वरूण के लिए, माया – शूर्पणखा तो माया के लिए, निःसंदेह वरूण – रावण. माने, चोर चोर सगे भाई!!!
व्यंज़ल
कोई जोकर, कोई शूर्पणखा तो कोई रावण
राजनीति में यारों कम पड़ते हैं पत्ते बावन
मेरा भी मकां होता सत्ता के गलियारो में
सुना है तो वहां होता है बारहों मास सावन
मैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
कहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन
बंदा हो या कोई खुदा हो या हो कोई फ़कीर
मिला है कभी किसी को उसका मन भावन
जनता तो सो रही है चादर तान के रवि
भले ही हद से जा रही हो सियासती दावन
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बहुत खूब! बहुत खूब!
प्रत्युत्तर देंहटाएंसत्य व्यंजल
प्रत्युत्तर देंहटाएंwah wah
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahoot sahi
चोर चोर मौसेरे भाई नहीं जी बल्कि कहिए चोर चोर भाई-बहिन :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज की राजनीति पर व्यंग्य करती इस कविता में उपहास, ठिठोली और क्रीड़ापरकता के साथ आक्रमकता भी है जो इसे विशेष दर्जा प्रदान करती है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसच मे बावन पत्ते भी कम है नेताओ के लिये
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन
.... सुन्दर रचना,प्रसंशनीय!!!!
बहुत खूब...!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत अच्छी प्रस्तुति।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइसे 13.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
सही व्यंग्य!! यहाँ तो सभी मुखोटाधारी ही मिलेगें...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
कहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन
चिंता न करो रवि जी . एकदिन यही देश सभी रावनों सूर्पंखाओं को ख़त्म करेगा . यदा यदाहि धर्मस्य...........
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