोड कर इसका आनंद उठा सकते हैं - हाँ, अच्छे अनुभव के लिए आपके स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पांच इंच या बड़ी होनी चाहिए. टैबलेट पर यह और अच्छे से पढ़ा जा सकता है. बाजार में प्रिंट मैग्जीन का विकल्प तो खैर है ही - कीमत - केवल 40 रुपए.

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“भारत में कैशलेस इकॉनॉमी”. पर एक मेघावी विद्यार्थी (वो, जाहिर है, सीए इन्टर्न था) का लिखा निबंध आपके अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है –

कैशलेस इकॉनॉमी की सोच बहुत ही फासीवादी, निरक्षर किस्म की, तुगलकी, फूहड़ और निकृष्ट विचार वाली है. यह ऐसा विचार है, जिसको अपना कर भारत प्रागैतिहासिक काल वाली स्थिति में पहुंच जाएगा. बहुत पीछे चला जाएगा. उसकी प्रगति खत्म हो जाएगी. भारत में क्या, कहीं भी कैशलेस इकॉनॉमी की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. कैशलेस इकॉनॉमी भी कोई इकॉनॉमी होती है भला? जहाँ कैश नहीं वहाँ इकॉनॉमी कैसी?

कैशलेस इकॉनॉमी से बहुतों का धंधा चौपट हो जाएगा. सबसे पहले चार्टर्ड एकाउन्टेंटों का धंधा चौपट होगा. जब हर ट्रांजैक्शन, हर लेन-देन खाता बही में दर्ज होगा, सारा कुछ ब्लैक एंड व्हाइट में दर्ज होगा, तो फिर भला हम चार्टर्ड एकाउन्टेंटों को कौन पूछेगा?

कैशलेस इकॉनॉमी से भयंकर मंदी आएगी. ऐसी मंदी जिससे देश कभी उबर नहीं सकेगा. कैशलेस सिस्टम से दो नंबर का धंधा बंद हो जाएगा, जिससे बहुत सारी इंडस्ट्री बंद हो जाएगी. स्टील और सीमेंट आदि सैक्टर में तो तालाबंदी हो जाएगी. जिस देश की इंडस्ट्री में सत्तर प्रतिशत बिजनेस दो नंबर में, बिना बिल के, या एक ही बिल में दर्जनों बार माल आर पार कर खेल होता है वह समाप्त हो जाएगा, जिससे बिजनेस मर जाएगा. इंडस्ट्री ये टैक्स, वो टैक्स दे देकर घाटे में आकर मर जाएगी. अरे! एप्पल जैसी विश्व की सबसे बड़ी, अमरीकी कंपनी भी आज अगर नंबर एक पर है तो इसलिए कि वो अमरीका में टैक्स नहीं देती, अपना पैसा और बिजनेस आयरलैंड में बताती और पार्क करती है. और आप बात करते हैं! जो आदमी अब तक दिन में सौ रुपए लगाकर पाँच हजार रुपए की चाय बेचकर नित्य चार हजार नौ सौ रुपए कमाता था और कोई टैक्स नहीं देता था, वो तो चाय के हर कप पर टैक्स देने के विचार के सदमे से मर ही जाएगा. भारती की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं सदमों से सफाचट हो जाएगी. ओह! अतिरेक हो गया? मगर, फिर, धंधा किये और टैक्स दिए – यह भी कोई जीना, आईमीन, धंधा है लल्लू?

कैशलेस इकॉनॉमी से देश के मतदाताओं को पंचसालाना चुनावी उत्सव से महरूम होना पड़ेगा. अहा! वे भी क्या दिन थे. जब देश में चुनाव एक महोत्सव हुआ करता था. बुरा हो शेषन का जिसने चुनावी महोत्सवों के गुब्बारे में इतने छेद कर दिए कि गुब्बारा फूट गया और चुनाव बस उत्सव बन कर रह गए और मामला भूकंप के बाद बचे अवशेषों को सजाने-सम्भालने जैसा हो गया. कैशलेस इकॉनॉमी से परेशान नेतागण आपस में सिर जोड़ कर यह जुगाड़ भिड़ाने में बैठे हैं कि पार्टी लाइन की ओर से मतदाताओं को दिए जाने वाले मंगलसूत्र, टीवी, साइकिल आदि तो खैर ठीक है, व्यक्तिगत जीत सुनिश्चित करने के लिए कंबल ओढ़ कर दिए जाने वाले कैश का विकल्प कैशलेस में आखिर कैसे संभव होगा? वैसे ये जमात भारत की सबसे जुगाड़ू जमात है. चुनाव आते न आते कैशलेस का कैशबैक किस्म का कोई न कोई जुगाड़ निकल ही आएगा.

कैशलेस इकॉनॉमी से आम जनता को अपना रोजमर्रा का कार्य करने-करवाने में बहुत समस्या आएगी. अभी तो किसी किस्म का ड्राइविंग लाइसेंस लेने, किसी बिल्डिंग का परमीशन लेने या राशन कार्ड बनवाने के लिए कैश बहुत काम आता है. दलालों और अफ़सरों को उनके सुविधा शुल्क के तयशुदा रेट कैश में दो और काम घर बैठे हो जाता है. कैशलेस इकॉनॉमी में यह सब कैसे होगा यह सोच-सोच कर जनता परेशान हो रही है हलाकान हो रही है और इस समस्या का कहीं कोई हल नजर नहीं आता.

कैशलेस इकॉनॉमी से आने वाले समय में कभी भी किसी का कहीं कोई काम नहीं होने वाला. कोई लाइसेंस नहीं बनेगा, न कहीं कोई परमीशन मिलेगी. किसी का राशनकार्ड भी नहीं बनेगा. चहुँओर अव्यवस्था हो जाएगी. दंगे भड़क उठेंगे. मारकाट मच जाएगी.  हाँ, कौन जाने आगे शायद नेताओं की तरह, भारतीय जुगाड़ू जनता इसका कोई हल निकाल ले. वैसे भी, आजकल की अधिकांश  भारतीय जनता किसी न किसी किस्म की नेतागिरी में व्यस्त है और यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि ये नेता है या आदमी या आदमी है या नेता. शायद पेटम जैसा कोई ऐप्प निकल आए जो बिटक्वाइन जैसे ब्लॉकचैन आभासी मुद्रा के जरिए पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी चलाए और जो केवल ऐसे काम-धाम के लिए खास, गुपचुप तौर पर बनाया जाए. वैसे इस विचार का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता है. सचिवालयों में जहाँ टेंडर आदि होते हैं, बिटक्वाइन के बारे में आजकल तहकीकातें वैसे भी जरा ज्यादा होने लगी हैं. जो दसवीं फेल नेता कभी इंटरनेट और कंप्यूटर को टेढ़ी निगाह से देखते थे और पूछते थे कि ये क्या बला है, वे भी बड़े कुतूहूल से बिटक्वाइन के बारे में पूछते फिर रहे हैं. जब दो-नंबरी, इंटरनेशनल पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी इस रफ़्तार से आ रही है तो कुल मिलाकर, एक नंबर की देशीय कैशलेस इकॉनॉमी को फेल होना ही है.

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व्यंज़ल

 

आया था कैशलेस जाएगा कैशलेस

फिर डर क्यों, हो जाएगा कैशलेस

 

गुमान क्योंकर हो, जब ये तय है

एक दिन, सब हो जाएगा कैशलेस

 

सभी देख रहे हैं चेहरे दूसरों के

कि कौन पहले हो जाएगा कैशलेस

 

याद रख, जन्नत में तुझे हूरें मिलेंगी

यदि, बंदे, तू हो जाएगा कैशलेस

 

क़तार में सबसे पहले खड़ा है रवि

जानता है, वो हो जाएगा कैशलेस

एक गुलुबन्द यानी मफलर की वापसी.

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शीर्षक में आधुनिक, कूल-डूड, भारतीय पाठकों को गुलुबन्द का अर्थ बताना बनता है ना? नहीं तो बहुत से लोगों को आइडेन्टिटी क्राइसिस हो जाएगा.

बहरहाल, सरदी का मौसम लौट आया है और साथ में गुलुबन्द भी. मैंने भी अपनी आलमारी से अपना गुलुबन्द निकालने की कोशिश की तो उसने निकलने से मना कर दिया. मैंने पूछा, भइए, क्या बात है? किस बात की नाराजगी? तो वह बेहद भावुक हो गया. देश में भावुक होने का मौसम है. प्रधान मंत्री से लेकर प्रधान न्यायाधीश सभी भावुक हो रहे हैं. हर छोटी बड़ी बात पर. मैं भी बड़ा भावुक होकर यह तथाकथित व्यंग्य जुगलबंदी लिख रहा हूँ – जिसे पढ़कर (या शायद घोर अपठनीय होने के कारण हिकारत से देख कर) पाठक लोग और ज्यादा भावुक होंगे और कहेंगे – ये व्यंग्य है? व्यंग्य का स्तर इतना न्यून! फिर वे और भावुक हो जाएंगे.

तो, बात गुलुबन्द की भावुकता की हो रही थी. वो बेहद भावुक होकर बोला – किसी ने मेरी अपनी इच्छा, मेरी अपनी अभिलाषा पूछी है?

फिर उसने पूरी भावुकता में अपनी अभिलाषा कुछ यूँ बयान की -

गुलुबन्द यानी मफलर की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गले में लिपट जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-कंधे में फहर
प्यारी को ललचाऊँ,


चाह नहीं जनता के कानों में
हे हरि लपेटा जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
बंधूं भाग्य पर इठलाऊँ,


मुझे बांध कर हे! राजनेता,
उस पथ पर चल देना तुम!
क्षुद्र निकृष्ट राजनीति करने,
जिस पथ पर जावें नेता अनेक!

