टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

May 2011

मरीकी इतिहास में पहली मर्तबा कोई एक लाख चालीस हजार कंप्यूटर उपयोक्ताओं पर हर्जाना भरने का मुकदमा दायर किया गया है. उन पर टोरेंट से फ़िल्में अवैध तरीके से डाउनलोड करने का आरोप है. टोरेंट से डाउनलोड करने वालों को उनके आईपी पते से पहचाना जाकर उन पर अवैध तरीके से फिल्म डाउनलोड करने और इस वजह से फिल्म कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई का मुकदमा दायर किया गया है.

और, ऐसा एक नहीं कई फ़िल्मों के निर्माताओं ने किया है. हर्टलाकर फ़िल्म के लिए 24583 लोगों को, एक्सपांडेबल्स के लिए 23000 लोगों को चिह्नित किया जाकर उनपर मुकदमे दर्ज किए गये हैं. इसी तर्ज पर कई अमरीकी शहरों में कई बी ग्रेड फ़िल्मों व पॉर्न फ़िल्मों को टोरेंट से डाउनलोड करने वाले कोई 1 लाख 40 हजार लोगों के ऊपर हर्जाना वसूलने के  अलग-2 मुकदमे दर्ज किए गए हैं. प्रत्येक मुकदमे के लिए डेढ़ हजार से 3000 डालर (करीब डेढ़ लाख रुपए) हर्जाना वसूला जा रहा है. हर्जाना वसूलने का यह धंधा वहाँ इतना बढ़िया फल फूल रहा है कि कई कंपनियाँ एक ही व्यक्ति को कई कई बार अभियुक्त बना रही हैं.

तो यदि आप भी टोरेंट जंकी हों तो चेत जाइए. भारत में जब गली कूचों में पायरेटेड डीवीडी मिलती है तो फिर टोरेंट से डाउनलोड कर पहचान हेतु अपना आईपी पता छोड़ने की क्या कोई जरूरत है भी?

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"सर, पिछले वर्ष हमने नागपुर, मुम्बई, चेन्नई यानी लगभग सारे वेस्टर्न सदर्न बिग सिटीज कवर कर लिए थे, और अब सेंट्रल सिटीज की बारी है."

"गुड. गो अहेड"

"सर, हम एमपी के इंदौर, भोपाल, जबलपुर से शुरू करेंगे और फिर यूपी की तरफ आगे बढ़ेंगे."

"ग्रेट प्लान."

"सर, हमने इन सिटीज के डीएम, एसपी को पहले ही लाइन में ले लिया है - तो पूरी सरकारी मशीनरी हमारे साथ है. दो-एक मेनस्ट्रीम अखबार के बिग हेड्स को भी सेट कर लिया है, ये हमारे कैंपेन में अपने अखबारों में साथ देंगे."

"दैड्ट गुड. एनीथिंग एक्स्ट्रा नीड्स टू बी मैनेज्ड?"

"यस सर, कुछ लोकल पॉलिटिशियन को भी मैनेज करना पड़ सकता है, नहीं तो कैंपेन की हवा निकल जाएगी."

"ओके, दैट विल बी डन."

 

और इस तरह इन शहरों में बारी बारी से हफ़्ते दस दिन के लिए हेलमेट पहनो-पहनाओ अभियान हेलमेट कंपनियों के बैकग्राउण्ड प्रायोजन में चलता रहा. और जनता की हलाकान जिंदगी दस-बारह दिनों में वापस पटरी पर आती रही...

 

(डिस्क्लेमर और वैधानिक चेतावनी - सुरक्षा के लिहाज से दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट अवश्य पहनें.)

3G

बीएसएनएल 3 जी डाटा कार्ड का बड़े बुझे दिल से मैंने कुछ दिन पहले मर्सिया पढ़ दिया. बाद में पता चला कि मैं अकेला नहीं हूं.

पीसी क्वैस्ट के प्रशांतो के राय ने अपना अनुभव बताते हुए लिखा है कि भले ही वे अपने विदेशी दौरे में अपने दैनिक भत्ते का अच्छा खासा हिस्सा 3जी डाटा कनेक्शन के लिए खर्च कर लेते हों, भारत में अभी 3 जी से दूर का नाता बनाए रखेंगे. क्यों? कनेक्शन और सिग्नल स्टेबिलिटी की समस्या.

कुछ और कारण हैं हाल फिल हाल 3 जी से दूरी बनाए रखने के -

 

5 एमबीपीएस पीक सिगनल आमतौर पर मिलता तो है परंतु बुरी तरह अनस्टेबल रहता है. दूसरे ही क्षण केबीपीएस में आ जाता है

बारंबार और कभी भी (फ्रीक्वेंट) काल ड्राप

3जी एनेबल्ड फ़ोन में बैटरी की जिंदगी 2 जी की अपेक्षा 3 जी में आधी

डाटा डाउनलोड अपलोड फास्ट, परंतु एक दो मिनट बाद ही कनेक्टिविटी की समस्या

गूगल मैप्स, वीडियो, मल्टीमीडिया इत्यादि भारी भरकम डाटा डाउनलोड के लिए तो ठीक है, परंतु सामान्य ब्राउजिंग, ईमेलिंग के लिए 2 जी पर्याप्त है.

 

पीसी क्वैस्ट 3 जी शूटआउट में यह समस्या प्रायः सभी कैरियरों में पाई गई है.

