टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

November 2011

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

(273)

मूल्यवान हार

नसरूद्दीन हौजा के पास अपने दादा के दिए हुए बीस दुर्लभ मोती थे। एक दिन वह एक सुनार के पास गया और बोला कि वह इन मोतियों का एक हार बनवाना चाहता है। सुनार एक लालची व्यक्ति था।

सुनार ने नसरूद्दीन से कहा - "ठीक है, पर पहले मैं तुम्हारे सामने इन मोतियों को गिन लूँ।"

मोती गिनते समय उसने अपने हाथ की सफाई दिखाते हुए एक मोती अपनी हथेली में छुपा लिया और बोला - "ये उन्नीस हैं।"

नसरूद्दीन ने सुनार को मोती छुपाते हुए देख लिया लेकिन वह उसे जाहिर करना नहीं चाहता था। इसलिए वह बोला - "एक बार मैं भी गिन लूँ।"

नसरूद्दीन ने मोतियों की गिनती की और सुनार की ही तरह हाथ की सफाई दिखाते हुए एक और मोती कम कर दिया और बोला - "हाँ ये उन्नीस ही हैं।"

सुनार बोला - "मैं कल तक हार बना दूंगा। तुम कल हार ले जाना।"

बाद में जब शाम को सुनार ने मोतियों की गिनती की तो उसे पता चला कि मोती तो सिर्फ अठारह ही हैं। वह अपने आप से बोला - "लेकिन नसरूद्दीन ने तो मेरे सामने उन्नीस मोती गिने थे। अब मैं क्या करूँ। किसी और मोती से तो काम भी नहीं चलेगा।"

इस तरह सुनार के पास चुराये हुए मोती को ही हार में लगाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा।

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(274)

सुरक्षा का उपाय

एक बार नसरूद्दीन ने एक लड़के से उसके लिए कुँऐं से पानी खींचने का अनुरोध किया। जैसे ही वह लड़का कुँए से पानी खींचने को झुका, नसरूद्दीन ने उसके सिर में जोर से थप्पड़ मारा और कहा, "ध्यान रहे। मेरे लिए पानी खींचते समय घड़ा न टूटे।"

वहाँ से गुजरते हुए एक राहगीर ने यह सब देखा तो उसने नसरूद्दीन से कहा - "जब उस लड़के ने कोई गल्ती ही नहीं की तो तुमने उसे क्यों मारा?"

नसरूद्दीन ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया - "यदि मैं यह चेतावनी घड़े के फूटने के बाद देता तो उसका कोई फायदा नहीं होता।"

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28

कौन बड़ा?

एक बार एक आश्रम के दो शिष्य आपस में झगड़ने लगे – मैं बड़ा, मैं बड़ा.

झगड़ा बढ़ता गया तो फैसले के लिए वे गुरु के पास पहुँचे.

गुरु ने बताया कि बड़ा वो जो दूसरे को बड़ा समझे.

अब दोनों नए सिरे से झगड़ने लगे – तू बड़ा, तू बड़ा!

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29

मैं तुझे तो कल देख लूंगा

सूफी संत जुनैद के बारे में एक कथा है.

एक बार संत को एक व्यक्ति ने खूब अपशब्द कहे और उनका अपमान किया. संत ने उस व्यक्ति से कहा कि मैं कल वापस आकर तुम्हें अपना जवाब दूंगा.

अगले दिन वापस जाकर उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हें जवाब देने की जरूरत ही नहीं है.

उस व्यक्ति को बेहद आश्चर्य हुआ. उस व्यक्ति ने संत से कहा कि जिस तरीके से मैंने आपका अपमान किया और आपको अपशब्द कहे, तो घोर शांतिप्रिय व्यक्ति भी उत्तेजित हो जाता और जवाब देता. आप तो सचमुच विलक्षण, महान हैं.

संत ने कहा – मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है कि यदि आप त्वरित जवाब देते हैं तो वह आपके अवचेतन मस्तिष्क से निकली हुई बात होती है. इसलिए कुछ समय गुजर जाने दो. चिंतन मनन हो जाने दो. कड़वाहट खुद ही घुल जाएगी. तुम्हारे दिमाग की गरमी यूँ ही ठंडी हो जाएगी. आपके आँखों के सामने का अँधेरा जल्द ही छंट जाएगा. चौबीस घंटे गुजर जाने दो फिर जवाब दो.

क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति पूरे 24 घंटों के लिए गुस्सा रह सकता है? 24 घंटे क्या, जरा अपने आप को 24 मिनट का ही समय देकर देखें. गुस्सा क्षणिक ही होता है, और बहुत संभव है कि आपका गुस्सा, हो सकता है 24 सेकण्ड भी न ठहरता हो.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

272

हनुमान की भक्ति

राम के राज्याभिषेक के बाद सीता एवं राम के तीनों भाईयों ने बैठक करके आपस में यह तय किया कि हनुमान को राम की सेवा से मुक्ति दे देनी चाहिए। वे यह चाहते थे कि अब तक जो कार्य हनुमान किया करते थे, उन तीनों को सौंप दिये जायें। उनका ऐसा मानना था कि हनुमान को पहले ही राम की सेवा का पर्याप्त अवसर प्राप्त हो चुका है।

अतः जहां तक संभव हुआ उन्होंने अपनी याददाश्त के अनुसार हनुमान द्वारा सुबह से लेकर शाम तक किए जाने वाले छोटे से छोटे कार्य की सूची बनायी और उन कार्यों को आपस में बांट लिया। हनुमान की उपस्थिति में उन्होंने राम के समक्ष कार्यों की यह सूची प्रस्तुत की।

राम ने इस नयी प्रक्रिया के बारे में धैर्य से सुना, सूची को पढ़ा और मुस्कराते हुए अपना स्वीकृति प्रदान की। उन्होंने हनुमान से कहा कि उनके द्वारा किए जाने वाले सभी काम अब इन लोगों में बांट दिए गए हैं तथा अब वे आराम कर सकते हैं। हनुमान ने अनुरोध किया कि उन्हें इस सूची को पढ़कर सुनाया जाये। जब उन्हें सूची को पढ़ कर सुना दिया गया तो हनुमान ने उसमें एक चूक पायी और कहा कि इसमें जम्हाई लेते समय चुटकी बजाने के कार्य का उल्लेख नहीं है।

उन्होंने प्रार्थना की कि निस्संदेह एक राजा के रूप में राम को यह कार्य स्वयं नहीं करना चाहिए। यह काम तो किसी सेवक द्वारा ही किया जाना चाहिए। उनका तर्क सुनकर राम ने यह कार्य हनुमान को सौंपने की सहमति प्रदान की।

यह कार्य हनुमान के लिए अत्यंत भाग्यशाली सिद्ध हुआ क्योंकि इस कार्य ने अपने स्वामी श्रीराम के समक्ष दिनभर हनुमान की उपस्थिति को आवश्यक बना दिया। आखिर कोई यह कैसे पता लगा सकता था कि उन्हें जम्हाई कब आएगी?

और इस तरह हनुमान को दिनभर राम का सुंदर चेहरा निहारने का सुअवसर प्राप्त हो गया। अब न तो वे एक पल के लिए राम से दूर जा सकते थे और न ही आराम कर सकते थे।

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26
एक मिनट की भी देरी किसलिए?
एक बार एक जंगल में जबरदस्त आग लग गई और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलकर खाक हो गया. जंगल में एक गुरु का आश्रम था. जब जंगल की आग शांत हुई तो उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि जंगल को फिर से हरा भरा करने के लिए देवदार का वृक्षारोपण किया जाए.


एक शक्की किस्म के चेलने ने शंका जाहिर ही - मगर गुरूदेव, देवदार तो पनपने में बरसों ले लेते हैं.


यदि ऐसा है तब तो हमें बिना देरी किए तुरंत ही यह काम शुरू कर देना चाहिए - गुरू ने कहा.
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27
सीमित शब्द
एक बार एक गुरुकुल के कुछ छात्र लाओ त्जू की इस सूक्ति पर विचार-विमर्श कर रहे थे -
"जिन्हें मालूम है, वे कहते नहीं,
जो कहते हैं उन्हें मालूम नहीं."


इस सूक्ति का सटीक अर्थ जब उनमें से कोई नहीं बता पाया तो वे इसका अर्थ जानने अपने गुरू के पास पहुँचे.


गुरु ने पूछा - "तुममें से कितने लोग गुलाब की खुशबू के बारे में जानते हो"


सभी शिष्यों ने सहमति में सर हिलाया.


यदि तुम सबको यह मालूम है तो मुझे इसे शब्दों में समझाओ.


सबके सब चुप थे क्योंकि वे इसे शब्दों में कह नहीं सकते थे...!!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

271

शिकार

एक दिन सुल्तान ने नसरुद्दीन को अपने साथ भालू के शिकार पर चलने को कहा। नसरुद्दीन जाना नहीं चाहता था पर सुल्तान को खुश करने के लिए वह साथ में जाने को तैयार हो गया।

शिकार पर गया दल जब शाम को लौटा तो सभी लोग उनसे यह जानने को उत्सुक थे कि शिकार कैसा रहा और उन्होंने नसरुद्दीन से इसके बारे में पूछा।

नसरुद्दीन बोला - "बेहतरीन" !

लोगों ने फिर उत्सुकतावश पूछा - "तुमने कितने भालू मारे?"

"एक भी नहीं "- नसरुद्दीन बोला।

"तो तुमने कितने भालुओं का पीछा किया?"- उन्होंने पूछा।

"एक भी नहीं " - नसरुद्दीन फिर बोला।

"तो तुम्हें कितने भालू दिखायी दिए?"- उन्होंने पूछा।

"एक भी नहीं "- नसरुद्दीन बोला।

"तो तुमने कितने भालुओं का पीछा किया?"- उन्होंने उत्सुकतावश पूछा।

"एक भी नहीं "- नसरुद्दीन बोला।

तो फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि शिकार बेहतरीन रहा? - एक व्यक्ति ने कहा।

नसरुद्दीन ने मुस्कराते हुए कहा।- "महोदय! यह जान लीजिये, कि जब आप भालू जैसे खतरनाक जानवर के शिकार पर हों तो सबसे अच्छी बात यही है कि उससे आपका सामना ही न हो। "

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24

संघर्ष की महत्ता

एक व्यक्ति को तितली का एक कोकून मिला, जिसमें से तितली बाहर आने के लिए प्रयत्न कर रही थी. कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया था जिसमें से बाहर निकलने को तितली आतुर तो थी, मगर वह छेद बहुत छोटा था और तितली का उस छेद में से बाहर निकलने का संघर्ष जारी था.