(स्व. श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी की आत्मा से क्षमायाचना सहित)

कल्पना कीजिए कि आप बाहर यात्रा के लिए निकले हैं, ट्रेन पकड़नी है, और समयाभाव व ट्रैफ़िक जाम की वजह से थोड़ी जल्दी में भी हैं. अचानक आपको याद आता है कि आप अपना टूथब्रश और टूथपेस्ट रखना भूल गए हैं. कोई बात नहीं, आप इसे रास्ते चलते परचून की दुकान से खरीदने के लिए रुक जाते हैं. दुकान वाला पहले ही किसी अन्य खरीदार से जूझ रहा होता है. उसे निपटाकर वह आपसे मुखातिब होता है. आप जल्दी में हैं, आपके ट्रेन छूट जाने का समय हो रहा है, मगर दुकानदार को आपकी यह अर्जेंसी पता नहीं है, तो वो अपने हिसाब से आपको सामान देता है. फिर आप खरीदी हुई वस्तु का भुगतान करते हैं तो एक और समस्या आती है. आपके पास केवल बड़े नोट हैं और दुकानदार के पास आपको देने को पर्याप्त छुट्टे नहीं हैं. इस आपाधापी में आपकी ट्रेन छूट जाती है.

अब अपनी इस कल्पना में थोड़ा सा ट्विस्ट कीजिए. आप जिस दुकान पर टूथपेस्ट लेने जा रहे हैं, वहाँ आरएफआईडी सेंसर युक्त कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की सुविधा है और आपने भी कॉन्टैक्टलैस पेमेंट वाला आरएफआईडी टैग युक्त रिस्टबैंड पहना हुआ है. आप दुकान में घुसते हैं, टूथपेस्ट, टूथब्रश उस दुकान के काउंटर से उठाते हैं, और बस वहां से बाहर आ जाते हैं. आपके दुकान में घुसते ही वहाँ का आरएफआईडी सेंसर आपको पहचान लेता है और दुकान पर स्थित विभिन्न सेंसर सक्रिय हो जाते हैं और जो जो सामान आप उठाते हैं उनकी कीमत जोड़ते जाते हैं. जैसे ही आप दुकान से बाहर आते हैं, आपके खाते में स्वचालित बिलिंग हो जाती है और स्वचालित भुगतान हो जाता है जिसकी सूचना आपको आपके मोबाइल पर एसएमएस और ईमेल के जरिए मिल जाती है. दुकान के गेट पर बैठे दुकानदार या चौकीदार के पास ग्रीन सिग्नल आता है कि भुगतान हो चुका है. वो आपका अभिनंदन करता है और आप इस तर तुरंत ही खुशी-खुशी इंस्टैंट भुगतान कर निकल लेते हैं. और आपकी ट्रेन आपको आराम से मिल जाती है. ऊपर से, न चिल्लर का चक्कर और न ढेर सारे रुपए लेकर साथ चलने की जरूरत.

कैशलेस भुगतान की यही सबसे बड़ी खूबी है. आप अपने साथ अपना बैंक लेकर चल सकते हैं, हर किस्म का चिल्लर और कितनी ही बड़ी राशि चाहे वह लाखों में हो – अपने जेब में साथ लेकर – एक प्लास्टिक कार्ड – डेबिट या क्रेडिट कार्ड - में या अपने मोबाइल वालेट के रूप में साथ लेकर चल सकते हैं, और उसका उपयोग चौबीसों घंटे कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं. वह भी पूरी तरह सुरक्षित.
आइए, अब जानते हैं कि कैशलेस भुगतान प्रणाली के पीछे का विज्ञान क्या है क्या क्या विकल्प हैं और यह काम कैसे करता है. परंतु पहले इसका इतिहास जानें –

कैशलेस भुगतान प्रणाली का इतिहास मानवीय सभ्यता जितना पुराना है जिसमें बार्टर यानी वस्तु-विनिमय का उपयोग किया जाता था. उधारी प्रथा भी एक तरह का कैशलेस तंत्र है जिसमें महीने के अंत में या एक नियमित अंतराल पर वास्तविक रकम का लेन-देन किया जाता है, बाकी समय लेन-देन को एक रजिस्टर या बही में दर्ज कर लिया जाता है. परंतु आधुनिक कैशलेस भुगतान प्रणाली जिसमें क्रेडिट डैबिट कार्डों अथवा ईवालेट जैसी टेक्नोलॉज़ी का उपयोग होता है, वह जटिल कंप्यूटिंग और इंटरनेट प्रणाली का सुरक्षित प्रयोग कर बनाया गया है.
लेन-देन के लिए रुपए-पैसे के बदले क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने की संकल्पना और इस शब्द का उपयोग उपन्यासकार एडवर्ड बेलामी ने अपने उपन्यास लुकिंग बैकवर्ड में सन 1887 में किया. तब इसे कोरी कल्पना ही कहा जा सकता था. मगर जल्द ही, विभिन्न व्यापारिक संस्थानों जिनमें होटल, डिपार्टमेंटल स्टोर और पेट्रोल पम्प आदि शामिल थे, अपने परिचित व बारंबार आने वाले ग्राहकों की सुविधा के लिए कुछ उपाय गढ़ने प्रारंभ किए. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में चार्ज-क्वाइन का प्रयोग प्रारंभ हुआ. ये चार्ज-क्वाइन आमतौर पर धातुओं के बने होते थे और केवल परिचित और नियमित ग्राहकों को दिए जाते थे जिनका खाता व्यापारिक संस्थानों में होता था. इस तरह इन चार्ज क्वाइन को दिखाकर लेन-देन को खाते में दर्ज कर लिया जाता था. सन् 1920 के आते आते चार्ज क्वाइन का रुपरंग बदल गया और चार्ज-प्लेट और चार्ज कार्ड का उपयोग होने लगा. वेस्टर्न यूनियन ने अपने नियमित ग्राहकों के लिए चार्ज कार्ड पेश किया और दस साल के भीतर ही ये कार्ड इतने लोकप्रिय हुए कि अन्य व्यापारिक संस्थानों ने एक दूसरे के कार्ड भी स्वीकार करना प्रारंभ कर दिए. चूंकि उस जमाने में इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिकी जैसी कोई सुविधा नहीं थी, अतः उन कार्डों में एम्बोज कर या कार्ड के पीछे चिपकी कागज की शीट पर मशीन से छपाई कर लेनदेन का विवरण दर्ज किया जाता था और महीने के अंत में कार्ड पर देय रकम का भुगतान किया जाता था.

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तब की उपलब्ध ये सारी सुविधाएँ, तब की उपलब्ध वैज्ञानिकी, प्रौद्योगिकी पर निर्भर थीं, और इसी वजह से बेहद सीमित मात्रा में ही प्रचलित थीं. आमतौर पर क्षेत्र विशेष में ही. और इनके इस्तेमाल में तमाम झंझटें भी थी. फिर, सितंबर 1958 में बैंक ऑफ अमरीका ने एक बड़ा दांव खेला. बैंक ऑफ अमेरिका ने फ्रेस्नो शहर के सभी 60 हजार योग्य निवासियों को बैंकअमरीकार्ड नामक क्रेडिट कार्ड मुफ़्त में भेज दिया और इसका उपयोग शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों में करने का अनुरोध किया. शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों से भी इस कार्ड को स्वीकार करने का अनुरोध किया. यह परीक्षण चल निकला और इस कार्ड की मांग तो बढ़ी ही, नए प्रकल्पों के गठन का रास्ता भी खुला. 1966 में मास्टरकार्ड का जन्म हुआ और 1976 में बैंकअमरीकीकार्ड का नाम बदल कर वीजा कार्ड हो गया. दुनियाभर के देशों में यही दो कार्ड अधिक लोकप्रिय हैं. परंतु तब इन कार्डों का प्रयोग, कैशलेस की सुविधा देते होते हुए भी उपयोगकर्ताओं के लिए झंझट भरा होता था, बावजूद इसे ये कार्ड लोकप्रिय होते रहे.

आप पूछेंगे कि कैसे? तब जब आप अपना क्रेडिट कार्ड कहीं प्रयोग में लेते थे तो व्यापारिक संस्थान पहले आपके कार्ड के बैंक में फ़ोन लगाते थे और फिर आपके कार्ड के सही होने की व खाते में पर्याप्त बैलेंस या लिमिट की पुष्टि करते थे. पुष्टि हो जाने के उपरांत ही वे आपके कार्ड के लेनदेन को स्वीकृत करते थे. कार्ड लेनदेन की स्वचालित सुविधा ग्राहकों को तब मिलने लगी जब 1973 के पश्चात बैंकों में बड़े स्तर पर कंप्यूटरीकरण का दौर प्रारंभ हुआ. और नेटवर्क के जरिए कंप्यूटर पूरे समय एक दूसरे से जुड़े रहने लगे.

और जब दुनिया को इंटरनेट की सुविधा मिली, तब कैशलेस भुगतान सुविधा को तो जैसे पंख लग गए. बैंकों के चौबीसों घंटे आपस में जुड़े रहने और उपलब्ध रहने की सुविधा ने न केवल नए-नए विकल्प प्रदान किए, ये क्रेडिट कार्ड इंटरनेट बैंकिंग सेवा से पूर्ण रूपेण जुड़ गए और इनके विविध रूप जैसे कि डेबिट कार्ड, प्रीपेड कार्ड, पेट्रो कार्ड आदि भी आ गए. इंटरनेट के माध्यम से ही लेनदेन का प्रकल्प पेपाल भी आ गया जिसके जरिए घर बैठे ही समुद्रपार लेनदेन किया जा सकता था. अब तो एनएफ़सी और आरएफआईडी टैग जैसे सिस्टम आ चुके हैं जिनके जरिए बिना किसी कार्ड स्वाइप के, मात्र अपनी उपस्थिति से भुगतान कर सकते हैं. यही नहीं, इंटरनेट की अपनी, आभासी मुद्रा बिटक्वाइन भी आ गई जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया.

इसतरह, कैशलेस लेनदेन को देखें तो यह इंटरनेट के साथ ही पला-बढ़ा. हालांकि विभिन्न देशों में इस विधि की स्वीकार्यता विभिन्न कारणों से, इंटरनेट की स्वीकार्यता से बिलकुल भिन्न किस्म की रही है. फिर भी, जिन देशों में इंटरनेट को समग्र रूप से उपयोग में लिया जाता रहा है, वहां कैशलेस भुगतान प्रणाली परिपूर्ण विकसित और स्वीकार्य हो चुकी है. कुछ उन्नत देशों में तो यह 90-95 प्रतिशत तक स्वीकार्य हो चुकी है और केवल 5-10 प्रतिशत लोग ही लेन-देन के लिए यदा कदा रुपए पैसे का उपयोग करते हैं. यूँ तो अब, कैशलेस लेनदेन पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर है. परंतु बहुत सी जगह मोबाइल फ़ोनों से एसएमएस के जरिए भी कैशलेस बैंकिंग की सुविधा हासिल हो रही है, मगर इनके बैकएंड में तगड़ा इंटरनेट सपोर्ट समाहित होता है.

