टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

April 2012

कन्याकुमारी में विराट, अनंत समुद्र में से सूर्योदय और सूर्यास्त को देखने का अपना अलग अनुभव है. इन चित्रों से उस माहौल की कल्पना आप भी कर सकते हैं -

कन्याकुमारी कन्याकुमारि kanyakumari

 

 

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मेरा तो नहीं है. तैयार होने का इंतजार कर रहा हूं. वैसे, गूगल के मुफ़्त 5 जीबी के मुकाबले मेरे पास माइक्रोसॉफ़्ट का 25 जीबी डिस्क पहले से तैयार और उपयोग में है. मगर उपयोगिता? बहुत ही कम. शायद भरोसे की समस्या.

तो सवाल ये है कि गूगल डिस्क में आखिर नया क्या है जो पब्लिक इसे लेने के लिए लाइन में लगे?

गूगल की साइट से उठाया गया नीचे दिया गया माल बांच लें - शायद कुछ जानकारी बढ़े (और अनुवाद के बारे में भी आप अपनी टिप्पणी में कुछ कहें!)

 

 

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अब आपके लिए एक क्विज - क्या आप इस वाक्यांश का अर्थ बता सकते हैं: "अतः जब आप सहेजें बटन दबाते हैं तो एक नया पुनरीक्षण सहेज लिया जाता है."

पहले भोमियो और फिर बाद में चिट्ठाजगत.कॉम की प्रॉक्सी सर्वर की सुविधा से कुछ समय पूर्व तक हिंदी (भारतीय भाषा) साइटों को अन्य भारतीय भाषा में एक क्लिक पर बदलने की सुविधा हासिल थी. अब ये दोनों ही सुविधाएं बंद हैं. यूनिमेधा पर यह सुविधा अभी उपलब्ध है. जब तक यह सुविधा उपलब्ध है आप इसका लाभ ले सकते हैं. अपनी साइट पर निम्न कोड कॉपी कर लगाएं. ध्यान दें कि जहाँ जहाँ भी http://www.rachanakar.org लिखा है, वहाँ अपनी साइट के यूआरएल से बदल दें.

 

<p>Read <strong>Rachanakar</strong> in your own INDIC script:</p>
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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

497

वकील और दादी माँ

वकीलों को दादी माँ से ऐसे प्रश्न करने ही नहीं चाहिए थे जिनके उत्तर वे सुन न सकें। एक छोटे शहर की अदालत में अभियोजन पक्ष के वकील ने अपने पहले गवाह के रूप में एक बुजुर्ग दादी माँ को कटघरे में बुलाया।

उनके पास जाकर वकील ने उनसे पूछा - “श्रीमती जोन्स, क्या आप मुझे जानती हैं? “

दादी ने उत्तर दिया - “हां-हां क्यों नहीं मि. विलियम्स! मैं तुम्हें तब से जानती हूं जब तुम जवान थे। और यदि मैं साफ-साफ कहूं तो तुमने मुझे बहुत निराश किया है। तुम झूठे हो, तुमने अपनी पत्नी को धोखा दिया है, तुम लोगों से झूठ बोलकर उन्हें फुसलाते हो और पीठ पीछे उनकी बुराई करते हो। तुम अपने आप को तीसमार खां समझते हो जबकि तुम्हारे पास इतनी भी अक्ल नहीं है कि अपने आप को समझ सको। हां मैं तुम्हें जानती हूं मि. विलियम्स! “

वकील भौचक्का रह गया! जब उसे कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे, उसने बचाव पक्ष के वकील की ओर इशारा करते हुए पूछा - “श्रीमती जोन्स, क्या आप बचाव पक्ष के वकील को जानती हैं? “

दादी ने फिर उत्तर दिया - “क्यों नहीं, जरूर जानती हूं! मैं मि. ब्रैडले को उनकी जवानी के समय से जानती हू। वे आलसी, कट्टर और शराबी हैं। वे किसी से भी सामान्य संबंध नहीं रख सकते और उनकी वकालत पूरे राज्य में सबसे खराब है। यह कहने की बात नहीं है कि उन्होंने अपनी पत्नी को धोखा दिया है और उसके तीन महिलाओं के साथ संबंध रहे हैं जिसमें से एक तुम्हारी पत्नी है। हां मैं उसे जानती हूं! “

बचाव पक्ष का वकील सन्न रह गया।

यह सुनकर जज महोदय ने दोनों वकीलों को अपने नजदीक बुलाया और धीरे से कहा - “खबरदार जो तुम लोगों ने उस महिला से मेरे बारे में पूछा। मैं तुम दोनों को हवालात भेज दूंगा। “

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498

तीन गहरे दार्शनिक मजाक

जेल के वार्डन से पूछा गया - “कैदियों के भाग जाने के बारे में तुम क्या जानते हो? क्या तुमने बाहर जाने के सभी दरवाज़ों पर ताला नहीं लगाया था? “

वार्डन ने संकोचपूर्वक उत्तर दिया - “हम बाहर जाने के सभी दरवाज़ों पर ताले लगाते हैं। शायद कैदी अंदर आने के दरवाज़े से भागे होंगे? “

******

पिता ने खेल के मैदान में अपने पुत्र जिमी को दूसरे लड़के के ऊपर बैठा हुआ पाया।

जिमी के पिता ने उससे पूछा - “तुम जॉर्ज को इस तरह क्यों दबाये हुए हो? “

“उसने मुझे आँख में मारा है। “

पिता ने पूछा - “कितनी बार मारा है? मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि अपना आपा खोने के पूर्व सौ तक गिनती गिना करो। “

जिमी ने उत्तर दिया - “मैं सौ तक गिनती गिन रहा हूं। मैं उसके ऊपर इसलिए बैठा हूं ताकि वह गिनती पूरा होने तक भाग न जाए। “

******

जॉनी को टीका लगाने के तुरंत बाद डॉक्टर ने टीका लगाने की जगह पर पट्टी बांधनी शुरू की। जॉनी ने डॉक्टर को रोकते हुए दूसरे हाथ पर पट्टी बांधने को कहा।

डॉक्टर ने पूछा - “ऐसा क्यों जॉनी? पट्टी तो उसी हाथ में बंधनी चाहिए जिस पर जख्म है ताकि तुम्हारे स्कूल के साथी उस पर चोट न पहुंचायें। “

जॉनी ने जिद करते हुए कहा - “डॉक्टर साहब, दूसरे हाथ पर ही पट्टी बांधिये। आप मेरे स्कूल के बच्चों को नहीं जानते। “

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499

पुत्र की तस्वीर

कृपा बहुत बूढ़ा हो गया था। उसका शरीद दुर्बल और कमजोर हो गया था।

उसके चेहरे पर दुःख और उम्र की परछाईं थी। उसकी दृष्टि भी धुंधली पड़ गयी थी। उसका इकलौता पुत्र युद्ध में शहीद हो गया था। उसको अपने पुत्र की मृत्यु का इतना ग़म था कि उसने जीने की आस ही छोड़ दी थी। एक दोपहर उसके दरवाज़े पर एक व्यक्ति ने दस्तक दी - “मैं भी आपके पुत्र की रेजीमेंट में सैनिक था। मैं उसकी मृत्यु के समय उसके साथ था। जो गोली उसे लगी दरअसल उसपर मेरा नाम लिखा था। वह गोली और मेरे बीच में आ गया। मेरा ये जीवन उसी का दिया हुआ है। मैंने आपके पुत्र की तस्वीर बनायी है। कृपया इसे उपहार के रूप में स्वीकार करें। “ कृपा कला का सच्चा पारखी था। उसके घर की दीवारों पर बहुमूल्य कलाकृतियां लगी हुयी थीं लेकिन यह तस्वीर उसके दिल को छू गयी।

कई वर्ष बाद कृपा का भी निधन हो गया। उसके वकील के पास अंत्येष्टि क्रिया के बाद पढ़े जाने के लिए एक पत्र था। वकील ने कहा - “इसके पहले कि मैं कृपा द्वारा संपत्ति के बारे में की गयी वसीयत को पढ़ूं, मेरे पास उनकी सबसे बहुमूल्य चीज, इन कलाकृतियों, के बारे में दिए गए निर्देश हैं। निर्देशों के अनुसार मुझे इन कलाकृतियों की नीलामी करनी होगी और सबसे पहले उनके पुत्र की तस्वीर की नीलामी होगी। “ यह कहते हुए वकील ने उस सैनिक द्वारा बनायी गयी तस्वीर को सामने रखा। लेकिन उस तस्वीर का कोई खरीददार सामने नहीं आया। बार-बार वकील ने उस तस्वीर की नीलामी के लिए आवाज़ लगायी किंतु कोई भी उस तस्वीर को खरीदने के लिए तैयार नहीं हुआ।

अंत में परिवार का एक पुराना माली सामने आया। अपनी फटी हुयी जेब से पैसे निकालते हुए बोला - “मेरे पास इस तस्वीर को खरीदने के लिए सिर्फ रु. 27/- हैं। “ वकील ने एक....दो...तीन...बोला और कहा - “ये तस्वीर तुम्हारी हुयी। “ इसके बाद उसने अपनी जेब में रखा लिफाफा निकाला और उसे फाड़ते हुए वसीयत को बाहर निकाला। वसीयत में लिखा था - “जो भी वयक्ति मेरे पुत्र की तस्वीर को खरीदेगा, उसे मेरी बाकी सभी कलाकृतियां दे दी जायें। मेरी बाकी संपत्ति नीलामी कर दी जाए और उससे प्राप्त धन से युद्ध में मारे गए सैनिकों के अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय बनवाया जाये। “

इस तरह उसकी वसीयत पूरी हुयी।

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500

मैं फिर कभी शिकायत नहीं करूंगा

1970 के दशक की बात है। एरिजोना इलाके से गुजर रहा एक व्यक्ति भारी बारिश के बीच एक गैस स्टेशन पर अपनी कार में गैस भरवाने के लिए रुका। भारी बारिश के बीच वह अपनी कार में ही बैठा रहा जबकि उस गैस स्टेशन पर मौजूद कर्मचारी ने भीगते हुए उसकी कार में गैस भरी। वहां से जाते समय उसने गैस स्टेशन के कर्मचारी से कहा - “मुझे माफ करना। मैंने तुम्हें इतनी बारिश में परेशान किया। “

कर्मचारी ने उत्तर दिया - “आपको माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। इस काम में मुझे कोई तकलीफ नहीं हुयी। जब मैं वियतनाम युद्ध के दौरान शत्रुओं की घेराबंदी में फंसा हुआ था, उसी समय मैंने निश्चय कर लिया था कि यदि मैं वहां से जीवित निकलने में कामयाब हो जाता हूं तो जीवनभर फिर कभी शिकायत नहीं करूंगा। इसके बाद मैंने कभी शिकायत नहीं की। “

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501

मुँह पर तमाचा

प्रायः कई लोग (मैं भी) शिक्षकों को कहते रहते हैं कि उन्हें ऐसा होना चाहिए, उन्हें वैसा होना चाहिए....इत्यादि।

एक दिन एकलव्य स्कूल की एक टीचर से मैंने कहा कि मैं स्वयं कुछ कक्षायें लूंगा और बताऊंगा कि कैसे पढ़ाया जाता है।

कक्षा 7 (या शायद कक्षा 8 की, मुझे ठीक से याद नहीं) की अंग्रेजी पुस्तक में डी.एच.लॉरेंस की कविता “द मॉसक्वीटो “ है। लॉरेंस मेरे पसंदीदा कवि हैं इसलिए मैंने सोचा कि पहले मैं ओवरहैड प्रोजैक्टर पर लॉरेंस का विस्तृत परिचय दूंगा। मैंने सोचा कि मैं उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में बताऊंगा कि वे कितने गरीब थे और किस तरह गर्मी से भरे किचन में ही सोया करते थे (मैंने नाटिंघम, इंग्लैड स्थित डी.एच.एल. का वह घर देखा है जहां वे बड़े हुए थे।) मैंने सोचा कि मैं विद्यार्थियों को यह बताऊंगा कि किस तरह डी.एच.एल. अपने प्रोफेसर की पत्नी के प्रेम में पड़कर इटली या जर्मनी भाग गए थे, जहाँ उनके द्वारा सर्वश्रेष्ठ साहित्य की रचना की गयी। (मेरा यह सोचना था कि लोगों को यह विचार बेहद पसंद आएगा।)