उस व्यक्ति से यह देखा नहीं गया और वह जल्दी से कैंची ले आया और उसने कोकून को एक तरफ से काट कर छेद बड़ा कर दिया. तितली आसानी से बाहर तो आ गई, मगर वह अभी पूरी तरह विकसित नहीं थी. उसका शरीर मोटा और भद्दा था तथा पंखों में जान नहीं थी. दरअसल प्रकृति उसे कोकून के भीतर से निकलने के लिए संघर्ष करने की प्रक्रिया के दौरान उसके पंखों को मजबूती देने, उसकी शारीरिक शक्ति को बनाने व उसके शरीर को सही आकार देने का कार्य भी करती है. जिससे जब तितली स्वयं संघर्ष कर, अपना समय लेकर कोकून से बाहर आती है तो वह आसानी से उड़ सकती है. प्रकृति की राह में मनुष्य रोड़ा बन कर आ गया था, भले ही उसकी नीयत तितली की सहायता करने की रही हो. नतीजतन तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और जल्द ही काल कवलित हो गई.

संघर्ष जरूरी है हमारे बेहतर जीवन के लिए.

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25

शायद ऊपर कोई रास्ता निकल आए

कुछ बच्चों ने तय किया कि मुल्ला नसरूद्दीन को परेशान करने के लिए जब मुल्ला कहीं चप्पल निकाले तो उसे छुपा दिया जाए.

उन्होंने एक उपाय निकाला. जब मुल्ला पास से गुजर रहा था तो मुल्ला को सुनाने के लिए एक बच्चे ने दूसरे से जोर से कहा – “सामने वाले पेड़ पर कोई भी नहीं चढ़ सकता, और मुल्ला तो कभी भी नहीं.”

मुल्ला ठिठका, पेड़ को देखा जो कि बेहद छोटा और शाखादार था. “कोई भी चढ़ सकता है इस पर – तुम भी. देखो मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि कैसे.” ऐसा कह कर उसने अपनी चप्पलें निकाली और उन्हें अपनी कमरबंद में खोंसा और पेड़ पर चढ़ने लगा.

“मुल्ला,” बच्चे चिल्लाए क्योंकि उनका प्लान फेल हो रहा था – “ऊपर पेड़ में तुम्हारे चप्पलों का क्या काम?”

“इमर्जेंसी के लिए हमेशा तैयार रहो,” मुल्ला ने मुस्कुराते हुए बात पूरी की – “क्या पता ऊपर कोई रास्ता मिल ही जाए”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

269

नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।

अरब के शेख सादी की एक दंतकथा इस प्रकार है -

जंगल से गुजरते हुए एक आदमी ने ऐसी लोमड़ी को देखा जिसके पैर टूट चुके थे और वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी। उसने सोचा कि आखिर वह अपना गुजारा कैसे करेगी। तभी उसने देखा कि एक बाघ अपने मुँह में शिकार को दबाये हुए वहाँ आया। पेटभर खाने के बाद वह बचाखुचा शिकार लोमड़ी के लिए छोड़कर चला गया।

अगले दिन भी ईश्वर ने बाघ को लोमड़ी के लिए भोजन के साथ वहाँ भेज दिया। वह आदमी ईश्वर की महानता के बारे में सोचकर आश्चर्यचकित हो गया और उसने यह निर्णय लिया कि वह बिना कुछ एक कोने में पड़ा रहेगा और ईश्वर उसका भरण-पोषण करेंगे।

अगले एक माह तक वह ऐसा ही करता रहा और जब वह मृत्युशय्या पर पहुंच गया तब उसे एक आवाज़ सुनायी दी - "मेरे बच्चे! तुम गलत राह पर हो। सत्य को पहचानो। नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।"

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270

एक वादक, एक श्रोता

कई वर्ष पूर्व चीन में दो मित्र रहते थे। एक मित्र अत्यंत कौशलपूर्ण तरीके से सितार बजाता था और दूसरा पक्के पारखी की तरह से सुनता था।

जब पहला मित्र सितार बजाते हुए पर्वतों के बारे में गाता था तो दूसरा कहता - "मुझे साकार रूप में पर्वत यहीं दिख रहे हैं।"

और जब पहला मित्र सितार बजाते हुए पानी के बारे में गाता था तो दूसरा कहता - "बहती हुयी जलधारा तो यहाँ है।"

कुछ दिनों बाद जब श्रोता मित्र की मृत्यु हो गयी तो वादक मित्र ने अपने सितार के तारों को तोड़ दिया और हमेशा के लिए गाना छोड़ दिया

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23

किसान और गेहूँ के दाने

दुःख के समय दुनिया और दुनिया वाले बेहद जालिम प्रतीत होते हैं. और, दुःख तब होता है जब चीजें आपकी इच्छानुसार नहीं होतीं. परंतु यह भी सच है कि दुनिया की तमाम चीजें सारे समय आपकी इच्छानुसार नहीं हो सकतीं. अपनी स्वयं की प्रकृति के अनुरूप घटनाएँ घटती रहती हैं.

इस प्रकृति को लाओ त्जू ने ताओ नाम दिया. बुद्ध ने इसे धम्म कहा तो महावीर ने परिभाषा दी कि चीजों की प्रकृति कोई नहीं बदल सकता. आग में गर्मी है तो पानी में ठण्डक. क्या इनकी प्रकृति बदल सकती है? कदापि नहीं. बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो धीरज रखे और प्रकृति के साथ तारतम्य बनाए रखे.

जब आप प्रकृति के साथ अपना तारतम्य बिठा लेंगे तो दुःख नहीं होगा. तब दुःख भी आपको प्रकाशवान और सहज लगेगा. ऐसा नहीं है कि दुःख आपके पास आएंगे ही नहीं. वे आएंगे, मगर दुश्मन के रूप में नहीं. मित्रवत रूप में आएंगे क्योंकि तब आपको पता होगा कि जीवन में दुःख भी आवश्यक हैं, जीवन का अभिन्न अंग हैं.

एक प्राचीन दृष्टान्त है. तब ईश्वर मनुष्यों के साथ धरती पर निवास करते थे. एक दिन एक वृद्ध किसान ने ईश्वर से कहा – आप ईश्वर हैं, ब्रह्माण्ड को आपने बनाया है, मगर आप किसान नहीं हैं और आपको खेती किसानी नहीं आती, इसलिए दुनिया में समस्याएँ हैं.

ईश्वर ने पूछा – “तो मुझे क्या करना चाहिए?”

किसान ने कहा - “मुझे एक वर्ष के लिए अपनी शक्तियाँ मुझे दे दो. मैं जो चाहूंगा वो हो. तब आप देखेंगे कि दुनिया से समस्याएँ, गरीबी भुखमरी सब समाप्त हो जाएंगी.”

ईश्वर ने किसान को अपनी शक्ति दे दी. किसान ने चहुँओर सर्वोत्तम कर दिया. मौसम पूरे समय खुशगवार रहने लगा. न आँधी न तूफ़ान. किसान जब चाहता बारिश हो तब बारिश होती, जब वो चाहता कि धूप निकले तब धूप निकलती. सबकुछ एकदम परिपूर्ण हो गया था. चहुँओर फ़सलें भी लहलहा रही थीं.

जब फसलों को काटने की बारी आई तब किसान ने देखा कि फसलों में दाने ही नहीं हैं. किसान चकराया और दौड़ा दौड़ा भगवान के पास गया. उसने तो सबकुछ सर्वोत्तम ही किया था. और यह क्या हो गया था. उसने भगवान को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

भगवान ने स्पष्ट किया – चूंकि सबकुछ सही था, कोई संधर्ष नहीं था, कोई जिजीविषा नहीं थी – तुमने सबकुछ सर्वोत्तम कर दिया था तो फसलें नपुंसक हो गईं. उनकी उर्वरा शक्ति खत्म हो गई. जीवन जीने के लिए संघर्ष अनिवार्य है. ये आत्मा को झकझोरते हैं और उन्हें जीवंत, पुंसत्व से भरपूर बनाते हैं.

यह दृष्टांत अमूल्य है. जब आप सदा सर्वदा खुश रहेंगे, प्रसन्न बने रहेंगे तो प्रसन्नता, खुशी अपना अर्थ गंवा देगी. यह तो ऐसा ही होगा जैसे कोई सफेद कागज पर सफेद स्याही से लिख रहा हो. कोई इसे कभी देख-पढ़ नहीं पाएगा.

खुशी को महसूस करने के लिए जीवन में दुःख जरूरी है. बेहद जरूरी.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

267

ऐसी कितनी चीजें हैं जिनके बिना मेरा जीवन आराम से कट रहा है

सुकरात का ऐसा मानना था कि बुद्धिमान लोग सहज रूप से मितव्ययी जीवन व्यतीत करते हैं।

यद्यपि वे स्वयं जूते नहीं खरीदते थे पर प्रायः बाजार में जाकर दुकानों में सजाकर रखे गए जूते व अन्य चीजों को देखना पसंद करते थे।

जब उनके एक मित्र ने इसका कारण पूछा तो वे बोले - "मैं वहां जाना इसलिये पसंद करता हूं ताकि मैं यह जान सकूं कि ऐसी कितनी चीजें हैं जिनके बिना मेरा जीवन आराम से कट रहा है। "

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268

शेर और डॉल्फिन

समुद्र के तट पर चहलकदमी करते हुए शेर ने एक डॉल्फिन को लहरों के साथ अठखेलियाँ करते हुए देखा। उसने डॉल्फिन से कहा कि वे दोनों अच्छे मित्र बन सकते हैं।

"मैं जंगल का राजा हूँ और सागर पर तुम्हारा निर्विवाद राज है। यदि संभव हो तो हम दोनों एक अच्छा मित्रतापूर्ण गठजोड़ कर सकते हैं।"

डॉल्फिन ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी मित्रता होने के कुछ ही दिनों बाद शेर की भिडंत जंगली भैंसे से हो गयी। उसने डॉल्फिन को मदद के लिए पुकारा। डॉल्फिन भी शेर की मदद करना चाहती थी परंतु वह चाहकर भी समुद्र के बाहर नहीं जा सकती थी। शेर ने डॉल्फिन को धोखेबाज करार दिया।

डॉल्फिन ने कहा - "मुझे दोष मत दो। प्रकृति को दोष दो। भले ही मैं समुद्र में कितनी भी ताकतवर हूँ, पर मेरी प्रकृति मुझे समुद्र के बाहर जाने से रोकती है।"

"ऐसे मित्र का चुनाव करना चाहिए जो न सिर्फ आपकी मदद करने का इच्छुक हो

बल्कि ऐसा करने में सक्षम भी हो।"

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21

वह चाँदी चमकाने वाला

स्त्रियों का एक समूह अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन कर रहा था. एक अध्याय में एक पंक्ति थी – “वह चाँदी चमकाने वाले जैसा बैठेगा.”