 

अतः आप भी अभी 3 जी से पर्याप्त दूरी बनाए रखिए जी. कम से कम भारत में.

speckie-hindi-spell-check-for-internet-explorer

माइक्रोसॉफ़्ट की कुटिल व्यवसायिक नीति के चलते इंटरनेट एक्सप्लोरर में हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा अभी तक उपलब्ध नहीं थी. जबकि माइक्रोसॉफ़्ट हिंदी ऑफ़िस में यह उपलब्ध है, और थोड़े से बदलाव के साथ इसे आसानी से इंटरनेट एक्सप्लोरर में जोड़ा जा सकता है. परंतु तब फिर हिंदी ऑफ़िस कौन खरीदेगा? इधर  आप आकाश के  दूसरी तरफ दृष्टि डालें तो पाएंगे कि गूगल क्रोम में हिंदी वर्तनी जाँच की सुविधा अंतर्निर्मित है, और मोजिल्ला के लिए दो-एक हिंदी वर्तनी जांच प्लगइन जारी किए जा चुके हैं.

यही वजह है कि (सुविधाएँ कम होने के कारण व सुरक्षा खतरों इत्यादि के चलते) एक समय जहाँ माइक्रोसॉफ़्ट इंटरनेट एक्सप्लोरर का प्रयोग 80 प्रतिशत से अधिक इंटरनेट प्रयोक्ता करते थे, अब मामला सिमट कर आधे से भी कम रह गया है और इंटरनेट एक्सप्लोरर का यह पतन जारी है. मैं शर्त लगा सकता हूँ कि यदि मूलभूत सुविधाएँ, जैसे कि हिंदी वर्तनी जांच जैसी चीजें इंटरनेट एक्सप्लोरर में दे दी जाएँ, तो इसके प्रयोक्ता अच्छे खासे बढ़ेंगे, क्योंकि ऑफ़िस प्लेटफ़ॉर्म में उपलब्ध हिंदी वर्तनी जाँच सुविधा उन्नत है और थिसॉरस समेत है.

बहरहाल, इंटरनेट एक्सप्लोरर के लिए स्पेकी नामक एक एडऑन/प्लगइन उपलब्ध है जिसमें कोई 30 से अधिक भाषाओं के वर्तनीजांच को आप एक साथ या अलग-अलग सक्षम कर सकते हैं. इसमें हिंदी की वर्तनी जांच सुविधा भी शामिल है. इसमें हिंदी वर्तनी जांच हेतु शब्द भंडार संभवतः ओपनसोर्स हंस्पैल/आस्पैल हिंदी वर्तनी जाँच से लिया गया है, अतः शब्द भंडार बेहद कम है, मगर आपके सामान्य ब्लॉग लेखन के लिए पर्याप्त है.

इंटरनेट एक्सप्लोरर हेतु हिंदी वर्तनी जांच स्पेकी को इंस्टाल करना आसान है. डाउनलोड यहाँ  http://www.versoworks.com/?p=spie  से करें तथा डाउनलोड पश्चात स्पेकी सेटिंग / विकल्प में जाकर अतिरिक्त वर्तनी जांच इंस्टाल करने का विकल्प चुन कर हिंदी वर्तनी शब्द भंडार इंस्टाल करें .

फिर इंटरनेट एक्सप्लोरर में किसी भी इनपुट बक्से में हिंदी की वर्तनी जांचें. यह तकनीकी हिंदी समूह के फ़ॉन्ट कन्वर्टरों के इनपुट बक्सों में भी बढ़िया काम करता है.

यह विंडोज एक्सपी के इंटरनेट एक्सप्लोरर 8 में बढ़िया काम करता है. विंडोज 7 में इंटरनेट एक्सप्लोरर 9 में अंग्रेजी में तो काम करता है, मगर हिंदी में टें बोल जाता है. शायद यह समस्या अगले बग-फ़िक्स में दूर हो जाए.

iit iim without any level

किसने कैसी है उँगली उठाई स्तरहीन

देखिए कौन किसे कह रहा स्तरहीन

 

मुश्किल से राज की ये बात पता चली

शान से जीते हैं वही जो हैं स्तरहीन

 

कोई भी आता नहीं है यहाँ इस तरह

क्यों जमाने भर की भीड़ है स्तरहीन

 

जवाब की कामना किस मुँह से करोगे

सवाल ही जब दागा गया है स्तरहीन

 

रवि का तो बड़ा नाम है ईमानदारों में

दरअसल वो है जरा सा कम स्तरहीन

जागरण जंक्शन ब्लॉग

हिंदी के शीर्ष के चुनिंदा श्रेष्ठ ब्लॉगों की कोई सूची हो सकती है?

पिछले कई मौकों पर और हाल ही में कुछ ऐसे प्रयोग होते रहे हैं, और इनमें से कई खासे विवादास्पद होते रहे हैं क्योंकि कोई भी ऐसी सूची, यकीन मानिए, मुकम्मल हो ही नहीं सकती. वजह, जाहिर है - पसंद अपनी अपनी, खयाल अपना अपना.

 

फिर भी कहीं कहीं कुछ संकलन अवश्य उपलब्ध हैं जहाँ हिंदी के शीर्ष क्रम के चिट्ठों को अपने अपने अंदाज में संकलित किया गया है.

ऐसा ही एक और प्रयास जागरण जंक्शन के बेस्ट वेब ब्लॉग में किया गया है. जागरण जंक्शन का अपना स्वयं का ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म है, जिसमें हिंदी ब्लॉगिंग को कंटेंट क्रिएशन के रूप में जबरदस्त पुश दिया जा रहा है. इसके बावजूद, शीर्ष के हिंदी ब्लॉगों में ब्लॉगर और वर्डप्रेस के अच्छे हिंदी ब्लॉगों को भी स्थान दिया गया है.