स्कूल टीचर ने जून में (जब शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ।) मुझे बताया कि पाठ्यक्रम के अनुसार वह कविता मध्य सितंबर में पढ़ायी जानी है। मेरे पास काफी क्त था इसलिए मैंने अच्छी तरह से तैयारी की और आकर्षक प्रस्तुतियां तैयार कीं। मैंने सितंबर आने का इंतजार किया। टीचर ने मुझे बताया कि उन्होंने इस कक्षा के दो पीरियड लिए जाने की योजना बनायी है। मैंने उनसे कहा कि दो अलग-अलग पीरियड की जगह एक सम्मिलित पीरियड आयोजित किया जाए। टीचर ने मेरी बात मानकर सम्मिलित पीरियड आयोजित किया (लेकिन इसके कारण कक्षाओं की समय-सारणी में व्यापक परिवर्तन करने पड़े। इसके बाद मैंने निर्णय लिया कि यह सभी के लिए कष्टदायी होता है और भविष्य में ऐसे सम्मिलित पीरियड आयोजित करने की आवश्यकता नहीं है।)

मैंने अपनी कक्षा प्रारंभ की। यह कक्षा 8ए और 8बी की सम्मिलित कक्षा थी अतः मुझे एक ही विषय दो बार पढ़ाने की आवश्यकता नहीं थी। छात्र उत्तेजित थे कि सुनील सर स्वयं पढ़ाने आ रहे हैं। मेरे लिए भी यह अनूठा अनुभव था जिससे मेरे बचपन की वे यादें ताजा हो गयीं जब मैंने अपने अंग्रेजी टीचर एस.डब्ल्यु. चंद्रशेखर से यह कविता पढ़ी थी (1971 में हैदराबाद पब्लिक स्कूल में)। मैंने छात्रों में डी.एच.एल. को लेकर उत्सुकता जागृत कर दी (उन दिनों डी.एच.एल. नामक कोरियर कंपनी अपने जंबो बॉक्स का खूब विज्ञापन कर रही थी, जिससे जब भी मैं डी.एच.एल. का नाम लेता, छात्रों को उनका नाम सुनकर हंसी-ठिठोली करने का अवसर प्राप्त होता।)

इन सभी प्रस्तावनाओं के बाद मैंने सोचा कि अब सभी छात्र कविता पढ़ाये जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं अतः मैंने कक्षा में मौजूद छात्रों से कविता की पहली दो पंक्तियां पढ़ने के लिए कहा। कविता पढ़ने के लिए उठे हाथों में से मैंने एक छात्र का चयन किया जिसने पूरी गंभीरता से उस कविता की पहली दो पंक्तियां पढ़कर सुनायीं और बैठ गया। अब उस बेहतरीन और अविस्मरणीय कविता का सार समझाने की मेरी बारी थी!

तभी घंटी बज गयी!

मैंने समय तो खर्च किया परंतु अपना कार्य पूरा नहीं कर पाया (सच कहें तो मैंने अभी शुरू ही किया था)। यह मेरे मुंह पर करारा तमाचा था। ऐसे सभी लोग जो हर समय टीचरों को यह कहते रहते हैं कि उन्हें कैसे पढ़ाना चाहिए और कैसे नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं...........अब ऐसे लोगों के बारे में मैं क्या कहूं? यह जाहिर ही है, है ना?

  

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.)

(समाप्त)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

493

चार्ली चैपलिन

एक बार चार्ली चैपलिन ने समाचार पत्र में एक विज्ञापन देखा कि शहर में “चार्ली चैपलिन जैसा दिखो “ प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है। चार्ली चैपलिन ने भी उस प्रतियोगिता में भाग लिया, परंतु हार गए।

प्रतियोगिता में हारने के बाद वे बोले - “बनावटी वेशधारी व्यक्ति जीत गया और वास्तविक व्यक्ति हार गया। वे मेरी वेशभूषा की नकल तो कर सकते हैं किंतु मेरे दिमाग और सोच की नहीं। मुझे इस प्रतियोगिता को हारने की खुशी जीतने वाले व्यक्ति से ज्यादा है क्योंकि मैं ही वास्तविक चार्ली चैपलिन हूं। “

 

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सबसे सटीक उत्तर

गणित की टीचर ने 07 वर्ष के अर्नब को गणित पढ़ाते समय पूछा - “यदि मैं तुम्हें एक सेब, एक सेब और एक सेब दूं तो तुम्हारे पास कुल कितने सेब हो जायेंगे? “ कुछ ही सेकेण्ड में अर्नब ने उत्तर दिया - “चार! “

नाराज टीचर को अर्नब से इस सरल से प्रश्न के सही उत्तर (तीन) की आशा थी। वह नाराज होकर सोचने लगी - “शायद उसने ठीक से प्रश्न नहीं सुना। “ यह सोचकर उसने फिर प्रश्न किया - “अर्नब ध्यान से सुनो, यदि मैं तुम्हें एक सेब, एक सेब और एक सेब दूं तो तुम्हारे पास कुल कितने सेब हो जायेंगे? “

अर्नब को भी टीचर के चेहरे पर गुस्सा नजर आया। उसने अपनी अंगुलियों पर गिना और अपनी टीचर के चेहरे पर खुशी देखने के लिए थोड़ा हिचकिचाते हुए उत्तर दिया - “चार! “

टीचर के चेहरे पर कोई खुशी नज़र नहीं आयी। तभी टीचर को याद आया कि अर्नब को स्ट्राबेरी पसंद हैं। उसे सेब पसंद नहीं हैं इसीलिए वह प्रश्न पर एकाग्रचित्त नहीं हो पा रहा है। बढ़े हुए उत्साह के साथ अपनी आँखें मटकाते हुए टीचर ने फिर पूछा - “यदि मैं तुम्हें एक स्ट्राबेरी, एक स्ट्राबेरी और एक स्ट्राबेरी दूं तो तुम्हारे पास कुल कितनी स्ट्राबेरी हो जायेंगी? “

टीचर को खुश देखकर अर्नब ने फिर से अपनी अंगुलियों पर गिनना शुरू किया। इस बार उसके ऊपर कोई दबाव नहीं था बल्कि टीचर के ऊपर दबाव था। वह अपनी नयी योजना को सफल होते देखना चाहती थीं। थोड़ा सकुचाते हुए अर्नब ने टीचर से पूछा - “तीन? “

टीचर के चेहरे पर सफलता की मुस्कराहट थी। उनका तरीका सफल हो गया था। वे अपने आप को बधाई देना चाहती थीं। लेकिन एक चीज बची हुयी थी। उन्होंने अर्नब से फिर पूछा - “अब यदि मैं तुम्हें एक सेब, एक सेब और एक सेब दूं तो तुम्हारे पास कुल कितने सेब हो जायेंगे? “

अर्नब ने तत्परता से उत्तर दिया - “चार। “

टीचर भौचक्की रह गयीं। उन्होंने खिसियाते हुए कठोर स्वर में पूछा - “कैसे अर्नब, कैसे? “ अर्नब ने मंद स्वर में संकुचाते हुए उत्तर दिया - “क्योंकि मेरे पास पहले से ही एक सेब है। “

जब भी कोई व्यक्ति आपको अपेक्षा के अनुरूप उत्तर न दे तो यह कतई न समझें कि वह गलत है। उसके पीछे भी कोई न कोई कारण हो सकता है। आप उस उत्तर को सुनें और समझने की कोशिश करें। लेकिन पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर न सुनें।

 

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वह बुजुर्ग लकड़हारा राजा था!

राजा भोज एक दिन खाली समय में नदी के किनारे टहल रहे थे। वे हरे-भरे वृक्षों और सुंदर फूलों को निहार रहे थे। तभी उन्हें सिर पर लकड़ियों का बंडल लादकर ले जाता एक व्यक्ति दिखायी दिया। उस वृद्ध व्यक्ति के सिर पर लदा बोझ बहुत भारी था और वह पसीने से तर हो रहा था। लेकिन वह प्रसन्न दिखायी दे रहा था। राजा ने उस व्यक्ति को रोकते हुए पूछा - “सुनो, तुम कौन हो? “ उस व्यक्ति ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया - “मैं राजा भोज हूं। “ यह सुनकर राजा भोज भौचक्के रह गए और पूछा - “कौन? “

उस व्यक्ति ने पुनः उत्तर दिया - “राजा भोज! “ राजा भोज जिज्ञासा से भर गए। वे बोले - “यदि तुम राजा भोज हो तो अपनी आय के बारे में बताओ? “ लकड़हारे ने उत्तर दिया - “हां, हां क्यों नहीं, मैं प्रतिदिन छह पैसा कमाता हूं। “

राजा ने उसकी जेब में मौजूद इस भारी धन के बारे में सोचा। कोई व्यक्ति छह पैसे प्रतिदिन कमाकर भी अपनेआप को राजा कैसे मान सकता है? और वह इतना खुश कैसे रह सकता है? राजा ने अपनी अनगिनत समस्याओं और चिंताओं के बारे में विचार किया। वह उस व्यक्ति के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा - “यदि तुम सिर्फ छह पैसे प्रतिदिन कमाते हो तो तुम्हारा खर्च कितना है? क्या तुम वास्तव में राजा भोज हो? “

उस वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया - “यदि आप वास्तव में जानना चाहते हैं तो मैं बताता हूं। मैं प्रतिदिन छह पैसा कमाता हूं। उसमें से एक पैसा मैं अपनी पूंजी के मालिक को देता हूं, एक पैसा मंत्री को और एक ऋणी को। एक पैसा मैं बचत के रूप में जमा करता हूं, एक पैसा अतिथियों के लिए और शेष एक पैसा मैं अपने खर्च के लिए रखता हूं। “ अब तक राजा भोज पूर्णतः विस्मित हो चुके थे। “क्या खूब योजना है! क्या खूब दृष्टिकोण! वह भी इतनी कम आय वाले व्यक्ति की!..... लेकिन यह कैसे संभव है? इस पहेली में उलझकर राजा ने फिर पूछा - “कृपया विस्तार से बतायें, मुझे कुछ ठीक से समझ में नहीं आया। “

लकड़हारे ने उत्तर दिया - “ठीक है! मेरे माता-पिता मेरी पूंजी के मालिक हैं। क्योंकि उन्होंने मेरे लालन-पालन में निवेश किया है। उन्हें मुझसे यह आशा है कि बुढ़ापे में मैं उनकी देखभाल करूं। उन्होंने मेरे लालन-पालन में यह निवेश इसीलिए किया था कि समय आने पर मैं उन्हें उनका निवेश ब्याज समेत लौटा सकूं। क्या सभी माता-पिता अपनी संतान से यह अपेक्षा नहीं करते? “

राजा ने तत्परता से पूछा - “और तुम्हारा ऋणी कौन है? “ वृद्ध व्यक्ति ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया - “मेरे बच्चे! वे नौजवान हैं। यह मेरा फर्ज़ है कि मैं उनका सहारा बनूं। लेकिन जब वे वयस्क और कमाने योग्य हो जायेंगे, वे उसी तरह मेरा निवेश लौटाना चाहिये जैसे मैं अपने माता-पिता को लौटा रहा हूं। इस तरह उन्हें भी अपना पितृऋण चुकाना होगा। “

राजा ने कम शब्दों में पूछा - “और तुम्हारा मंत्री कौन है? “ उस व्यक्ति ने उत्तर दिया - “मेरी पत्नी! वही मेरा घर चलाती है। मैं उसके ऊपर शारीरिक और भावनात्मक रूप से निर्भर हूं। वही मेरी सबसे अच्छी मित्र और सलाहकार है। “

राजा ने संकोचपूर्वक पूछा - “तुम्हारा बचत खाता कहां है? “ वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया - “जो व्यक्ति अपने भविष्य के लिए बचत नहीं करता, उससे बड़ा बेवकूफ और कोई नहीं होता। जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। प्रतिदिन मैं एक पैसा अपने खजाने में जमा करता हूं। “

राजा बोले - “कृपया बताना जारी रखें। “ लकड़हारे ने उत्तर दिया - “पांचवा पैसा मैं अपने अतिथियों की खातिरदारी के लिए सुरक्षित रखता हूं। एक गृहस्थ होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मेरे घर के द्वार सदैव अतिथियों के लिए खुले रहें। कौन जाने कब कोई अतिथि आ जाये? मुझे पहले से ही तैयारी रखनी होती है। “

उसने मुस्काराते हुए अपनी बात जारी रखी - “और छठवां पैसा मैं अपने लिए रखता हूं। जिससे मैं अपने रोजमर्रा के खर्च चलाता हूं। “

अपनी समस्त जिज्ञासाओं का समाधान पाकर राजा भोज उस लकड़हारे से बहुत प्रसन्न हुए।

निश्चित रूप से प्रसन्नता और संतुष्टि का धनसंपदा, पद और सांसारिक वैभव से कोई लेना-देना नहीं है। वर्तमान स्थिति के प्रति आपका व्यवहार और स्वभाव ही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने को उपलब्ध साधनों के अनुरूप ही जीवनजीने की कला सीख ले तो वह काफी कुछ प्राप्त कर सकता है। यही सकारात्मक सोच और सही व्यवहार की शक्ति है। वह बुजुर्ग लकड़हारा वास्तव में राजा था क्योंकि उसका नजरिया ही राजा की तरह था!