यह पंक्ति बहुतों को समझ में नहीं आई. उनमें से एक ने कहा कि वो इसके बारे में और जाँच पड़ताल करेगी और समझने की कोशिश करेगी.

दूसरे दिन वह एक सुनार के पास गई, और उससे चाँदी चमकाने की प्रक्रिया के बारे में पूछा और उस प्रक्रिया को देखना चाहा.

उसने देखा कि सुनार गंदे काले पड़ चुके चाँदी के गहनों को तेज आग में जला रहा है ताकि उसकी गंदगी जल जाए. इस क्रिया को करते समय वह सुनार पूरे समय गहनों पर ध्यान लगाए हुए था और उलट पुलट कर गहनों को तपा रहा था.

जब चाँदी के गहनों की गंदगी जल गई तो उनमें निखार आ गया. उनकी चमक पुनर्जागृत हो उठी. उन गहनों में सुनार की छवि दिखाई देने लगी.

तो यह बात है. ईश्वर भी चाँदी चमकाने वाले की तरह है. हम सदैव ईश्वर के हाथों में होते हैं. वह सुख दुःख से हमें तपाता है और हमारी आत्मा को चमकाता है. जिस दिन हमारी आत्मा में ईश्वर की छवि निखर आएगी, समझिए कि हमें मुक्ति, उद्धार मिल गया.

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265

अपने भीतर के प्रकाश को देखो

एक गुरूजी लंबे समय से अचेतावस्था में थे। एक दिन अचानक उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को अपने नजदीक बैठे हुए पाया।

उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा - "तुम इतने समय तक मेरे बिस्तर के नजदीक ही बैठे रहे और मुझे अकेला नहीं छोड़ा?"

शिष्य ने रुंधे हुए गले से कहा - "गुरूदेव मैं ऐसा कर ही नहीं सकता कि आपको अकेला छोड़ दूं।"

गुरूजी - "ऐसा क्यों?"

"क्योंकि आप ही मेरे जीवन के प्रकाशपुंज हैं।"

गुरूजी ने उदास से स्वर में कहा - "क्या मैंने तुम्हें इतना चकाचौंध कर दिया है कि तुम अपने भीतर के प्रकाश को नहीं देख पा रहे हो?"

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266

शेर और लोमड़ी

एक लोमड़ी, जंगल के राजा शेर के अधीनस्थ एक नौकर के रूप में कार्य करने को सहमत हो गयी। कुछ समय तक तो दोनों अपने स्वभाव और सामर्थ्य के अनुसार भलीभांति कार्य करते रहे। लोमड़ी शिकार बताती और शेर हमला करके शिकार को दबोच लेता। परंतु लोमड़ी को जल्द ही यह ईर्ष्या होने लगी कि शेर शिकार का ज्यादा हिस्सा स्वयं चट कर जाता है और उसे बचाखुचा हिस्सा ही मिलता है। वह सोचने लगी कि आखिर वह किस मायने में शेर से कम है। और उसने यह घोषणा कर दी कि भविष्य में वह अकेले ही शिकार करेगी। अगले ही दिन जब वह एक भेड़शाला में से भेड़ के बच्चे को दबोचने ही वाली थी कि अचानक शिकारी और उसके पालतू कुत्ते आ गए और उसे अपना शिकार बना लिया।

"जीवन में अपना स्थान नियत करो और यह स्थान ही आपकी रक्षा करेगा।"

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19

अर्जुन या एकलव्य

यदि आपसे पूछा जाए कि क्या बनना बेहतर है – अर्जुन या एकलव्य तो आपका उत्तर क्या होगा? हममें से अधिकतर का उत्तर होगा कि अर्जुन बनना बेहतर है क्योंकि उन्हें गुरु द्रोण से सीखने का प्रत्यक्ष अवसर मिला. यह संभवतः सही चुनाव हो सकता है. आइए, इसे जरा दूसरे दृष्टिकोण से सोचते हैं.

कल्पना कीजिए कि अर्जुन धनुर्विद्या की शिक्षा चल रही है और वे अभ्यास कर रहे हैं. वे एक लक्ष्य पर निशाना लगाते हैं और प्रत्यंचा खींच कर तीर छोड़ते हैं. तीर लक्ष्य से दो इंच बाईं ओर लगता है. द्रोण अर्जुन को निशाने पर तीर लगाते बारीकी से देख रहे होते हैं और बताते हैं कि उन्होंने क्या गलती की. अपने अगले अभ्यास में अर्जुन ने उस गलती को दोहराया नहीं और तीर निशाने पर लगा.

अब कल्पना कीजिए कि एकलव्य धनर्विद्या स्वयं सीख रहे हैं. उनके पास उनकी गलतियों को बताने वाला कोई गुरु नहीं है, उनके पास कोई रेडीमेड हल नहीं है. उनका निशाना कई दिनों के अभ्यास के बाद सही नहीं लग रहा. आज उनका तीर लक्ष्य से तीन इंच दूर रह जाता था. मगर एकलव्य ने आस नहीं छोड़ी. कुछ दिनों के अभ्यास से उनको अपनी गलती समझ में आ गई. अब उन्होंने अपनी गलती सुधार ली और तीर अब निशाने पर लगने लगा.

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि कौन सी परिस्थिति चुनने योग्य है? आप अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य. यदि आप अर्जुन बनते हैं तो आपको अपनी प्रत्येक गलती को सुधारने के लिए एक अदद गुरु की जरूरत होगी. एकलव्य अपनी गलतियोँ को खुद ही ढूंढता है और खुद ही उनका समाधान प्राप्त करता है.

अंत में, यही प्रश्न एक बार फिर से आपके सामने है – आप अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य?

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22

धार्मिकता और अंधभक्ति

आप धार्मिक हैं या अंधभक्त? व्यक्ति को धार्मिक तो होना चाहिए, मगर अंधभक्त नहीं.

आर्मी के एक कमांडिंग ऑफ़ीसर की यह कहानी है –

कमांडिंग ऑफ़ीसर ने अपने नए-नए रंगरूटों से पूछा कि रायफल के कुंदे में अखरोट की लकड़ी का उपयोग क्यों किया जाता है.

“क्योंकि इसमें ज्यादा प्रतिरोध क्षमता होती है” एक ने कहा.

“गलत”

“इसमें लचक ज्यादा होती है” दूसरे ने कहा.

“गलत”

“शायद इसमें दूसरी लकड़ियों की अपेक्षा ज्यादा चमक होती है” तीसरे ने अंदाजा लगाया.

“बेवकूफी की बातें मत करो.” कमांडर गुर्राया – “अखरोट की लकड़ी का प्रयोग इस लिए किया जाता है क्योंकि यह नियम-पुस्तिका में लिखा है.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

(263)

आदेश देने का तरीका

एक बार एक राजा ने भगवान महावीर से पूछा, "क्या आप मुझे राज-पाट चलाने के लिये कोई परामर्श दे सकते हैं?"

भगवान महावीर बोले - "जरूर। पहले तुम यह सीखो कि आदेश कैसे दिया जाता है।"

राजा ने पूछा - "कैसे"?

महावीर ने कहा - "तुम्हारा आदेश देने का तरीका ऐसा हो कि अन्य व्यक्ति बिना किसी हीनभावना के उनका पालन करें।"

(264)

तुम्हारा फर्नीचर कहाँ है?

पिछली शताब्दी की बात है। एक अमेरिकी पर्यटक सुप्रसिद्ध पुलिस कर्मचारी रब्बी हॉफेज़ चैम से मिलने गया।

उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि रब्बी सिर्फ एक कमरे में रहते थे और वह भी किताबों से भरा हुआ था। उसमें फर्नीचर के नाम पर सिर्फ एक मेज और कुर्सी थी।

"तुम्हारा फर्नीचर कहाँ हैं रब्बी?" - पर्यटक ने पूछा ।

"और तुम्हारा कहाँ हैं?" - रब्बी ने कहा ।

"मेरा फर्नीचर ! लेकिन मैं तो यहाँ एक पर्यटक हूँ और यहाँ से गुजर ही रहा था।"

"और मैं भी" -- -- -- रब्बी ने भोलेपन से कहा ।

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17

वृद्ध रहित भूमि

एक बार एक देश में यह निर्णय लिया गया कि वृद्ध किसी काम के नहीं होते, अकसर बीमार रहते हैं, और वे अपनी उम्र जी चुके होते हैं अतः उन्हें मृत्यु दे दी जानी चाहिए. देश का राजा भी जवान था तो उसने यह आदेश देने में देरी नहीं की कि पचास वर्ष से ऊपर के उम्र के लोगों को खत्म कर दिया जाए.

और इस तरह से सभी अनुभवी, बुद्धिमान बड़े बूढ़ों से वह देश खाली हो गया. उनमें एक जवान व्यक्ति था जो अपने पिता से बेहद प्रेम करता था. उसने अपने पिता को अपने घर के एक अंधेरे कोने में छुपा लिया और उसे बचा लिया.