अभी जब आप कोई कैशलेस लेनदेन करते हैं – उदाहरण के लिए, आपने किसी दुकान पर अपने डेबिट कार्ड से स्वाइप मशीन से भुगतान किया. आपने कार्ड स्वाइप किया, मशीन में अपना पिन डाला और भुगतान हो गया. इस पूरी प्रक्रिया में पीछे बेहद जटिल कार्य निष्पादित हुए हैं – जिन्हें सिलसिलेवार इस तरह समझा जा सकता है – जैसे ही आपने कार्ड स्वाइप किया, इसके मैग्नेटिक स्ट्रिप् में मौजूद डेटा को पढ़कर वह स्वाइप मशीन आपके कार्ड को, आपके खाते को पहचान गया, और एक सेंट्रल सर्वर पर डेटा को भेज दिया कि कार्ड के जरिए इतनी राशि का भुगतान करना है. सर्वर पर आपके खाते में मौजूद रकम या लिमिट की सत्यता को चेक किया जाता है और आपके पिन को वेलिडेट किया जाता है. यह सही होने पर पलक झपकते ही भुगतान हो जाता है. यह सारा संचार अति सुरक्षित एनक्रिप्टेड होता है. हालांकि हाल ही में कुछ रपट यह भी आई थी कि किसी खास कंपनी के पीओएस मशीनों में वायरस इंस्टाल कर उनके डेटा चुराए गए थे और कंपनियों और बैंकों को बड़ा चूना लगाया गया था.

आमतौर पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि इंटरनेट बैंकिंग जो कि वर्तमान के किसी भी किस्म के कैशलेस लेन-देन का बैकबोन है, असुरक्षित रहता है और हैकर्स इसमें सेंध मारते रहते हैं. तो मामला भले ही तू डाल-डाल-और मैं पात-पात जैसा रहता हो, आमतौर पर यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाए, तो आधुनिक कैशलेस लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित रहता है. मैं स्वयं पिछले बीस साल से इंटरनेट बैंकिंग व डेबिट/क्रेडिट कार्डों का उपयोग कर रहा हूँ, यहाँ तक कि पुराने मोबाइल फ़ीचर फ़ोन में स्टेटबैंक ऑफ इंडिया के मोबाइल बैंकिंग का प्रयोग भी एसएमएस के जरिए करता रहा हूँ, जिसमें इंटरनेट की जरूरत नहीं होती है, आज तक मुझे किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं हुई और न ही मेरा एक पैसा किसी गलत या फर्जी ट्रांजैक्शन में फंसा. एकाध बार एटीएम में कैश नहीं निकला और खाते में क्रेडिट हो गया, मगर वह पैसा भी सप्ताह भर के भीतर वापस खाते में जमा हो गया. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कैशलेस लेनदेन पूरी तरह सुरक्षित रहता है और केवल एक-दो प्रतिशत मामले में ही समस्या होती है.

वर्तमान में भारत में कैशलेस लेनदेन के लिए अति सुरक्षित पेमेंट ग्रेड एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का उपयोग किया जाता है जिससे कि उपयोगकर्ता व बैंक का डेटा सुरक्षित रहे. इसे खासतौर पर सरकार के नेशनल पेमेंट कार्पोरेशन ऑफ इंडिया के लिए बनाया गया है. मास्टरकार्ड और वीज़ा के कार्ड में भी उन्नत किस्म की एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का प्रयोग किया जाता है जिससे प्रयोग के दौरान हैकिंग आदि के जरिए उपयोगकर्ताओं या व्यापारिक संस्थानों को चूना लगाने वाली संभावना नहीं होती. आमतौर पर इन कार्डों के प्रयोग में सुरक्षा की समस्या कार्ड धारक के कार्ड गुमने, गलत हाथों में जाने अथवा कार्ड का प्रयोग जहाँ हुआ है वहां के सिस्टम में सेंध मारकर डेटा चुराने आदि से होती है. फिर भी, ऐसे गलत लेनदेन की रपट यदि तीन कार्यदिवस के भीतर दे दी जाए तो उपयोगकर्ता का पैसा आमतौर पर सुरक्षित होता है चूंकि कानूनन, ऐसे लेनदेन के लिए फिर सेवा-प्रदाता कंपनियाँ जिम्मेदार होती हैं.

आज के दौर में कैशलेस लेनदेन के लिए बहुत सारे विकल्प हैं. क्रेडिट/डेबिट/प्रीपेड कार्ड में पहले मैग्नेटिक स्ट्रिप का प्रयोग होता था. जिसे पीओएस मशीन से स्वाइप कर लेनदेन सुनिश्चित किया जाता था. सुरक्षा बढ़ाने के लिहाज से उनमें चिप लग कर आने लगे. फिर उनमें सुविधा के लिहाज से एनएफसी टैग आने लगा जिससे भुगतान में और आसानी होने लगी – यानी बिना स्वाइप किए, कार्ड को मशीन में बिना लगाए, केवल टैप कर लेनदेन पूरा किया जाने लगा. इंटरनेट बैंकिंग व मोबाइल ऐप्प से बैंकिंग भले ही थोड़ा झंझट भरा हो सकता है, मगर यह एक अति सुरक्षित माध्यम कहा जा सकता है क्योंकि इसमें द्विस्तरीय और त्रिस्तरीय सुरक्षा जोड़ी जा सकती है. आपके रजिस्टर्ड मोबाइल पर प्रत्येक ट्रांजैक्शन के लिए पासवर्ड या पिन भेजा जाता है जिसे भर कर आपको अपना भुगतान वेलिडेट करना होता है. हाल ही में आरबीआई ने नया गाइडलाइन जारी किया है जिससे पंजीकरण के उपरांत उपयोगकर्ता और व्यापारिक संस्थान दो हजार रुपये से कम के लेनदेन पर हर बार पासवर्ड या पिन दर्ज करने के झंझट से मुक्ति पा सकेंगे और उनका केशलेस व्यवहार और आसान होगा. आजकल हर व्यक्ति के हाथ में एक अदद मोबाइल वह भी स्मार्टफ़ोन किस्म का दिख ही जाता है. फ्रीचार्ज और पेटीएम जैसे ऐप्प से आपका स्मार्टफ़ोन अब आपके बटुए का रूप धारण करने में पूरी तरह सक्षम हैं, और वह भी पूरी तरह सुरक्षित. आपका बटुआ यदि कोई चुरा ले तो उसमें रखा पूरा रुपया उस पॉकेटमार का हो जाता है, मगर यदि आपका मोबाइल बटुआ यानी मोबाइल फ़ोन यदि कोई चुरा ले या गुम जाए, तो भी उसमें से आमतौर पर कोई कुछ चुरा नहीं सकता क्योंकि पासवर्ड और पिन तो आपको आपके मन में याद रहता है. ऊपर से, आज की उन्नत तकनीक में इंटरनेट के जरिए या किसी अन्य मोबाइल के जरिए तत्काल ही अपने मोबाइल फ़ोन को लॉक कर सकते हैं व उसमें मौजूद डेटा को हटा सकते हैं.

यूँ भी आने वाला समय कैशलेस का होगा. कहीं भी जाइए, किसी भी देश में जाइए, किसी भी मुद्रा में लेनदेन करिए, कितनी ही छोटी बड़ी राशि का लेनदेन करिए, किसी भी समय लेनदेन करिए – कहीं कोई समस्या नहीं. कैशलेस तंत्र की यही खूबी है. तो आइए, इसे अभी से क्यों न अपनाएँ? आइए, कैशलेस हो जाएँ!

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दुनिया में आईओटी यानी इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स

 

की विचारधारा अभी आई ही थी, कि अब एक नई विचारधारा ने पूरी दुनिया को लपेट में ले लिया है. डीओटी यानी देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स. इतना कि इसके सामने इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा लगने लगी है.

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अब पूरी दुनिया देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है. न्यूयॉर्क से लेकर बस्तर तक और दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक लोग अपना अपना राष्ट्रगान हर यथासंभव स्थान और समय पर गा रहे हैं और राष्ट्रवाद का ट्रम्पेट बजा रहे हैं.

आइए, आपको ले चलते हैं कुछ लाइव शो में जहाँ आप देखेंगे कि देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स के पीछे भारतीय मन मानस किस तरह डूब-उतरा रहा है –

दृश्य एक –

सीपीडबल्यूडी हैडक्वार्टर पर एक नामचीन ठेकेदार, महा-मुख्य-अभियंता से जो अपना पिछला तीन टर्म एक्सटेंशन करवाने में ऑलरेडी महा-सफल हो चुके हैं : “सर, एक जबरदस्त राष्ट्रवाद स्कीम का आइडिया लाया हूँ. सीधे पचास परसेंट का खेल हो सकता है. पूरे देश में मकानों-दुकानों-सरकारी-गैर-सरकारी बिल्डिंगों के बाहरी रंग को अनिवार्य रूप से तिरंगे रंग में करने का प्लान लाया जाए. टेंडर और वर्क-ऑर्डर तो सदा की तरह अपन मैनेज कर ही लेंगे. इस राष्ट्रवादी प्लान को हर ओर से समर्थन मिलेगा, विभाग को जबरदस्त फंड मिलेगा. विरोधियों की तो हवा गोल हो जाएगी क्योंकि कोई बोलेगा ही नहीं, क्योंकि जो बोला समझो वो राष्ट्रद्रोही मरा. सर, आपके एक और टर्म एक्सटेंशन के पूरे चांस हो जाएंगे.”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – तीन-टर्म-एक्सटेंसित-महा-मुख्य-अभियंता ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