 

496

फैसला न करें।

एक ड्यूक की हीरों से जड़ी सुंघनी खो गयी। अपने कुछ पुराने अधिकारियों के सम्मान में दिए गए रात्रिभोज के बाद उन्होंने खोई हुयी सुंघनी को खोजना शुरू किया। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। उस समय उस कक्ष में कोई भी नौकर मौजूद नहीं था इसलिए सभी अतिथि अपनी तलाशी देने को तैयार हो गए। लेकिन एक अधिकारी ने तलाशी का तीव्रता से विरोध किया, यहां तक कि वह वहां से जाने को तैयार हो गया। सभी लोगों का संदेह उसी अधिकारी पर गया क्योंकि कोई भी उसके बारे में अधिक जानकारी नहीं रखता था।

अगले वर्ष जब उस ड्यूक ने अपना वही कोट पहना तो उसकी अंदर की जेब में वह सुंघनी मिल गयी। ड्यूक ने उस अधिकारी को तलाश किया जिस पर सभी को संदेह था। वह अधिकारी छत पर बने एक बेकार से फ्लैट में मिल गया। ड्यूक ने उससे क्षमा मांगी।

ड्यूक ने उससे पूछा - “लेकिन तुमने उस समय तलाशी का विरोध क्यों किया था? अन्य अधिकारियों की बात न मानकर तुमने अपनेआप को शर्मिंदगी का पात्र क्यों बनाया? “

उस बुजुर्ग सज्जन ने उत्तर दिया - “क्योंकि,....मेरी जेब माँस के जूठे टुकड़ों से भरी हुयीं थी जो मैंने भूख से मरणासन्न अपनी पत्नी और परिवार के लिए खाने की मेज से चुराये थे! “

उसकी बात सुनकर ड्यूक की आँखों से आँसू छलक पड़े।

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

489

अच्छी प्रतिष्ठा को नुक्सान नहीं

मुल्ला नसरुद्दीन को एक व्यक्ति ने सूचना दी कि एक समाचार पत्र में उसके खिलाफ बुरी बातें छपीं है। तुम उस अखबार के खिलाफ क्या कार्रवाई करोगे?

मुल्ला ने उत्तर दिया - "कोई कार्रवाई नहीं करूंगा। जितने लोगों के यहां यह अखबार आता है, उनमें से आधे लोगों ने यह खबर पढ़ी नहीं होगी। जिन्होंने यह खबर पढ़ी होगी, उनमें से आधे लोगों को समझ में नहीं आयी होगी। जितने लोगों को यह खबर समझ में आयी होगी, उनमें से आधे लोगों ने इसपर कोई विश्वास नहीं किया होगा। और जिन लोगों ने इस खबर पर विश्वास किया होगा, उनमें से आधे लोगों से मुझे कोई लेना-देना नहीं है।

ऐसे प्रश्नों का यही सबसे बेहतर उत्तर है। भले ही कोई व्यक्ति तुम्हारे बारे में जानबूझकर दुष्प्रचार करे, तुम्हारे सच्चे मित्र और सगे-संबंधी उस बात पर यकीन नहीं करेंगे और जो यकीन करेंगे, उनसे तुम्हें कोई लेना-देना नहीं होता।

 

490

पूर्वग्रह

मेरे एक साथी ने मुझसे कहा कि उसने विधानसभा में यह वाक्य सुना है -

"वह धोखेबाज है। उसने अपना वोट हमारे विरोध में डाला है, और वह हमारा साथ छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो गया है। "

"तुम मुझे यह बताओ कि दूसरे दल को छोड़कर अपने साथ आए व्यक्ति को भी क्या तुम धोखेबाज कहोगे?

"निश्चित रूप से नहीं।........... उसे धोखेबाज नहीं बल्कि परिवर्तित व्यक्ति कहा जायेगा। "


491

बढ़ा रखी है

एक दिन मैं एकलव्य परिसर में टहल रहा था। तभी मैंने एक बस कंडेक्टर को देखा जिसने अपनी दाढ़ी बढ़ा रखी थी। मैंने उससे दाढ़ी बढ़ाने का कारण पूछा। उसने कहा - "मैंने बढ़ा रखी है। " उसकी पत्नी गर्भवती थी और उसने यह शपथ ले रखी थी कि जब तक उसकी डिलेवरी नहीं हो जायेगी, वह दाढ़ी नहीं बनायेगा। मैंने उससे कहा - "ऐसा वादा करो जिससे मुझे कोई बाधा नहीं हो। "

फिर मैंने उसे समझाया कि अपने आप से ऐसा वायदा मत करो जिसका पालन आसान हो और जिसमें कोई मेहनत न लगे। (मैं चाहता था कि सभी ड्राइवर और कंडक्टर साफ-सुथरे, दाढ़ी बनाए हुए और स्वच्छ कपड़े पहने हुए दिखने चाहिये।)

दाढ़ी बढ़ाने की बजाए वह ऐसी शपथ भी ले सकता है कि पत्नी की डिलेवरी होने तक वह चाय नहीं पियेगा(यदि उसे चाय पीना पसंद हो)। ऐसा करने से उसे दिन में कई बार उसे मनोवैज्ञानिक दबाव से गुजरना पड़ेगा। इस आंतरिक संघर्ष में वह विजयी भी हो सकता है और पराजित भी। अतः शपथ ऐसी ही होनी चाहिए। हो सकता है कि वह सच में चाय पीना छोड़ दे।

चाय की जगह वह अपनी ऐसी ही अन्य किसी वासना का भी त्याग कर सकता है। इसी बहाने पैसा भी बचेगा और बुरी आदत भी छूट जायेगी।

वह मुझे देखता ही रह गया।

 

492

पर्स में फोटो


यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में टी.टी.ई. को एक पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स में कुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा - "यह किसका पर्स है? "

एक बूढ़ा यात्री बोला - "यह मेरा पर्स है। इसे कृपया मुझे दे दें। " टी.टी.ई. ने कहा - "तुम्हें यह साबित करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है। केवल तभी मैं यह पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं। " उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन मुस्कान के साथ उत्तर दिया - "इसमें भगवान श्रीकृष्ण की फोटो है। " टी.टी.ई. ने कहा - "यह कोई ठोस सबूत नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है? पर्स में तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है? "

बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला - "मैं तुम्हें बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे। मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी।

जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने बालों को देखकर खुश हुआ करता था। कुछ साल बाद मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे को निहारा करता।

जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर जाता ओर जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी। "

बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ बोलना जारी रखा - "कई वर्ष पहले मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का क्त नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था, वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है। अब मैंने भगवान कृष्ण की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता। जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं इतना अकेला नहीं होता। "

टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने बुकस्टाल पर पहुंचा और विक्रेता से बोला - "क्या तुम्हारे पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के लिए चाहिए। "

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

486

गुरूजी के उत्तर

गुरूजी के उत्तरों को प्रायः एक फार्मूले की तरह दुहराना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना कि अपनेआप में वह उत्तर।

यह कहानी एक ऐसे गुरूजी से संबंधित है जिन्होंने जीवनपर्यंत मौन व्रत धारण किया हुआ था। चूंकि गुरूजी हमेशा मौन रहा करते थे, इसीलिए शिष्यों को अपनी भाषायी और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए गुरूजी के संभावित उत्तर का स्वयं अनुमान लगाना पड़ता था। इसका परिणाम यह हुआ कि उनका प्रत्येक शिष्य उनकी ही तरह बुद्धिमान हो गया और अपने गुरूजी के स्थान पर उपदेश देने में सक्षम हो गया।

गुरू सिर्फ एक मार्गदर्शक की तरह होता है जो सही राह दिखाता है। यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वह अपने गुरू के बताये रास्ते पर चले या नहीं।

487

अंधी चाल चलना

भयंकर हवा और बारिश के दौरान कसी हुयी रस्सी पर नियाग्रा प्रपात को पार करने के खतरनाक स्टंट के बाद महान जुम्ब्राती को एक अत्यंत उत्साही समर्थक मिला। उस समर्थक ने जुम्ब्राती को अपनी वापिसी की यात्रा उसी रस्सी पर एक पहिए चलाते हुए पूरा करने के लिए कहा।

महान जुम्ब्राती भयंकर मौसम को देखते हुए तैयार नहीं थे परंतु उस समर्थक ने दबाव बनाते हुए कहा - "तुम यह कारनामा कर सकते हो। मुझे विश्वास है।"

जुम्ब्राती ने उससे पूछा - "क्या तुम्हें वास्तव में यकीन है कि नियाग्रा फॉल को पहिया चलाकर पार कर सकता हूं?"

समर्थक ने उत्साहपूर्वक उत्तर दिया - "जरूर! तुम यह कारनामा कर सकते हो।"

यह सुनकर जुम्ब्राती ने उससे कहा - "तो ठीक है, पहिया लाओ।"

488

मैं भी तो उपयोग नहीं कर रहा था

बैंक के दीवालिया होने पर मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने सारे जीवन की जमापूंजी गंवा दी। इस बात पर वह धीरे से बोला - "चलो मेरा धन किसी के तो काम आएगा। आखिर मैं भी तो इसका उपयोग नहीं कर रहा था।"

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

484

फिलिस्तीन के दो समुद्र

फिलिस्तीन में दो समुद्र हैं। दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। एक को गैलीलि सागर कहते हैं जिसका पानी इतना स्वच्छ, निर्मल और पेय है। इस सागर में मछलियां रहती हैं और लोग तैरते हैं। इसके चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और मैदान हैं। कई लोगों ने इसके चारों ओर अपने घर बना लिये हैं। यीशू मसीह ने भी इस सागर को कई बार पार किया है।

दूसरे समुद्र का नाम मृत सागर है और यह बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप है। इसका सब कुछ मृत है। इसका पानी इतना खारा है कि कोई भी पीकर बीमार पड़ जाये। इसमें एक भी मछली नहीं है। इसके किनारों पर कोई वनस्पति नहीं उगती। कोई भी व्यक्ति इसकी दुर्गंध के कारण इसके आसपास नहीं रहना चाहता।

इन सागरों के बारे में रोचक तथ्य यह है कि एक ही नदी इन दोनों को जोड़ती है। तो इसमें खास बात क्या है? सिर्फ यह कि एक प्राप्त करके देता भी है और दूसरा प्राप्त करके अपने पास रख लेता है।

जॉर्डन नदी गैलीलि सागर के शीर्ष से प्रवाहित होती है और निचली ओर से बाहर निकलती है। इसके बाद जॉर्डन नदी मृत सागर में मिलती है और उसी में समाहित हो जाती है।

मृत सागर स्वार्थपूर्ण रूप से इसे अपने पास ही रख लेता है। इससे यह मृत होता है। यह लेता तो है परंतु देता नहीं।

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485

जब तूफान आये तब नींद लो

एक किसान का खेत समुद्र के तट पर था। उसने अन्य किसान को किराये पर लेने के लिए कई विज्ञापन दिये। लेकिन ज्यादातर लोग समुद्र तट पर स्थित खेत में काम करने के इच्छुक नहीं थे। समुद्र के किनारे भयंकर तूफान उठते रहते हैं जो जानमाल और फसलों को प्रायः नुक्सान पहुंचाते हैं। उस किसान ने कई लोगों का अपने सहायक के रूप में कार्य करने के लिए साक्षात्कार लिया परंतु सभी ने मना कर दिया।

अंत में एक ठिगने कद का दुबला-पतला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास आया।

किसान ने उससे पूछा - "खेती-किसानी जानते हो?"