कुछ साल के बाद उस देश में भीषण अकाल पड़ा और जनता दाने दाने को मोहताज हो गई. बर्फ के पिघलने का समय आ गया था, परंतु देश में बुआई के लिए एक दाना भी नहीं था. सभी परेशान थे. अपने बच्चे की परेशानी देख कर उस वृद्ध ने, जिसे बचा लिया गया था, अपने बच्चे से कहा कि वो सड़क के किनारे किनारे दोनों तरफ जहाँ तक बन पड़े हल चला ले.

उस युवक ने बहुतों को इस काम के लिए कहा, परंतु किसी ने सुना, किसी ने नहीं. उसने स्वयं जितना बन पड़ा, सड़क के दोनों ओर हल चला दिए. थोड़े ही दिनों में बर्फ पिघली और सड़क के किनारे किनारे जहाँ जहाँ हल चलाया गया था, अनाज के पौधे उग आए.

लोगों में यह बात चर्चा का विषय बन गई, बात राजा तक पहुँची. राजा ने उस युवक को बुलाया और पूछा कि ये आइडिया उसे आखिर आया कहाँ से? युवक ने सच्ची बात बता दी.

राजा ने उस वृद्ध को तलब किया कि उसे यह कैसे विचार आया कि सड़क के किनारे हल चलाने से अनाज के पौधे उग आएंगे. उस वृद्ध ने जवाब दिया कि जब लोग अपने खेतों से अनाज घर को ले जाते हैं तो बहुत सारे बीच सड़कों के किनारे गिर जाते हैं. उन्हीं का अंकुरण हुआ है.

राजा प्रभावित हुआ और उसे अपने किए पर पछतावा हुआ. राजा ने अब आदेश जारी किया कि आगे से वृद्धों को ससम्मान देश में पनाह दी जाती रहेगी.

कहावत है –

वृद्धस्य वचनम् ग्राह्यं आपात्काले ह्युपस्थिते

जिसका अर्थ है – विपदा के समय बुजुर्गों का कहा मानना चाहिए.

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18

क्या मेरा वेतन बढ़ेगा?

प्रेरक सम्मेलन (मोटिवेशन सेमिनार) से लौटकर उत्साहित प्रबंधक ने अपने एक कामगार को अपने ऑफ़िस में बुलाया और कहा – “आज के बाद से अपने काम को तुम स्वयं प्लान करोगे और नियंत्रित करोगे. इससे तुम्हारी उत्पादकता बढ़ेगी.”

“इससे क्या मेरे वेतन में बढ़ोत्तरी होगी?” कामगार ने पूछा.

“नहीं नहीं, -” प्रबंधक आगे बोला – “पैसा कहीं भी प्रेरणा देने का कारक नहीं बनता और वेतन में बढ़ोत्तरी से तुम्हें कोई संतुष्टि नहीं मिलेगी.”

“ठीक है, तो जब मेरी उत्पादकता बढ़ जाएगी तब मेरा वेतन बढ़ेगा?”

“देखो, -” प्रबंधक ने समझाया “जाहिर है कि तुम मोटिवेशन थ्योरी को नहीं समझते. इस किताब को ले जाओ और इसे अच्छी तरह से पढ़ो. इसमें सब कुछ विस्तार में समझाया गया है कि किस चीज से तुममें प्रेरक तत्व जागेंगे.”

वह आदमी बुझे मन से किताब ले कर जाने लगा. जाते जाते उसने पूछा - “यदि मैं इस किताब को अच्छी तरह से पूरा पढ़ लूं तब तो मेरा वेतन बढ़ेगा?”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

इरफान के कार्टूनों के दीवाने यकीनन आप भी होंगे. अलग शैली, बेहतरीन पंच और बारीक ऑब्जर्वेशन लिए इनके कार्टून अन्य समकालीन कार्टूनकारों से इन्हें जुदा बनाते हैं.

हाल ही में इरफान की कार्टून प्रदर्शनी के साथ साथ कार्टून वर्कशाप का आयोजन भोपाल में हुआ. कार्टून प्रदर्शनी की थीम थी - बेटियाँ बचाओ. इस दौरान इस बेहद उम्दा और सफल प्रदर्शनी को देखने, वर्कशॉप में कुछ देर के लिए ही सही, भाग लेने और इरफान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

प्रस्तुत है प्रदर्शनी के कुछ चुनिंदा कार्टून -

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इरफान - कार्टून-कला के वर्कशॉप में प्रतिभागियों को कार्टून की बारीकियाँ सिखाते हुए.

 

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इरफान (बीच में) के साथ व्यंग्यकार व संपादक - भास्कर अनुज खरे (दाएँ) तथा कार्टूनिस्ट हरि ओम तिवारी

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

15

कल्पतरू

एक बार एक आदमी घूमते-घामते स्वर्ग पहुँच गया. स्वर्ग में सुंदर नजारे देखते हुए वह बहुत देर तक घूमता रहा और अंत में थक हार कर एक वृक्ष के नीचे सो गया.

स्वर्ग में जिस वृक्ष के नीचे सोया था, वह कल्पतरू था. कल्पतरू की छांह के नीचे बैठ कर जो भी व्यक्ति जैसी कल्पना करता है, वह साकार हो जाता है.

कुछ देर बाद जब उस आदमी की आँख खुली तो उसकी थकान तो जाती रही थी, मगर उसे भूख लग आई थी. उसने सोचा कि काश यहाँ छप्पन भोग से भरी थाली खाने को मिल जाती तो आनंद आ जाता.

चूंकि वह कल्पतरू के नीचे था, तो उसकी छप्पन भोग से भरी थाली उसके कल्पना करते ही प्रकट हो गई. चूंकि उसे भूख लगी थी तो उसने झटपट उस भोजन को खा लिया. भोजन के बाद उसे प्यास लगी. उसने सोचा कि काश कितना ही अच्छा होता कि इतने शानदार भोजन के बाद एक बोतल बीयर पीने को मिल जाती. उसका यह सोचना था कि बीयर की बोतल नामालूम कहाँ से प्रकट हो गई.

उसने बीयर की बोतल खोली और गटागट पीने लगा. भूख और प्यास थोड़ी शांत हुई तो उसका दिमाग दौड़ा. यह क्या हो रहा है उसने सोचा. क्या मैं सपना देख रहा हूँ? खाना और बीयर हवा में से कैसे प्रकट हो गए? लगता है कि इस पेड़ में भूत पिशाच हैं जो मुझसे कोई खेल खेल रहे हैं. उसने सोचा.

उसका इतना सोचना था कि कल्पतरू ने उसकी यह कल्पना भी साकार कर दी. हवा में से भूत पिशाच प्रकट हो गए जो उसके साथ डरावने खेल खेलने लगे. वह आदमी डर कर सोचने लगा ये भूत प्रेत तो अब मुझे मार ही डालेंगे. मेरी मृत्यु निश्चित है.

आप समझ सकते हैं कि कल्पतरू के नीचे उसकी इस कल्पना का क्या हश्र हुआ होगा.

दरअसल हमारा दिमाग ही कल्पतरू के माफ़िक है. आप जो सोचते हैं वही होता है. सारी चीजें दो बार सृजित होती हैं. एक बार आपके दिमाग में और फिर दूसरी बार भौतिक संसार में. आज नहीं तो कल, जो आपने सोचा है, वह होकर रहेगा. बहुत बार आपकी कल्पना और चीजों के होने में इतना समय हो जाता है कि आप भूल जाते हैं कि कभी आपने इसके लिए ख्वाब भी देखे होंगे. आप अपने लिए स्वर्ग भी रचते हैं और आप अपने लिए नर्क भी रचते हैं. यदि आप स्वर्ग की सोचेंगे तो आपको स्वर्ग मिलेगा. छप्पन भोग की सोचेंगे तो छप्पन भोग मिलेगा. भूत पिशाच की सोचेंगे तो भूत पिशाच मिलेंगे.

और जब आप समझ जाते हैं कि आप अपने लिए स्वयं स्वर्ग या नर्क बुन सकते हैं तो फिर आप इस तरह की अपनी दुनिया को बनाना छोड़ सकते हैं. स्वर्ग या नर्क बनाने की जरूरत फिर किसी को नहीं होती. आप इन झंझटों से निवृत्त हो सकते हैं. मस्तिष्क की यह निवृत्ति ही मेडिटेशन (ध्यान योग) है.

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16

जीवन को किसने समझा

“पथ क्या है?”

“दैनंदिनी जीवन ही पथ है.”

“क्या इसे समझा जा सकता है?”

“यदि आप इसे समझने की जितनी कोशिश करेंगे, तो आप इससे उतना ही दूर जाते जाएंगे.”

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(261)

कुल लाभ

जब बैटीना बंज ने टेनिस से संन्यास लिया, मार्टिना नवरातिलोवा के विरूद्ध उनका रिकॉर्ड 0 - 17 का था। इतनी पराजयों के बाद जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने नवरातिलोवा से क्या सीखा?

