टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

2009

वैसे तो इस तरह की सुविधा आई-गूगल इत्यादि (व्यक्तिगत पन्नों) में भी है, और बहुत पहले से है. मगर समाचार साइटों में ऐसी सुविधा हिन्दी साइटों में अब तक नहीं थी. अंग्रेज़ी समाचार साइटों – जैसे कि बीबीसी अंग्रेज़ी में कुछ समय से ऐसी सुविधा उपलब्ध थी.  तरकश.कॉम जिसे हाल ही में प्रतिष्ठित मंथन पुरस्कार भी मिला है, में ऐसी सुविधाओं को हाल ही में जुटाया गया है. अब आप इस साइट के मुख पृष्ठ की सामग्री को अपने रुचि अनुरूप विषयों से सजा संवार सकते हैं और जिन विषयों में आपको रूचि नहीं है, उन्हें आप निकाल बाहर कर सकते हैं.

उदाहरण के लिए, तरकश का डिफ़ॉल्ट पन्ना:

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मेरी रूचि तो, विज्ञान में है -

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और ये कुछ और विषय बन्द!

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तो, अगर आपको लगता है कि तरकश सेमी पॉर्न परोस रहा है, तो ऐसे विषयों को नजरों से कर दें बाय-बाय.

स्पैनर, एंकर, तीर के निशान और रेडियो चयन बटनों से आप तरकश के अपने होम पेज की अपनी सेटिंग बदल सकते हैं. पूरा, विस्तृत  ट्यूटोरियल यहाँ देखें. ध्यान दें कि यह सुविधा सिर्फ मुख पृष्ठ (होम पेज) पर ही उपलब्ध है, भीतर के पन्नों में नहीं.

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सबसे पहले एक सत्य कथा. मेरे एक मित्र कलाकार हैं. केनवस पर चित्र उकेरते हैं. बहुत पहले जब वे जमने के लिए संघर्ष कर रहे थे तब का वाकया है. एक मर्तबा अपनी कलाकृतियों को लेकर वे दिल्ली की किसी आर्टगैलरी को जा रहे थे और ऑटो में अपना कैनवास इत्यादि चढ़ा रहे थे. इतने में उनके गहरे रंग के शर्ट पर ऊपर उड़ रही चिड़िया का सफेद बीट गिरा. मित्र परेशान हुए कि ये क्या! उनके कुर्ते का सत्यानाश हो गया. पर ऑटो चालक ने दिलासा दिया – भइए, रंज न करो. आज तुम्हारा भाग्य जग गया. आज तो तुम्हें पैसा मिलेगा. संयोगवश, उस दिन उन मित्र की एक पेंटिंग, किसी प्रदर्शनी में पहली मर्तबा अच्छे, मुंह-मांगे दामों में बिकी.

तो, सवाल उठता है कि क्या पक्षियों की बीट से किसी तरह की भविष्यवाणी संभव है? यदि हम अपने कार के शीशे या झक सफेद कुर्ते पर चिड़ियों की बीट पर अपने भाग्योदय संबंधी बात न करें और कुछ वैज्ञानिक आख्यानों के पूर्वानुमानों की बातें करें, तो कह सकते हैं कि हाँ!

अचानक ही मेरे हाथ में एक किताब आई, जिसका शीर्षक है – व्हाट बर्ड डिड दैट? इस किताब में बेहद मनोरंजक और ज्ञानवर्धक तरीके से यह बताया गया है कि आपके कार के छत या विंड स्क्रीन पर या कहीं और भी, चिड़ियों के बीट के आकार प्रकार और रूप रंग के आधार पर पूर्व के वैज्ञानिक अध्ययनों से तुलना कर उन चिड़ियों की जातियों, निवास, खानपान इत्यादि के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है. किताब में चालीस से अधिक चिड़ियों की बीट के सुंदर चित्रों – जी हाँ, सुंदर चित्रों सहित चिड़ियों का वर्णन किया गया है.

bird droppings

किताब में यह भी बताया गया है कि चीन के चिड़ियों के व्यापारी किस तरह से अपने चिड़ियों को कोई टॉप सीक्रेट दाना चुगाते थे जिससे उनकी चिड़िया स्वर्ण रंग की बीट करती थीं. किताब ने मेरा ज्ञान बढ़ाया कि न्यूजीलैण्ड में पहली मर्तबा कुछ लुप्त प्राय: चिड़ियों की बीट के चित्र युक्त डाक टिकट जारी किए गए.

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और, क्या आपको पता है कि चिड़िया के बीट कलाकृतियों के अनुपम उदाहरण होते हैं? कुछ अधुनातन अमूर्त चित्रणों को देखेंगे तो आप पाएंगे कि इससे बेहतर चित्रकारी तो चिड़ियाएं अपने बीटों से उड़ते उड़ते ही (ऑन द फ़्लाई) ही कर लेती हैं!

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ये सब और बहुत कुछ इस किताब में हैं. पर्यावरण और पक्षी प्रेमियों के लिए तो लाजवाब.

 

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व्हाट बर्ड डिड दैट

लेखक द्वय : पीटर हंसर्ड व बर्टन सिल्वर

टेन स्पीड प्रेस, केलिफ़ोर्निया, यूएसए

आईएसबीएन नं. 0-89815-427-8

अमेजन.कॉम पर कीमत – 79.00 डॉलर

किताब के कुछ पृष्ठ आप यहाँ पर देख सकते हैं.

वैसे तो पोस्टरस की हिन्दी क्षमता की जाँच परख 23 मई 2009 को ही कर ली गई थी, मगर तब कुछ नुक्स नजर आए थे. अभी दोबारा कुछ जांच परख करने पर पाया गया कि यह हिन्दी ब्लॉग पोस्टिंग के लिए एक दम चुस्त दुरूस्त होकर तैयार हो गया है.