पर, जैसा कि मैंने पहले भी कहा, कोई ऐसी सूची परिपूर्ण या आइडियल बन ही नहीं सकती. हरेक में खामियाँ होंगी ही. जागरण जंक्शन की इस सूची में भी गंभीर खामियाँ हैं. भी  फिर भी प्रयास साधुवाद का पात्र है क्योंकि अन्य प्लेटफ़ॉर्म के कुछ चुनिंदा अच्छे चिट्ठे जागरण जंक्शन में सामने नजर तो आ ही रहे हैं.

जागरण जंक्शन को इस सूची को निरंतर अद्यतन किया जाना चाहिए और इसमें अभी और अच्छे खासे श्रम की दरकार है, नहीं तो कहीं ऐसा न  हो कि हिंदी ब्लॉगों की ऐसी सूचियाँ मजाक बनकर न रह जाएँ.

वैसे, अब हिंदी में भी विषयवार शीर्ष क्रम के चिट्ठों की सूचियाँ बनाने का समय नहीं आ गया है? है कोई लेवाल?

एयरटेल सक्स. आलवेज.

airtel digital tv sucks

जैसे एयरटेल डीटीएच कनेक्शन लेकर मैंने पाप कर लिया हो. पर साल भर तक तो इसका अहसास नहीं ही हुआ था.

जब डीटीएच और टीवी देखने वालों की  दुनिया एचडी फ़ॉर्मेट में जाने लगी तो अपने राम ने भी सोचा कि चलो डीटीएच एचडी पर शिफ़्ट हुआ जाए. हालांकि अभी भारत में डीटीएच में एचडी का तो एक तरह से जन्म ही नहीं हुआ है, मगर शुरूआती प्लेयरों को तो हम जैसे नवीन टेक्नोलॉज़ी के प्रयोक्ताओं के द्वारा संबल तो दिया ही जाना चाहिए?

तो, तमाम एचडी डीटीएच की जाँच पड़ताल की गई तो पाया गया कि या तो जीटीवी के एचडी डीटीएच से जुड़ा जाए या फिर टाटा स्काई के डीटीएच से, क्योंकि एयरटेल में तो अभी एचडी डीटीएच के नाम मात्र के ही चैनल हैं.

तो हमने एयरटेल डीटीएच काल सेंटर को बोल दिया कि भइए, हमारा कनेक्शन का समय खतम हो रहा है, हम एचडी में जाना चाहते हैं, तो हमें अब ये कनेक्शन नहीं रखना है.

 

और हमने यह संदेश देकर अपना एयरटेल डीटीएक का सब्सक्रिप्शन रीन्यू नहीं करवाया.

और, लगता है कि यहीं हमने आफत मोल ले ली.

सब्सक्रिप्शन रीन्यू ड्यू होने के हफ़्ते दिन पहले से सुबह-शाम-रात-दोपहर मेरे रजिस्टर्ड मोबाइल फोन में एसएमएस और ऑटोमेटेड काल्स का सिलसिला चालू हो गया, कि सब्सक्रिप्शन खतम हो रहा है, रीन्यू करवाओ, रीन्यू करवाओ. आईपीएल देखना है तो रीन्यू करवाओ, दबंग देखना है तो रीन्यू करवाओ, शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी देखनी हो तो रीन्यू करवाओ.

कई मर्तबा काल सेंटर पर और सीनियर सपोर्ट पर्सनल से बात करने, विनम्र, सनम्र निवेदन करने और नोकझोंक, तूतू-मैंमैं करने के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है. ईमेल करने के बाद भी कोई सुनने वाला नहीं है. ईमेल का प्रत्युत्तर ही नहीं दिया गया.

एयरटेल डीटीएच वालों का यह कैसा सीआरएम (कंज्यूमर रिटेंशन मैनेजमेंट) है? कंज्यूमर को इतना इरीटेट कर दो कि वो दुबारा एयरटेल की ओर देखे ही नहीं और अपने जान-पहचान के चंद दस-बीस और को भी बता दे कि भइये, एयरटेल मत लेना! सीआरएम का इससे घटिया उदाहरण और कहीं हो ही नहीं सकता. इससे पहले रतलाम में मेरे पास जीटीवी का डीटीएच था. जब उसे बंद किया तो वहाँ से एक सिंगल काल नहीं आया. वे समझते हैं कि कंज्यूमर होशियार है, उसे टीवी देखनी है तो सब्सक्रिप्शन जारी रखेगा, नहीं तो टीवी दर्शन यूँ ही स्वचालित बंद हो जाएगा, इसमें कंज्यूमर को मोबाइल में एसएमएस और फोन के जरिए याद दिलाने जैसा घटिया फूहड़ उपाय की जरूरत है भी?

ऊपर से मेरे इस एयरटेल डीटीएच कनेक्शन काटने की बात पर अब पच्चीस रूपए माइनस (जो कि एयरटेल की गलती से हुए हैं, मैंने यह सेवा जारी रखने के लिए नहीं कहा था,) खाते में हो गए हैं उसे जमा करने की बात की जा रही है. यानी एयरटेल डीटीएच अपनी औकात पच्चीस रुपए दिखा रही है. साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि कनेक्शन कटवा क्यों रहे हैं, दूसरे को बेच क्यों नहीं देते? तो भइए, क्या मैं आपके कहने से एयरटेल डीटीएच बेचने का धंधा शुरू कर दूं?