उस ठिगने आदमी ने उत्तर दिया - "मैं उस समय सो सकता हूं जब तूफान आ रहा हो।" यद्यपि वह उसके उत्तर से संतुष्ट नहीं था किंतु उसके पास उसे रखने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वह ठिगना व्यक्ति सुबह से शाम तक खेत में काम में लगा रहता। किसान भी उसके काम से संतुष्ट था। एक रात समुद्र की ओर से तूफान की खौफनाक आवाजें आने लगीं। अपने बिस्तर से कूद कर किसान ने लालटेन संभाली और पड़ोस में स्थित उस व्यक्ति के आवास तक भांगता हुआ गया। उसने झटका देकर उस किसान को जगाया और कहा -"जल्दी उठो, तूफान आ रहा है। सभी चीजों को बांध लो ताकि तूफान उन्हें उड़ा न ले जाये।"

उस ठिगने आदमी ने करवट बदलते हुए कहा - "नहीं श्रीमान, मैंने आपसे पहले ही कहा था कि मैं उस समय सो सकता हूं जब तूफान आ रहा हो।"

उसके दोटूक उत्तर से किसान को बहुत गुस्सा आया। वह तत्काल उसे नौकरी से निकालना चाहता था लेकिन वह तूफान से बचाव के लिए बाहर भागा। उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि सूखी घास के ढेर तिरपाल से ढ़के हुए थे। सभी गायें अपने बाड़े और मुर्गियां अपने दरबे में थीं और दरवाजे बंद थे। शटर भी कसकर बंद था। हरचीज बंधी हुयी थी। कुछ भी उड़ नहीं सकता था।

किसान को तब जाकर उस आदमी की बात का अर्थ समझ में आया। वह भी अपने बिस्तर की ओर लोटा और आराम से सो गया।

जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होता है तब उसे कोई भय नहीं होता। सूत्र वाक्य यह है कि बुरी से बुरी स्थिति के लिए भी तैयार रहो।

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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अभी तक हम गर्व से अपने 5000 (भई, सीमा ही इतनी है, क्या करें!) फ़ेसबुक मित्रों की सूची सबको बताते फिरते थे. फ़ेसबुक दुश्मन (आप इनमें से चाहे जो भी कह लें - शत्रु, दुश्मन, वैरी, विरोधी, बैरी, मुद्दई, रिपु, अरि, प्रतिद्वंद्वी, प्रतिद्वन्द्वी, मुखालिफ, मुख़ालिफ़, रकीब, रक़ीब, अनुशयी, अराति, सतर, अयास्य, अमित्र, अमीत, वृजन, अरिंद, अरिन्द, अरुंतुद, अरुन्तुद, तपु) की बात तो कोई करता ही नहीं था.

फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट तो एकदम आइडियल दुनिया लगती थी. यहाँ बस मित्र और मित्र ही बसते थे. दुश्मनों का तो कोई ठौर ठिकाना ही नहीं था जैसे.

परंतु ऐसा कहीं होता है? जहाँ आपके दस मित्र होते हैं तो बीस-चालीस दुश्मन भी होते हैं. सीधे शब्दों में कहें तो फेसबुक अब तक आपके प्रोफ़ाइल का आधा सच ही बताता फिरता था. बाकी का आधा सच वो गोल कर जाता था. आपके दुश्मनों के बारे में कहीं कोई जगह ही नहीं थी इसमें. और, बकौल पॉल न्यूमैन - फेसबुक में तो आपका (या किसी का भी,) कोई कैरेक्टर ही नहीं था क्योंकि, वहाँ किसी का कोई दुश्मन ही नहीं था.

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परंतु धन्यवाद फेसबुक एप्प - एनिमीग्राफ. अब हम सार्वजनिक रूप से अपने दुश्मनों को फ़ेसबुक में सूचीबद्ध कर सकेंगे.  उन्हें गर्व से जोड़ सकेंगे, शामिल कर सकेंगे.

और, जिसका जितना बड़ा, रसूखदार दुश्मन, वो उतना ही बड़ा फेसबुकिया आदमी. और, अब तो लगता है कि फ़ेसबुक के प्रसार-प्रचार, लोकप्रियता और उपयोग में और भी ज्यादा धुंआधार वृद्धि दर्ज होगी. अभी तक शत्रु, दुश्मन किस्म के लोग फ़ेसबुक से दूरियाँ जो बनाए हुए थे. वैसे भी, किसी से दुश्मनी निकालने का सोशल प्लेटफ़ॉर्म फ़ेसबुक से बढ़िया और कोई हो सकता है भला?

तो चलिए,  अपने फेसबुक में यह एप्प एनिमीग्राफ इंस्टाल करें और धड़ाधड़ जोड़ें अपने दुश्मनों को. वैसे भी इस बेदर्द दुनिया में मित्रों की अपेक्षा दुश्मनों की संख्या कई गुना ज्यादा है. और दुश्मन तो कोई भी हो सकता है -नेता, सेलेब्रिटी, ब्रांड, फिल्म, कोई जगह इत्यादि इत्यादि. और, शुरूआत के लिए आप माया या मुलायम दोनों में से किसी एक को चुन सकते हैं - क्योंकि दोनों के दोनों एक साथ किसी के दुश्मन नहीं हो सकते. या फिर, शायद हो सकते हों! मगर फिर आपके सामने दूसरा विकल्प भी दे देता हूं - करुणानिधि या जयललिता.

 

यहाँ तक तो फिर भी ठीक था. परंतु आपके आभासी सोशल लाइफ की वाट तब लगेगी, इसकी हवा तब निकलेगी जब लोग धड़ाधड़ आपको अपने दुश्मन सूची में शामिल करेंगे. पता चला कि आपके तो कुछ हजार दुश्मन हैं, मगर आपने लाखों की तादाद में लोगों की दुश्मनी मोल ले ली है!

 

वैसे, अपने दुश्मनों को देखने जाएं, उनकी सूची बनाने जाएँ तो सबसे पहला नाम किसका आएगा सोचा है आपने कभी?

संदर्भ के लिए ये सूफी पंक्ति आपके लिए -

लाली देखन मैं गई...

 

बहरहाल, हैप्पी दुश्मनी!

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

483

जीसस का वकील के साथ संवाद - एक सच्चा धार्मिक

ज्यादातर समय क्राइस्ट ने जीसस को अपने आप से अलग रखा क्योंकि वे अपने मुखबिर की बातों पर भरोसा कर सकते थे। वे जानते थे कि उनका गुप्तचर भरोसे के काबिल है क्योंकि समय - समय पर वे अन्य लोगों से भी जीसस की बातों और गतिविधियों के बारे में जानकारी लेते रहते थे और इस तरह अपने गुप्तचर के संदेश की पड़ताल करते थे। उन्होंने अपने गुप्तचर के संदेशों को प्रायः सटीक पाया।

लेकिन जब क्राइस्ट ने सुना कि जीसस अपने नगर में उपदेश देने जा रहे हैं और यह कि वे कभी-कभी सभा में सबसे पीछे की ओर बैठ चुपके से अपने बारे में बातें सुनते थे। एक अवसर पर जब उन्होंने ऐसा किया तो यह देखा कि एक वकील जीसस से प्रश्न कर रहा है। कानून के जानकार व्यक्ति ने अपने सारे दांवपेंच जीसस के सामने प्रयोग किए परंतु जीसस उनमें से ज्यादातर के उत्तर देने में सक्षम थे, यद्यपि क्राइस्ट के अनुसार उनमें से कुछ तरीके सर्वथा अनुचित थे। बहस के दौरान प्रायः कहानियां सुनाने से अतिरिक्त कानूनी तत्व शामिल होते हैं। लोगों की भावनाओं में हेरफेर करके उन्हें अपनी बात से सहमत करना बहस में अतिरिक्त प्रभाव तो पैदा कर सकता है किंतु कानूनी दृष्टि से अनुचित है।

इस बार वकील ने उनसे कहा - "गुरूजी, आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिये?"

क्राइस्ट ने ध्यान से जीसस को यह उत्तर देते हुए सुना - "तुम वकील हो। है ना? अच्छा पहले मुझे यह बताओ कि इस बारे में कानून क्या कहता है?"

"पूर्ण समर्पित होकर तन, मन, धन से ईश्वर से प्रेम करो और अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसा स्वयं से करते हो।"

यह सुनकर जीसस बोले - "ये हुई न बात, तुम बिल्कुल ठीक समझे। तुम कानून समझते हो। यही करो, इससे तुम्हें आंतरिक शांति प्राप्त होगी।"

लेकिन आखिर वह व्यक्ति वकील था और वह यह साबित करना चाहता था कि उसके पास सभी बातों के लिए प्रश्न हैं। इसलिए उसने पूछा - "ओह, लेकिन मुझे यह तो बताने की कृपा करें कि मेरा पड़ोसी कौन है?"

इसके उत्तर में जीसस ने यह कहानी सुनायी -

"एक बार की बात है। तुम्हारी ही तरह का एक यहूदी व्यक्ति येरूशलम से जेरिको जा रहा था। बीच रास्ते में डकैत उसके ऊपर टूट पड़े। डकैतों ने उसकी जमकर पिटायी लगायी और उसके पास मौजूद सारा माल लूट लिया। बाद में उसे सड़क किनारे ही अधमरा छोड़ के चले गए।

उस व्यस्त सड़क पर कुछ देर बाद वहां से एक पादरी गुजरे। उन्होंने खून से लथपथ उस व्यक्ति को एक झलक देखा और मुंह फेर लिया। उन्होंने वहां न रुकने का फैसला किया। कुछ देर बाद वहां से एक पुजारी गुजरा और उसने भी पचड़े में न पड़ने का निर्णय लिया और जल्दी से वहां से खिसक गया।

लेकिन इसके बाद एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति वहां से गुजरा। जैसे ही उसने घायल पड़े व्यक्ति को देखा, मदद के लिए रुक गया। उसने उसके घावों को विसंक्रमित करने के लिए उनपर शराब डाली और जख्मों से राहत देने के लिए तेल की मालिश की। उसने उसे सहारा देकर अपने गधे पर बैठाया और एक सराय तक ले गया। उसने सराय के मालिक को उस व्यक्ति की देखभाल के लिए धन दिया और कहा - "यदि तुम्हें और धन की आवश्यकता पड़े तो मैं अपनी अगली यात्रा में दे दूंगा परंतु इसकी देखभाल में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए।"

अब तुम्हारे लिए मेरा प्रश्न यह है कि पादरी, पुजारी और उस धार्मिक व्यक्ति में से कौन उस घायल व्यक्ति का पड़ोसी था?