जैसा कि पोस्टरस द्वारा दावा किया गया है – ब्लॉग पोस्ट करना इससे आसान नहीं हो सकता. सही है. न तो आपको खाता खोलने की जरूरत न ही पंजीकृत होने की. न टैम्प्लेट, ब्लॉग नाम इत्यादि कि चिंता और झंझट. बस, अगड़म बगड़म पोस्ट लिखकर एक ईमेल post@posterous.com को भेजें और आपकी ब्लॉग प्रविष्टि बन कर तैयार. ब्लॉग प्रविष्टि की लिंक के बारे में आपको वापस ईमेल भेज कर बताया जाएगा. किसी ईमेल खाते से पहली बार भेजेंगे तो आपका ब्लॉग भी स्वयं बन कर तैयार हो जाएगा.

और, आप ब्लॉग में चित्र, एमपी3 या वीडियो भी जोड़ सकते हैं – बस अपने ईमेल में इनका अटैचमेंट लगा दीजिए. ब्लॉग पाठ को गाढ़ा, मोटा, रंगीन, तिरछा भी बना सकते हैं.

ये रही जाँच पोस्टें -

मेरे ईमेल खाते से बनाया व थोड़ा सजाया संवारा गया -

http://raviratlami.posterous.com/ 

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और ये रचनाकार ईमेल खाते से सादा ईमेल भेज कर बनाया गया ब्लॉग -

http://ravishankar-zuucd.posterous.com/

 

पर, ये जानना रोचक होगा कि पोस्टरस को मिले स्पैम ईमेलों तथा हमारे एड्रेसबुकों के कॉन्टैक्ट के सारे ईमेलों को वायरस द्वारा स्वचालित भेजे या हमारे सेंड आल वाले ईमेल फारवर्डों को पोस्टरस कैसे प्रबंधित करता है!

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यह बोरीवली, बंबई मुम्बई, भारत महाराष्ट्र के रहने वाले एक मनसे कार्यकर्ता की टॉप सीक्रेट डायरी के कुछ पन्नों के संक्षिप्त अंश हैं.

मेरी डायरी का यह पहला पन्ना. परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना है कि मेरी इस डायरी के बारे में मेरे कॉमरेड ताजिंदगी कभी भी न जान पाएँ! क्योंकि यदि उन्हें पता चलेगा कि मैं इसे मराठी में नहीं, बल्कि हिन्दी में लिख रहा हूं, तो वो तो मुझे वडा पाव में दबा कर खा जाएं! हालांकि हिन्दी में लिखने का अलग मजा है क्योंकि बहुत से पार्टी सदस्य हिन्दी से घोर नफरत करते हैं, और उनके सामने इस डायरी को लहराने पर भी वे इसकी ओर देखेंगे भी नहीं. वे तो सिर्फ और सिर्फ मराठी देखने-पढ़ने के लिए प्रोग्राम्ड हैं!

कल का दिन हम सभी के लिए बहुत ही विशिष्ट और अच्छा गुजरा! हमने यूपी के दस भैयाओं को सुबह सुबह तब पकड़ लिया जब वे निपटने के लिए समुद्र किनारे जा रहे थे! हमने उन्हें अपने शानदार मराठी अलंकार “हलकट” से पुकारा और वहां से मार भगाया.

चूंकि शुरूआत शानदार रही थी, तो बाकी का दिन और भी बढ़िया गुजरना ही था. दोपहर में तो आज गुरूजी का भाषण था ना! गुरु रा* ठाकरे एमएनएस कार्यकर्ताओं की आमसभा को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने हम सभी कार्यकर्ताओं को निम्न सार्थक टिप्स दिए:

1 – दुनिया में जीवन के वर्गीकरण वो नहीं है जो अब तक बताया जाता रहा है – आदमी और जानवर. बल्कि असली वर्गीकरण है – मराठी माणूस और गैर मराठी माणूस.

2 – मुम्बई में आतंकवादी हमलों की बातें जो आम जनता करती है वो बेमानी है, और बरगलाया जाता है. दरअसल, यूपी के भैया ही असली आतंकवादी हैं, और मुम्बई पर उनके हमले नित्य जारी हैं.

3 – हम लोग भले ही महाराष्ट्र के राजा हैं, मगर यूपी-बिहार में अकेले कभी न जाएँ!

4- रेलवे का उपयोग बन्द कर दो. पहले रेल मंत्री बिहारी हुआ करता था, अब “बंगाली” है.

5 - यदि कोई फ़िल्म, किताब या कुछ भी आपको पसंद न आए, तो आप बस चिल्लाना चालू कर दो – यह मराठी माणूस के खिलाफ है. इस तरह से आपके पास पोस्टर, सिनेमाहाल, कार-बस-ट्रेन इत्यादि में तोड़फ़ोड़ करने और आगजनी करने का लाइसेंस मिल जाएगा.

इत्यादि... इत्यादि....

शाम बड़ी अफरातफरी भरी रही. भीड़ भड़क्के में देश के हर कोने से आए गैर मराठी मणहूसों से भिड़ते भिड़ाते, यूपी-बिहारी भैयाओं को दौड़ाते भगाते, उनके विरूद्ध नारे लगाते पूरी तरह थक हारकर घर पहुँचे. घर पर पता चला कि दादा जी जब बाजार से लौट रहे थे तो उनका एक्सीडेंट हो गया था. वो तो लगभग मर ही जाते यदि समय पर वहां उपस्थित भीड़ में से कुछ लोगों ने उनकी सहायता नहीं की होती और तत्काल चिकित्सा सुविधा मुहैया नहीं करवाई होती. दादा जी ने बताया कि उनमें से बहुत सारे लोग गैर मराठी माणूस थे. यह कितना अजीब है न कि जब उन लोगों ने मेरे दादा जी की मदद की तो न तो उन्होंने जात देखी न पांत. मराठी-बिहारी-यूपी तो बिलकुल ही नहीं देखी. गुरु रा* ठाकरे के बुद्धिमत्ता पूर्ण शब्द पता नहीं क्यों यहाँ लागू नहीं हुए, पर चुनावों के समय तो ये बढ़िया कमाल दिखाते हैं, नहीं तो हम दाएँ-बाएँ और बाजू की इत्ती सीटें कैसे जीत पाते?

तो इस तरह से आज का यह दिन घटना प्रधान गुजरा. शुभरात्रि मेरी डायरी!!