दृश्य दो –

सूचना-प्रसारण हैडक्वार्टर पर एक कार्यकर्ता, महा-मुख्य-सचिव से जो हाल ही में महा-जुगाड़ कर इस महा-मलाईदार पद पर आसीन हुए हैं : “सर, सिनेमाघर की तर्ज पर हर टीवी शो के पहले, हर रेडियोकार्यक्रम के पहले, हर वाट्सएप्प पोस्ट के पहले, हर फ़ेसबुक स्टेटस के पहले, हर इसके पहले, हर उसके पहले राष्ट्रगीत अनिवार्य किया जाना चाहिए और इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए एक नौ-नॉनसैंन-फुलप्रूफ़, राष्ट्रवाद-रक्षक विभाग गठित किया जाना चाहिए. इस विभाग को जाहिर है 24X7 मॉनीटरिंग और इंसपैक्टिंग करनी होगी तो हर लेवल पर तगड़ा स्टाफ़ भी चाहिए होगा. तो देखिए कि कितनी संभावनाएँ बनती हैं. अपन अधिकांशतः तो अपनी ही विचारधारा के लोगों को भर्ती करेंगे और बाकी तो फिर आप समझ ही रहे होंगे...”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – महा-जुगाड़ित-महा-मलाईदार-पदासीन-महा-मुख्य-सचिव ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

कुछ समय बाद -

कण कण में भगवान वाले देश में कण कण में देशभक्ति और राष्ट्रवाद आ गया. देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की क्रांतिकारी अवधारणा ने देश में क्रांति ला दी, और बाढ़-सूखा-गरीबी-भुखमरी-अशिक्षा-गंदगी-भ्रष्टाचार-कालाधन आदि आदि समस्याएँ गौण होकर नेपथ्य में चली गई. पूरा देश फुल राष्ट्रवाद की आगोश आ गया. कहीं सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा है, दुकानों मकानों की दीवारें, छत तो तिरंगे हो ही चुके हैं, घर के भीतर किचन और टॉयलेट की दीवारें भी तिरंगी हो गई हैं. लोगों ने अपने परिधान, अपने केश तक तिरंगे कर लिए हैं – वस्तुतः अन्य रंगों का उपयोग देश में दंडनीय-अपराध हो गया है. देशवासियों को दिन में पाँच वक्त राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य हो गया है. किसी भी फ़िल्मी-ग़ैर-फ़िल्मी-भजन-ग़ज़ल-कव्वाली-पॉप-रॉक-रैप गीत का मुखड़ा राष्ट्रगीत होना अनिवार्य है. अतः अब हर कहीं या तो कोई राष्ट्रगीत गा रहा है, या कोई बजा रहा है, या कहीं बज रहा है, या कहीं कोई सुन-सुना रहा है. और सम्मान में हर कोई हर कहीं सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है. इस तरह पूरा देश सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है.

ल्लो! कहीं किसी ने राष्ट्रगीत बजा दिया – शायद किसी सरकारी-न्यायालयीन आदेश के तहत! सावधान!

सिनेमा ही क्यों, हर टीवी चैनल पर हर सीरियल के पहले राष्ट्रगान सुनाया जाना चैये!

अनिवार्य रूप से!

लोगों की राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ गायब हुई जा रही है, उसे इसी जरिए से वापस लाया जा सकेगा.

घर घर में, हर घर में.

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चलो, अब मूवी थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तब भी चलेगा. बल्कि थोड़ा लेट जाने से ही ठीक रहेगा :)



इधर मैंने वह खबर टीवी पर देखी,  उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ था. मुझे रात में हजारों सूरज दिखाई देने लगे थे. सुबह ही मैंने एटीएम से पूरे पाँच हजार रुपए निकलवाए थे – पाँच पाँच सौ के पूरे दस नोट. वे अब मुझे चिढ़ाते से प्रतीत हो रहे थे. रात बारह बजे के बाद से वो महज कागज के टुकड़े भर रह जाने वाले थे.

रॉबर्ट के हाथ में भी टीवी का रिमोट था. उसके टीवी में भी, तमाम चैनलों में वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही खबर देख सुन रहा था. खबर सुन कर उसकी भी आंखें फटी रह गई थी. वह भी घबरा गया था. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा था. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की थी – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में पुराने नोट बंद कर दिए हैं और बदले में नए नोट चलाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. ऊपर से बहुत सारा माल मार्केट में आने को तैयार है उस स्टाक का क्या होगा? हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा था. वह भी टीवी के सामने जमा हुआ था. वह भी वही समाचार देख रहा था. परंतु  उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला था – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. दरअसल बिजनेस का चार्म इधर खत्म होता जा रहा था. लाइफ़ में कोई चैलेंज साला बचा ही नहीं था. अब आएगा मजा. असली चैलेंज का असली मजा. जल्द से जल्द इन नए नोटों के असली से भी असल लगने वाले नकली नोटों को छापना और चलाना. अभी तक तो हर ऐरा-गैरा, पाकी-ए-टू-जैड गैंग इन पुराने नोटों का नकल छाप लेता था और मार्केट में चला डालता था. नए नोट चैलेंजिंग है, सुना है कि इसमें चिप लगा है, ट्रैकिंग डिवाइस है, कैमरा है, न जाने क्या क्या है. अब कोई बनाए इनकी नकल! हमारे सिवा किसी के पास इस तरह की तकनीक मिलना मुश्किल है. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है. अब तो हम इसकी तकनीक आउटसोर्स कर और ज्यादा बिजनेस करेंगे”

इस तरह लॉयन ने रॉबर्ट का कन्फ्यूजन दूर कर दिया था. इधर नए रुपए के संबंध में मेरा भी सारा कन्फ्यूजन दूसरे दिन ही दूर हो गया था. पुराने नोटों के चलन से बाहर होने के कारण बाजार में नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. नए नोटों के बंडल ऑन में बिकने लगे. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन रुपयों की काला बाजारी होने लगी. भ्रष्टाचार और कालाधन मिटाने के चक्कर में सरकार ने देश की मासूम जनता के हाथ में भ्रष्टाचार करने का एक और सरल किस्म का, आसान सा औजार थमा दिया था. जिधर, जिस बैंक में निगाह डालो, उधर लोग लाइन में लगे थे और कमीशन लेकर एक दूसरे के नोट अदला-बदली कर रहे थे और अपने सुप्त-गुप्त खातों को किराए पर प्रस्तुत कर रहे थे. तीस प्रतिशत में तो आप चाहे जितना पुराना रुपया नए रुपए से बदल सकते थे. टार्गेट पूरा करने के चक्कर में बेचारे जिन बैंकरों ने अपनी जेब से दस रुपल्ली खर्च कर, ऐसे लोगों को पकड़-पकड़ कर, जिनके पास शाम की दारू के पैसे के लाले हमेशा बने रहते थे, जन-धन खाते खुलवाए थे उनमें अचानक, नामालूम कहाँ से पैसों की बरसात होने लगी थी. बैंकों में पिछले दरवाजे का उपयोग बढ़ गया था, और विशिष्ट कस्टमर सेवा का प्रचलन बढ़ गया था. जिन लोगों ने पूरी जिंदगी अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड का नाम तक नहीं सुना था, वहां के लिए चार्टर्ड प्लेन बुक कर फेरियां लगाने लगे थे.

अचानक बहुतों का जमीर भी जाग गया था. बड़े अकड़ वाले अफसर और नेता अचानक रिश्तेदारी निभाने लग गए थे. चार्टर्ड अकाउंटैंट और बैंकर्स को जिन्हें लोग साल में एकाध बार भी दुआ-सलाम नहीं करते थे. अचानक सबके दुलारे बन बैठे. हर कोई उनसे रिश्तेदारी निभाने, निकालने और जमाने में लग गया था.

इधर हफ़्ते भर की मशक्कत के बाद, एटीएम से निकाले अपने इकलौते दोहजारी नए नोट के साथ सब्जी खरीदने गया तो ठेले वाले ने मुझ पर हिकारत भरी नजर डाली और कहा – या तो खुल्ले लाओ या फिर फैटीएम से पेमेंट करो. संदेश साफ था – या तो जुगाड़ कर चिल्लर ले आओ या फिर अपग्रेड हो जाओ.

लगता है नए रूपए ने भारत को सचमुच बदल दिया है. एक नए भारत का निर्माण हो रहा है. नई इकॉनामी, नए प्रयोग, नए-नए रास्ते और नई-नई रिश्तेदारियाँ.

 

भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम

नोटबंदी के साइड-इफ़ेक्ट के चलते काम के अधिक बोझ की वजह से एटीएम खराब हो रहे हैं. सुधारने के लिए तकनीशियन बुलाए जा रहे हैं. एक तकनीशियन के हाथ दो एटीएम का रिकवर्ड डेटा मिला. एक था भक्त एटीएम और दूसरा था आपिया एटीएम.

पहले भक्त एटीएम का रिकवर्ड डेटा मुलाहिजा फरमाएँ –

· आज नोटबंदी का पहला दिन है. वाह क्या सर्जिकल स्ट्राइक मारा है काले धन और भ्रष्टाचारियों पर. पूरी मुस्तैदी से लगा हूँ, लोगों की सेवा करने में. मजा आ रहा है. इतनी भीड़ देखकर ही मन प्रसन्न हो जा रहा है.

· आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर से इस कदम की प्रशंसा हो रही है. आम जनता में गजब का उत्साह है. लोग घंटों लाइन में लगे हैं, मगर उनके माथे पर शिकन तक नहीं. बड़े नोटों की कमी की वजह से मेरा पेट जरा जल्दी ही खाली हो रहा है – इस बात का मलाल है, नहीं तो चौबीसों घंटे लोगों की सेवा करने की बात सोच के ही मन प्रफुल्लित हो रहा है.

· आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. पहले दो दिन तो विरोधियों को सांप सूंघा रहा. वे सोच नहीं पाए कि क्या करें, क्या बोलें, क्या कहें. शायद दो दिन इस विचार में लगे कि उनके पास रखे काले धन को कहाँ ठिकाने लगाएँ. आज उनके श्री मुख से कुछ बोल फूटे हैं – सदा की तरह विरोध में. यह तो होना ही था. विरोधी विरोध न करें ऐसा कैसे हो सकता है. इधर हमारा मन सदा की तरह राष्ट्रवाद से ओतप्रोत है. जनता को थोड़ी असुविधा हो रही है, मगर, सुना है कि वह उन लोगों की वजह से ज्यादा हो रही है जो भाड़े के लोगों को बारंबार लाइनों में चार हजार रुपये बदलने के लिए किराए पर लाइनों में लगवा रहे हैं. बहुत जगह से समाचार भी आ रहे हैं कि डील पाँच सौ – हजार रुपए तक में हो रही है – चार हजार के पुराने नोटों को बदलवाने के एवज में. इधर हमारे पेट में सौ-सौ के नोट ही आ पा रहे हैं जिसका मलाल है कि हमारे पेट जल्द ही खाली हो जा रहे हैं और हम जनता की पूरी कैपेसिटी से सेवा नहीं कर पा रहे हैं. जल्द ही स्थिति सुधरेगी. लाइन में लगी जनता में अभी भी गज़ब का उत्साह है और वे अब अपने आप को अमीरों के बराबर की श्रेणी में मान रही है – अब आया अमीर भ्रष्टाचारी गरीब के नीचे!

· “........”

· नोटबंदी का दसवां दिन है. पेट में सर्जरी कर सुधार कर दिया है, जिससे मेरे तन और मन में नई ऊर्जा का संचार हुआ है. और अब मेरे पेट में आराम से दो हजार और पाँच सौ के नए नोट भी आने लगे हैं. जनता की नए नोटों से सेवा करने का जैसे ही अहोभाग्य प्राप्त उधर लाइन भी कम हो गई. लोगों की प्रतिक्रियाएँ सुनने में बड़ा मजा आता था. सुना है कि बैंकों में लाखों करोड़ रूपए जमा हुए हैं. वर्षों से मुर्दा पड़े खाते जी उठे हैं और गरीबी रेखा वाले जन धन खातों में रुपयों की बरसात हो गई है. बैंक ब्याजदर घटेंगे जिससे महंगाई कम होगी. कैशलेस ट्रांजैक्शन की तरफ भारत बढ़ रहा है. सब्जी भाजी वाले भी पीओएस लेने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. यानी सर्वत्र एक नंबर का मार्केट. भारत में कोई टैक्सचोर नहीं बचेगा. जल्द ही भारत की तस्वीर बदलेगी. नया भारत उभरेगा. शक्तिशाली. समृद्ध. भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया बनेगा.

अब एक आपिए एटीएम का रिकवर्ड डेटा पढ़िए –

· आज नोटबंदी का पहला दिन है. अजीब तुगलकी निर्णय है. न इन्फ्रास्ट्रक्चर न तैयारी. जनता इस निर्णय की तो वाट लगा देगी. दंगा फसाद कर देगी. ये कोई बात हुई – रात से आपका 500 और 1000 का नोट नोट नहीं रहेगा कागज का टुकड़ा रहेगा. हर नोट पर गवर्नर का लिखा व हस्ताक्षरित प्रत्याभूत क्या मजाक है? लोगों की लाइन है कि खत्म ही नहीं हो रही. लाइन में खड़ा हर आदमी इस तुगलकी निर्णय को गरिया रहा है. भीड़ देखकर तो मुझे पसीना आ रहा है. रोते हुए और गुस्से में अपना काम कर रहा हूँ – जानता हूँ कि उनका अपना ही पैसा है, मगर चाहते हुए भी लोगों को उनके पूरे पैसे नहीं दे पा रहा हूँ. जिस काम के लिए बनाया गया हूँ, वही ढंग से नहीं कर पा रहा हूँ!

· आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर इस कदम की लानत मलामत हो रही है. आम जनता बेहद परेशान हो रही है. लगता है जैसे पूरा देश फिर से लाइन में लगने को अभिशप्त हो गया हो. मेरा मशीनी पार्ट हर दो मिनट में चल-चल कर थक कर चूर हो गया है, घिस घिस कर खराब होने की कगार पर आ गया है, मगर भीड़ है कि कम नहीं हो रही. ऊपर से बड़े नोटों की कमी के कारण मेरा पेट जल्दी जल्दी खाली भी होता जा रहा है. बिना सोचे समझे, बिना तैयारी के ऐसा काम करने का प्रतिफल तो ऐसा ही होना था. ऊपर से कहा जा रहा है यह साहसिक कदम है – तो अंधे कुएं में कूदना भी साहसिक कदम होता है और फांसी लगाकर झूलना भी!

· आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. स्थिति सुधरने के बजाए बिगड़ रही है, और भीड़ कम होने के बजाए बढ़ रही है. जनता के धैर्य का इम्तिहान हो रहा है. कमाल है! जनता इतनी भीड़ में इतनी लंबी लाइनों में घंटों खड़ी है, मगर वह उग्र विरोध का कोई काम क्यों नहीं कर रही. जनता को तो तोड़ फोड़ चालू कर देनी चाहिए. कुछ दंगा फसाद, आग जनी आदि कर देनी चाहिए ताकि कर्ता-धर्ताओं की नींद तो खुले. इस वाहियात निर्णय को वापस ले. नहीं तो साल भर इसी तरह की भीड़ भरी लाइन की सेवा करते करते तो अपना जल्दी ही इंतकाल हो जाएगा. मुर्दों का राष्ट्र है यह. क्रांति यहाँ हो नहीं सकती. अपने ही रुपयों को निकालने के लिए लंबी कतार और कभी वो भी संभव नहीं. यह तो अघोषित आपातकाल है. बल्कि आपातकाल से भी बड़ा!

· “......”

· आज नोटबंदी का दसवां दिन है. जबरन अच्छे खासे चल रहे कलपुर्जों को हटा कर नया पाँच सौ और दो हजार रुपयों का कैसेट लगाया गया और मेरा सॉफ़्टवेयर अपडेट किया गया. जनता तो कष्ट भोग ही रही है, हम मशीनों को भी जबरिया कष्ट में ढकेला गया. बंदर के हाथ में उस्तुरा देने से यही तो होता है. बड़े नोट आ जाने से ज्यादा लोगों की सेवा कर सकूंगा, परंतु जनता की भीड़ कम हो गई. जनता भी दस दिन लाइन में खड़ी रह कर त्रस्त और तंग हो गई लगती है, और उनके पैरों का दम निकल गया लगता है. सुना है कि नोटबंदी भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है. अपनों को फायदा पहुँचाया गया, उद्योगपतियों के ऋण आम जनता के पैसों से माफ किए गए और जनता को झांसे में रखा गया. भारत की स्थिति तो अब नाईजीरिया से भी भयावह होने वाली है. उद्योगधंधे चौपट पड़े हैं, व्यवसाय खत्म हो गया है, मंदी की मार में भारत गिरफ्त हो गया है. भारत का सबसे बुरा दिन आया है. एक समय की सोने की चिड़िया भारत को विदेशियों ने लूटा, और एक बार फिर भारत लुट रहा है, कोढ़ में खाज यह कि अब भारतीय ही इसे लूट रहे हैं.

(अभिषेक ओझा के लेख - http://www.aojha.in/quotes-etc/useyourbrainormaybe से प्रेरित.)

(चित्र - समीर लाल के ब्लॉग पोस्ट मशीन की व्यथा-कथा  http://udantashtari.blogspot.in/2016/11/blog-post_20.html से साभार)

यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?

 


जब इंसान के हाथ में नोट ही न हों, पता लगे कि आपके पास के 86 फीसद, अरे साहब वही 5 सौ और हजार वाले नोट, अब सब्जीवाले, चायवाले, कपड़ेवाले, धोबी, बढ़ई वगैरह-वगैरह नहीं लेंगे। आपको इस साल के खत्म होने से पहले अपने सारे ऐसे नोट बैंक में वापस धर देने हैं, उसके बदले नए कलदार निकारने हैं। आपके मोबाइल में देश से काला धन को जड़ से खत्म कर देने के देशभक्त संकल्प आ-जा रहे हैं, आप ऊर्जा से भरे हैं और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार अपने पास पड़े चार हज़ार के बड़े नोटों को चिल्लर में बदलवाने बैंक जा रहे हैं। आपको उम्मीद है कि आप जाएंगे और बैंक मैनेजर फूलों के हार के साथ आपका स्वागत करेगा।

आगे का पूरा मनोरंजक आलेख रचनाकार पर यहाँ पढ़ें - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_18.html

तकनीक के पंडित बी.एस.पाबला जी ने व्हाट्सएप्प को छोड़ने की घोषणा की है. अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर  -

स्क्रीनशॉट नीचे है -

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व्हाट्सएप्प एक नो-नॉनसेंस, बेहतरीन, उच्च दर्जे का कम्यूनिकेशन प्रोग्राम है, इस्तेमाल में बेहद आसान और पूरा- 100% यूजर फ़्रेंडली.

परंतु इसकी इन्हीं खूबियों ने इसे बहुतों को रुलाना शुरू कर दिया है. और शायद यही कारण है पाबला जी का व्हाट्सएप्प छोड़ने का. एक दिन उन्होंने स्टेटस छापा था कि उनके व्हाट्सएप्प संदेश में 4500 संदेश दिनभर में आए. इतना संदेश आदमी पढ़ तो क्या देख भी नहीं पाए!

व्हाट्सएप्प की सबसे बड़ी समस्या है इसके आपके फ़ोन के तमाम संपर्क को स्वचालित रूप से पॉपुलेट करने की - जिससे पता चल जाता है कि व्हाट्सएप्प पे कौन कौन बंदा तैयार बैठा है और फिर सिलसिला चालू हो जाता है असीमित संदेश भेजने, असीमित समूहों में जोड़ने घटाने का.

इसकी एक और बड़ी समस्या है - तमाम मीडिया के स्वचालित डाउनलोड होने का. कुछ बजट फ़ोन के उपयोगकर्ताओं को हवा नहीं रहती और उनका डेटा पैक तो बारंबार, अंतहीन फारवर्ड किए गए उन्हीं सड़ियल जोक, वीडियो और पिक्चर को डाउनलोड में ही हवा हो जाता है और उनके फोन की मेमोरी भी जल्द ही फुल हो जाती है. और फ़ोन हैंग होने लग जाता है.

ये दोनों समस्याएँ बड़ी सिरदर्द हैं.

परंतु आप इन दोनों से मुक्त हो सकते हैं.