वकील केवल यही उत्तर दे सका - "वह व्यक्ति जिसने उसकी मदद की थी।"

जीसस ने उससे कहा - "तुम्हें सिर्फ यही जानने की जरूरत है। अब तुम जाओ और ऐसा ही करो।"

क्राइस्ट ने इस कहानी को यह जानते हुए भी लिख लिया कि अपनी समस्त अनुचित बातों के बावजूद लोग इस कहानी को कानूनी परिभाषा की तुलना में बहुत दिनों तक याद रखेंगे।

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

481

सुखी वैवाहिक जीवन का रहस्य

एक दंपति का वैवाहिक जीवन 60 वर्ष से अधिक हो चुका था। उन्होंने एक - दूसरे से कभी कोई बात नहीं छुपायी। वे सभी मसलों पर आपस में बात किया करते थे। उनके बीच में कभी कोई रहस्य नहीं था, सिवाय एक जूते के डिब्बे के, जो उस वृद्ध महिला की अल्मारी में ऊपर की ओर रखा रहता था। महिला ने अपने पति को यह कह रखा था कि वह कभी भी उस डिब्बे को खोलकर न देखे।

पति ने भी इतने वर्ष उस डिब्बे की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। एक दिन वह बुजुर्ग महिला बहुत बीमार पड़ गयी। डॉक्टरों ने बताया कि उसके बचने की उम्मीद बहुत कम है। एक - दूसरे के मध्य सभी शेष विषयों की जानकारी लेने के उद्देश्य से पति उस जूते के डिब्बे बिस्तर पर पड़ी महिला के पास लेकर पहुंचा।

महिला ने भी माना कि जूते के डिब्बे के रहस्य से पर्दा उठाने का यही सही वक्त है। जब पति ने उस डिब्बे को खोला तो उसमें कढ़ाईकारी की हुयीं दो गुड़ियां और $ 95000/- मिले।

पति ने इसके बारे में जानना चाहा। महिला ने उत्तर दिया - "जब हमारी शादी हुयी थी तो मेरी दादी ने मुझे सुखी वैवाहिक जीवन के रहस्य के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि मैं कभी भी तुमसे बहस न करूं। यदि मुझे कभी तुम्हारे ऊपर गुस्सा आये तो मैं चुप रहूं और अपना ध्यान गुड़िया को सजाने के लिए की जाने वाली कढ़ाईकारी पर लगा दूं।"

उस वृद्ध पुरुष की आँखों में खुशी के आंसू छलक आये। डिब्बे में सिर्फ दो गुड़िया थीं। पति यह सोचकर भी खुश था कि इतने वर्षों के लंबे वैवाहिक जीवन में उसने सिर्फ दो बार ही अपनी पत्नी का दिल दुखाया था।

"लेकिन प्रिये! यह तो हुयी गुड़िया की बात। फिर इतने सारे पैसों का क्या रहस्य है? ये कहाँ से आये?"

पत्नी ने उत्तर दिया - "ओह! ये पैसा मैंने उन गुड़ियों को बेचकर कमाया है।"

482

किसकी समस्या ?

एक व्यक्ति को यह आशंका हुयी कि उसकी पत्नी कुछ ऊँचा सुनने लगी है। उसे लगा कि उसकी पत्नी को सुनने की मशीन लगवाने की आवश्यकता है। वह असमंजस में पड़ गया कि पत्नी को इस संबंध में कैसे बताया जाए। अतः उसने अपने पारिवारिक डॉक्टर से संपर्क किया।

डॉक्टर ने उसे पत्नी की बहरापन जांचने के लिए आसान घरेलू उपाय बताया - "तुम 40 फुट दूर से खड़े होकर अपनी पत्नी से उस तरह बात करो जैसे उसके नजदीक ही खड़े हो, और देखों कि वह तुम्हें सुन पा रही है या नहीं। यदि नहीं तो 30 फुट की दूरी से बात करो, फिर 20 फुट और इसी तरह पास आते जाओ जब तक कि तुम्हें जबाव न मिले।"

उसी शाम उसकी पत्नी किचन मे खाना पका रही थी और वह दूसरे कमरे में था। वह अपने आप से बोला - "मैं लगभग 40 फुट दूर हूं। देखते हैं क्या होता है?" फिर उसने सामान्य स्वर में अपनी पत्नी से पूछा - "अजी सुनती हो! आज क्या बना रही हो?" कोई उत्तर नहीं मिला! तब पतिदेव किचन की ओर बढ़े। किचन से लगभग 30 फुट की दूरी से उसने फिर पूछा -"अजी सुनती हो! आज क्या बना रही हो?" अभी भी कोई उत्तर नहीं मिला।

फिर वह और नजदीक स्थित डाइनिंग रूम तक पहुंच कर बोला - "अजी आज क्या बना रही हो?" फिर कोई उत्तर नहीं मिला। फिर वह किचन के दरवाजे तक यानि पत्नी से 10 फुट की दूरी तक पहुंच कर बोला - "अजी आज क्या बना रही हो?" तब भी कोई उत्तर नहीं मिला। तब वह पत्नी के ठीक पीछे जाकर चिल्लाया - "आज क्या बना रही हो????"

पत्नी ने उत्तर दिया - "जयेश, मैं पांचवी बार बता रही हूं कि मैं खिचड़ी बना रही हूं।"

जरूरी नहीं कि दूसरों के साथ ही कोई समस्या हो, जैसा कि हम मानते हैं। ये हमारे साथ भी हो सकती है।

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

479

साबुन के डिब्बे

एक महिला ने एक दुकान से नहाने के साबुन खरीदे। जब उसने उनमें से एक साबुन के डिब्बे को खोला तो पाया कि उसके अंदर साबुन है ही नहीं। वह खाली डिब्बा था। उस महिला ने उत्पादक कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज़ करायी और मुआवजा हासिल किया। इस प्रकरण के बाद कंपनी के समक्ष यह पता लगाने की चुनौती थी कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? वे यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि ऐसी घटना दोबारा न हो? उस महिला को मुआवज़ा देने के अलावा उनकी काफी बदनामी भी हुयी थी।

विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद यह पता चला कि साबुन की पैकिंग के दौरान एक या दो डिब्बे साबुन पैक हुए बिना खाली छूट जाते थे। पैक होने के बाद भरे डिब्बे और खाली डिब्बे में पता लगाना बहुत कठिन काम था। एक-एक डिब्बे की जांच करना बहुत दुष्कर कार्य था। अतः तकनीकी विभाग के प्रमुख को इस समस्या का हल ढ़ूढ़ने के लिए कहा गया। उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट बनायी और एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली स्थापित करने का सुझाव दिया जिसमें एक-एक साबुन का वज़न और स्कैन होने की व्यवस्था थी। इस प्रणाली की स्थापना में भारी खर्च प्रस्तवित किया गया।

कंपनी प्रबंधन ने उनके प्रस्ताव को ध्यानपूर्वक सुना और मशीनरी खरीदने का निर्णय लिया। तभी वहां मौजूद एक अशिक्षित कर्मचारी बोला - "बीच में बोलने के लिए मुझे माफ करें श्रीमान, परंतु मैं ऐसा तरीकाबता सकता हूं जिससे यह काम बहुत कम खर्च में हो सकता है।"

शुरूआत में कंपनी प्रबंधन को कुछ झिझक हुयी। लेकिन उन्होंने उस कर्मचारी की बात को सुना और उसके प्रस्ताव का प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शन देखने का निर्णय लिया। अगले दिन वह कर्मचारी एक शक्तिशाली औद्योगिक पंखा लेकर आया जिसे उसने कन्वेयर बैल्ट, जिस पर से पैक किए हुए साबुन गुजरते थे, के पास एक सही दिशा पर लगा दिया। जैसे ही खाली डिब्बे उस बैल्ट पर से गुजरे, हल्के होने के कारण उड़कर दूर जा गिरे जबकि भरे हुए डिब्बे आसानी से गुजर गए।

एक जटिल समस्या का इससे आसान समाधान और क्या हो सकता है। व्यावहारिक ज्ञान (कॉमन सेंस) कभी-कभी ही सामान्य होता है।

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480

धरती के प्रति प्रेम

"हमारी धरती हमारे धन से अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह हमेशा बनी रहेगी। इसे अग्नि की ज्वाला द्वारा भी नष्ट नहीं किया जा सकता।"

जब तक यह सूर्य चमकता रहेगा और नदियों में पानी बहता रहेगा, तब तक यह धरती मनुष्यों और जीव-जंतुओ को जीवन प्रदान करती रहेगी। हम मनुष्यों और जीव-जंतुओं के जीवन का सौदा नहीं कर सकते। इसलिए हम इस भूमि को नहीं बेच सकते। इसे हमारे लिए एक महान भावना के तहत अवतरित किया गया है अतः हम इसे नहीं बेच सकते क्योंकि हमारा इस पर कोई अधिकार नहीं है।

"तुम अपने धन की गणना कर सकते हो और पलक झपकते ही इसे नष्ट कर सकते हो किंतु केवल एक महान भावना ही इस धरती के अनाज और मैदानों की लहलहाती घास की गणना कर सकती है। एक उपहार के रूप में हम तुम्हें वह सब कुछ देंगे जो हमारे पास है और जिसे तुम ले जा सकते हो; लेकिन यह धरती कभी नहीं।"

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

अभी कुछ दिन पहले थोड़ी खोजबीन कर रहा था तो कुछ हिंदी शब्द युक्त कुछ दिलचस्प जाल-पते हाथ लगे. इनमें से अधिकांश ब्लॉग या संबंधित प्लेटफ़ॉर्म से हैं और हो सकता है कि इनमें से कई 404 त्रुटि भी दिखाएं या फिर कई अन्य साइट को रीडायरेक्ट करें. फिर भी, सूची आपके लिए प्रस्तुत है -

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इनमें से बहुत से मेरी वृहत् ब्लॉग सूची में शामिल हैं.

यदि आपकी जानकारी में कुछ और हों या इनमें शामिल नहीं हों तो कृपया बताएं. वैसे, इसे महज आंकड़े जुटाने की कवायद समझें.

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

477

हीरे की खरीद

एक धनी डच व्यापारी हीरों के अपने संग्रह को और अधिक समृद्ध करने के लिए एक विशेष प्रकार का हीरा खरीदना चाहता था। न्यूयॉर्क के एक प्रसिद्ध डीलर ने ऐसे हीरे को देखने और खरीदने के लिए उसे आमंत्रित किया। वह व्यापारी तत्काल न्यूयॉर्क रवाना हो गया। उस विक्रेता ने अपने सबसे अनुभवी और विशेषज्ञ सेल्समैन को हीरा बेचने के काम पर लगाया। सेल्समैने द्वारा हीरे की गुणवत्ता और खूबसूरती के संबंध में समस्त जानकारी प्राप्त होने के बाद भी व्यापारी ने हीरा न खरीदने का निर्णय लिया।

इसके पहले कि वह दुकान से बाहर जाता, दुकान के मालिक ने उससे कहा - "अगर आपके पास समय हो तो मैं उन हीरों को फिर से दिखाता हूं।" ग्राहक तैयार हो गया।

दुकान के मालिक ने सेल्समैन द्वारा कही गयी किसी भी बात को नहीं दुहराया। उसने हीरे को हाथ में लेकर देखा और सिर्फ इसकी खूबसूरती और विलक्षणता के बारे में बताया कि किस तरह यह अन्य हीरों से अलग है।

ग्राहक ने तत्काल वह हीरा खरीद लिया। हीरे को अपनी शर्ट की जेब में रखते हुए वह दुकान के मालिक से बोला - "मुझे आश्चर्य इस बात का है कि सेल्समैन के असफल होने के बाद भी आप यह हीरा मुझे बेचने में कैसे सफल हो गये?"