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(मूलत: पूअरजोक्स.कॉम पर ब्लॉग-ए-टन के तहत अंग्रेज़ी में All in a Day's Work. शीर्षक से प्रकाशित. हिन्दी अनुवाद की स्वीकृति देने के लिए निहारिका का धन्यवाद.)

अगर आप भी मेरी तरह अकसर अपने संलग्नकों को संलग्न करना भूल जाते हैं, तो इससे निजात पाने के लिए थंडरबर्ड अपना सकते हैं.

मॉजिल्ला थंडरबर्ड में नित्य नई ख़ूबियाँ जुड़ती जा रही हैं. सबसे बड़ी खूबी तो यह है कि आप इसमें जीमेल खाते को बड़ी आसानी से सिंक्रोनाइज कर सकते हैं – आईमैप और पॉप3 दोनों ही विधियों से, और ऑफलाइन काम कर सकते हैं. कुछ समय से थंडरबर्ड में जीमेल की तरह ही संलग्नकों के लिए रिमाइंडर सुविधा इसमें जोड़ी गई है. यही नहीं, अब आप इसमें संलग्नकों को जोड़ने से न भूल जाएं इसके लिए आपकी अपनी ही भाषा में कीवर्ड जोड़ने की भी सुविधा दी गई है. यह सुविधा थंडरबर्ड में तो वैसे कुछ समय से उपलब्ध है, मगर हिन्दी कीवर्डों पर यह ठीक से काम नहीं करता था. अब इसके नए संस्करण में हिन्दी कीवर्डों पर भी बढ़िया काम करता है.

मैं अकसर संलग्नकों को जोड़ना भूल जाता था और ईमेल लिखने के उपरांत भेजें बटन पर चटका लगा देता था. अब मैंने थंडरबर्ड में संलग्नक हेतु स्मरण दिलाने के लिए हिन्दी में ही संलग्न’ नाम से कीवर्ड जोड़ दिया है. अब जब भी मेरे ईमेल में संलग्न शब्द आता है, और यदि संलग्नक नहीं जुड़ा हुआ होता है तो यह मुझे स्मरण दिलाता है कि आपको कहीं संलग्नक तो नहीं लगाना है? यदि हाँ तो संलग्नक जोड़ें.

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थंडरबर्ड में संलग्नक हेतु हिन्दी में कीवर्ड जोड़ने के लिए मेन्यू में टूल्स > ऑप्शन्स पर जाएँ तथा प्रकट हुए विंडो में कंपोजिशन टैब पर चटका लगाएँ. वहां पर चेक फ़ॉर मिसिंग अटैचमेंट चयन बक्से पर क्लिक कर सही का निशान लगाएँ तथा कीवर्ड्स बटन पर क्लिक करें. नए प्रकट विंडो पर एड बटन को क्लिक करें. इनपुट बक्से में कीवर्ड – ‘संलग्न’  भरें और ओके बटन पर क्लिक करें.

अगली मर्तबा जब भी आप कुछ इस तरह ईमेल लिखेंगे – आपके लिए फ़ाइल संलग्न है... तो यह आपके लिखे में ‘संलग्न’ को समझ लेगा और नीचे किनारे पर आपको चेतावनी देगा – यदि आपने कोई संलग्नक नहीं जोड़ा है तो -

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चेतावनी को आप बख़ूबी अनदेखा कर सकते हैं यदि आपको संलग्नक नहीं जोड़ना है तो. और यदि भूल रहे हों तो थंडरबर्ड  के इस फ़ीचर का धन्यवाद करिए और संलग्नक जोड़िए.

हैप्पी थंडरबर्डिंग!

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अंग्रेज़ों भारत छोड़ो की तर्ज पर ये गुहार है. गुहार नहीं, बल्कि एक आंदोलन है. भारत के शीर्ष पर बैठे राजनेता द्वारा छेड़ा गया आंदोलन. ऐसे में भारतवंशियों को भारत लौटना ही चाहिए. वैसे भी, भारतवंशियों को भारत से बाहर किसी सूरत जाना ही नहीं चाहिए, और यदि चले गए हैं तो बिना देरी के, तुरंत वापस आ जाना चाहिए. बिना किसी आंदोलन या गुहार के उन्हें वापस आना चाहिए. भारतवंशियों के वापस भारत लौटने के बढ़िया, कुछ टॉप के कारण ये हो सकते हैं –

#1 – भारत की धूल भरी, गड्ढेदार, भीड़ भरी, सांडों और गायों से अटी-पटी, षोडशी नारी की कमर से भी पतली, सदैव जाम युक्त सड़कों का क्या मुकाबिला? सिक्स लेन की खाली सड़क पर गाड़ी दौड़ाने में भी कोई मजा है लल्लू?

#2 – सत्यम के राजू की याद है आपको? या ताजातरीन कोडा? बोफ़ोर्स और चारा घोटाला? हजारों करोड़ रुपए देखते ही देखते बना सकने की सुविधा किसी और देश में है? फिर क्यों बुड़बक की तरह बाहर चले गए हो? जल्द लौट आओ. भारतवंशियों, आपके टैलेंट की जरूरत भारत में बहुत है.

#3 – राजा-महाराजा तो बीते जमाने की बातें हैं? हो सकता है. पर यहाँ भारत में आप अब भी ठसके से राजा-महाराजा की तरह रह सकते हैं – दो शुद्ध सपाट तरीके हैं – नेतागिरी में उतर आइए संसद की कुर्सी कब्जाइये, या फिर सिविल सेवा जॉइन कर सरकारी अफसरी की कुर्सी कबाड़ लीजिए. नेतागिरी में तो फिर भी पाँच-साला चक्कर रहता है. सिविल सेवक तो भारत में ताउम्र महाराजा स्टाइल मार सकता है. फिर क्यों आप विदेशी नौकरी बजा रहे हैं?

#4 – अगर आप ऊंची जाति के हैं तो आप वापस आएँ, क्योंकि दुनिया में कहीं भी ऊँची जाति वालों को इतनी इज्जत नहीं मिलती. ऊंची जाति वालों, अपनी बेइज्जती करवाने, अपनी जाति को खाक में मिलाने विदेश चले गए हैं? हद है! इसी प्रकार, यदि आप बैकवर्ड जाति के हैं तो आपको तो तत्काल भारत लौटना ही चाहिए. तमाम किस्म के आरक्षण जैसी सुविधाएँ विदेशों में कहीं मिलती हैं भला?