मेरे दर्जनों बार अनुरोध करने, गरियाने और झल्लाने के बावजूद मेरे पंजीकृत मोबाइल पर एयरटेल डीटीएच कनेक्शन को जारी रखने के लिए 100 रूपए जमा करने के एसएमएस संदेश और स्वचालित फोनकाल्स बदस्तूर जारी हैं, जो बेहद ही इरिटेटिंग है. इनके काल में डूनॉटडिस्टर्ब सुविधा काम नहीं करेंगे क्योंकि मैंने खुद कनेक्शन लेते समय अपना मोबाइल नं. दर्ज करवाया था. - आपके लिए एक सीख और - कभी भी भूलकर एयरटेल जैसी सड़ियल सेवा में अपना मोबाइल नंबर दर्ज नहीं करवाएँ, नहीं तो कब्र में भी वे आपको एसएमएस संदेश और अपना ऑटोमेटेड तथा व्यक्तिगत संदेश भेजते रहेंगे कि सब्सक्रिप्शन रीन्यू करवा लो.

कोई मित्र इस समस्या से छुटकारा पाने का रास्ता बताएँ. अब मोबाइल को मैं बड़े तालाब में फेंकने से  तो रहा, और नया सिम या नया नंबर लेने का झंझट भी पालने से रहा.

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पुनश्च - एयरटेल डिजिटल टीवी का भुक्तभोगी मैं अकेला ही नहीं हूं. कंज्यूमर कंप्लेंट नामक फोरम में मेरे जैसे दर्जनों अन्य हैं, तथा ऐसे अनकों फ़ोरम हैं!

वैसे तो अपनी किताब छपवाने का सपना मैं तब से देख रहा हूँ जब मैं राम-रहीम पॉकेट बुक पढ़ता था. बाद में गुलशन नन्दा पर ट्रांसफर हुआ तब भी अपना स्वयं का रोमांटिक नॉवेल मन में कई बार लिखा और उससे कहीं ज्यादा बार छपवाया. कुछ समय बाद रोमांस का तड़का जेम्स हेडली चेइज, अगाथा क्रिस्टी और एलिएस्टर मैक्लीन में बदला तब तो और भी न जाने कितने जासूसी नॉवेल मन ही मन में लिख मारे और छपवा भी डाले और बड़े-बड़ों से लोकार्पण भी करवा डाले. इस बीच कभी कभार जोर मारा तो कविता, तुकबंदियों और व्यंज़लों का संग्रह भी आ गया.

मगर, वास्तविक में, प्रिंट में छपवाने के मंसूबे तो मंसूबे ही रह गए थे. बहुत पहले एक स्थापित लेखक की एक और कृति बढ़िया प्रकाशन संस्थान से छपी और लोकार्पित हुई. एक समीक्षक महोदय ने प्राइवेट चर्चा में कहा – सब सेटिंग का खेल है. देखना ये किसी कोर्स में लगवाने की जुगत कर लेंगे. वो किताब कोर्स में लगी या नहीं, मगर किताब छपवाने में भी सेटिंग होती है ये पहली बार पता चला.

एक बार एक कहानीकार मित्र महोदय चहकते हुए मिल गए. उनके हाथों में उनका सद्यःप्रकाशित कहानी संग्रह था. एक प्रति मुझे भेंट करते हुए गदगद हुए जा रहे थे. मैंने बधाई दी और कहा कि अंततः आपके संग्रह को एक प्रकाशक मिल ही गया. तो थोड़े रुआंसे हुए और बोले मिल क्या गए, मजबूरी में खोजे गए. संग्रह की 100 प्रतियों को बड़ी मुश्किल से नेगोशिएट कर पूरे पंद्रह हजार में छपवाया है.

मेरे अपने संग्रह के छपने के मंसूबे पर पंद्रह हजार का चोट पड़ गया. तो, हिंदी किताबें ऐसे भी छपवाई जाती हैं? एक अति प्रकाशित लेखक मित्र से इस बाबत जाँच पड़ताल की तो उन्होंने कहा – ऐसे भी का क्या मतलब? हिंदी में ऐसे ही किताबें छपवाई जाती हैं.

अपनी हार्ड अर्न्ड मनी में से जोड़-तोड़ कर, पेट काट कर, बचत कर और पत्नी की चंद साड़ियाँ बचाकर मैंने जैसे तैसे पंद्रह हजार का जुगाड़ कर ही लिया. अब तो मेरा भी व्यंज़लों का संग्रह आने ही वाला था. मैंने प्रकाशक तय कर लिया, कवर तय कर लिया, लेआउट तय कर लिया, व्यंजलों की संख्या तय कर ली, मूल्य – दिखावे के लिए ही सही – तय कर लिया, किन मित्रों को किताबें भेंट स्वरूप देनी है और किन्हें समीक्षार्थ देनी है यह तय कर लिया. बस, संग्रह के लिए व्यंज़लों को चुनने का काम रह गया था, तो वो कौन बड़ी बात थी. दस-पंद्रह मिनट में ही ये काम हो जाता. बड़ी बात थी, संग्रह के लिए दो-शब्द और भूमिका लिखवाना. तो इसके लिए कुछ नामचीन, स्थापित मठाधीश लेखकों से वार्तालाप जारी था.

अंततः यह सब भी हो गया और मेरी किताब, मेरी अपनी किताब, मेरी अपनी लिखी हुई किताब छपने के लिए चली गई. अपना व्यंजल संग्रह छपने देने के बाद मैं इत्मीनान से ये देखने लग गया कि आजकल के समीक्षक आजकल प्रकाशित हो रही किताबों की समीक्षा किस तरह कर रहे हैं और क्या खा-पीकर कर रहे हैं.