दुकान के मालिक ने उत्तर दिया - "वह सेल्समैन अपने काम में सर्वश्रेष्ठ है। उसे हीरों के बारे में अन्य लोगों की तुलना में अधिक जानकारी है। मैं उसके ज्ञान और दक्षता के कारण उसे मोटी तनख्वाह देता हूं। मैं खुशी-खुशी उसकी तनख्वाह दोगुनी करने को तैयार हूं यदि वह उन बातों को जान ले जो मैं जानता हूं। वह हीरों को पहचानता है और मैं हीरों को प्यार करता हूं।"

(किसी भी व्यापार को शुरू करने के पहले यह सबसे जरूरी है कि

आपको उस काम से लगाव हो।)

478

गाँव का सरपंच

भारत के गांवों में मुखिया को सरपंच कहा जाता है। इंद्रपाल एक गांव का सरपंच था। वह बहुत बुजुर्ग हो गया था और उसका स्वास्थ्य भी गिर रहा था। इसलिए उसने गांव के बुजुर्गों से कहा कि वह सरपंच के पद से सेवानिवृत्त होना चाहता है। नए सरपंच के नाम पर विचार हुआ। अंत में दो युवकों करन और महिपाल के नाम पर आम सहमति बनी। वे दोनों ही उस गांव के होनहार युवक थे। काफी सोच-विचार करने के बाद भी गांव के बुजुर्ग इस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए कि इनमें से किसे सरपंच चुना जाये। तब बुजुर्ग सरपंच ने उन दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

वह गांव दोनों ओर से मुख्य राजमार्ग से एक मील की दूरी पर था। गांव के सरपंच ने करन और महिपाल को बराबर धन देकर कहा कि तुम दोनों को गांव को दोनों ओर से राजमार्ग से जोड़ने के लिए कच्चे मार्ग का निर्माण करना है।

करन अगले ही दिन से काम में जुट गया। उसने एक ठेकेदार नियुक्त किया जो अपने साथ बड़ी संख्या में श्रमिकों को लेकर आया। उन्होंने सड़क के मार्ग में आने वाली झाड़ियों और पेड़ों का सफाया किया तथा कीचड़ को दबाकर मिट्टी को एक सा कर दिया। उनका मार्ग गांव के कबड्डी मैंदान के बीचोंबीच से गुजर गया। बेहतर सड़क के निर्माण के लिए धन कम पड़ गया। दो ही दिन में ठेकेदार ने करन को बताया कि सड़क बनकर तैयार हो गयी है।

दूसरी ओर महिपाल ने कुछ ही श्रमिकों को इस काम के लिए नियुक्त किया। उसने अपने साथ इस कार्य में हाथ बटाने के लिए गांव के नवयुवकों से श्रमदान की अपील की। सड़क आधी ही बनकर तैयार हुयी थी कि उसके समक्ष पुराना बरगद का पेड़ आ गया। महिपाल ने कहा -"हम इस पेड़ को नहीं काटेंगे और हम इस सड़क को पेड़ के किनारे से ही थोड़ा सा मोड़ लेंगे।" सभी नवयुवकों ने सड़क की मिट्टी को एक समान करने में अपना योगदान दिया तथा सड़क के दोनों ओर मेड़ भी बना दी। जब सड़क पूरी बनकर तैयार हो गयी तो महिपाल ने पाया कि कुछ धन अभी भी शेष है। वह शहतूत के 100 छोटे पेड़ खरीद कर लाया जिसे उसने नवयुवकों के साथ मिलकर दोनों ओर सड़क के किनारे लगा दिया। फिर भी थोड़ा सा धन बचा रह गया। तब महिपाल ने उस बचे हुए पैसों की मिठाई खरीद कर अपने उत्साही नवयुवकों की टीम में बांट दिया।

सड़क के पूरा होने का समाचार गांव के सरपंच को दिया गया। सरपंच दोनों सड़कों का मुआयना करने गए। वह करन के कार्य की उत्तमता से बहुत प्रभावित हुआ। उसके द्वारा बनवायी गयी सड़क बिल्कुल पेशेवर तरीके से कुशलतापूर्वक बनायी गयी थी।

बाद में वह दूसरी सड़क को भी देखने गया। अपने सरपंच की राय सुनने के लिए वहां सभी नवयुवक मौजूद थे। उन्होंने सरपंच को अपने द्वारा किया गया वृक्षारोपण दिखाया। बरगद के पेड़ को न काटने और उसके बगल से सड़क को मोड़ देने के कार्य से सरपंच विशेष रूप से प्रभावित हुए।

उसने नए सरपंच के रूप में महिपाल के नाम की घोषणा की और कहा -"किसी नेता का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण उसके द्वारा कराए गए कार्य का उत्तम होना नहीं बल्कि कार्य के प्रति उसका समर्पणभाव, विश्ववसनीयता और समूह भावना पैदा करना है। महिपाल इन सभी नवयुवकों का विश्वास जीतने में सफल रहा, इसीलिए सभी ने उसके कार्य का अनुसरण किया। वह कार्य के प्रति ईमानदार रहा और उसने एक टीम का गठन करने में पसीना बहाया। नेता अकेले ही नेता नहीं होता, वह व्यक्तियों का नेता होता है और इसीलिए वह और उसकी बात भरोसे के लायक होती है। केवल ऐसे ही गुणोंवाला व्यक्ति नेता बनने के योग्य होता है।"

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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पुरानी कहावत थी - जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि. अब मामला बदल गया है, या इसमें थोड़ा सा सुधार हो गया है. कवि का स्थान ब्लॉगर ने ले लिया है. ब्लॉगर अब हर जगह पाया जाता है. यहाँ तक कि कॉमिक्स में भी!

राज कॉमिक्स ने कुछ समय पहले एक नया कॉमिक्स - ब्लागर फाइटर टोड्स  छापा जिसका केंद्रीय पात्र एक ब्लॉगर है जो अपनी ब्लॉग पोस्टों के जरिए इंटरनेट में फिशिंग जाल फैलाकर लोगों को लूटता है. परंतु इस ब्लॉगर से जरा सी गलती हो जाती है. वो फाइटर टोड्स से भी अनजाने में पंगा ले लेता है. नतीजे में उसे मिलती है फाइटर टोड्स की मार और जेल की हवा.

फाइटर टोड्स इस कॉमिक्स में भी अपने विशिष्ट शैली के मजाहिया संवादों तथा बेवकूफी भरी हरकतों से पाठकों का मनोरंजन करने में सफल रहे हैं. फाइटर टोड्स के दीवानों को यह अंक भी पसंद आएगा.

 

इस कॉमिक्स को ई-कॉमिक के रूप में आप राज कॉमिक्स से खरीद सकते हैं कीमत है मात्र 12 रुपए.

और यदि इसका प्रिंट संस्करण चाहिए तो वह भी मात्र 17 रुपए में उपलब्ध है.

 

ब्लॉगर फाइटर टोड्स कॉमिक्स को ऑनलाइन खरीदने के लिए यहाँ जाएँ -

http://www.rajcomics.com/index.php?page=shop.product_details&flypage=flypage_rc.tpl&product_id=22213&category_id=21257&option=com_virtuemart&Itemid=2

तो जरा सावधान हो जाइए.

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लन्दन की एक अदालत द्वारा ललित मोदी के खिलाफ दिया गया फैसला सोशल मीडिया के अतिरेकियों के लिए कड़ी चेतावनी है। आईपीएल के पूर्व आयुक्त ललित मोदी ने वर्ष 2010 में टि्वटर पर न्यूजीलैंड के क्रिकेटर क्रिस केयन्र्स पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया था। तेज गेंदबाज केयन्र्स ने ललित मोदी पर लन्दन में मानहानि का मुकदमा दर्ज कर दिया, जिसका निर्णय 27 मार्च 2012 को आया है। लन्दन के उच्च न्यायालय ने क्रिस केयन्र्स की दलील को स्वीकार करते हुए ललित मोदी को चार लाख नब्बे हजार पौंड का मुआवजा अदा करने का आदेश दिया।

वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ व प्राचार्य प्रोफेसर हरबंश दीक्षित का लिखा पूरा आलेख पत्रिका में यहाँ  http://www.patrika.com/article.aspx?id=33266 पढ़ें

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

475

सर्वोत्तम गाउन

राजकुमारी अलीना को सुंदर वस्त्र पहनने का बहुत शौक था। उसके पास बहुत सारी सुंदर गाउन थीं। कुछ गाउन सिल्क की बना हुयीं थी और कुछ सैटिन की। ज्यादातर गाउनों में फीते, मनके और झालरें लगी हुयी थीं। उसके पास लगभग सभी रंगों की गाउन थीं। प्रत्येक गाउन विशेष रूप से उसके नाप की बनायी गयी थी। परिधान सिलने के लिए उसके पास दरजिनों की अपनी अलग टीम थी।

एक दिन राजकुमारी ने अपनी मुख्य सेविका से यूं ही कहा - "मेरी ज्यादातर गाउन दाहिने हाथ की कलाई पर गंदी हो गयी हैं। केवल कुछ गाउन ही गंदी नहीं हुयीं हैं। ऐसा कैसे संभव है?" मुख्य सेविका ने बिना दाग वाली सभी गाउन को अलग किया। उसने सभी दरजिनों को बुलाकर इसके बारे में पूछा। उसे ज्ञात हुआ कि ये सभी गाउन एक ही दरजिन द्वारा सिली गयीं हैं। उसने तत्काल उस दरजिन को बुलाया। अपने बुलावे से अचंभित वह दरजिन भागी-भागी आयी। मुख्य सेविका ने उससे कहा - "राजकुमारी जी का कहना है कि तुम्हारे द्वारा सिली गयी गाउनों की दाहिनी कलाई भोजन करते समय गंदी नहीं होती जबकि अन्य सभी गाउन दाहिनी कलाई पर गंदी हो जाती हैं। इसका क्या कारण है?"

दरजिन ने उत्तर दिया - "राजकुमारी की दाहिनी भुजा बांयी भुजा से एक इंच छोटी है। इसलिए मैंने गाउनों की दाहिनी भुजा एक इंच छोटी बनायी है ताकि यह सही जगह रहे, न कि नीचे लटकती रहे।"

सेविका की आँखें आश्चर्य से फटी रह गयीं। वह उस दरजिन को राजकुमारी के पास ले गयी। उस लड़की ने राजकुमारी के हाथों की फिर से नाप ली। वास्तव में दाहिनी भुजा छोटी पायी गयी। केवल इसी लड़की ने यह अंतर देख पाया था।

विस्तार से दे ध्यान देना! विस्तार से दे ध्यान देना! विस्तार से दे ध्यान देना! विस्तार में ही ईश्वर का वास है।

 

476

सुअर और गाय

एक बार की बात है किसी गांव में एक बहुत धनी और कंजूस व्यक्ति रहता था। सभी गांव वाले उससे बहुत नफरत करते थे। एक दिन उस व्यक्ति ने गांव वालों से कहा - "या तो तुम लोग मुझसे ईर्ष्या करते हो या तुम लोग धन के प्रति मेरे दीवानेपन को ठीक से नहीं समझते, केवल मेरा ईश्वर ही जानता है। मुझे पता है कि आप लोग मुझसे नफरत करते हैं। लेकिन जब मैं मरूंगा तो अपने साथ यह धन नहीं ले जाऊंगा। मैं यह धन अन्य लोगों के कल्याण के लिए छोड़ जाऊंगा। तब आप सभी लोग मुझसे खुश हो जायेंगे।"

उसकी ये बात सुनने के बाद भी लोग उसके ऊपर हँसते रहे।

गांव वाले उसके ऊपर जरा भी विश्वास नहीं रखते थे। वह फिर बोला - "मैं क्या अमर हूं? मैं भी दूसरे लोगों की ही तरह मरूंगा। तब यह धन सभी के काम आएगा।" उस व्यक्ति को यह समझ में नहीं आ रहा था कि लोग उसकी बातों पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे हैं।

एक दिन वह व्यक्ति टहलने गया हुआ था कि अचानक जोरदार बारिश शरू हो गयी। उसने एक पेड़ के नीचे शरण ली। पेड़ के नीचे उसने एक सुअर और गाय को खड़ा पाया। सुअर और गाय के मध्य बातचीत चल रही थी। वह व्यक्ति चुपचाप उनकी बातें सुनने लगा।

सुअर, गाय से बोला - "ऐसा क्यों है कि सभी लोग तुमसे प्रेम करते हैं और मुझसे नफरत? जब मैं मरूंगा तो मेरे बाल, चमड़ी और मांस लोगों के काम में आयेंगे। मेरी तीन-चार चीजें काम की हैं जबकि तुम सिर्फ एक चीज ही देती हो - दूध। तब भी सब लोग हर वक्त तुम्हारी ही सराहना करते रहते हैं, मेरी नहीं।"

गाय ने उत्तर दिया - "तो सुनो, मैं लोगों को जिंदा रहते दूध देती हूं। इस कारण सभी लोग मुझे उदार समझते हैं। और तुम सिर्फ मरने के बाद ही काम आते हो। लोग भविष्य में नहीं वर्तमान में यकीन रखते हैं। सीधी सी बात है, यदि तुम जिंदा रहने के दौरान ही लोग के काम आओ तो लोग तुम्हारी भी तारीफ करेंगे।"