#5 – अगर आप डॉक्टर हैं तो वापस आएं, क्योंकि पान-गुटका-तम्बाकू से लेकर नकली दूध-दवाई तक और मच्छर मक्खी से लेकर भारी भरकम जनसंख्या तक सभी तरह के कारणों से यहाँ मरीजों की कमी कभी नहीं होगी और आपका धंधा चकाचक चलेगा. अगर आप इंजीनियर हैं तो सरकारी ठेके के 85 प्रतिशत (यह बात तो स्व. राजीव गांधी भी सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर चुके थे) कमीशन आपको बुला रहे हैं. यदि आप वकील हैं तो यहाँ जाति-धर्म-पंथ इत्यादि के कभी न खत्म होने वाले झगड़े टंटे के मुकदमों की कमी नहीं है – मुकदमों के लिए तो बीस साल का वेटिंग लिस्ट अभी ही है....

वैसे तो सैकड़ा भर और भी धांसू कारण गिनाए जा सकते हैं, जिनके बिना पर विदेश जा बसे भारतीयों को वापस भारत आना ही चाहिए. मगर फोकट में लिस्ट लंबी करने से क्या फायदा. समझ तो वो भी रहे होंगे. बस उन्हें एक बार जोर से ललकारने की जरूरत है – भारतीयों, भारतवंशियों, भारत लौटो!

ठीक है, हर तरफ विंडोज 7 की चर्चा है, यह विक्रय के नए कीर्तिमान चहुँओर स्थापित कर रहा है, और आपके नए नवेले कम्प्यूटर पर भी विंडोज 7 आया हुआ है. सवाल ये है कि इसमें हिन्दी में काम कैसे करें?





विंडोज 7 में हिन्दी कुंजीपट कैसे इनेबल करें?

यह बेहद आसान है. विंडोज एक्सपी की तरह आपको हिन्दी कुंजीपट इंस्टाल करने के लिए अलग से इसके इंस्टालेशन सीडी इत्यादि की आवश्यकता नहीं होगी. विंडोज 7 में हिन्दी का अंतर्निर्मित समर्थन है. हिन्दी कुंजीपट इसमें पहले से ही इंस्टाल रहता है. इसे लागू करने के लिए आपको निम्न चरण अपनाने होंगे –

प्रोग्राम मेन्यू > कंट्रोल पैनल > में क्लिक करें, फिर नए विंडो में एडजस्ट योर कम्प्यूटर सेटिंग विंडो पर क्लिक करें. वहाँ पर क्लॉक, लैंगुएज, रीजन पर क्लिक करें तथा रीजन एंड लैंगुएज पर क्लिक करें. यहाँ आपको बहुत से विकल्प मिलेंगे. यहाँ पर चेंज कीबोर्ड आर अदर इनपुट मैथड को चुनें. एक नया विंडो खुलेगा जहाँ चेंज कीबोर्ड बटन पर क्लिक करें.







अब टैक्स्ट सर्विस एंड इनपुट लैंगुएजेस विंडो पर एड बटन पर क्लिक करें. आपके सामने एक नया विंडो प्रकट होगा – एड इनपुट लैंगुएज’ जिसमें सैकड़ो भाषाओं के कुंजीपट दिखेंगे.

यहाँ पर स्क्रॉल करते हुए नीचे जाएँ और हिन्दी इंडिया पर जाएँ और वहां + चिह्न पर क्लिक करें. वहाँ आपको बहुत से उपलब्ध विकल्प दिखेंगे. हिन्दी का दो ही विकल्प दिखेगा – इनस्क्रिप्ट तथा हिन्दी ट्रेडिशनल. दोनों ही इनस्क्रिप्ट कुंजीपट के रूप हैं. यदि आप इनस्क्रिप्ट प्रयोग करते हैं तब तो ठीक है, अन्यथा आपको कुछ दूसरा उपाय अपनाना होगा.


बहुत से लोग हिन्दी (अन्य भारतीय भाषाओं जैसे कि गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, मराठी, मलयालम, कन्नड इत्यादि भी) टाइप करने के लिए फ़ोनेटिक कुंजीपट का प्रयोग करते हैं. जैसे कि कमल टाइप करने के लिए वे अंग्रेज़ी में kamal या kml टाइप करते हैं. तो इस तरह का कुंजीपट आप विंडोज 7 में आसानी से लगा सकते हैं. आप भाषाइंडिया माइक्रोसॉफ़्ट इंडिक आईएमई 1/2 को इसमें आसानी से संस्थापित कर सकते हैं जिसमें 7 तरह के कुंजीपट – रेमिंगटन (कृतिदेव), फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट, वेबदुनिया इत्यादि से यूनिकोड हिन्दी में टाइप कर सकते हैं. इसी तरह आप बारहा (बरह) को भी संस्थापित कर उसका बढ़िया प्रयोग कर सकते हैं. कुछ अच्छे ऑनलाइन कुंजीपटों – मसलन गूगल, क्विलपैड यूनिनागरी इत्यादि का प्रयोग भी विंडोज 7 में आसानी से किया जा सकता है.

विंडोज 7 में नया हिन्दी फ़ॉन्ट (जैसे कि कृतिदेव) कैसे संस्थापित करें तथा इसमें एक से अधिक यूनिकोड हिन्दी में काम कैसे करें?



विंडोज 7 में यूनिकोड हिन्दी के बहुत से फ़ॉन्ट अंतर्निर्मित उपलब्ध हैं. एक्सपी व विस्ता में तो सिर्फ मंगल फ़ॉन्ट ही उपलब्ध था. विंडोज 7 में मंगल के अलावा कोकिला, उत्साह, अपराजिता इत्यादि फ़ॉन्ट भी सम्मिलित किए गए हैं. आप चाहें तो यहाँ से अन्य हिन्दी यूनिकोड फ़ॉन्ट भी डाउनलोड कर उनका प्रयोग अपने दस्तावेजों को सजाने संवारने के लिए कर सकते हैं.