बंज ने कहा - "हाथ कैसे मिलाया जाता है।"

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(262)

आदमी और शेर

एक बार एक शेर और एक आदमी साथ-साथ यात्रा कर रहे थे। उनके मध्य यह बहस होने लगी कि कौन ज्यादा ताकतवर और श्रेष्ठ है। उनके मध्य नोक-झोंक तीखी हुई ही थी कि वे चट्टान पर उकेरी गयी एक मूर्ति के पास से गुजरे जिसमें एक आदमी को शेर का गला दबाते हुए दर्शाया गया था।

"वो देखो। हमारी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए क्या तुम्हें और किसी प्रमाण की आवश्यकता है?" - आदमी ने गर्व से कहा।

शेर ने उत्तर दिया - "ये कहानी कहने का तुम्हारा नजरिया है। यदि हम लोग शिल्पकार होते तो शेर के एक पंजे के नीचे बीस आदमी दबे होते।"

"इतिहास सिर्फ विजेताओं द्वारा ही लिखा जाता है।"

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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257

कार्य में आध्यात्मिकता

गुरू जी को अपने समस्त शिष्यों के प्रति एक समान प्रेम भाव था । इसके बावजूद वे आश्रम में रहने वाले शिष्यों की तुलना में ऐसे शिष्यों के प्रति अपने लगाव को छुपा नहीं पाये जो 'गृहस्थ जीवन' व्यतीत कर रहे थे जैसे - विवाहित, व्यापारी, सैनिक, किसान ............आदि।

जब उनसे इसके बारे में पूछा गया तो वे बोले - "संन्यासी जीवन की तुलना में गृहस्थ आश्रम के कार्यशील जीवन में आध्यात्मिकता का अभ्यास कहीं बेहतर होता है।"

258

अपनी आँखें खुली रखो

दार्जिलिंग में कुछ बुजुर्ग मित्रों का एक समूह था जो आपस में समाचारों के आदान-प्रदान और एक साथ चाय पीने के लिये मिलते रहते थे। उनका एक अन्य शौक चाय की महँगी किस्मों की खोज और उनके विभिन्न मिश्रणों द्वारा नए स्वादों की खोज करना था।

मित्रों के मनोरंजन हेतु जब समूह के सबसे उम्रदराज़ बुजुर्ग की बारी आयी तो उसने समारोहपूर्वक एक सोने के महंगे डिब्बे में से चाय की पत्तियाँ निकालते हुए चाय तैयार की। सभी लोगों को चाय का स्वाद बेहद पसंद आया और वे इस मिश्रण को जानने के लिए उत्सुक हो उठे। बुजुर्ग ने मुस्कराते हुए कहा - "मित्रों, जिस चाय को आप बेहद पसंद कर रहे हैं उसे तो मेरे खेतों पर काम करने वाले किसान पीते हैं।"

"जीवन की बेहतरीन चीजें न तो महंगी हैं और न ही उन्हें खोजना कठिन है।"

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(259)

किस बुक से

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से एक पत्रकार ने पूछा - "कि अपनी किस बुक से आपको सबसे अधिक लाभ प्राप्त हुआ है?"

नामी व्यंगकार बर्नार्ड शॉ ने तत्परता से कहा - "चैक बुक से"।

(260)

मत बदलो

वर्षों तक मैं मानसिक रोगी रहा - चिंताग्रस्त, अवसादग्रस्त और स्वार्थी। हर कोई मुझे अपना स्वभाव बदलने को कहता ।

मैं उन्हें नाराज करता, पर उनसे सहमत भी था। मैं अपने आपको बदलना चाहता था लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाया।

मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी जब दूसरों की तरह मेरे सबसे नजदीकी मित्र भी मुझसे बदलने को कहते। मैं ऊर्जारहित और बंधा-बंधा सा महसूस करता ।

एक दिन उसने कहा - "अपने आप को मत बदलो। तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

ये शब्द मेरे कानों को मधुर संगीत की तरह लगे - "मत बदलो, मत बदलो, मत बदलो ............. तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

मैंने राहत महसूस की। मैं जीवंत हो उठा और अचानक मैंने पाया कि मैं बदल गया हूँ। अब मैं समझ गया हूँ कि वास्तव में, मैं तब तक नहीं बदला था जब तक कि मैंने ऐसे व्यक्ति को नहीं खोज लिया जो मुझसे हर हाल में प्रेम करता हो।

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)



आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ
संकलन – सुनील हांडा

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महज सम्मान के लिए

एक पत्रकार ने एक छोटे शहर के कई व्यक्तियों से शहर के मेयर के बारे में पूछा।

"वह झूठा और धोखेबाज है" - एक व्यापारी ने कहा।

"वह घमंडी गधा है" - एक व्यापारी ने कहा।

"मैंने अपने जीवन में उसे कभी वोट नहीं दिया" - डॉक्टर ने कहा।

"उससे ज्यादा भ्रष्ट नेता मैंने आज तक नहीं देखा" - एक नाई ने कहा।

अंततः जब वह पत्रकार उस मेयर से मिला तो उसने उससे पूछा कि वह कितना वेतन प्राप्त करता है?

"अजी मैं वेतन के लिए कार्य नहीं करता"- मेयर ने कहा।

"तब आप यह कार्य क्यों करते हैं?"

"महज सम्मान के लिए।" मेयर ने उत्तर दिया।


256

दोष को ही खा लेना

कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गयीं कि बौद्ध भिक्षु अध्यापक फुगाई एवं उनके अनुयायियों के लिए रात्रिभोज की तैयारी में देरी हो गयी। रसोईया दौड़ा - दौड़ा अपने बगीचे में गया और अपने चाकू से जल्दी-जल्दी कुछ हरी सब्ज़ियों के शीर्ष काट लाया और उन्हें एक साथ बारीक काटकर उनका सूप बना दिया। हड़बड़ाहट में वह यह नहीं देख पाया कि सब्ज़ियों के साथ एक साँप भी कट गया है।

फुगाई के अनुयायियों ने ऐसा जायकेदार सूप पहले कभी नहीं पिया था। लेकिन जब अध्यापक ने अपने कटोरे में साँप का कटा हुआ मुँह पाया तो उसने रसोइये को बुलाकर साँप का सिर दिखाते हुए पूछा - "यह क्या है?"

"धन्यवाद मालिक! " - रसोइये ने उत्तर दिया और उस टुकड़े को मुँह में रखकर शीघ्रता से खा लिया।

20
तो समस्या क्या है?


नसरूद्दीन एक दुकान पर गया जहाँ तमाम तरह के औजार और स्पेयरपार्ट्स मिलते थे.
“क्या आपके पास कीलें हैं?”
“हाँ”

“और चमड़ा, बढ़िया क्वालिटी का चमड़ा”
“हाँ है”

“और जूते बांधने का फीता”
“हाँ”

“और रंग”
“वह भी है”

“तो फिर तुम जूते क्यों नहीं बनाते?”
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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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वास्तविकता – प्रश्न एक उत्तर अनेक

वास्तविकता का बोध मस्तिष्क के स्तर और व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है. कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1 व्यास ने चार्वाक से पूछा – चार्वाक! क्या कभी तुमने यह अनुभव किया है कि तुम कहाँ से आए हो, कहाँ तुम्हें जाना है और इस जीवन का उद्देश्य क्या है?

चार्वाक का उत्तर था – मैं अपने चाचा जी के घर से आया हूँ, और बाजार जा रहा हूँ. मेरा उद्देश्य है अच्छी सी ताजी मछली खरीदना.

 

2 यही प्रश्न नारायण ने सुरेश से पूछा. सुरेश का उत्तर था:

मैं अपने अभिभावकों से इस जगत् में आया हूँ. भाग्य जहाँ ले जाएगा, वहाँ मुझे जाना है. जो मुझे मिला है उससे अधिक इस संसार को अर्पित करूं यह मेरे जीवन का उद्देश्य है.

 

3 और जब यही बात गोविंदप्पा ने शंकर से पूछा तो शंकर जा जवाब था – मैं संपूर्णता से आया हूँ और संपूर्णता में ही वापस लौटना है. और जीवन की इस यात्रा में पग-दर-पग संपूर्णता को महसूस करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है.

 

4 बुद्ध के प्रश्न पर महाकश्शप का प्रत्युत्तर था – मैं शून्य से आया हूँ, शून्य में मुझे जाना है और मेरे जीवन का उद्देश्य भी शून्य ही है.

 

5 अष्टावक्र ने जनक से जब यही प्रश्न पूछा तो जनक ने जवाब दिया – मैं न तो आया हूँ, न कहीं जाऊंगा. और न ही कोई उद्देश्य है.

 

6 कृष्ण मुस्कुराए, और कुछ नहीं पूछे. भीष्म मुस्कुराए और कोई जवाब नहीं दिए.

सत्य के बोध के लिए हर एक का दृष्टकोण अलग होता है.

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14

मैं कैसे बताऊँ...

नसरूद्दीन एक बार एक किचन गार्डन में दीवार फांद कर घुस गया और अपने साथ लाए बोरे में आराम से जी भर कर जो भी मिला सब फल सब्जी तोड़ कर भरने लगा.

इतने में माली ने उसे देखा और दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया –

 

“ये तुम क्या कर रहे हो?”

 

“मैं चक्रवात में फंसकर उड़ गया था और यहाँ टपक पड़ा”

 

“और ये सब्जियाँ किसने तोड़ीं?”

 

“तूफ़ान में उड़ने से बचने के लिए मैंने इन सब्जियों को पकड़ लिया था तो ये टूट गईं.”

 

“अच्छा, तो वो बोरे में भरी सब्जियाँ क्या हैं?”

“मैं भी तो यही सोच रहा था जब तुमने मेरा ध्यान अभी खींचा.”

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

253

राजा से तो बेहतर वृक्ष है

एक लड़का आम के वृक्ष पर पत्थर मारकर आम तोड़ने का प्रयास कर रहा था। गलती से एक पत्थर अपने लक्ष्य से भटककर वहां से गुजर रहे राजा को लगा। राजा के सैनिकों ने दौड़कर उस लड़के को पकड़ लिया और उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किया ।

राजा ने कहा -"इसके लिए तुम सजा के भागीदार हो। ............ताकि फिर कभी कोई राजा के ऊपर पत्थर फेंकने की हिम्मत न करे, अन्यथा ऐसे तो शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा।"

लड़के ने विनयपूर्वक उत्तर दिया - "हे वीर एवं न्यायप्रिय राजन, जब मैंने आम के वृक्ष पर पत्थर मारा तो मुझे उपहार स्वरूप मीठे रसीले फल खाने को मिले और जब आपको पत्थर लगा तो आप मुझे दंड दे रहे हैं....आप से भला तो वृक्ष है।"

राजा का सिर शर्म से झुक गया।

 

254

कोट के भीतर डायनामाइट

मुल्ला नसरुद्दीन खुशी-खुशी कुछ बुदबुदा रहा था। उसके मित्र ने इस खुशी का राज पूछा।

मुल्ला नसरुद्दीन बोला - "वो बेवकूफ अहमद जब भी मुझसे मिलता है, मेरी पीठ पर हाथ मारता है। आज मैंने अपने कोट के भीतर डायनामाइट की छड़ छुपा ली है। इस बार जब वो मेरी पीठ पर हाथ मारेगा तो उसका हाथ ही उड़ जाएगा।"

"भले ही मुझे हानि पहुंचे, मैं उसे क्षति पहुंचाकर बदला लूंगा।"

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)


(इस परियोजना से परितोष मालवीय जी भी जुड़े हैं और उन्होंने क्रमांक 251 से कहानियों का अनुवाद प्रारंभ किया है. यानी आपको कहानियाँ अब दोगुनी रफ़्तार से पढ़ने को मिलेंगी. परितोष जी को धन्यवाद. इन कहानियों को पाठकों का एक बड़ा वर्ग पसंद कर रहा है और नित नए पाठक बन रहे हैं. आप सभी सुधी पाठकों का आभार.)
आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ
संकलन – सुनील हांडा

251
मृगतृष्णा

जब महात्मा बुद्ध ने राजा प्रसेनजित की राजधानी में प्रवेश किया तो वे स्वयं उनकी आगवानी के लिए आये। वे महात्मा बुद्ध के पिता के मित्र थे एवं उन्होंने बुद्ध के संन्यास लेने के बारे में सुना था।

अतः उन्होंने बुद्ध को अपना भिक्षुक जीवन त्यागकर महल के ऐशोआराम के जीवन में लौटने के लिए मनाने का प्रयास किया। वे ऐसा अपनी मित्रता की खातिर कर रहे थे।

बुद्ध ने प्रसेनजित की आँखों में देखा और कहा, "सच बताओ। क्या समस्त आमोद-प्रमोद के बावजूद आपके साम्राज्य ने आपको एक भी दिन का सुख प्रदान किया है?"