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

472

मन में इच्छा रखना वैसा ही है जैसे मरे हुए चूहे को पकड़ना

एक चील अपनी चोंच में मरे हुए चूहे को पकड़कर उड़ गयी। जैसे ही अन्य चीलों ने उस चील को चूहा ले जाते हुए देखा, वे उसके आसपास मडराने लगीं और उस पर हमला शुरू कर दिया। चीलों ने उसे चोंच मारना शुरू कर दिया जिससे वह लहुलुहान हो गयी। हालाकि वह इस हमले से अचंभित थी परंतु उसने चूहे को नहीं छोड़ा। लेकिन अन्य चीलों के लगातार हमले के कारण चूहा उसकी पकड़ से छूट गया। जैसे ही वह चूहा उसकी पकड़ से छूटा, उन सभी चीलों ने, जो उसके आसपास मडरा रही थीं, सारा ध्यान उस चूहे पर लगा दिया। वह चील एक पेड़ पर बैठ गयी और सोचने लगी।

उसने सोचा - पहले मैंने सोचा कि बाकी सभी चीलें मेरी दुश्मन थीं लेकिन जैसे ही मैंने चूहे को छोड़ा वे सभी मुझसे दूर चली गयीं। इसका मतलब यह है कि उनकी मुझसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। वह चूहा ही उनके हमले का कारण था। गलती मेरी थी कि मैं चूहे को अपनी चोंच में दबाये रही। मुझे उस चूहे को पहले ही छोड़ देना चाहिए था लेकिन मैं बेवकूफ यह सोच रही थी कि वे सभी मुझसे जाराज़ हैं। 

स्वामी रामकृष्ण यह कहानी प्रायः सुनाते थे और कहा करते थे कि मन में इच्छा रखना वैसा ही है जैसे मरे हुए चूहे को पकड़ना।


473

सबसे अच्छी दवा

एक नौजवान लड़का प्रायः निराश और दुःखी रहा करता था। वह हमेशा चुप और अकेला रहता। वह अपने दोस्तों के साथ खेलना और रहना भी नहीं चाहता था। वह तो सिर्फ अकेले बैठकर सुबकना चाहता था।
उसकी माँ उसे यह डॉक्टर के पास ले गयीं। उन्होंने डॉक्टर को सारी समस्यायें विस्तार से बतायीं। उन्हें यह चिंता थी कि उनका पुत्र अवसाद का शिकार हो रहा है। डॉक्टर ने भलीभांति उस नौजवान का परीक्षण किया और सब कुछ सामान्य पाया। माँ को संतुष्ट करने के लिए डॉक्टर ने कुछ दवायें लेने का परामर्श दिया। लेकिन वास्तव में डॉक्टर ने उसे बीमारी की नहीं बल्कि ताकत की दवायें ही लिखी थीं। इसके बाद वह डॉक्टर उस महिला को एक किनारे ले गया और बोला - हालाकि मैंने बच्चे के लिए दवायें लिखीं हैं परंतु उसे दवाओं से ज्यादा प्यार की जरूरत है। आप उसे अधिक से अधिक प्यार दें। यही उसके लिए सबसे अच्छी दवा होगी। मुझे विश्वास है कि इससे वह जल्द ठीक हो जाएगा।

चिंतित महिला ने प्रश्न किया - और यदि इसका भी असर नहीं हुआ तो?

डॉक्टर ने उत्तर दिया - तब खुराक बढ़ाकर दोगुनी कर देना।


474

प्रेम का व्यवहार

एक रात मेरे घर एक व्यक्ति आया और बोला - ॑एक परिवार है जिसमें आठ बच्चे हैं और वे कई दिन से भूखे हैं।  मैंने अपने साथ खाने का कुछ सामान लिया और वहाँ पहुंचा। जब मैं उस घर पर पहुंचा तो मैंने बच्चों के भूख से मुरझाये हुए चेहरों को देखा। उनके चेहरे पर दुःख या उदासी नहीं बल्कि भूख से पैदा हुआ गहरा दर्द दिखायी दे रहा था। मैंने उन बच्चों की माँ को थोड़ा सा चावल दिया। उसने आधा चावल बच्चों को खाने के लिए दिया और आधा चावल अपने साथ लेकर चली गयी। जब वह वापस आयी तो मैंने उससे पूछा कि वह कहाँ गयी थी?

उसने सीधा सा उत्तर दिया - अपने पड़ोस में गयी थी, वे भी भूखे हैं?

मुझे यह सुनकर जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि गरीब लोग उदार होते ही हैं। लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का था कि उसे यह कैसे पता चला कि उसके पड़ोसी भी भूखे हैं। सामान्यतः जब हम कष्ट में होते हैं तो हमें सिर्फ अपने ही कष्ट दिखायी देते हैं, दूसरों के नहीं।

मेरे मित्र तारिक भाई ने एकबार मुझसे कहा था - वह कभी सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जो अपने पड़ोसियों के भूखा रहते हुए भी भरपेट भोजन करे। जरूरतमंद की तलाश करना तुम्हारा काम है। कोई स्वयं तुम्हारे आगे हाथ फैलाने नहीं आएगा। 

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

471

जमनालाल बजाज पर लिखित पुस्तक से कुछ अंश

जमनालाल बजाज ने व्यापार में ईमानदारी को हमेशा सर्वोपरि मूल्य माना। शुरूआत में ही उन्होंने ईमानदारी और सत्यनिष्ठा पर आधारित आचरण नियम बनाए और हमेशा कड़ाई से उनका पालन किया।

एक बार उन्हें पता चला कि उनका एक अभिकर्ता रुई का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें गीला कर देता था। जमनालाल ने तत्काल उस अभिकर्ता और प्रबंधक को नौकरी से निकाल दिया। कई लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि यह तो सारी दुनिया में चलता है और यदि उन्होंने भी ऐसा नहीं किया तो कंपनी को भारी घाटा होगा। लेकिन जमनालाल अडिग रहे। "घाटा होता है तो होता रहे परंतु हम सत्य और ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ेंगे।"

उनके प्रबंधकगण शुरूआत में तो उनके फैसले से नाराज़ हुए लेकिन जल्द ही उन्होंने यह पाया कि जैसे ही जमनालाल की ईमानदारी का समाचार चारों ओर फैला, लोग अधिक मूल्य देकर भी उनसे सामान खरीदना चाहते थे।

जमनालाल बजाज ने कभी बाजार के दावपेंचों को नहीं अपनाया। उन्होंने वहीं चीजें बेचीं जो वास्तव में उन्होंने खरीदी थीं।

*****

उस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे। जमनालाल ने समाचारपत्रों में उनके बारे में बहुत पढ़ा हुआ था। वे अक्सर सोचा करते, "यदि वे कभी भारत आयेंगे, तो मैं उनसे जरूर संपर्क करूंगा।"

वर्ष 1915 में गांधीजी भारत आए। उन्होंने अहमदाबाद में आश्रम स्थापित किया। जमनालाल अक्सर आश्रम जाया करते और प्रातःकाल व संध्या प्रार्थना में भाग लेते। उनमें और गांधीजी के मध्य व्यक्तिगत परिचय विकसित हो गया था। जमनालाल ने यह महसूस किया कि गांधीजी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। वे जो उपदेश देते हैं, उसका स्वयं भी पालन करते हैं। जमनालाल ने भी गांधीजी के आदर्शों को अपनाना शुरू कर दिया।

घर में, उनकी पत्नी जानकी देवी रोज प्रातःकाल उनके पैर धोया करती थीं और पैर धोने के बाद उस जल को पवित्र मानते हुए कुछ बूंदों से आचमन किया करतीं। वे उनकी जूठी थाली में भी भोजन किया करतीं। एक दिन जमनालाल ने उनसे कहा,"जानकी! मैं तुमसे दो चीजों के बारे में बात करना चाहता हूं।"

जानकी देवी ने उनकी ओर पूछताछ भरी नज़रों से देखा। जमनालाल बोले - "पहली बात तो यह कि तुम मेरी जूठी थाली में खाना बंद करो। जूठी थाली में मक्खियां बैठती हैं और यह स्वच्छ नहीं होती। उसमें खाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। ...और दूसरी बात यह कि मेरे पैर धोने के बाद निकले पानी को पीना बंद करो। मुझे यह कतई पसंद नहीं है।"

जानकी देवी ने जूठी थाली में तो खाना बंद कर दिया परंतु पति के चरणों को धोने से निकले पानी से आचमन करना बंद नहीं किया। किसी अन्य व्यक्ति को अपनी बात मानने के लिए विवश करना न चाहने के कारण उन्होंने इस मामले को फिर नहीं उठाया।

एक दिन घर में कई मेहमान आए हुए थे। उनमें से एक ने अपनी कमर पर चांदी की मोटी सी चेन पहन रखी थी। जानकी देवी को याद आया कि उनके घर में भी सोने की कई चेनें रखी हुयी हैं। उन्होंने तत्परतापूर्वक जमनालाल से कहा,"आप भी सोने की चेन क्यों नहीं पहनते?"

उनके उत्तर से जानकी देवी के उत्साह पर तुषारापात हो गया। जमनालाल ने उत्तर दिया, "जानकी, स्वर्ण ईश्वर का प्रतीक है। क्या किसी को कमर के नीचे सोना पहनना चाहिए? बल्कि बापू तो कहते हैं कि सोना बुराईयों की जड़ है। यह दूसरों में ईर्ष्याभाव पैदा करता है। और इसके चोरी हो जाने का भी भय होता है। जहां इसे पहना जाता है, शरीर के उस भाग पर मैल एकत्रित हो जाती है। नाक और कान से दुर्गंध आने लगती है। इसके अलावा आभूषणों को खरीदने में खर्च हुआ पैसा ताले में बंद रहता है जिससे उसके ब्याज की हानि होती है। मैं तो यह कहूंगा कि तुम भी अपने सभी आभूषणों को उतार फेंको।"

जानकी देवी हमेशा अपने पति की इच्छाओं का पालन करती थीं। भले ही वे स्वयं सहमत न हो, परंतु वे पति की इच्छाओं का अवश्य पालन करती थीं। उन्होंने आंसू बहाते हुए अपने शरीर पर से एक-एक आभूषणों को उतारना प्रारंभ किया। अंत में सिर्फ पैर की अंगुली में पहनने वाली बिछूड़ी ही शेष बची। तब उन्होंने पूछा - "क्या मैं सिर्फ यह पहने रह सकती हूं? यहां तक कि गरीब से गरीब महिला भी इसे पहने रहती है।"

जमनालाल ने कोई उत्तर नहीं दिया। जानकीदेवी ने अंतिम आभूषण भी उतार दिया।

इसके बाद उन्होंने कभी आभूषण नहीं पहने। समय के साथ-साथ जमनालाल ने पर्दा प्रथा से भी छुटकारा पा लिया।

उन्‍होंने घर पर ही सूत कातना और खादी पहनना शुरू कर दिया। खादी की सफेद मोटी साड़ी पहनने के कारण जानकी देवी को प्राय: अपने रिश्‍तेदारों के व्‍यंग्‍य सुनने पड़ते। लेकिन वे उन व्‍यंग्‍यों पर ध्‍यान नहीं देती थीं। उनके लिए पति की इच्‍छा ही सर्वोपरि थी।

जमनालाल ने मन ही मन गांधीजी को अपने पिता के तुल्‍य मान लिया था और उनकी यह उत्‍कट इच्‍छा थी कि गांधीजी वर्धा आयें और रहें। उन्‍होंने कई बार गांधी जी से इस बारे में चर्चा की, लेकिन गांधी जी नहीं माने। लेकिन फिर भी जमनालाल को यह विश्‍वास था कि वे एक न एक दिन गांधीजी को वर्धा अवश्‍य लेकर आयेंगे।

पिता-पुत्र का यह संबंध अंतत: नागपुर में स्‍थापित हुआ। जमनालाल ने व्‍यापार के साथ-साथ राजनीति में भी रुचि लेनी प्रारंभ की।

*****

नागपुर में एक घटना हुयी। जमनालाल को यह पता चला कि हिंदू और मुस्‍लिमों के बीच दंगा छिड़ गया है। दंगाईयों ने जमनालाल को वहां से जाने को कहा परंतु जमनालाल घायलों को छोड़कर कैसे जा सकते थे। किसी ने उनके ऊपर एक पत्‍थर फेंका जो उनकी बाजू में लगा। उनकी बाजू से रक्‍त बहता देखकर दंगाई कुछ शांत हुए। दंगा रुक गया।

जमनालाल को बाजु में टांके लगवाने पड़े। इस संबंध में गांधी जी द्वारा लिखे गए पत्र ने उनके लिए मलहम का काम किया।

“तुम्‍हारे घायल होने के समाचार से मैं जरा भी दु:ख नहीं हुआ। मेरा विश्‍वास है कि हम जैसे कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। नफरत का यह ज़हर इतनी तेजी से और व्‍यापक तरीके से फैला है कि हमारे बीच के कुछ पवित्र व्‍यक्‍तियों की कुर्बानी दिए बगैर इस विपत्‍ति से बचा नहीं जा सकता।”

कैसे परोपकारी विचार थे ये!