दूसरी समस्या तो आसान है, स्वचालित मीडिया डाउनलोड को डिसेबल कर दें बस. यह व्हाट्सएप्प की सेटिंग में उपलब्ध होता है. पाबला जी की समस्या यह नहीं है, उनकी समस्या शायद पहली है -

 

पहली समस्या का एक शानदार जुगाड़ है. आप केवल अपने ही पसंदीदा या वांछित व्यक्ति को व्हाट्सएप्प में जोड़ सकते हैं, बाकी को हवा नहीं लगेगी कि आप व्हाट्सएप्प उपयोग करते हैं.

इसके लिए क्या करना होगा?

पहले तो आप अपने पुराने व्हाट्सएप्प एकाउंट को हटा दें (यदि कोई हो). न भी हटाएँ तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, परंतु फिर मामला थोड़ा लंबा हो जाएगा, इसलिए इसी विधि को अपनाते हैं.

फिर आप कोई नया, चालू सिम लें, (नया नंबर , और अच्छा हो कि वह  दूसरे प्रदेश या और भी अच्छा हो कि वो दूसरे देश - जी हाँ! दूसरे देश का हो - जैसे कि ब्रिटेन या पाकिस्तान! का - पर यदि सिम दूसरे देश/प्रदेश का हो तो यह ध्यान रखें कि उसमें रोमिंग एनेबल है और चालू है ताकि आप वाट्सएप्प एक्टिवेट कर सकें).

इस नए सिम से नया  व्हाट्सएप्प खाता सक्रिय कर लें. सक्रियण हो जाने के बाद अपने पुराने सिम को वापस फ़ोन में लगा लें.

वाट्सएप्प आपसे पूछेगा कि आप क्या नए नंबर से व्हाट्सएप्प चलाना चाहेंगे या फिर पुराने नंबर से ही चलने दें.

आप दूसरा विकल्प चुनें. यानी पुराने, आपके संपर्कों को अज्ञात नंबर से व्हाट्सएप्प चलने का विकल्प चुनें.

हो गया.

मैंने अपने फ़ोन में व्हाट्स्एप्प नाईजीरिया के नंबर (जस्ट जोकिंग!) से एक्टिवेट किया हुआ है. और मैं केवल तीन लोगों से नियमित संवाद करता हूँ (बता सकते हैं कि कौन-कौन?) बाकी किसी को हवा ही नहीं लगती कि ये "नाईजीरियाई" नंबर का आदमी "रविरतलामी" हो सकता है. कोई स्पैम नहीं, कोई समूह में जोड़-घटाना नहीं. बस, काम की बातें, वह भी जिनसे मैं चाहूँ! और, यदि मैंने बिना बताए किसी को वाट्सएप्प किया तो वो तुरंत मुझको बाहर का रास्ता दिखा देता है ये सोचते हुए कि ये नाईजीरियाई जबरिया मुझे क्यों संदेश भेज रहा है - क्या इसका फ़िशिंग का इरादा है?

हाँ, पर, पाबला होना भी अलग बात है. उनका नाईजीरियाई नंबर तो हर कोई ग्रुप में बांटता फिरेगा - अरे, ये नाईजीरियाई नंबर पाबला जी का है, उनसे व्हाट्सएप्प पे राय मांग लो या कोई ज्ञान की बात या कोई सड़ियल जोक ठेल दो और अपने ग्रुप में जोड़ लो!

शब्द उपनिषद

‘ उपनिषद” का शब्दार्थ ‘समर्पणभाव से निकट बैठना’ है.उप का अर्थ है निकट;;नि; से तात्पर्य है’समर्पण’भाव और सद माने बैठना है.ऋषियों के पास बैठकर जिज्ञासुओं को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही उप्निषदों में संकलित है.

एक मज़ेदार बात यह है कि जूतों के लिये एक प्राचीन शब्द ;उपानत’ था उपानत का अर्थ है, जिसे निकट लाया जाए. आख़िर जूते हमारे पैरों के सबसे नज़दीक नज़दीक रहने वाली वस्तु है. “उपनिषद” और उपानत,दोनो में इस प्रकार जो भावात्मक सम्बंध है, देख्ते ही बनता है‌,भले ही दोनों के अर्थ में कोई सिर पैर न हो. या,यों कहें ,सिर और पैर का अंतर हो.

यदि हम समर्पण भाव से शब्दों के निकट जाएं तो शब्द अपने तमाम रहस्य रहस्य हमारे समक्ष खोल देते हैं. कुछ ऐसे ही शब्दों का जायज़ा लीजिए....

आप इस ज्ञानवर्धक आलेख को आगे आप यहाँ रचनाकार.ऑर्ग पर पढ़ सकते हैं - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_17.html

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अंततः मैं भी आधा दर्जन पैकेट नमक के ले ही आया. थोड़ी बहुत मशक्कत तो खैर करनी ही पड़ी, और बहुत सारा जुगाड़ भी. जो कि इस देश-वासियों की खासियत या ये कहें कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है. छः घंटे की लाइन में लगकर, रात बारह बजे, दैवयोग से खुली किराने की दुकान से, और, उससे भी बड़े दैवयोग से कि मेरा नंबर आते तक स्टॉक खत्म नहीं हुआ. जेब में, जोड़-तोड़ और जुगाड़ से हालिया हासिल किए नए-नकोर पिंक कलर के एक-मात्र दो हजार रुपये के नोट से छः किलो नमक ले आना तो जैसे स्वर्गिक आनंद की तरह था.

जी हाँ, स्वर्गिक आनंद. जरा डॉमिनोज़ के एक्स्ट्रा टॉपिंग वाले पित्ज़ा या केएफसी के फ़ाइव-इन-वन मील बॉक्स को बिना नमक के खाने का अहसास कर देखिए. आपके हजार रुपल्ली के माल का वैसे भी स्वाद भूसे जैसा होगा. ऐसे में, हजार रुपए में भी हासिल एक चुटकी नमक अपनी कीमत की औकात बखूबी बता ही देता है. और, मैंने तो वैसे भी हजार रुपए में तीन पैकेट के भाव से नमक खरीदा है.

माना कि महीने भर में मेरा नमक-खर्च कोई सौ-पचास ग्राम भी नहीं होगा, मगर भविष्य को सुरक्षित रखना भी तो कोई बात है. आदमी पशु तो है नहीं जो भविष्य की चिंता न करे. यूं भी अपने नमक का हिसाब कौन रखता है कि कितना खाया. अलबत्ता दूसरों को नमक खिलाने और दूसरों के नमक खाने का हिसाब-किताब रखना हमारी "गब्बर-कालिया" परंपरा रही है, मगर आजकल परंपराओं को तोड़ने-मरोड़ने व उन्हें उखाड़ फेंकने, गोली मारने का रिवाज भी तो चल पड़ा है. फिर भी, नमक के मामले में कोई रियायत नहीं. इसलिए, यदि खाने-खिलाने को नमक न रहे जीवन में तो ये जीवन ही क्या! इसलिए, सभी को नमक का पर्याप्त संग्रह कर रखना चाहिए. बल्कि तो भारतीय परंपरानुसार सात पुश्तों तक के लिए नमक-संग्रह कर रखना चाहिए. जितना अधिक संग्रह उतना अच्छा!

इस देश में वैसे भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है. जब पत्थर के गणेश दूध पी सकते हों, जब किसी खूबसूरत सी शाम आप जेब में हजार पाँच सौ के नोट लेकर घूमने निकले हों और पता चले कि घंटा भर पहले तो ये अप्रचलित हो चुके हैं, तो फिर वास्तव में कहीं भी, कुछ भी हो सकता है. देश क्या दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो सकता है – जब ट्रम्प अमरीकी चुनाव जीत सकता है तो यह देश क्या पूरी दुनिया नमक से खाली हो सकती है. वैसे भी देश का सारा नमक लोग-बाग खा-खा-कर नमकहरामी तो आजादी के पहले से करते आ रहे हैं और आजादी के बाद भी ये बदस्तूर एक्सपोनेंशियली बढ़ता हुआ जारी ही है. तो ये भी हो सकता है कि किसी दिन अलसुबह पता चले कि नमकहरामों ने देश का सारा नमक रातोंरात हजम कर लिया है. और आम जनता की थाली से नमक ग़ायब हो गया है.

आपकी चुटकी में लिए नमक में स्वाद तब और बढ़ जाता है जब आप इसे हजार रुपल्ली किलो के भाव में खरीदते हैं. खुल्ले में मिलने वाला पच्चीस पैसे किलो का नमक भी कोई नमक हुआ. वो तो पूरा बेस्वाद ही होगा. फेंकने लायक. महंगे, पैकेज्ड आयोडीन से भरपूर, भले ही एक स्वस्थ आदमी को उसकी आवश्यकता हो न हो, की बात ही कुछ और है. स्वाद की कहें तो इसका स्वाद तब और द्विगुणित हो जाता है जब आपके चिकित्सक ने अधिक नमक खाने से मना किया हो. आपको बीपी आदि की शिकायत हो और आपको कम नमक खाने की हिदायत हो.

नमक में यदि अंग्रेज़ी का तड़का हो तो खाने-खिलाने का मजा कुछ और होता है. फ़्रूट साल्ट हो या ब्लैक साल्ट. सी साल्ट हो या हिमालयन साल्ट या फ्लैक साल्ट. नमक के स्वाद पर देश-स्थान-समय-वातावरण आदि का भी धीर-गंभीर असर होता है. शीशम के डाइनिंग टेबल पर रखे चाँदी-सोने के नमक-दानी में रखे 'टेबल साल्ट' यानी साधारण नमक का स्वाद तो वही बता सकता है जिसने ऐसा खाया हो. अलबत्ता किसी मजदूर के रात्रि भोजन में सादी रोटी के साथ एक चुटकी नमक का स्वाद सर्वश्रेष्ठ होता है – ऐसा पंडितों (ब्राह्मणों नहीं, विचारकों) का कहना है. क्या किसी ने खाया है ऐसा नमक? मुझे तो आजतक यह नमक मिला नहीं, मैं इस नमक की एक चुटकी के लिए हजार रुपए तक देने को तैयार हूँ. पुराना अप्रचलित नहीं, नया, प्रचलित.

व्यंग्य का विषय क्या हो?