अब सवाल ये है कि विंडोज 7 में हिन्दी (या कोई भी अन्य) के फ़ॉन्टों को कैसे इंस्टाल करें? विंडोज 7 में यह बेहद आसान है. बस आप किसी भी फ़ॉन्ट फ़ाइल पर दायाँ क्लिक करें और उपलब्ध संदर्भित मेन्यू में से इंस्टाल का विकल्प चुन लें. आपका नया फ़ॉन्ट त्वरित ही आपके अनुप्रयोगों में काम हेतु उपलब्ध हो जाएगा.

विंडोज 7 में एक हिन्दी फ़ॉन्ट की सामग्री दूसरे फ़ॉन्ट में कैसे बदलें?
रूपांतर, परिवर्तन इत्यादि अनुप्रयोग विंडोज 7 में बढ़िया चलते हैं. इसी तरह, तकनीकी हिन्दी खंड के ब्राउजर आधारित समस्त फ़ॉन्ट परिवर्तक भी बढ़िया काम करते हैं. डांगीसॉफ़्ट का फ़ॉन्ट परिवर्तक चलने में धीमा है, मगर यह शत प्रतिशत शुद्धता से फ़ॉन्टों को परिवर्तित करता है.



विंडोज 7 की भाषा – मेन्यू, मदद इत्यादि (यूआई – यूजर इंटरफेस) हिन्दी में कैसे करें?
इसके लिए आपको इसका हिन्दी भाषा का पैक इंस्टाल करना होगा. इसे यहाँ से डाउनलोड करें और संस्थापित करें. तत्पश्चात् प्रोग्राम मेन्यू > कंट्रोल पैनल > में क्लिक करें, फिर नए विंडो में एडजस्ट योर कम्प्यूटर सेटिंग विंडो पर क्लिक करें. वहाँ पर क्लॉक, लैंगुएज, रीजन पर क्लिक करें तथा रीजन एंड लैंगुएज पर क्लिक करें. वहाँ इंस्टाल आर अनइंस्टाल डिस्प्ले लैंगुएज चुनें. ब्राउज कम्प्यूटर चुनें और डाउनलोड की गई फ़ाइल को चुन लें. यदि आप नेट से कनेक्टेड हैं तो हिन्दी भाषा का पैक पहले से इंस्टाल करने की जरूरत भी नहीं है. यह विकल्प – आपको यहीं लांच विंडोज अपडेट के रूप में मिलेगा. उपलब्ध भाषा – हिन्दी चुनें और संस्थापित करें.


विंडोज 7 में हिन्दी अनुप्रयोग कहाँ से लाएँ और कैसे चलाएँ?
अब सवाल ये है कि आपने विंडोज 7 में हिन्दी कुंजीपट डाल लिया, इसकी भाषा हिन्दी कर दी. अब दूसरे हिन्दी के अनुप्रयोग कहाँ से लाएँ? तो आप केडीई हिन्दी 4.x के सैकड़ों अनुप्रयोगों को आप हिन्दी समेत अन्य दूसरे भारतीय भाषाओं में विंडोज 7 में आसानी से चला सकते हैं. कैसे? अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें.

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अब तक तो घरों के सामने नाम-पट्ट टंगता था, घरों के नाम या उसका अता-पता – गली, मोहल्ले, मकान का नंबर इत्यादि टंगता था. अब आदमी की अमीरी-गरीबी टंगा करेगी.

यदि आप गरीब हैं, तो अब आपको अपने घर पर लिख कर ये टाँगना पड़ेगा – ‘मैं गरीब हूं’.

अभी तो ‘मैं गरीब हूं’ टंग रहा है. कल को मैं महा-गरीब हूँ, मैं महा-महा गरीब हूं, मैं बिलकुल फटीचर हूँ इत्यादि टंगने के फरमान आएंगे. आखिर सरकार गरीबों को कैसे पहचान पाएगी कि वो गरीब है जब तक कि उसके घर में ये टंगा, लिखा न मिले कि वो गरीब है. बहुत पहले खबर आई थी कि किसी जनप्रतिनिधि के पास बीपीएल कार्ड था. बीपीएल यानी बिलो पावर्टी लाइन. यानी गरीब से भी नीचे. इसके लिए कोई खालिस शब्द भी नहीं है. अपना शब्द भंडार भी इस मामले में कंगाल है. ऐसे लोगों के घरों पर क्या लिखा जाएगा? फिर, जल्द ही इसके उलट, ‘मैं अमीर हूं’, या ‘मैं महा अमीर हूं’, या फिर ‘मैं भारत का या दुनिया का सबसे अमीर हूं’ यह भी टंगने लगेगा. वैसे, अप्रत्यक्ष रूप से तो यह टंगने भी लगा है.

और, गरीबी की परिभाषा, उसका लेवल क्या है? मैं अपनी बात करूं तो मैं अंबानीज़, टाटाज़ के सामने तो महागरीब, महा फटीचर हूं. तो क्या मैं अपने घर के सामने ये लिख मारूं कि मैं तो फलां फलां व्यक्ति की तुलना में तो महा-महा गरीब हूं. या फिर गरीब वो है जिसे दो जून की रोटी मयस्सर नहीं है? तो क्या वो अपने मकान के सामने लिख कर बैठा रहेगा कि भई, मैं तो भूखे मर रहा हूं?

मप्र सरकार गरीबों के घरों के सामने यह लिखवा कर टंगवा रही है – “मैं गरीब हूं.” यह तो वैसी ही बात हुई जैसे कि किसी फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के हाथों पर “मैं चोर हूँ” गुदवा दिया गया था.

गरीब होना कोई अपराध है? क्या गरीबी ऐसी समस्या है जिससे कभी छुटकारा नहीं पाया जा सकता? क्या गरीब को अपनी गरीबी क्या इस तरह सरेआम घोषित करते रहनी पड़ेगी? उसे सरेआम गरीबी का तमगा लगाकर घूमते रहना पड़ेगा?

हमारी वैचारिक गरीबी की पराकाष्ठा नहीं है ये? मैं सचमुच अपने आपको बहुत, बहुत गरीब महसूस करने लगा हूं.