एक हालिया प्रकाशित किताब की चर्चित समीक्षा पर निगाह गई. यूँ तो आमतौर पर समीक्षकों का काम कवर, कवर पेज पर राइटर और अंदर बड़े लेखक की भूमिका में से माल उड़ाकर धाँसू समीक्षा लिख मारना होता है, मगर यहाँ पर समीक्षक तो लगता है कि पिछले कई जन्म जन्मांतरों की दुश्मनी निकालने पर आमादा प्रतीत दीखता था. उसने हंस के अभिनव ओझा स्टाइल में किताब की फ़ुलस्टॉप, कॉमा, कोलन, डेश, इन्वर्टेड कॉमा में ही दोष नहीं निकाले बल्कि अक्षरों और वाक्यों के अर्थों के अनर्थ भी निकाल डाले और किताब को इतना कूड़ा घोषित कर दिया कि किताब छपाई को पेड़ों और काग़ज़ की बर्बादी और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव भी बता दिया. लगता है कि समीक्षक महोदय का सदियों से विज्ञापनों की सामग्री से अटे पड़े टाइम्स, वॉग और कॉस्मोपॉलिटन जैसे अख़बारों-पत्रिकाओं का साबिका नहीं पड़ा था.

बहरहाल, मुझे अपने व्यंज़ल संग्रह की धज्जियाँ उड़ती दिखाई दीं. मैं वापस प्रकाशक के पास भागा. मैंने प्रकाशक को बताया कि मैं अपनी किताब किसी सूरत प्रकाशित नहीं करवाना चाहता. प्रकाशक बोला कि भइए, अभी कल ही तो आप खुशी खुशी आए थे, और आज क्या हो गया? मैंने प्रकाशक से कहा – भइए, आप मेरी किताब छाप दोगे तो वनों का विनाश हो जाएगा. पर्यावरण का कबाड़ा हो जाएगा. नेट पर फ़ॉन्ट साइज और पृष्ठ का रूप रंग तो प्रयोक्ता अपने हिसाब से सेट कर लेता है. मेरी किताब में यदि किसी समीक्षक को फ़ॉन्ट साइज नहीं जमी तो वो तो उसे पूरा कूड़ा ही बता देगा. मुझे नहीं छपवानी अपनी किताब. प्रकाशक अड़ गया. बोला किताब भले न छपे, पैसे एक घेला वापस नहीं मिलेगा. मैं सहर्ष तैयार हो गया. मैं सस्ते में छूट जो गया था!

भगवान ने खूब बचाया. ऐसे समीक्षकों से!! भगवान, तेरा लाख लाख शुक्रिया. सही समय सद्बुद्धि दे दी थी.

"....अगर हमारे देश में भ्रष्टाचार नहीं होता तो आज हमारी तस्वीर संसार के विश्वपटल पर कुछ और ही होती। सरकार में बैठे लोग चाहे मंत्री हों या अधिकारी ईमानदारी और शिष्टाचार के तहत कुछ नहीं करते। २००४ में सर्वप्रथम यह हिन्दी सॉफ़्टवेयर मैंने प्रदेश सरकार के एक सचिव स्तर के अधिकारी को दिखाए थे। उन्होंने वल्लव भवन में अपने चैम्बर में मुझसे कहा था की आपका हिन्दी सॉफ़्ट्वेयर का कार्य बहुत अच्छा है, लेकिन आप यहाँ जिस कुर्सी पर बैठे हैं वहाँ माइक्रो***** जैसी कम्पनी वाले भी आकर बैठते हैं जोकि हम पर करोड़ों रूपये खर्च करते हैं। आपसे हमें क्या मिलेगा?तो मैंने कहा था, मैं क्या दे सकता हूँ, आप तो जानते हैं मैं तो एक साधारण से किसान परिवार से हूँ।” तो उस अधिकारी ने बहुत ही रूखा व्यवहार किया था और देश के लाखों लोगों के काम आ सकने वाले मेरे कार्य को इस अधिकारी ने फ़ाइलों में ही दबा दिया..."  आगे पढ़ें >>>

jagdeep dangi

यह बात हिंदी सॉफ़्टवेयर डेवलपर जगदीप डांगी ने अपने ताज़ा साक्षात्कार में कही है. साक्षात्कार में जगदीप ने हिंदी कंप्यूटिंग पर और भी बहुत सी बेबाक बातें कही हैं. पूरा साक्षात्कार आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं.

हिंदी ब्लॉग, ब्लॉगिंग और ब्लॉग-मित्रों की, ब्लॉग-मित्रों से बातें - गिरीश बिल्लौरे मुकुल तथा विजय तिवारी किसलय के साथ :

 

(शुरू के कुछ मिनट ऑडियो बेहद धीमा है, मगर बाद में ठीक है. आप चाहें तो शुरू के 4-5 मिनट स्किप कर सकते हैं)

इसी प्रवास के कुछ और लाइव वीडियो -

इस लाइव वीडियो को अपने सेल फ़ोन से लाइव किया विजय तिवारी किसलय ने :

.Bambuser | देवर्षि  नारद  पत्रकारिता  सम्मान  समारोह  जबलपुर  (विजय तिवारी 5)

और

ऊपर दिए लाइव वीडियो के प्रारंभिक भाग की कड़ी -

http://bambuser.com/v/1657858 

(इस वीडियो में साउंड की कुछ समस्या है, अतः अग्रिम क्षमा)

जबलपुर की शाम यादगार बनाने हेतु भाई विजय व भाई गिरीश का हार्दिक धन्यवाद.

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(पुराना याहू! मेल)

याहू! मेल का प्रयोग करते हुए 11 वर्ष कब बीत गए पता ही नहीं चला. बीच में याहू! मेल में स्पैम ईमेलों की भरमार होने और हिंदी समेत तमाम अन्य सुविधाओं के अंतर्निर्मित होने व प्रमुख रूप से पॉप-3 एक्सेस की सुविधा होने से जीमेल पर पूरी तरह शिफ़्ट हो गया, परंतु कुछ पुराने खातों को मेंटेनेंस और द्वितीय, वैकल्पिक ईमेल की सुविधा के चलते याहू! मेल खाता चलता रहा और महीने पंद्रह दिनों में वहाँ झांकता रहा था.