प्रसेनजित चुप हो गए और उन्होंने अपनी नजरें झुका लीं।

"दुःख के किसी कारण के न होने से बड़ा सुख और कोई नहीं है; 
और अपने में संतुष्ट रहने से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है।"
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252

नदी का पानी बिकाऊ

गुरू जी के प्रवचन में एक गूढ़ वाक्य शामिल था।

कटु मुस्कराहट के साथ वे बोले, "नदी के तट पर बैठकर नदी का पानी बेचना ही मेरा कार्य है"।

और मैं पानी खरीदने में इतना व्यस्त था कि मैं नदी को देख ही नहीं पाया।

"हम जीवन की समस्याओं और आपाधापी के कारण प्रायः सत्य को नहीं पहचान पाते।"
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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)


आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ
संकलन – सुनील हांडा
अनुवाद – रवि-रतलामी


11

उज्जवल भविष्य
अकसर हम अपने टीम सदस्यों को प्रेरित करने के लिए प्रयास करते रहते हैं. कई बार हम कंपनी और व्यक्तिगत सदस्यों के उज्जवल भविष्य हेतु वादा भी करते हैं.

एक धोबी के पास एक गधा था, जो वो सारा काम करता था जो एक गधा करता है. और वह गधा अपने काम से पूरी तरह बोर हो चुका था. वो सोचता था कि अब गधागिरी से तौबा करने का वक्त आ गया है.

एक दिन वह गधा घाट पर एक दूसरे धोबी के गधे से मिला. उनमें वार्तालाप प्रारंभ हुआ. पहला गधा अपने उकताए जीवन के बारे में बताने लगा.

दूसरे गधे ने कहा देखो, मैं भी एक समय तुम्हारी तरह पूरी तरह उकताया हुआ था. मेरी जिंदगी में कोई उजाला नजर नहीं आता था. परंतु पिछले सप्ताह मेरे मालिक ने कुछ ऐसा कहा जिससे मेरा भविष्य अच्छा खासा उज्जवल नजर आने लगा है. तो तुम भी उम्मीद मत हारो. किसी दिन तुम्हारे जीवन के खंडहर में भी बहार आएगी.

ऐसा क्या कह दिया तुम्हारे मालिक ने?” पहले गधे ने पूछा.

दूसरे ने जवाब दिया हाल ही की बात है, एक दिन मेरा मालिक अपनी बेटी से बेहद नाराज हो गया, और उस पर गुर्राया था कि यदि वो लाइन पर नहीं आई तो उसकी शादी अपने गधे यानी मुझसे करवा देगा. अब मेरी जिंदगी में आगे चलने के लिए कुछ तो आसरा है.
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और अब जब भी मैं अपनी टीम के उज्जवल भविष्य के बारे में बात करता हूँ, तो ये कहानी मेरे दिमाग में आती है और मेरे चेहरे में एक मुस्कुराहट!
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12
तेरा तुझको अर्पण
एक समय की बात है. एक बड़ा ही बुद्धिमान और चतुर राजा था और उसके देश की जनता उससे बेहद प्यार करती थी. परंतु राजा अपने कार्यों और राजसी ठाठबाठ से उकता गया था.

एक दिन वह अपने गुरू के पास गया और अपनी समस्या बताई. उसने अपने गुरू से कहा मैं राजकाज से उकता गया हूं. मैं किसी समस्या का कोई हल ढूंढता हूं तो दूसरी समस्या पैदा हो जाती है, और जब मैं इसे हल कर लेता हूं तो तीसरी आ जाती है. रोज रोज नई समस्याएं. मैं बेहद उकता गया हूँ. मैं क्या करूं?”

गुरू ने कहा, ठीक है तो राजगद्दी छोड़ दो
राजा ने प्रतिवाद किया ऐसे में तो समस्या और बढ़ जाएगी. देश में अराजकता फैल जाएगी जिसका जिम्मेदार मैं ठहराया जाऊंगा.

गुरू ने फिर कहा तो राजगद्दी अपने पुत्र को क्यों नहीं सौंप देते?”
राजा ने कहा महाराज, मेरा पुत्र अभी छोटा है और वह राज्य को संभाल नहीं पाएगा.
गुरू ने अंत में कहा फिर तो राजकाज तुम मुझे सौंप दो.
राजा प्रसन्नता पूर्वक बोला हाँ, यह ठीक रहेगा. मैं अभी से ही अपनी राजगद्दी आपको देने की घोषणा करता हूँ. और यह कह कर वह जाने लगा.

गुरू ने राजा से पूछा तुम कहाँ चले?”

मैं कहीं दूर देश चला जाऊंगा, और आम जीवन जीने की कोशिश करूंगा. चिन्ता मुक्त राजा ने कहा.

क्या कहा?” गुरू की भृकुटियाँ तनीं अब तुम मेरे राज्य के एक नागरिक हो और मैं तुम्हारा राजा. तुम्हें राजाज्ञा दी जाती है कि आज से तुम इस राज्य का सारा राजकाज मेरे नाम से चलाओगे. तुम्हारा इसमें कुछ नहीं होगा. यही तुम्हारा कार्य है.

राजा के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था.
कुछ समय के बाद राजा और गुरू की फिर से भेंट हुई. गुरू ने हाल चाल जानना चाहा. राजा ने बताया मैं बेहद खुश हूं. मैं रात को घोड़े बेचकर सोता हूं. दिन में कड़ी मेहनत करता हूँ. समस्याओं को हल करने की पूरी कोशिश करता हूँ. वैसे भी ये सब मेरा नहीं है बल्कि आपका है तो मैं चिंता क्यों करूं? मैं तो बस अपनी ड्यूटी निभाता हूं, और उसी में खुश रहता हूं.
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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

9

छुट्टन के तीन किलो

छुट्टन पटसन तौल-2 कर ढेरी बना रहा था. उधर से एक बौद्ध गुजरा. उसने छुट्टन से पूछा “तुम जिंदगी भर पटसन तौलते रहोगे  – तुम्हें मालूम है, बुद्ध कौन था?”

छुट्टन ने बताया – “नहीं, पर यह खूब पता है कि पटसन का यह गुच्छा तीन किलो का है.”

 

10

बारिश में सूखे

एक बार एक शिकारी ने मुल्ला नसरूद्दीन को शिकार पर साथ चलने के लिए न्योता दिया. शिकारी ने मुल्ला को एक मरियल सा घोड़ा दे दिया और खुद बढ़िया, तेज घोड़े पर चला. जल्दी ही शिकारी आँख से ओझल हो गया और मरियल घोड़े पर सवार मुल्ला ज्यादा दूर नहीं जा पाया. इतने में बारिश होने लगी. मुल्ला ने अपने सारे कपड़े उतारे, उनकी पोटली बनाई और एक मोटे पेड़ की छांव में बैठ गया. बारिश बन्द होने पर उसने अपने कपड़े पहने और वापस लौट चला.

शिकारी को बारिश ऐसी जगह मिली जहाँ दूर दूर तक कोई पेड़ नहीं था, घास के मैदान थे अतः वो बारिश में बुरी तरह भीगा वापस आया. उसने मुल्ला से पूछा कि वो सूखा सूखा कैसे है.

मुल्ला ने कहा – “ऐसा आपके घोड़े के कारण हुआ.”

दूसरे दिन शिकारी ने धीमा घोड़ा खुद अपने पास रखा और तेज घोड़ा मुल्ला को दे दिया. उस दिन बारिश देर से हुई जब शिकारी का घोड़ा घास के मैदान तक पहुँच गया था और मुल्ला अपने घोड़े पर वापस उस पेड़ के पास आ चुका था. मुल्ला ने बारिश से बचने के लिए फिर वही उपाय अपनाया और शिकारी धीमे चाल वाले घोड़े के कारण कल से भी ज्यादा बुरी तरह भीगा वापस आया.

मुल्ला को देखते ही शिकारी चिल्लाया – “ये सब तुम्हारी चाल थी. तुमने मुझे इस घटिया घोड़े की सवारी करवाई.”

“मेरी तो नहीं, मगर ये आपके घोड़े की चाल जरूर थी.” मुल्ला ने जवाब दिया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

7

प्रार्थना -1

वे प्रतिवर्ष पिकनिक पर सपरिवार जोशोखरोश से जाते थे और अपनी धर्मपरायण चाची को बुलाना नहीं भूलते थे. मगर इस वर्ष वे हड़बड़ी में भूल गए.

आखिरी मिनटों में किसी ने याद दिलाया. चाची को जब निमंत्रण भेजा गया तो उन्होंने कहा – “अब तो बहुत देर हो चुकी. मैंने तो आँधी-तूफ़ान और बरसात के लिए प्रार्थना भी कर ली है.”

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8

गगरी आधी भरी या खाली

एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था. वह उससे बहुत प्यार करता था. उस घोड़े को खरीदने के कई आकर्षक प्रस्ताव उसके पास आए, मगर उसने उसे नहीं बेचा.