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(चित्र - काजल कुमार http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2016/11/india-kajal-cartoon-orop-khattar-kejriwal-suicide.html का कार्टून)

बहुत पुरानी बात है. एक परिपूर्ण, आइडियल, खुशहाल देश हुआ करता था. खुशहाली के इंडैक्स में पूरे सौ में से सौ. पर, वहाँ एक कमी खलती थी. वहाँ सब कुछ था, सारी खुशी थी, परंतु वहाँ, उस देश में कोई व्यंग्यकार नहीं था, कोई व्यंग्य नहीं था. दरअसल, वहाँ व्यंग्य के लिए कोई विषय ही नहीं था.

वहाँ के शीर्ष साहित्यकारों ने एक दिन एक आम बैठक बुलाई और व्यंग्य की अनुपलब्धता पर गहन चिंतन मनन किया. देश में, साहित्य में, साहित्यकारों में व्यंग्य कहाँ से, कैसे, किस प्रकार लाए जाएं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ.

किसी ने कहा – व्यंग्य दिल से निकलता है. लगता है यहाँ दिल वाले नहीं रह गए हैं.

किसी ने कहा – व्यंग्य के लिए दुःख जरूरी है, वर्ग-संघर्ष जरूरी है, असमानता आवश्यक है. यहाँ, इस देश में तो चहुँओर खुशियाली है, कहीं कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं है, फिर व्यंग्य कहाँ से आएगा?

एक ने कहा – व्यंग्य न रहने से साहित्य सूना हो गया है. हम सबको प्रयास कर कहीं न कहीं से व्यंग्य लाना ही होगा. किराए पर ही सही. नकली ही सही. बाई हुक आर क्रुक. व्यंग्य हमें चाहिए ही!

उनमें से एक साहित्यकार, जो अपनी उलटबांसी के लिए जाना जाता था, चुपचाप लोगों की बातें सुन रहा था. लोगों ने एक स्वर में उससे पूछा – तुम चुप क्यों हो? तुम भी तो कुछ कहो?

उसने प्रतिप्रश्न किया – क्या हमारे देश में चुनाव होते हैं? क्या हमारी इस साहित्यिक समिति में कभी चुनाव हुए हैं?

सबने आश्चर्य से मुंह बिचकाते हुए, उपहास से कहा – ये कैसा अजीब प्रश्न है? यहाँ तो राम-राज्य है. यहाँ चुनाव का क्या काम? चुनाव जैसी व्यवस्था का यहाँ क्या काम?

वही तो! इसीलिए व्यंग्य नहीं है – उसने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंकी - और कहा – तो, चलिए आज हम अपनी इस साहित्यिक समिति में एक चुनाव कर लेते हैं. कुछ पदाधिकारियों का चुनाव. कल देश में भी आम चुनाव के लिए माहौल बना लेंगे, आवाज उठा लेंगे, और शायद परसों देश में  भी चुनाव  हो जाए!

कुछ लोगों ने सोचा, ये पागल हो गया है, जो व्यंग्य के लिए चुनाव करवा रहा है. परंतु, व्यंग्य के इतर, कुछेक को चुनाव का विचार बहुत पसंद आया. कुछेक ने यह विचार सिरे से ही खारिज कर दिया. देखते देखते ही वहाँ बहस होने लगी. घंटे भर में तो मामला यूँ गर्मागर्मी का हो गया कि अंततः नतीजा ये निकाला गया कि एक समिति बनाई जाए जो सप्ताह भर के भीतर साहित्यकारों में चुनाव करवाएगी कि कौन अध्यक्ष बनेगा और कौन सचिव और कौन कोषाध्यक्ष.

इस घटना के अगले दिन, वहाँ के अख़बार व्यंग्य से भरे पड़े थे. हर दूसरे साहित्यकार ने व्यंग्य लिख मारा था. विषय था – साहित्य में चुनाव!

सुनते हैं कि जल्द ही उस देश में आम-चुनाव भी होने लगे. तब से उस देश में व्यंग्य के लिए विषयों की कोई कमी कभी नहीं रही. हर लेखक, हर साहित्यकार अंततः व्यंग्यकार हो गया था. लोग कहानी, कविता, संस्मरण यहाँ तक कि अपने इनकमटैक्स रिटर्न में भी व्यंग्य मार देते थे!

मेरी तेरी उसकी दीवाली

औरों की तरह इस बार मैं भी, स्वतःस्फूर्त, भरा बैठा था. जम के दीपावली मनाऊँगा. पर, पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय किस्म की, पर्यावरण-प्रिय दीपावली.

महीने भर पहले से ही तमाम सोशल-प्रिंट-दृश्य-श्रव्य मीडिया में मैंने विविध रूप रंग धर कर चीनी माल, खासकर चीनी दियों, चीनी लड़ियों, और चीनी पटाखों का बहिष्कार कर शानदार देसी दीवाली मनाने का आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी सबकुछ देता रहा था. चहुँ ओर से आ रहे ऐसे संदेशों को आगे रह कर फारवर्ड पे फारवर्ड मार कर, और जरूरत पड़ने पर नया रंग रोगन लगा कर फिर से फारवर्ड मार कर यह सुनिश्चित करता रहा कि कोई ऐसा कोई संदेश व्यर्थ, अपठित, अफारवर्डित न जाए.

मेरे आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी में पर्यावरण-प्रेम भी सम्मिलित था, जिसमें आतिशबाज़ी, पटाखों से दूर रहने और अनावश्यक रौशनी करने, बिजली की लड़ियां लगा कर बिजली की कमी से जूझ रहे देश के सामने संकट को और बढ़ाने के कार्य से दूर रहने का आग्रह भी सम्मिलित था.

यही नहीं, मैंने तो अपने मुहल्ले में और अपनी सोसाइटी में भी पूरा दम लगा दिया था कि इस बार की दीपावली पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय और पर्यावरण प्रिय मनाई जाएगी. इसके लिए हमने एक घोषणापत्र भी छपवाया था और बाकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाकर उस पर अपने स्टाइलिश हस्ताक्षर भी किए थे.

पिछले पखवाड़े भर से सोशल मीडिया में चहुँओर से आ-जा रहे तमाम संदेशों, स्टेटसों से यह लग रहा था कि अपना यह प्रयास, यह अभियान बेहद सफल रहा है और इस बार की दीपावली बड़ी अच्छी, राष्ट्र प्रिय, शांति प्रिय, पर्यावरण प्रिय रहेगी और एक मिसाल के रूप में मनाई जाएगी.

दीपावली की शाम आ चुकी थी, और सोशल मीडिया स्टेटस अपडेट, ट्वटिर ट्वीट आदि पर परिपूर्ण शांति छाई थी जो यह इंगित कर रही थी कि इस दफा दीपावली सचमुच अलग किस्म की, राष्ट्रीय, पर्यावरण प्रिय होने वाली है. मन में एक अजीब किस्म की खुशी और गर्व का अहसास हो रहा था.

मोहल्ले में भी कहीं कोई धूम-धड़ाका नहीं हो रहा था जो यह इंगित कर रहा था कि जनता सचमुच जागृत हो गई है और पर्यावरण के प्रति उसका प्रेम, उसकी चिंता जाग चुकी है और वो समाज और प्रकृति को संरक्षित करने की ओर अपना कदम बढ़ा चुका है. बच्चे-बच्चे में जागृति छा चुकी है.

सूरज डूब रहा था, थोड़ा अँधेरा हो रहा था और आसमान में रौशनी भी आम दिनों की तरह ही नजर आ रही थी, उजाला ज्यादा नहीं हो रहा था इसका अर्थ था कि जनता चीनी लड़ियों से मुक्त हो चुकी है और राष्ट्रीय संपत्ति, महंगी बिजली बचाने की खातिर अपने घर को रौशन करने के बजाए अपने मन-मंदिर को रौशन करने के लिए प्रतिबद्ध हो चुकी है. एक शिक्षित, समृद्ध राष्ट्र की ओर हम आज बढ़ चुके थे. विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनने से बस हम चंद कदम ही दूर थे. यूँ भी जनसंख्या के लिहाज से तो यह कदम और भी कम है. बहरहाल.

अचानक कहीं पड़ोस में एक पिद्दी सा फटाका फूटा. सोचा, इतना तो चलेगा. शायद पिछले साल का बचा खुचा पटाखा होगा, किसी ने चला लिया होगा. उधर थोड़ा अँधेरा और बढ़ा तो दूर रौशनी की कतारें थोड़ी दिखने लगी थीं. सोचा, किसी अज्ञानी ने, किसी प्रकृति-अप्रेमी ने बिजली की लड़ लगा ली होगी, और लगाई होगी भी तो देसी – चीनी नहीं.

इधर सोशल मीडिया में भी यही हाल था. मामला बेहद ही शालीन. बहुत ही अच्छा लग रहा था. बस, पटाखे फ़ोड़ने के, दिए जलाने के और बिजली की लड़ियाँ लगाने के, कहीं कहीं इक्का-दुक्का अपडेट आने लगे थे – इन बेशर्मों ने सचमुच देश का कबाड़ा किया हुआ है. न इन्हें राष्ट्र की चिंता है और न ही पर्यावरण की.

पर, ये क्या! आधा घंटा बीतते न बीतते माहौल गरमाने लगा. दीपावली के स्टेटसों की बाढ़ आ गई. कोई फुलझड़ी के चित्र लगा रहा था तो कोई रॉकेट के तो कोई रौशनी के. मुहल्ले में इक्का दुक्का चलने वाले पटाखे अब आगे बढ़कर सौ और हजार, पाँच हजार लड़ियों वाले लगातार दस-बीस मिनट चलने वाले पटाखों के रूप में तबदील हो चुके थे. इधर सूरज पूरी तरह डूब चुका था और पूरा मुहल्ला, पूरा शहर, पूरा देश जगमग रौशनी में नहाया हुआ था. चहुँ और तेज, और तेज आवाजों वाले पटाखे चल रहे थे. जहाँ रॉकेट ऊपर आसमान में जाकर रौशनी कर रहे थे आवाज कर फूट रहे थे, वहाँ नीचे अनार और चकरी जुगलबंदी से समां बाँध रहे थे. देश के हर शहर हर गांव के हर घर में बिजली की लड़ से रौशनी हो रही थी – गोया बिजली इस बार मुफ़्त थी और बिजली के लड़ चीन से मुफ़्त में मिल गए थे.