पर इधर कुछ दिनों से मैं देख रहा था कि याहू! ईमेल में स्पैम ईमेलों की संख्या नगण्य सी हो गई है. तभी से लग रहा था कि याहू! मेल शायद किसी समय कमबैक करे. और आज ये नोटिस मिला -

Dear ravi,
We appreciate that you have been with Yahoo! Mail for the past 11 years. We are looking forward to bringing you an even faster, safer, easier-to-use Yahoo! Mail very soon.
If you’ve already upgraded to the latest Yahoo! Mail, thank you.
If not, in about a month from the date of this email, when you sign in to your Yahoo! Mail account, we will ask you to upgrade to the newest version of Yahoo! Mail. At that time, your current version of Yahoo! Mail will no longer be available. But you don't have to wait. You can have the newest Yahoo! Mail today.
You can upgrade now to the newest Yahoo! Mail if your browser is Internet Explorer 7, Firefox 3, Safari 4, or Chrome 5, or newer.

और मैंने अपग्रेड नाऊ का विकल्प चुना तो पाया कि याहू! मेल का नया अवतार तो वाकई काबिले तारीफ है. साफ सुथरा रूप, तेजी से लोड होते पन्ने और उपयोग में बेहद आसान.

घूरे के भी दिन फिरते हैं?

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नया याहू! मेल

हाँ भई, हाँ.

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माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़ प्लेटफ़ॉर्म में चहुंओर हिंदीकरण हो रहा है. ऑपरेटिंग सिस्टम स्तर से लेकर ऑफ़िस अनुप्रयोग और प्रोग्रामिंग हेतु भी हिंदी में इंटरफ़ेस उपलब्ध करवाए जा रहे हैं. बहुतों को शिकायत रहती है कि अनुवाद का स्तर ठीक नहीं है या अनुवाद सही नहीं हुआ है या अनुवाद और कहीं बेहतर हो सकता है. हिंदी कंप्यूटिंग की बेहतर एडॉप्टिबिलिटी के लिए व  अनुवादों का स्तर बढ़ाने में तथा गलतियों को सुधारने में आम जनता से जो हिंदी कंप्यूटिंग प्रयोग करती है, मदद चाही गई है.


आप भी माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़ की हिंदी सुधारने में मदद कर सकते हैं.


आपको क्या करना होगा?


आसान है. आपको नीचे दिए गए यूआरएल में जाकर विंडोज़ लाइव खाता से लॉगिन करना होगा.


http://www.microsoft.com/language/mtcf/mtcf_glossary.aspx?s=4&langid=2179&cult=hi-HI

वहाँ पर आप दिए गए तकनीकी शब्दों के वर्तमान अनुवाद को देखें और यदि आपको लगता है कि अनुवाद बेहतर हो सकता है तो अपने विकल्प सुझाएँ. यदि आपका विंडोज़ लाइव खाता नहीं है तब भी कोई बात नहीं आप खाता बना सकते हैं या फिर गेस्ट के रूप में वर्तमान अनुवादों को देख सकते हैं.

ध्यान दें कि जितने ज्यादा किसी विकल्प के लिए वोट पड़ेंगे उतने ही ज्यादा उस अनुवाद को स्वीकृत किए जाने के अवसर होंगे.

अन्य विवरण यहाँ देखें -
http://www.microsoft.com/language/mtcf/mtcf_home.aspx?s=1&langid=2179&cult=hi-HI

ध्यान दें कि यह अवसर सिर्फ ९ मई से ३ जून तक ही 
उपलब्ध है

यह चित्र देखें -​



यहां एक  प्रविष्टि पर २२६ टिप्पणियाँ दर्ज हैं.​
शुरू के १०-१५ तो जेनुइन हैं, और उसके बाद के सारे के सारे स्पैम. फर्जी साइटों के लिंक लिए हुए.​

अगर आप अपनी टिप्पणियों को माडरेट नहीं करते हैं तो चेत जाइए. देखिए कि आपके चिट्ठे की पुरानी पोस्टों में ऐसे स्पैम कमेंट डेरा डाले तो नहीं बैठे हैं.​

यह जाँच प्रविष्टि लिपिक.इन (http://lipik.in/hindi.html) के आनलाइन इनस्क्रिप्ट (​आप रेमिंगटन यानी कृतिदेव और फ़ोनेटिक में भी लिख सकते हैं) हिंदी टाइपिंग औजार के जरिए बिना हार्ड ड्राइव युक्त नोटबुक कंप्यूटर (हार्डड्राइव खराब हो गया तो यूएसबी पेन ड्राइव प्रयोग में) में बूटेबल लिनक्स मिंट यूएसबी पेन ड्राइव के जरिए, रिलायंस डेटा कार्ड का प्रयोग करते हुए यात्रा के बीच लिखा जा रहा है.​\

टेक्नोलाजी वाकई एडवांस हो गई है. एक मरते हुए नोटबुक को काम लायक जिंदा देखना, वो भी ब्राउजर में उपलब्ध सारे संसाधनों के जरिए. रोचक, अचंभित करने वाला अनुभव है.

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व्यंज़ल

अचरज है ये मुद्दा नहीं है

मुद्दा है कि ये मुद्दा नहीं है.

 

जवाब सबको मालूम हैं

सवाल कोई मुद्दा नहीं है.

 

समस्या तो कुरसी की  है

यूँ और कोई मुद्दा नहीं है.

 

भूखे पेट, सड़ते अनाज

कमाल है ये मुद्दा नहीं है

 

जीतना तो है रवि को

कि कैसे, ये मुद्दा नहीं है.