एक रात उसका घोड़ा अस्तबल से गायब हो गया. गांव वालों में से किसी ने कहा “अच्छा होता कि तुम इसे किसी को बेच देते. कई तो बड़ी कीमत दे रहे थे. बड़ा नुकसान हो गया.”

परंतु उस बुजुर्ग ने यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “आप सब बकवास कर रहे हैं. मेरे लिए तो मेरा घोड़ा बस अस्तबल में नहीं है. ईश्वर इच्छा में जो होगा आगे देखा जाएगा.”

कुछ दिन बाद उसका घोड़ा अस्तबल में वापस आ गया. वो अपने साथ कई जंगली घोड़े व घोड़ियाँ ले आया था.

ग्रामीणों ने उसे बधाईयाँ दी और कहा कि उसका तो भाग्य चमक गया है.

परंतु उस बुजुर्ग ने फिर से यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “बकवास! मेरे लिए तो बस आज मेरा घोड़ा वापस आया है. कल क्या होगा किसने देखा है.”

अगले दिन उस बुजुर्ग का बेटा एक जंगली घोड़े की सवारी करते गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई. लोगों ने बुजुर्ग से सहानुभूति दर्शाई और कहा कि इससे तो बेहतर होता कि घोड़ा वापस ही नहीं आता. न वो वापस आता और न ही ये दुर्घटना घटती.

बुजुर्ग ने कहा – “किसी को इसका निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है. मेरे पुत्र के साथ एक हादसा हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है, बस”

कुछ दिनों के बाद राजा के सिपाही गांव आए, और गांव के तमाम जवान आदमियों को अपने साथ लेकर चले गए. राजा को पड़ोसी देश में युद्ध करना था, और इसलिए नए सिपाहियों की भरती जरूरी थी. उस बुजुर्ग का बेटा चूंकि घायल था और युद्ध में किसी काम का नहीं था, अतः उसे नहीं ले जाया गया.

गांव के बचे बुजुर्गों ने उस बुजुर्ग से कहा – “हमने तो हमारे पुत्रों को खो दिया. दुश्मन तो ताकतवर है. युद्ध में हार निश्चित है. तुम भाग्यशाली हो, कम से कम तुम्हारा पुत्र तुम्हारे साथ तो है.”

उस बुजुर्ग ने कहा – “अभिशाप या आशीर्वाद के बीच बस आपकी निगाह का फ़र्क होता है. इसीलिए किसी भी चीज को वैसी निगाहों से न देखें. निस्पृह भाव से यदि चीजों को होने देंगे तो दुनिया खूबसूरत लगेगी.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

5

सबसे बड़ा सबक

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में चीन से एक दूत आया. वह चाणक्य के साथ ‘राजनीति के दर्शन’ पर विचार-विमर्श करना चाहता था. चीनी राजदूत राजशाही ठाठबाठ वाला अक्खड़ किस्म का था. उसने चाणक्य से बातचीत के लिए समय मांगा. चाणक्य ने उसे अपने घर रात को आने का निमंत्रण दिया.

उचित समय पर चीनी राजदूत चाणक्य के घर पहुँचा. उसने देखा कि चाणक्य एक छोटे से दीपक के सामने बैठकर कुछ लिख रहे हैं. उसे आश्चर्य हुआ कि चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का बड़ा ओहदेदार मंत्री इतने छोटे से दिए का प्रयोग कर रहा है.

चीनी राजदूत को आया देख चाणक्य खड़े हुए और आदर सत्कार के साथ उनका स्वागत किया. और इससे पहले कि बातचीत प्रारंभ हो, चाणक्य ने वह छोटा सा दीपक बुझा दिया और एक बड़ा दीपक जलाया. बातचीत समाप्त होने के बाद चाणक्य ने बड़े दीपक को बुझाया और फिर से छोटे दीपक को जला लिया.

चीनी राजदूत को चाणक्य का यह कार्य बिलकुल ही समझ में नहीं आया. चलते-चलते उसने पूछ ही लिया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया.

चाणक्य ने कहा – जब आप मेरे घर पर आए तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का निजी कार्य कर रहा था, तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का दीपक प्रयोग में ले रहा था. जब हमने राजकाज की बातें प्रारंभ की तब मैं राजकीय कार्य कर रहा था तो मैंने राज्य का दीपक जलाया. जैसे ही हमारी राजकीय बातचीत समाप्त हुई, मैंने फिर से स्वयं का दीपक जला लिया.

चाणक्य ने आगे कहा - मैं कभी ‘राज्य का मंत्री’ होता हूँ, तो कभी राज्य का ‘आम आदमी’. मुझे दोनों के बीच अंतर मालूम है.

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6

बुरे इरादे छुपाए नहीं छुपते

एक बार की बात है. एक गरीब बुढ़िया एक गांव से दूसरे गांव पैदल जा रही थी. उसके सिर पर एक भारी बोझ था. वह बेचारी हर थोड़ी दूर पर थक कर बैठ जाती और सुस्ताती. इतने में एक घुड़सवार पास से गुजरा. बुढ़िया ने उस घुड़सवार से कहा कि क्या वो अपने घोड़े पर उसका बोझा ले जा सकता है. घुड़सवार ने मना कर दिया और कहा – बोझा तो मैं भले ही घोड़े पर रख लूं, मगर तुम तो बड़ी धीमी रफ्तार में चल रही हो. मुझे तो देर हो जाएगी.

थोड़ी दूर आगे जाने के बाद घुड़सवार के मन में आया कि शायद बुढ़िया के बोझे में कुछ मालमत्ता हो. वो बुढ़िया की सहायता करने के नाम पर बोझा घोड़े पर रख लेगा और सरपट वहाँ से भाग लेगा. ऐसा सोचकर वह वापस बुढ़िया के पास आया और बुढ़िया से कहा कि वो उसकी सहायता कर प्रसन्न होगा.

अबकी बुढ़िया ने मना कर दिया. घुड़सवार गुस्से से लाल-पीला हो गया. उसने बुढ़िया से कहा, अभी तो थोड़ी देर पहले तुमने मुझसे बोझा ढोने के लिए अनुनय विनय किया था! और अभी थोड़ी देर में ये क्या हो गया कि तुमने अपना इरादा बदल दिया?

‘उसी बात ने मेरा इरादा बदला जिसने तुम्हारा इरादा बदल दिया.’ बुढ़िया ने एक जानी पहचानी मुस्कुराहट उसकी ओर फेंकी और आगे बढ़ चली.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

3

ईश दर्शन का सबसे सरल तरीका

एक विद्यार्थी ने पूछा – “सर, क्या हम भगवान को देख सकते हैं? हमें इसके लिए (भगवान के दर्शन) क्या करना होगा?”

ईश्वर के दर्शन व्यक्ति के अपने कार्यों से संभव होता है. प्राचीन काल में इसे तपस्या कहा जाता था. बालक ध्रुव ने यह अपनी पूरी विनयता और विनम्रता से हासिल किया. जब ईश्वर उनकी प्रार्थना से प्रकट नहीं हुए तब भी उन्होंने विश्वास और विनम्रता नहीं छोड़ी और अंततः ईश्वर को उन्हें दर्शन देना ही पड़ा.

विद्वान परंतु अहंकारी राजा रावण ने भी भगवान शिव के दर्शन हेतु तपस्या की. वे सफल नहीं हुए. उनकी तपस्या में विनम्रता नहीं थी, बल्कि घमंड भरा था. क्रोध से उन्होंने भगवान से पूछा कि उनकी तपस्या में क्या कमी थी.

और, जब भगवान शिव ने रावण को दर्शन नहीं दिए तो अंततः उसने अपने सिर को एक-एक कर काट कर बलिदान देना प्रारंभ कर दिया. इसे देख भगवान शिव भी पिघल गए और प्रकट हो गए.

कर्नाटक में मैंगलोर और मणिपाल के पास एक छोटा सा शहर है उडिपि (जहाँ कुछ समय के लिए आदि शंकराचार्य ने निवास किया था और जहाँ से दुनिया को डोसा बनाने की कला मिली). वहाँ पर कनकदास नामक एक प्रसिद्ध मंदिर है. कहानी यह है कि प्राचीन काल में कनकदास नामक एक शूद्र वहाँ रहता था जिसे कृष्ण मंदिर में जाने की अनुमति नहीं थी. वह नित्य ही मंदिर के पीछे जाकर जाली से कृष्ण भगवान की मूर्ति का दर्शन पीछे से करता था.

एक दिन भगवान की मूर्ति 180 अंश के कोण में घूम गई और अपने भक्त को उसने दर्शन दे दिया! आज भी वह मूर्ति मंदिर में इसी रूप में विद्यमान है! कनकदास की भक्ति और समर्पण से उसे ईश्वर दर्शन हुआ.

सवाल यह है कि इस घोर कलियुग में आखिर क्या किया जाए कि ईश्वर का आशीर्वाद मिले? क्या कोई तरीका है जिससे भगवान के दर्शन हों? इन प्रश्नों के अपने हिसाब से हर एक के कई उत्तर हो सकते हैं परंतु एक बेहद आसान, मितव्ययी, सुनिश्चित तरीका यह है (क्या इसे आधुनिक कलियुग में फैशनेबुल विधियों में से एक नहीं माना जाना चाहिए?) कि आप अपने माता-पिता व बुजुर्गों का खयाल रखें. आपके अभिभावक ईश्वर के जीवित स्वरूप हैं और उनका ध्यान रखना ही ईश्वर दर्शन का आसान और सुनिश्चित तरीका है.

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4

बुद्धिमानी

मुल्ला नसरूद्दीन शादी की दावत में निमंत्रित थे. पिछली दफ़ा जब वे ऐसे ही समारोह में निमंत्रित थे तो किसी ने उनका जूता चुरा लिया था. इसलिए इस बार मुल्ला ने जूता दरवाजे पर छोड़ने के बजाए अपनी कोट की जेब में ठूंस लिए.

“आपकी जेब में रखी किताब कौन सी है” – मेजबान ने मुल्ला से पूछा.

“लगता है  यह मेरे जूतों के पीछे पड़ा है” मुल्ला ने सोचा और कहा – “वैसे तो लोग मेरी बुद्धिमानी का लोहा मानते हैं.” और फिर चिल्लाया – “मेरी जेब में रखी इस भारी भरकम चीज का मुख्य विषय भी यही है - बुद्धिमानी.”