और, बचा हुआ तो केवल मैं और केवला मेरा ही घर था. परंतु मैं क्या कोई कच्चा खिलाड़ी था? बिलकुल नहीं. मैंने भी स्विच ऑन कर दिया. और मेरा घर भी रौशनी से जगमग कर उठा. पिछले वर्ष की सहेजी लड़ियों को मैंने पहले ही टाँग दिया था, और तीन-चार दर्जन चीनी लड़ियाँ और उठा लाया था. चीनी सामानों के बहिष्कार के कारण डर्ट-चीप दाम में मिल रही थीं. जस्ट इन केस, यू नो! सही समय पर बड़ी काम आ गई थीं वे. कुल मिलाकर मेरा घर पूरे मुहल्ले में, पूरे शहर में सर्वाधिक रौशनीयुक्त, सर्वाधिक प्रकाशित घर हो गया था.

साथ ही, मैंने अपना सीक्रेट भी बक्सा खोल ही लिया. क्लायंट दीपावली गिफ्ट कर गए थे, और उनका उपयोग नहीं करना वैसे भी उनका अनादर होता. अंदर एक से बढ़कर एक रौशनी वाले, आवाज वाले, स्टाइलिश चीनी पटाखे थे जिनकी बराबरी अपने इंडियन, शिवकाशी वाले पटाखे क्या खा-पी के करते! कसम से, इस बार तो मोहल्ले में अपनी पूरी धाक जम जाएगी. दो घंटे से कम का नजारा नहीं होगा, और वो भी पूरे धूम धड़ाके सहित!

तो ये थी हमारी दीवाली. आपकी अपनी दीपावली कैसी रही पार्टनर?

भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी - वर्तमान नाम विवेकानंद लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी और पश्चिमी (जर्मन, फ्रेंच) आदि भाषाओं की किताबें ही मिलती थीं.

जनता की बेहद मांग पर हिंदी की किताबें इस वर्ष के हिंदी पखवाड़े से नसीब होने लगी हैं और क्या खूब होने लगी हैं. दूसरी खेप आई है जिसकी ये झलकी है -

 

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नए संग्रह में शामिल 20 किताबों की सूची इस प्रकार है । 

  1. मुसाफिर कैफ़े (दिव्य प्रकाश दुबे)
  2. बनारस टॉकीज (सत्या व्यास)
  3. आज़ादी मेरा ब्रांड (अनुराधा बेनीवाल)
  4. मम्मा की डायरी (अनु सिंह चौधरी) 
  5. जादू भरी लड़की (किशोर चौधरी)
  6. टर्म्स एंड कंडिशन्स एप्लाई (दिव्यप्रकाश दुबे )
  7. ज़िंदगी आइस पाइस (निखिल सचान )
  8. नमक स्वादानुसार (निखिल सचान )
  9. नीला स्कार्फ (अनु सिंह चौधरी )
  10. वो अजीब लड़की (प्रियंका ओम)
  11. कुल्फी एंड कैपूचिनो (आशीष चौधरी )
  12. नॉन रेजीडेंट बिहारी (शशिकांत मिश्रा )
  13. लूजर कहीं का (पंकज दुबे)
  14. कोस कोस शब्दकोश (राकेश कायस्थ )
  15. इश्कियापा (पंकज दुबे)
  16. इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं (विनीत कुमार )
  17. चौराहे पर सीढ़ियाँ (किशोर चौधरी )
  18. मसाला चाय (दिव्य प्रकाश दुबे )
  19. बकर पुराण (अजीत भारती )
  20. ठीक तुम्हारे पीछे (मानव कौल )

 

ज्ञातव्य है कि इन किताबों को उनकी मांग और विविध स्रोतों से हासिल किए गए लोकप्रिय / हालिया बेस्टसेलर हिंदी किताबों की सूची में से छांट कर संग्रहित किया गया है.

सूची में शामिल लेखकों को बधाईयाँ, शुभकामनाएँ और प्रकाशकों को भी. इनमें से बहुत सारा हिंद युग्म से प्रकाशित है. शैलेश भारतवासी को भी विशेषतः बधाई.

और, विनीत की इश्क कोई न्यूज़ नहीं तो है ही, किशोर चौधरी की दो, अनु सिंह चौधरी की भी दो, और दिव्य प्रकाश दुबे की तो तीनों किताबें हैं :)

पेट्रोल जांच कर लो, डीजल, गैस जांच कर लो, आटा दाल जांच कर लो। नोट भी जांच कर लो।
गोया आदमी नहीं जांच मशीन हो!

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यूँ, सोशल मीडिया में लोग मुखौटे लगाए मिलते हैं, परंतु इन मुखौटों में थोड़ा और पॉलिश करने की जरूरत अब आ ही गई समझो!

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पुनर्धर्मभीरूभव:

बहुत पुरानी बात है. धरती पर एक बार एक इंसान गलती से बिना धर्म का, नास्तिक पैदा हो गया. उसका कोई धर्म नहीं था. उसका कोई ईश्वर नहीं था. वो नास्तिक था.

चहुँ ओर हल्ला मच गया. आश्चर्य! घोर आश्चर्य!¡ एक इंसान बिना धर्म के, नास्तिक कैसे पैदा हो सकता है. वो बिना हाथ-पैर के, जन्मजात विकृतियों समेत भले ही पैदा हो सकता है, और अब तो विज्ञान की सहायता से बिना मां-बाप के भी पैदा हो सकता है, मगर बिना धर्म के? लाहौलविलाकूवत! ये कैसी बात कह दी आपने! पैदा होना तो दूर की बात, बिना धर्म के कोई इंसान, इंसान हो भी सकता है भला?

ताबड़तोड़ उस इंसान को अपने-अपने धर्मों में खींचने की, उसे आस्तिक बनाने की जंग शुरू हो गई.

“उद्धरेदात्मनात्मानम् ... वसुधैव कुटुंबकम्...” सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व केवल हिंदुओं में है... इसका धर्म हिंदू होना चाहिए. हिंदुओं ने कहा.

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानेहिर्रहीम...” ईश्वर केवल एक है और उसके सबसे निकट, शांति और सहिष्णुता का धर्म इस्लाम है, वही स्वर्ग जाने का एकमात्र रास्ता है. इसका धर्म इस्लाम होना चाहिए. मुस्लिमों ने अधिकार जताया.

“ईश्वर दयालु है- ईश्वर इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं...” दयालु ईश्वर केवल यीशु हैं और केवल वो ही इसके पापों को क्षमा कर सकते हैं. ईसाइयों ने बताया.

उस बेधर्मी इंसान ने कहा – ठीक है, मैं सभी धर्मों का अध्ययन करूंगा और जो सबसे अच्छा लगेगा उसे धारण करूंगा.

उसने विभिन्न धर्मों के अध्ययन के लिए पर्याप्त समय लगाया और अंततः अपना अध्ययन पूरा कर लिया. ओर फिर उसने एक सभा रखी जिसमें उसे घोषणा करनी थी कि वो कौन सा धर्म अपनाएगा.

बड़ी भीड़ जुटी. तमाम धर्मों की जनता और तमाम धर्मों के गुरु उस सभा में स्वतःस्फूर्त जुटे. एक बेधर्मी इंसान के धर्म के अपनाने का जो खास अवसर था यह. नास्तिक के आस्तिक बनने का अवसर जो था यह.

भरी सभा में उस बेधर्मी इंसान ने भीड़ की ओर दुःख भरी नजर डाली और ऐलान किया – मैं बिना किसी धर्म का ही अच्छा हूँ. मैं नास्तिक ही ठीक हूँ. मुझे किसी ईश्वर में, किसी धर्म में कोई विश्वास नहीं है.

“भला ऐसा कैसे हो सकता है?” क्रोध से हिंदू धर्माचार्य चिल्लाये. उनके त्रिनेत्र खुल चुके थे. लोग त्रिशूल, भाले लेकर उस बेधर्मी इंसान की ओर दौड़े.

“लाहौलविलाकूवत!” ये तो ईशनिंदा है. परम ईशनिंदा. इसे दोजख में भी जगह नहीं मिलनी चाहिए... मुसलिम धर्माचार्य गरजे. पत्थर, कंकर लेकर लोग उसे मारने दौड़े.

“हे ईश्वर इसे क्षमा करना.. ये नहीं जानता ये क्या कह रहा है...” ईसाई धर्माचार्यों ने हल्ला मचाया. लोग कीलें हथौड़े लेकर उसके पापों के प्रायश्चित्त करवाने के लिए उसे सूली पर टांगने दौड़े.

 

तब से, इस धरती पर कोई भी इंसान, गलती से भी, बिना धर्म के पैदा नहीं होता.

हिंदी उपयोगकर्ताओं (को सिखाने) के लिए गूगल ने जोरदार विज्ञापन अभियान निकाला है -

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कि, अब आप सर्च आदि बहुत सारे काम हिंदी में बोल कर भी कर सकते हैं, और बहुत बेहतर तरीके से कर सकते हैं.  हिंदी (और तमाम अन्य भारतीय भाषाओं की) की ध्वन्यात्मक खूबी के कारण परिणाम बेहद शुद्ध आते हैं.

आप भी आजमाएँ. यदि अब तक नहीं आजमाएँ हैं तो!

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कूल काऊ ट्रैकिंग - एक विज्ञापन की तस्वीर. असली. कोई फ़ोटोशॉप्ड नहीं, कोई नकली नहीं.

सवार के मुख पर प्रसन्नता की लकीरें बताती हैं कि यह कितना आह्लादकारी होगा! तो चलें, अपन भी ऐसी सवारी करने?

नहीं?

वैसे, अपने यहाँ भी लोग-बाग अक्सर गाय की सवारी अपने राजनीतिक लाभ के लिए करते रहे हैं. पर, वो आपको भी पता है कि अलग किस्म की अलहदा सवारी होती है, और उसका विजुअल इफ़ेक्ट नहीं, कुछ और इफ़ेक्ट होता है. हाँ, आह्लादकारी तो अवश्य होता होगा - राजनीतिक लाभ की तरह.

गऊ भक्तों से अग्रिम क्षमा याचना सहित. स्ट्रिक्टली नो ऑफ़ेंस टू एनीबडी!

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