टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

March 2015

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लेखक आज सुबह से ही प्रारब्ध पर एक तड़कता भड़कता लेख लिखने पर तुला था.

कंप्यूटर पर उसकी उंगलियाँ मानों नाच रही थीं. टॉपमोस्ट गीयर पर, फुल थ्रॉटल में.

उसका आलेख लगभग पूरा होने को था.

एकाध लिंक लगाने थे, एकाध शब्दों वाक्यों को दुरुस्त करना था. बस.

यह एक ऐसा आलेख था, जो वायरल हो सकता था. फ़ेसबुक, ट्विटर में नया ट्रैंड चलता और हिट होता.

हर ओर कॉपी-पेस्ट होता. कई कई बार रीसरफेस होकर लौटकर आता. इतना कि लोगबाग इस आलेख को 'अज्ञात' के नाम से संदर्भित करते.

.

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पर, ये क्या?

लेखक सोशल मीडिया पर 'पब्लिश' का बटन दबाता इससे पहले ही उसका वर्डप्रोसेसर क्रैश हो गया.

ऑटो सेव ऑप्शन लागू कर रखने, क्लाउड में काम करने के बावजूद प्रारब्ध पर लिखा वह धाँसू आलेख कबाड़ हो गया. नॉन रिट्रीवेबल हो गया.

 

प्रारब्ध?

भाई, अचानक, क्यों?

जरा ये स्क्रीनशॉट देखें -

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एक लाख ईमेल. जब से जीमेल चालू हुआ, लगभग तभी से इसका उपयोग प्रारंभ है. तब केवल आमंत्रितों के लिए हुआ करता था. और तब आपके इनबॉक्स में केवल 2 एमबी तक माल मसाला रखने की सुविधा हुआ करती थी, और आपको अपने इनबॉक्स को जब तब खाली करना होता था. पढ़े अनपढ़े पुराने धुराने सभी ईमेलों को हटाना होता था नहीं तो सामने वाला बंदा हड़काता था - अबे! तू अपने इनबॉक्स को तो खाली कर, मेरा भेजा ईमेल बाऊंस हो रहा है. जी-मेल ने इसे पूरी तरह बदल दिया था - आपको ईमेल हटाने की जरूरत ही नहीं. रखे रहो. चाहे जब तक. और फेयर यूज किया तो इसकी कैपेसिटी नित्य बढ़ती ही रहेगी. अभी मेरे खाते में 15 जीबी है, जिसमें 10 जीबी तक माल भरा है. यानी चिंता की कोई बात नहीं, एक लाख ईमेल और आ जाए!

याहू (वेब आधारित ईमेल की शुरूआत मैंने इसी से की थी, और खाता अभी भी सक्रिय है), एओएल और पता नहीं कौन कौन से ईमेल इस बीच आए, ललचाए, और चले गए, परंतु जीमेल - तेरा जवाब नहीं!

फिर से धन्यवाद. लाख लाख.

जब हिंदी ब्लॉग लेखन की शुरूआत हुई थी - कोई एक दशक पहले, तब स्मार्टफ़ोन - यानी हाई-एंड मोबाईल उपकरण नहीं थे. जनता केवल डेस्कटॉप कंप्यूटरों और लैपटॉप से ही हिंदी सामग्री का उपभोग इंटरनेट से करती थी.

तब से लेकर टेक्नोलॉज़ी की गंगा में बहुत सारी नई चीज़ें बहकर आ चुकी हैं. टैबलेट और स्मार्टफ़ोन इसमें शामिल हैं.

 

दस साल पहले, 100 प्रतिशत हिंदी सामग्री कंप्यूटर, डेस्कटॉप से पढ़ी जाती थी. और अब? हाई-एंड मोबाईल उपकरण - यानी स्मार्टफ़ोन और फ़ीचर फ़ोनों ने मामला उलट दिया है. अधिकांश जनता अब हिंदी सामग्री का उपभोग इन्हीं उपकरणों से करने लगी है, और आंकड़े में इजाफ़ा होना तय है. नीले रंग में दिया हिस्सा स्मार्टफ़ोन का है, हरे रंग का डेस्कटॉप, लैपटॉप का है, और नारंगी रंग में जो आंकड़ा है, वह टैबलेट का है.

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इसी तरह, दस साल पहले, हिंदी सामग्री का प्रमुख उपभोग करने वाला देश अमेरिका होता था. अप्रवासी भारतीय इंटरनेट पर न केवल हिंदी सामग्री के प्रमुख सृजकों में से होते थे, बल्कि हिंदी सामग्री के प्रमुख उपभोगकर्ता भी होते थे. अब अधिकांश हिंदी सामग्री का उपभोग भारतीय जनता ही करती है. हरे रंग में दर्शाया गया आंकड़ा हिंदी सामग्री के उपयोग का आंकड़ा है (वास्तविक भारत का नक्शा नहीं).

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और, अब तो स्मार्ट घड़ियाँ आ चुकी हैं, जिनमें, भले ही पूरा उपन्यास पढ़ने में दिक्कत हो, गुलजार की त्रिवेणियाँ और हाइकु तो आराम से पढ़े जा सकते हैं!

सोशल मीडिया का समाज शास्त्र - एक उम्दा रेडियो रूपक - अवश्य देखें सुनें - प्रस्तुति - महेश परिमल तथा राकेश डौंडियाल. कलाकार शम्पा शाह, फ़िल्मकार राजीव गोहिल, गायक उमाकांत गुंदेचा, साहित्यकार व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी, मनोवैज्ञानिक डॉ. विनय मिश्रा, रंगकर्मी आलोक चटर्जी तथा ब्लॉगर रवि रतलामी के विचार नीचे एम्बेड किए गए यूट्यूब वीडियो में प्ले कर सुनें. इस रेडियो रूपक को बिना नॉइस के रेकार्ड करने के लिए अपने डिजिटल रेडियो में विशेष हाई मास्ट एंटीना लगाना पड़ा तथा नॉइस रिडक्शन प्लगइन से साफ करना प़ड़ा. सुनें और बताएं कि आयोजन कैसा रहा.

पता नहीं, कैसे कैसे अनुवादकों को भर रखा है! एक और बानगी -

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ये एडसेंस में आ रहा हिंदी विज्ञापन. न तो वाक्य (शब्द-दर-शब्द अनुवाद?) सही, न शब्दों की वर्तनी!

ग्रो अप, गूगल! थोड़ा सीख ले!!

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व्यंज़ल

 

तब आदमी जानता नहीं था स्टिंग

अब प्यार मुहब्बत में भी है  स्टिंग

 

ये कैसा जमाना आ गया है यारों

प्यार आसां नहीं है बिना स्टिंग

 

एकांत में प्यार में किए कस्मे वादे

सब कर रहे हैं फारवर्ड कर स्टिंग

 

प्यार के पल याद आने से पहले

जाने क्यों मन में आता है स्टिंग

 

प्यार करने से अब डरता है रवि

कहीं कोई कर न रहा हो स्टिंग

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(कार्टून चित्र और समाचार शीर्षक - साभार 'पत्रिका' समाचार पत्र)

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