“अरे वाह!, आपने इसे कहाँ से खरीदा – ‘बुक-वार्म’ से या ‘क्रॉसवर्ड’ से?”

“मोची से”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

कल मैंने इस किताब की चर्चा की थी. और लिखा था कि काश! ये हिंदी में होती. किताब को फिर से उलटने पुलटने पर पाया कि यह तो कॉपी लेफ्टेड किताब है. अतः प्रस्तुत है इसकी कहानियों का हिंदी अनुवाद. कुल 555 कहानियाँ हैं. यहाँ प्रतिदिन 2 कहानियों के अनुवाद के प्रकाशन की कोशिश रहेगी. इस लिहाज से 250 दिनों के भीतर यह पूरी किताब आपके सामने हिंदी में होगी. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

1

घोषणा

मुल्ला नसरुद्दीन भरे बाजार में एक जगह खड़ा हो गया और भीड़ को संबोधित करने लगा.

“भाइयों और बहनो! क्या आप बिना कठिनाई के ज्ञान, बिना मिथ्यापन के सत्य, बिना प्रयास किए उपलब्धियाँ, बिना त्याग किए प्रगति पाना चाहते हैं?”

देखते देखते ही भारी भीड़ जुट गई. हर कोई चिल्लाने लगा – “हाँ, हाँ!”

“बहुत बढ़िया! मुल्ला ने कहा. मैं यही तो जानना चाहता था. आप लोग मुझ पर भरोसा कर सकते हैं. जब भी मुझे ये बातें पता चलेंगी तो मैं आपको अवश्य बताऊँगा”

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2

मेरा दिल तो पहले से ही वहाँ पर है

एक बुजुर्ग हिमालय पर्वतों की तीर्थयात्रा पर था. कड़ाके की ठंड थी और बारिश भी शुरू हो गई थी.

धर्मशाला के एक कर्मचारी ने पूछा “बाबा, मौसम खराब है. ऐसे में आप कैसे जाओगे?”

बुजुर्ग ने प्रसन्नता से कहा – “मेरा दिल तो वहाँ पहले से ही है. बाकी के लिए तो कोई समस्या ही नहीं है.”

(स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर, सुनील हांडा से साभार अनुवादित. अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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बिजनेसमैन और बिट्स-पिलानी, आईआईएम अहमदाबाद से निकले सुनील हांडा द्वारा संकलित कहानियों की किताब में अब, कुछ तो होगा ही.

लाइब्रेरी में जैसे ही यह किताब मेरे हाथ लगी और कुछ पन्ने इसके पढ़े, और इसकी कीमत देखी, तो फुरसत के अगले पलों में मैं अपने आपको फ्लिपकार्ट पर इस किताब को ऑनलाइन खरीदते पाया.

यह किताब है ही ऐसी.

पूरे सवा चार सौ पन्नों की किताब जिसमें 500 से अधिक कहानियाँ संकलित हैं. छोटी-छोटी कहानियाँ, मगर जीवन में हर किसी के लिए उपयोगी. और, मूल्य सिर्फ डेढ़ सौ रुपया. ऊपर से छूट सहित, फ्लिपकार्ट पर घर पहुँच सेवा सहित मात्र 113 रुपए में.

सुनील हांडा आईआईएम अहमदाबाद जैसे प्रतिष्ठित  प्रबंधन संस्थान में शौकिया तौर पर प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर गेस्ट लैक्चरर के रूप में पढ़ाते भी हैं. अपने लैक्चर के दौरान वे इन कहानियों का बखूबी प्रयोग उद्धरण के बतौर करते रहे हैं.

फ्लिपकार्ट पर इसके दो रीव्यू कुछ इस तरह हैं -

Punya Trivedi

06 August 11

Loved it!

One of the most amazing books I have every read! Whenever I feel down, I pick up and start reading it. The beauty of this book is short stories, which are very much inspiring.
I luckily got this book at such time, when I had almost stopped reading books because of a hectic work schedule. But now again I am glued to books, especially this one.
Must read! For everyone... Stories can be applied to every part of life, so much to learn from those simple stories :)
I give this book Ten on Ten with complete consciousness :)

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John Philip

14 August 11

Highly recommended

I couldn't have agreed more with the first reviewer. This book landed in my mailbox when I needed it most and gave a whole new perspective to my surroundings.
Anecdotal: a fellow traveler borrowed my copy and ended up buying it from me within the first 5 minutes. I ended up buying a second copy here and now I have resolved to gift a few copies to my loved ones.

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यदि आप भी इस किताब को खरीदना चाहें (यकीन मानिए, खरीद कर पछताएंगे नहीं, और फ्लिपकार्ट पर कैश ऑन डिलीवरी विकल्प में किताबें खरीदना बेहद आसान है) तो फ्लिपकार्ट पर यहाँ जाएँ अथवा किताब के शीर्षक - Stories from here and there या लेखक Sunil Handa के नाम से सर्च करें (आईएसबीएन नं. -978-81-908299-7-7).

काश, ये किताब हिंदी में भी होती!

प्रखर देवनागरी में 250 से भी अधिक पुराने हिंदी फ़ॉन्टों को यूनिकोड में 100% शुद्धता से परिवर्तन करने की सुविधा है.

इसके नए संस्करण में तालिका युक्त सामग्री तथा एक्सेल शीट से कॉपी की गई सामग्री को भी परिवर्तित करने की सुविधा है. इस सुविधा को आप अपने डाटाबेस की फ़ाइल से तालिका युक्त आरटीएफ फ़ाइल में बदल कर भी प्रयोग कर सकते हैं. परिवर्तन में तालिका का रूप व फ़ॉर्मेट भी बरकरार रहता है.

यह स्क्रीनशॉट वर्ड से कॉपी की गई तालिका युक्त सामग्री का रूपांतरण दर्शाता है -

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निम्न स्क्रीनशॉट में एक्सेल शीट से कॉपी की गई तालिका युक्त सामग्री का रूपांतरण दर्शित है:

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आप देखेंगे कि परिवर्तन न सिर्फ 100% शुद्धता से हुआ है, बल्कि तालिका व फ़ॉर्मेट भी बरकरार है.

बहुत से कार्यालयों में हिंदी में बहुत सारा डेटाबेस और सामग्री तालिका रूप में ही बनाई जाती रही है और उनको फॉर्मेट बिगाड़े बगैर यूनिकोड में परिवर्तित करने का यह औजार वरदान सरीखा है.

इसका डेमो संस्करण आप यहाँ http://www.4shared.com/u/5IPlotQZ/DangiSoft_India.html  से डाउनलोड कर जाँच परख कर सकते हैं. और यदि ये आपको काम का प्रतीत होता है तो इसे बखूबी खरीद सकते हैं. कीमत है मात्र 1500 रुपए, जो इस सॉफ़्टवेयर की खूबियों को देखते हुए एकदम पैसा वसूल है. साथ ही आपको मिलता है असीमित संस्करण अपडेट की सुविधा और सॉफ़्टवेयर सपोर्ट.

अधिक जानकारी के लिए इसके डेवलपर श्री जगदीप डांगी से उनके ईमेल dangijs@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं.

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मानदारी से बताइएगा, आपने आज तक कितनों को टोपी पहनाई है? चलिए, नहीं बताना चाहते, कोई बात नहीं, ये तो कन्फेस कर ही सकते हैं कि आपको कितनों ने कितनों की टोपी कब कब पहना डाली है? यह बताने में भी इमेज का, इज्जत का खतरा है?

हम सभी का साबिका टोपी पहनने पहनाने से पड़ता ही रहता है. कुछ लोग गाहे बगाहे दूसरों को टोपी पहनाने की जुगत में लगे रहते हैं. वहीं कुछ सीधे सादे किस्म के लोग जाने अनजाने जब तब टोपी पहन लेते हैं. टोपी पहनने की तो पता नहीं, परंतु टोपी पहनाना एक आर्ट है, एक अदद कला है. टोपी पहनाने की कला बड़े श्रम और रियाज से पाई जाती है. यूँ किसी-किसी में जन्मजात गुण भी होता है. चाँदी के चम्मच मुँह में लेकर पैदा हुए कई लोग टोपी पहनने-पहनाने के जन्मजात गुण लेकर पैदा हुए होते हैं, मगर वे सब के सब अकसर व्यवस्था, सरकार, देश और अंततः जनता को टोपी पहनाते फिरते हैं.

जनता की बात आई तो क्या कोई किसी नेता का नाम बता सकता है कि उसने अपनी जनता, अपने वोटर को कभी वायदों की टोपी नहीं पहनाई हो? इधर अफसर-मंत्री मिल-जुलकर ऐसी नई योजनाएँ बनाते हैं जिससे प्रत्यक्ष तो यह लगे कि देश सेवा हो रही है, मगर भीतर से वे देश के खजाने को टोपी पहनाने में लगे हुए होते हैं. कभी-कभी अपवाद स्वरूप सीबीआई और आयकर वाले ऐसे मंत्री-अफसरों पर छापे मार कर उन्हें भी टोपी पहना डालते हैं.

अभी कुछ समय पहले अन्ना टोपी का जोर चला था. जिधर देखो अन्ना टोपी. पर अब लोगों ने वो टोपी छुपानी शुरू कर दी है. कहीं उनका भी हश्र केजरीवाल – बेदी की तरह न हो जाए. न जाने कब और किस जमाने के उनके मासूम गुनाहों को खोद-खोद कर, खोजबीन कर सामने ले आया जाएगा कि कुछ कहा नहीं जा सकता.

इधर टेक्नोलॉज़ी भी टोपी पहनने पहनाने की कला में सहायक हो रही है. अब देखिए, हमीं यहाँ कंप्यूटर कीबोर्ड में दन्न से चार लाइन टाइप कर ब्लॉग से लेकर फ़ेसबुक और ट्विटर तक तमाम जगहों पर फेंक मारते हैं और पाठकों को टोपी पहनाने की जुगत में लगे रहते हैं.

आप अपनी उम्दा, नाइस नुमा टिप्पणी देकर इस पोस्ट को टोपी पहनाने की कोशिश नहीं करेंगे?

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