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hindi-Blogging-book

"हिंदी ब्लॉगिंग का विस्तृत दस्तावेज़..."  - डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल.

कोई पौने चार सौ पृष्ठों की इस किताब में हिंदी ब्लॉगिंग के तमाम छुए-अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है. किताब वस्तुतः हिंदी ब्लॉगिंग के विविध आयामों में जमे और डटे ब्लॉगरों की लिखी सामग्री को लेकर संपादित व संयोजित किया गया है.  एक तरह से यह ब्लॉग, खासकर हिंदी ब्लॉग के लिए रेफरेंस बुक की तरह है, जहाँ आपको हिंदी ब्लॉगिंग के तकनीकी पहलुओं से लेकर इसकी सर्जनात्मकता और आर्थिकता आदि तमाम दीगर पहलुओं पर विस्तृत आलेख मिलेंगे.

विविध विषयों पर विद्वान लेखकों का अपनी अपनी शैली में लेखन किताब को न सिर्फ पठनीय बनाता है, बल्कि रोचक और जानकारी परक भी है. अलबत्ता कहीं कहीं कथ्य और विषय में दोहराव है, मगर यह इसलिए भी जरूरी है कि किसी पाठ्य पुस्तक में कोई चैप्टर ठीक से समझ नहीं आता तो विद्यार्थी किसी अन्य लेखक की किताब का संदर्भ भी अपने फंडे क्लीयर करने में लेता है. तो यही बात यहाँ भी लागू है. ब्लॉगिंग के कुछ मूलभूत बातों को हर किसी ने अपने अपने एंगल और अपनी लच्छेदार शैली में बताने की भरपूर कोशिश की है. बहुत सा मसाला यूं तो नेट पर भी मिल सकता है, जिसे संबंधित लेखकों ने अलग अलग समय पर अपने ब्लॉगों या अन्यत्र कॉलमों में भी लिखा है. फिर भी, संपादन व संयोजन काबिले तारीफ है और इसके लिए संपादक द्वय अविनाश वाचस्पति और रवींद्र प्रभात बधाई व साधुवाद के पात्र हैं.

तो, यदि आप हिंदी ब्लॉगिंग में हैं, तो इस किताब को बाई, बोरो ऑर स्टील के तर्ज पर कहीं से भी हासिल कर पढ़ना ही चाहिए, और न सिर्फ पढ़ना चाहिए, एक अदद किताब रेफरेंस मटेरियल के तौर पर रखना चाहिए. कौन जाने कब किस संदर्भ सामग्री की जरूरत पड़ जाए!

 

हाथ कंगन को आरसी क्या? ये रही किताब की  अनुक्रमणिका -

 

तकनीकी खंड

यूनिकोड हिंदी टाइपिंग से परिचय - ई पंडित श्रीश शर्मा ।

आओ ब्लॉग बनाएँ - शाहनवाज सिद्दिकी

सजना है मुझे रीडर के लिए - चंडीदत्त शुक्ल

ब्लॉग की बेलाग दुनिया – चिराग जैन

हिंदी ब्लॉगिंग के तकनीकी पहलू - शैलेश भारतवासी

यूनिकोड तक पहुँचने के काँटो भरे रास्ते - रवि-रतलामी

मोबाइल फ़ोन/टैबलेट कंप्यूटर में हिंदी समर्थन - ई पंडित श्रीश शर्मा

जी-मेल में महत्त्वपूर्ण र्ईमेलों को कंप्यूटर पर कैसे सेव करें – कुन्नु सिंह

आप अपने ब्लॉग का अपना एसएमएस चैनल बनाएँ - विनयप्रजापति

वायस ब्लॉगिंग : बेकरार आवाज में असर के लिए - पीयूष पांडे

आपका लाइव होना जिंदादिली का नाम है – गिरीश बिल्लौरे मुकुल

ई-मेल में पोस्ट खुद आती है - बी एस पाबला

कैसे बढ़ाएँ ब्लॉग ट्रैफिक? – रतनसिंह शेखावत

 

ब्लॉग प्रसंग

हिंदी ब्लॉग : सृजन संकट और कुछ उम्मीदें - सिद्धेश्वरसिंह

आदमी को आदमी से जोड़ रही है हिंदी ब्लॉगिंग - सुरेश यादव

प्रकाशन की समस्या का अंत है हिंदी ब्लॉगिंग – पवनचंदन

हिंदी ब्लॉगिंग : रचनात्मक अभिव्यक्ति के विविध आयाम - केवलराम

संचार खंड

विश्व से जोड़ता ब्लॉगिंग माध्यम- शिवम मिश्र

ब्लॉगिंग की ताकत – खुशदीप सहगल

हिंदी ब्लॉगिंग से गले मिलें – सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी

जानिए, अपने प्रारंभिक ब्लॉगरों को - रवींद्र प्रभात

हिंदी ब्लॉगिंग : पालने में ही दहाड़ता पूत अजय कुमार झा

हिंदी ब्लॉगिंग को सही और सकारात्मक दिशा की दरकार – मनोज पांडेय

 

विमर्श खंड

हिंदी भाषा और साहित्य में चिट्ठाकारिता की भूमिका – रवींद्र प्रभात

ब्लॉगिंग का सामाजिक और साहित्यिक पक्ष - पूर्णिमा वर्मन

मानवीय सर्जना का नवोन्मेष है हिंदी ब्लॉगिंग - गिरीशपंकज

हिंदी ब्लॉगिंग को परिवर्तन के एक ताकतवर हथियार के रूप में ढालने की जरूरत है - प्रमोद तांबट