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व्यंज़ल

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पूछते हो कि क्यों मैं गरीब हूँ

तेरे राज में जानम मैं गरीब हूँ

 

दर्द का अहसास है न भूख का

सबब बस ये है कि मैं गरीब हूँ

 

मेरी तो समस्या है बड़ी अजीब

सोने के ढेर पे बैठा मैं गरीब हूँ

 

अमीरों के इस भीषण शहर में

मुझे तो फख्र है कि मैं गरीब हूँ

 

टाँग दी गई तख्ती रवि पर भी

सबने मान लिया है मैं गरीब हूँ

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 bloggers park

लोग-बाग़ भले ही ट्विटर और फेसबुक के कसीदे पढ़ लें, मगर, ब्लॉगिंग इज़ स्टिल इन थिंग. और, अब जब हर संभव विषय पर हर लेवल का कैपेबल व्यक्ति अपने-अपने ब्लॉग पर हर किस्म का मसाला परोसने लग गया है तो उसमें से छांट-बीन कर कुछ माल-मसाला लेकर प्रिंट मीडिया की एक बढ़िया कलेवर वाली पत्रिका निकाल लें तो?

ब्लॉगर्स पार्क पत्रिका में यही किया गया है. ब्लॉगर्स पार्क के दूसरे अंक की मानार्थ प्रति मुझे अभी हाल ही में मिली और इसके पन्ने पलटते हुए अजीब खुशनुमा अहसास हो रहा है कि चलिए, सिर्फ और सिर्फ ब्लॉगों में पूर्व प्रकाशित सामग्री से – पोस्ट व पोस्ट की टिप्पणियों समेत, एक संपूर्ण पत्रिका भारत में, वह भी भोपाल से, बाजार में बिक्री के लिए नियमित प्रकाशित होने लगी है. ब्लॉगर्स पार्क की दूसरी ख़ूबी यह है कि यह द्विभाषी है – पत्रिका अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में ही है – यानी इसमें अंग्रेज़ी व हिन्दी ब्लॉगों की सामग्री प्रकाशित की गई है. अलबत्ता इसकी सारी सामग्री स्क्रेचमाईसॉल.कॉम के ब्लॉगों से ली गई है.

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जाहिर है, ब्लॉगर्स पार्क को स्क्रेचमाईसॉल.कॉम समूह द्वारा जारी किया गया है जो कि प्रयोक्ताओं को नेट पर वर्डप्रेस जैसी मुफ़्त ब्लॉगिंग सुविधा उपलब्ध करवाते हैं. हालांकि बहुत मामलों में स्क्रेचमाईसॉल.कॉम की सुविधाएँ उतनी उन्नत नहीं हैं, मगर कुछ विशिष्ट किस्म की सुविधाएँ इसमें अंतर्निर्मित हैं – जैसे कि कुछ ज्वलंत व करंट अफेयर्स संबंधी विषयों जैसे कि वातावरण प्रदूषण, भ्रष्टाचार, अपराध इत्यादि पर सीधे ही लिखने लग सकते हैं. स्क्रेचमाईसॉल.कॉम ब्लॉगिंग-प्लेटफ़ॉर्म – ब्लॉग तथा एग्रीगेटर का मिलाजुला रूप प्रतीत होता है.

25 रूपए मूल्य की, 80 पृष्ठों की बढ़िया काग़ज़ में बढ़िया छपी पत्रिका - ब्लॉगर्स पार्क कौतूहल तो पैदा करती है, मगर सामग्री के लिहाज से यह निराश करती है. फिर अभी तो इसका दूसरा अंक ही निकला है. ब्लॉगों जैसी विविधता और मनोरंजकता इसमें लाई जाए तो इसके सफल होने में देर नहीं लगेगी.

ब्लॉगर्स पार्क के प्रवेशांक को (पीडीएफ़ फ़ाइल) आप यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.

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जनता जब ज्यादा ही चिल्लाने लगी कि मेरा धर्म तेरे धर्म से ज्यादा सफेद तो बात चाँद पर भी पहुँच गई और आखिर इंस्पेक्टर मातादीन* से रहा नहीं गया तो धरती पर आकर निकल पड़ा जेबी झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का नार्को टैस्ट में काम आने वाला सीरम-इंजैक्शन लेकर. अब तो जनता से उसका सही धर्म उगलवाना ही पड़ेगा.

वो अभी निकला ही था कि सामने ट्रैफ़िक जाम मिला. पता चला कि किसी वीवीआईपी नेता के काफ़िले के लिए ट्रैफ़िक रोका गया है. अब वो तो सुपर कॉप इंस्पेक्टर मातादीन था. उसने अपना डंडा अड़ाया और वीवीआईपी नेता को रोका. उससे बोला – महामहिम, मेरे कन्ने ये झूठ पकड़ने की मशीन भी है और ये नार्को टेस्ट वाला इंजेक्शन. इधर धर्म के नाम पर दुनिया में बड़ा बावेला मच रहा है, दंगे-फ़साद हो रहे हैं, कर्मकाण्ड-जेहाद हो रहे हैं. तो, मेहरबानी होगी, अब आप सच-सच बता दें कि आपका धर्म क्या है?

वीवीआईपी नेता पसीने पसीने हो गया. उसकी जुबान से अबतक, जब से वो नेता बना था कभी सच तो निकला ही नहीं था. पर उसे पता था कि जुबान से सच तो निकलना ही है – चाहे झूठ पकड़ने की मशीन से चाहे सच उगलवाने के इंजेक्शन से. तो वो सचमुच में सच बयान करने लगा –

“भई, मेरा धर्म तो नेतागिरी है. ऐन-कैन-प्रकारेण वोट कबाड़ने का धर्म. वोटर मेरा भगवान और इलैक्शन मेरा त्यौहार. चुनाव जीतने के लिए मुझे अपने घर में आग लगाना पड़े, यहाँ तक कि जेहाद के नाम पर अपनी खुद की दाईं आँख भी फोड़नी पड़े तो वो मैं करूंगा. इसे ही मेरा धर्म समझ लें.”