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साबरमती आश्रम में अपने सपरिवार प्रवास के दौरान ही उन्‍होंने अपनी सबसे बड़ी बेटी कमला का विवाह संपन्‍न किया। यह विवाह सादगी की दृष्‍टि से उल्‍लेखनीय था। दुल्‍हन कमला औरा दूल्‍हे रामेश्‍वर प्रसाद पूरे विवाह कार्यक्रम के दौरान खादी वस्‍त्र धारण किए रहे। इस विवाह में कोई दहेज लेन-देन, बैंड-बाजा और तड़क-भड़क देखने को नहीं मिली। वर-वधु को आशीर्वाद देने के लिए गांधी जी स्वयं इस विवाह में उपस्थित थे।

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जमनालाल की चिता पर जानकीदेवी सती होना चाहती थीं। लेकिन गांधीजी ने उन्हें मना कर दिया। पलायन करने में कौन सी बहादुरी है? वास्तव में सती (सच्ची नारी और समर्पित पत्नी) होना बिल्कुल अलग चीज है। शरीर को भस्म करने में कौन सी समझदारी है? यह शरीर तो तुच्छ और धूल के समान है। सती होने का तात्पर्य तो सभी कमजोरियों और बुराईयों से निजात पाना है। इनको जमनालाल की चिता पर ही स्वाहा कर दो और उन्हें खाक हो जाने दो। जो शेष बचेगा वही सच्चा सोना होगा। सोने को कौन जला सकता है? इसे तो भगवान कृष्ण पर न्योछावर किया जा सकता है।

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गांधीजी ने कमलनयन से कहा - हिंदू धर्म के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र अन्य पुत्रों की ही भांति पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है लेकिन वह परिवार की आध्यात्मिक विरासत एवं पिता द्वारा अपनायी गयी जीवनशैली और दर्शन का का संरक्षक भी होता है। इसलिए मैं चाहता हूं कि यदि तुम्हारी इच्छा हो तो व्यापार करो, तुम्हारी इच्छा हो तो धन कमाओ, लेकिन जमनालाल की तरह समस्त जन कल्याण के लिए अपनी संपत्ति के ट्रस्टी बनकर रहो।

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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जैसे पश्चिम में ब्लॉड चुटकुले प्रसिद्ध हैं, ठीक उसी तरह भारतीयों में संता-बंता के चुटकुले प्रसिद्ध हैं. चुटकुले संता-बंता से शुरू होते हैं तो खत्म भी वहीं होते हैं. सरदारजी पर और या संता-बंता पर किसी ने चुटकुला सुनाना शुरू किया नहीं और इधर ठहाके लगे नहीं. आप कोई चुटकुला सुनाने की शुरूआत करते हैं एक बार एक सरदार जी.. या फिर एक बार संता... और आप देखेंगे कि आपके श्रोताओं का पूरा ध्यान आप की ओर लग गया है. उनके फनी बोन में गुदगुदी की शुरूआत हो गई है. और अगर आपका पंचलाइन खराब निकला, चुटकुले सुनाने की शैली भी धारदार नहीं है, तब भी संता-बंता और सरदार जी के चुटकुलों से यह सुनिश्चित हो जाता है कि श्रोता-पाठक ठहाके तो लगाएंगे ही.

भारत के सबसे बड़े कॉलम लेखक खुशवंत सिंह, जो स्वयं सरदार जी हैं, अपने लेखों के अंत में जे पी सिंह काका जैसे लोगों द्वारा भेजे संता-बंता और सरदारजी के चुटकुले शामिल करते रहे हैं और उनके स्थापित होने और लोकप्रिय होने में इन चुटकुलों का बड़ा हाथ रहा है. उन्होंने इन चुटकुलों के कई संग्रह प्रकाशित करवाए जो बेस्ट सेलर रहे हैं, और बकौल खुशवंत सिंह, भारत में चुटकुले गर्म पकौड़ों की तरह बिकते हैं. और यदि वे संता-बंता और सरदार जी चुटकुले हों तो उनमें चटनी मुफ़्त में मिलती है.

चुटकुलों का भी अपना दर्शन होता है. दरअसल जब कोई चुटकुला सुनाया जाता है तो भले ही हम उसके प्रकट और प्रत्यक्ष पंच लाइन पर ठहाके लगा लें, मगर जब उस चुटकुले के दर्शन पर थोड़ा गंभीर चिंतन मनन करें तो पाएंगे उनमें आमतौर पर बड़ी गंभीर बातें कही गई होती हैं. और जितनी धीर गंभीर बात उसमें होगी, चुटकुले का पंचलाइन उतना ही गहरा होगा.

दिल्ली में पले-पढ़े निरंजन रामकृष्ण आजकल अमरीका में रहते हैं. वे राजनीति और समसामयिक विषयों पर लिखते हैं. उनके लेख अमरीका और भारत के प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित होते रहे हैं. साथ ही उन्होंने बैंक में भी कार्य किया है और दो सॉफ़्टवेयर कंपनियाँ भी चलाते हैं. निरंजन ने संता-बंता और सरदार जी चुटकुलों के दर्शन पर एक शानदार किताब लिखी है – बन्ताइज्म – द फ़िलॉसफी ऑफ सरदार जोक्स.

निरंजन ने संता-बंता चुटकुलों के दर्शन पर बात कही है. उन्होंने अपनी किताब में कुछ चुनिंदा संता-बंता और सरदारजी चुटकुलों को नए सिरे से सुनाया है और अंत में उन्होंने उस चुटकुले पर अपनी कमेंटरी मारी है. दूसरे शब्दों में उन्होंने उस चुटकुले के दर्शन पर अपनी मीमांसा, अपनी टीका दी है.

एक उदाहरण-

चुटकुला : समानता

“राम, कृष्ण, यीशुमसीह, मुहम्मद, नानक, बुद्ध, महावीर और महात्मा गांधी में क्या समानता है?” शिक्षक ने पूछा.

“ये सभी महानुभाव छुट्टी के दिन पैदा हुए थे!” बंता सिंग ने जवाब दिया.

टीका

आपको भले ही यह लगे कि बंता को सिर्फ और सिर्फ छुट्टियाँ ही दिखाई देती हैं या फिर बंता इन महापुरुषों/दैवपुरुषों को पढ़ाई-लिखाई में छुट्टी की वजह से याद करता या संदर्भित कर पाता है, मगर यह भी सत्य झलकता है कि ये सभी महापुरुष और दैवपुरुष काल के गाल में समा चुके हैं. नश्वर संसार में अमरता कुछ नहीं है, और जो बचता है वह सिर्फ नाम और काम. ग्रे का मर्सिया भी यही कहता है –

पद प्रतिष्ठा और धनबल,

सुंदरता और यौवन

सभी छिन जाते हैं एक दिन

रास्ते सभी जाते हैं समाधि की ओर.

बंता सिंग इन्हीं बातों को सीधे सादे, मासूम शब्दों में बता रहे हैं.

तो आपने देखा कि दो पंक्ति के सीधे-सादे चुटकुले में कितनी धीर गंभीर बातें कही गई हैं. निरंजन ने हजारों ऐसे सरदारजी चुटकुलों में खोज बीन कर छांट कर चुटकुलों का अच्छा खासा संग्रह एकत्र किया है और उन्हें अपनी टीका समेत पेश किया है. कुछ चुटकुले सुने सुनाए हैं तो बहुत से आपको नए भी मिलेंगे. चुटकुलों पर नया दर्शन जानने के लिए इस किताब को तो पढ़ना ही चाहिए, यदि आपको सिर्फ और सिर्फ सरदारजी चुटकुले पढ़ने में ही रुचि है तब भी कुछ अच्छे संता-बंता और सरदारजी चुटकुलों की खातिर इस किताब को आप पढ़ सकते हैं.

कहीं कहीं टीका जटिल और लंबी प्रतीत होती है, मगर जीवन भी यदा कदा लंबा, उबाऊ और जटिल प्रतीत होता है, जबकि वस्तुतः होता नहीं है. जीवन तो जीवन ही होता है – हर पल. समस्या उसे जीने में होती है.

चुटकुला प्रेमी जनता के लिए बुरी तरह से अनुशंसित. रीड इट. बाइ-बोरो-ऑर स्टील.

किताब फ्लिपकार्ट/इन्फ़ीबीम में उपलब्ध है. 140 रुपए की किताब इन्फ़ीबीम में 94 रुपए में 33% डिस्काउंट में उपलब्ध है. जो कि बेहद वाजिब कीमत प्रतीत होती है. पॉकेट बुक आकार में किताब का गेटअप, लेआउट, छपाई और कागज शानदार है. हाँ, किताब अंग्रेज़ी भाषा में है. निरंजन से अनुरोध है कि वे इसका हिंदी रूपांतर भी जल्द निकालें.

 

शीर्षक:
बन्ताइज्म
प्रकाशक:
रूपा पब्लिकेशन्स इंडिया प्रा.लि., 7/16 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
लेखक:
निरंजन रामकृष्णन
पेपरबैक संस्करण
ISBN: (आईऍसबीऍन:)
8129118890
EAN:
9788129118899
पृष्ठों की संख्या: 168

कीमत – रु 140

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सेना के मुखिया को जबरन छुट्टी पर भेजने की बात की जा रही है. पर आप यदि अपने इधर आजू बाजू देखेंगे तो पाएंगे कि जनता में से बहुतों को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने की जरूरत है. आइए, कुछ पड़ताल करें.

  • · सबसे पहले तो अपने भीतर झांकें. हममें से बहुत से चिट्ठाकारों और रचनाकारों को स्वयं-जबरन-छुट्टी (सेल्फ-फोर्स्ड-लीव) पर नहीं चले जाना चाहिए? इंटरनेट पर कचरा शायद कुछ कम फैलेगा. तो देर किस बात की!
  • · देश के नेताओं को जबरन छुट्टी नहीं भेज देना चाहिए? कुर्सी के लालच में जोड़तोड़ और भ्रष्टाचार के किस्से शायद कुछ कम सुनाई दें!
  • · देश की तमाम पुलिस फोर्स को जबरन छुट्टी पर नहीं भेज देना चाहिए? प्रतिफल में भ्रष्टाचार में भारत की रैंकिंग शायद थोड़ी सी सुधर जाए.
  • · देश के अफसरों को जबरन छुट्टी पर नहीं भेज देना चाहिए? नतीजतन फ़ाइलों के लालफ़ीते खुलेंगे और उनमें लगी धूल शायद कुछ झड़ जाए.
  • · देश की माताओं बहनों को भी घरू कार्य से जबरन छुट्टी पर भेजे जाने की जरूरत है. हमारे जैसे पुरुषों की अक्ल तो उनकी “मायके जाने की धमकी” से ही ठिकाने लग जाती है.
  • · और अंत में, दुनिया भर के पंडितों, मौलवियों, पादरियों, धर्म-गुरुओं को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने की जरूरत है. कम से कम धरती पर वापस भाईचारा और मानवता तो स्थापित होने की गुंजाइश दिखेगी.

इस अपूर्ण सूची को परिपूर्ण बनाने में आप भी अपना योगदान दे सकते हैं. (जबरन छुट्टी पर जाने से पहले यह नेक काम तो जरूर करते जाइए!)

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