पारस्परिक संवाद का सशक्त माध्यम है हिंदी ब्लॉगिंग – अविनाश वाचस्पति

वैकल्पिक मीडिया का नया अवतार – अजित राय

हिंदी ब्लॉगिंग का आर्थिक पक्ष – प्रतीक पांडे

यूनिकोड एक ऐसी कोडिंग प्रणाली जिसमें विश्व की सभी जीवंत भाषाएँ समाहित हैं -विजय के मल्होत्रा

ब्लॉग पर हिंदी साहित्य – अखिलेश शुक्ल

हिंदी ब्लॉगिंग में विज्ञान लेखन की संभावनाएँ – शास्त्री जे सी फिलिप

न्यू मीडिया : सभावनाएँ और चुनौतियाँ – कनिष्क कश्यप

हिंदी ब्लॉगिंग में विज्ञान लेखन - डॉ. अरविंद मिश्र

अंतरजाल पर कविता की दुनिया : कविता का बाजार – अरविंद श्रीवास्तव

हिंदी ब्लॉगिंग में काव्य सृजन की संभावनाएँ – रश्मि प्रभा

चिट्ठाकारिता और उसके कारक तत्व - पद्मसिंह

ब्लॉगिंग और कार्टून विधा - काजल कुमार

समाज निर्माण में ब्लॉगिंग और उसकी रचनात्मकता का योगदान – जयकुमार झा

ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति का एक सरल सहज और सशक्त माध्यम - वाणीशर्मा

बाजारवाद के इस दौर में हिंदी ब्लॉगिंग की भूमिका – एडवोकेट रणधीर सिंह सुमन

एक ऐसा माध्यम जिसकी न कोई सीमाएँ हैं न कोई बंधन – शिखा वार्ष्णेय

हिंदी ब्लॉगिंग में अर्थ जगत की गतिविधियाँ - विवेक रस्तोगी

लेखन का अनुभव और सार्थक ब्लॉगिंग – आशीष कुमार अंशु

हिंदी ब्लॉगिंग का सामाजिक व सृजनात्मक पक्ष डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

हिंदी ब्लॉगिंग में आधी दुनिया का यथार्थ – रेखा श्रीवास्तव

ब्लॉग की धार तीखी और मार गहरी होती है – ललित शर्मा

सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में हिंदी ब्लॉगिंग – वंदना गुप्ता

वास्तविक या आभासी – फौजिया रियाज

नागरिक पत्रकारिता का मजबूत स्तंभ बन सकता है ब्लॉग – उमाशंकर मिश्र

हिंदी ब्लॉग की चुनौतियाँ – उमेश चतुर्वेदी

सामाजिक सरोकार समझें ब्लॉगर – डॉ. सुभाष राय

 

विश्लेषण खंड

हिंदी ब्लॉगिंग में महिलाओं की स्थिति – रवींद्र प्रभात

ब्लॉगिंग : आनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति - बालेंदु शर्मा दाधीच

हिंदी ब्लॉगिंग का तेजी से बढ़ता सृजनात्मक दायरा – आकांक्षा यादव

नेट से आगे पहचान और भी है - चंडीदत्त शुक्ल

परिचर्चाखंड

ब्लॉग पर साहित्य की सार्थकता – रवींद्र प्रभात

ब्लॉग, जो पूरे फिल्मी हैं चंडीदत्त शुक्ल

संस्मरण खंड ब्लॉगिंग में तीन साल – ज्ञानदत्त पांडेय

ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का अद्भुत माध्यम – अनूप शुक्ल

हिंदी ब्लॉगर और प्रिंट मीडिया – जाकिर अली रजनीश

ब्लॉगर की दिनचर्या पत्नी की जुबानी – रचना त्रिपाठी

साक्षात्कार खंड

हिंदी ब्लॉगिंग छोटा सा समाज है – समीर लाल समीर

हिंदी ब्लॉगिंग को अभी परवरिश की दरकार है – दिविक रमेश

हिंदी के नए सूर और तुलसी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे - रवि-रतलामी

आज इंटरनेट सामान्य जीवन का अंग बन चुका है – जी.के. अवधिया

ब्लॉगिंग का व्यसन की तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए - प्रेमजनमेजय

साहित्य अकादमी की तरह ब्लॉगिंग अकादमी भी बने – अलबेला खत्री

ब्लॉगरों को सामूहिक ब्लॉग से जुड़कर अनुभव लेना चाहिए – अविनाश वाचस्पति

आज हिंदी ब्लॉगिंग समानांतर मीडिया का रूप ले चुका है – अमरजीत कौर

वर्चुअल टेक्नोलाजी में जबरदस्त सामर्थ्य है - गौहर रजा

ब्लॉगिंग आत्म प्रचार की नई तकनीक है – कृष्ण बिहारी मिश्र

वर्चुअल दुनिया का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर स्थायी होता है – अंबरीश अंबर

हिंदी ब्लॉगिंग ने परस्पर संवाद व विचार विमर्श के नए रास्ते खोले हैं - शकील सिद्दीकी

ब्लॉग, ब्लॉगर और ब्लॉगिंग : एक प्रश्नोत्तरी – सुषमा सिंह

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पुस्तक के  विषय, अध्याय व लेखक ही किताब की परिपूर्णता की कहानी बयाँ कर देते हैं.

अन्य विवरण -

हिंदी ब्लॉगिंग - अभिव्यक्ति की नई क्रांति

आईएसबीएन नं - ISBN 978-93-80916-05-7

संपादक - अविनाश वाचस्पति एवं रवीन्द्र प्रभात

प्रकाशक - हिंदी साहित्य निकेतन

16 साहित्य विहार, बिजनौर उप्र - फोन 01342 - 263232

ईमेल - GIRIRAJ@HINDISAHITYANIKETAN.COM

पृष्ठ - 375, मूल्य 495.00 रुपए.

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