इंस्पेक्टर मातादीन कन्फ़्यूजिया गया. ये साला कौन सा नया धर्म आ गया. पर मशीन इसे सच बता रही थी. वो हिचकिचाते हुए आगे बढ़ा. सामने पीली बत्ती वाली कार में सिविल सेवा का एक आला अफ़सर चौराहे के लालबत्ती की परवाह किए बगैर चला आ रहा था. सुपर कॉप इंस्पेक्टर मातादीन ने डंडा चमकाया तो अफ़सर भुनभुनाता हुआ आया. अफ़सर के मन में भाव थे – बाद में देख लूंगा तुझे बेटा! ऐसी जगह फ़िंकवाऊंगा कि बस तनख्वाह में गुजारा करता फिरेगा!

इंस्पेक्टर मातादीन ने अफ़सर को आदतन सैल्यूट दागा और फिर बोला – श्रीमान् मेरे पास झूठ पकड़ने की मशीन है और सच उगलवाने का इंजेक्शन. मैं जनता का असली धर्म पता करने निकला हूं. आप भी जनता का हिस्सा हैं, भले ही आप अपने आप को उससे कुछ ऊपर की चीज मानते हों. तो श्रीमान्, जरा बताने का कष्ट करेंगे कि आपका धर्म क्या है?

अफ़सर चकराया. आजतक किसी ने उससे प्रश्न पूछने की जुर्रत नहीं की थी. एक जमाने से वही लोगों से तमाम फ़ालतू के सर्कुलरों के जरिए बेकार के प्रश्न पूछता रहा था. मगर उसे झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का इंजेक्शन दिख रहा था. वो चालू हो गया –

“भई, मेरा धर्म तो पैसा कमाना है. भ्रष्टाचार के जरिए रेत में से तेल निकालना. हम सिविल सेवा में आए ही इसलिए हैं. हमें तो ट्रेनिंग के दौरान ही सिखा दिया गया था कि रेत में से तेल कैसे निकालते हैं. सरकारी योजनाओं से, जनता की जेब से पैसा निकालना और उसे सुरक्षित इन्वेस्ट करना ही हमारा धर्म है.”

इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग भिन्नाया. ये और कौन सा नया धर्म आ गया है. कभी इसके बारे में नहीं सुना. वो अफ़सर को सेल्यूट लगाकर वापस मुड़ा तो सीधे एक बुद्धिजीवी से टकरा गया. बुद्धिजीवी ने इंस्पेक्टर मातादीन को पहचान लिया और उससे पूछा कि वो चाँद से कब लौटा. इंसपेक्टर मातादीन ने बुद्धिजीवी को हड़काया और बोला कि अपने काम से काम रखे और ये बताए कि उसका धर्म क्या है. और ध्यान रहे कि सच बताए. झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का इंजेक्शन उसके पास है.

बुद्धिजीवी ने इंस्पेक्टर मातादीन को बताया कि वो तो बे-धर्मी है. उसका कोई धर्म नहीं है. अगर इंसानियत नाम का कोई धर्म होता तो जरूर वो उसका धर्म हो सकता था. मगर आजकल साली इंसानियत नाम की चीज भी ग़ायब हो चली है. बुद्धिजीवी इस बात को याद कर बड़ा दुःखी प्रतीत हो रहा था. इधर इंस्पेक्टर मातादीन की झूठ पकड़ने की मशीन का कांटा 100% सही से भी आगे ओवरशूट कर रहा था. इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग एक बार फिर चकराया. बुद्धिजीवी दुःखी मन से इंसानियत धर्म के नाम पर भाषण झाड़ने लगा था.

इंसपेक्टर मातादीन बुद्धिजीवी से जैसे तैसे पिंड छुड़ाकर भागा और सीधे झुग्गी बस्ती में पहुँच गया. उसने सुन रखा था कि भारत की अधिकांश जनता यहीं रहती है. जनता का असली धर्म यहीं पता चलेगा. वहां पहुँचकर उसने अपना डंडा फटकारा और सबसे पहले सामने पड़ने वाले आदमी को बुलाया. वो पच्चीस साल का जवान था, मगर था हड्डियों का ढांचा. गाल पिचके ऐसे हुए, आँखें ऐसी धंसी हुई – मानो पिचहत्तर साल का बुढ़ऊ हो. इंसपेक्टर मातादीन ने डंडा फटकारा और हुड़काया – बता, तेरा धर्म क्या है बे?

इंसपेक्टर मातादीन को पता था कि इसे झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने के इंजेक्शन का भय दिखाना बेकार है. इस किस्म की जनता तो वर्दी वाले किसी भी आदमी को देख कर भय में आ जाती है और खुद ब खुद सच उगलने लगती है.

वो आदमी अपनी कॉपती आवाज में बोला – “माई-बाप! हमें क्या पता हमारा धर्म क्या है. आप ही बता दें. हमें तो अपनी रोजी-रोटी कमाने से ही फुर्सत नहीं मिलती. जिस दिन कभी फुर्सत मिलती भी है तो दारू सुड़क लेते हैं. जब ज्यादा ही फुर्सत मिलती है – यानी रोजी नहीं मिलती तो पेट पर कपड़ा बाँध कर सो जाते हैं. यदि आप इसे ही हमारा धर्म समझते हैं तो...”

बस, बस, चुपकर! इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग पूरी तरह भिन्ना गया. “जनता साली झूठी है. वो झूठ-मूठ का धर्म निभाने के चक्कर में बेवजह दंगा फसाद करती है. आज उसका सच पकड़ में आ ही गया.” वो मन ही मन भुनभुनाया और वापस चाँद पर जा पहुँचा.

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चित्र – साभार, मप्र उत्सव 2009.

* – इंस्पेक्टर मातादीन – व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं रचित कैरेक्टर है.

"इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर" व्यंग्य लेख 'हरिशंकर परसाई' ने लिखा है.उसमें बताया गया है कि कैसे भारत का इंस्पेक्टर चांद पर जाता है और वहां शून्य अपराधिक दर देखकर परेशान हो जाता है.पुलिस महकमें को 'सुधारने'के लिये मातादीन जी कई तरकीबें अपनाते हैं जिसमें कुछ है:-
१.पुलिस का वेतन कम करना.
२.पुलिस लाइन में हनुमान मंदिर बनवाना.
३.बिना अपराध लोगों को सजा दिलवाना.
इस तरह के प्रयासों जल्द ही मातादीन जी को आशातीत सफलता मिलती और शीघ्र अपराध दर बढ़ती है.

बी योर ओन बॉस. जीवन भर के लिए मंदी-प्रूफ़ कैरियर. यह सब और बहुत कुछ. नीचे का विज्ञापन (डीबीस्टार भोपाल के 9 नवंबर के अंक में प्रकाशित) जरा खुदै बांच लें -



और, यदि लगता है कि इससे मामला कुछ बन(-बिगड़?) सकता है या फिर आजमाना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है.
आप हमारी बात पूछेंगे, तो हम कहेंगे भई – ऐसे खतरनाक विज्ञापनों से बचा….ओ!!!

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पता चला है कि चिट्टाचर्चा की हजारवीं पोस्ट आई है. पर, एक हजार एक वीं पोस्ट तो चिट्ठाजगत् का गब्बर पहले ही लिख चुका है.  तो गब्बर की चर्चा आप पढ़ना नहीं चाहेंगे?

गब्बर - अरे ओ सांभा
सांभा - जी, सरकार...

ग.- तो कितने हिन्दी चिट्ठाकार हैं?

सां.- जी, सरकार पांच सौ...

ग.- और दिन में कितने चिट्ठे चर्चा के लिए आ जाते हैं?
सां.- जी, सरकार, यही कोई पंद्रह बीस...

ग.- और तू पंद्रह-बीस चिट्ठों की भी ढंग से चर्चा नहीं कर पाता. ऊपर से बहाने बनाता है कि चिट्ठों पर ताला लगा है? बहूत नाइंसाफी है ये बहूत नाइंसाफ़ी.

सां.- सरकार,...

ग.- और क्यों क्या तेरे कन्ने कोई और काम धाम नईं था क्या जो तू बेमतलब और फ़ालतू चिट्ठाचर्चा लिख-लिख कर तमाम जनता को बोर करता फिरता है?
सां.- जी, सरकार...

ग.- उदर ये भासा ऊसा का क्या चक्कर है? कबी तू बंगाली मोशाय बनके लीखता होय, कबी तू मद्रासी बोन जाता है, कबी तू कविता करता है और कबी तू फ़ोकट का कुंडलियां तो कबी व्यंज़ल मारता है? कबी तू मध्याह्न में आ जाता है तो कबी फुरसत में लिखता बेठा रहेता है और कबी हैदराबादी तो कबी कुवैती बानी बोलता है. तो क्या तू पूरे देस-परदेस में घुमता फिरता है और क्या तेरे में बहुभाषी आत्मा घुस रहेला है?
सां.- हाँ, सरकार...

ग.- हाँ सरकार के बच्चे? क्या तू पाठकों को बेवकूफ़ समझता है? तू सुद्द हीन्दी क्यों नहीं लीखता है? और ई का चक्कर है कि तू कुछ चिट्ठों को तो बड़े प्रेम प्यार से बांचता है चर्चा करता है, और बाकी को छोड़ देता है? स्त्री नाम धारी चिट्ठाकारों के चिट्ठे तो तू बांच लेता है बाकी को फेंक देता है? कुछ चिट्ठों की बड़ी प्रशंसा मारता है तो कुछ चिट्ठों की खिल्ली उड़ाता है. बड़ी यारी दुसमनी निभाता है अपने चिट्ठाचर्चा के जरिए? सुना है तूने बहुत ग्रुप बना लिया है कोटरी बना लीया है?
सां.- सरकार, सरकार...

ग.- सरकार के बच्चे, ये बता तू चिट्ठाचर्चा में फोकट की खाली चरचा मारता है कि कुछ गंभीर समीक्षा-वमीक्षा भी करता है? कि बेफ़ालतू की खाली कड़ियाँ थमाकर भाग जाता है. जब तू चिट्ठाचर्चाकार बन गएला है तो अपने काम में प्रोफ़ेशनल एटीट्यूड क्यों नहीं लाता? चलताऊ काम क्यों करता है? या तो तेरे को चिट्ठाचर्चाकार नहीं बनना था, और जब बन गएला है तो गाहे-बगाहे बहाना क्यों बनाता है?
सां.- नहीं, सरकार...

ग.- चोप्प! अब सुन. अबी मेंने जो तेरे को सुनाया, उसपर ध्यान मार. भेजा उसपे लगा. मेरे को कोई कंट्रोवर्सी नईं मांगता. जो जो पिराबलम मेंने तेरे को ऊपर बताया उसे ठीक करके फिर चिट्ठाचर्चा लिखना. और, जरा जल्दी जल्दी सीख, अपने चिट्ठाचर्चा मैं स्टैंडर्ड ला. समझा क्या? और नहीं समझा तो ये बी समझ - आज मेरे सामने आदमी अकेला तू है और मेरे इस पिस्तौल में गोली पूरी की पूरी छ: है. हा हा हा हा हा हा हा हा हा ...

सां.- जी, सरकार.

चिट्ठाचर्चाकार सांभा तब से अपने टर्मिनल का कुंजीपट टिपियाते बैठा है. उसकी उंगलियाँ धड़ाधड़ चल रही हैं, परंतु गोली के भय से वह एक लाइन टाइप करता है और चार लाइन मिटाता है. उसकी पोस्ट माइनस में चली गई है. वह पोस्ट करे तो करे क्या? --- इस बीच वो एक व्यंज़ल लिख मारता है -

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चर्चा पर एक एंटी व्यंज़ल

 

अच्छी चर्चा बुरी चर्चा

ऐसी चर्चा कैसी चर्चा

 

क्यों किसलिए चर्चा

चर्चा, इसलिए चर्चा

 

बहुत प्रायोगिक चर्चा

बेहद अप्रायोगिक चर्चा

 

फूहड़ और बेकार की चर्चा

बढ़िया बड़े काम की चर्चा

 

आज की, कल की चर्चा

नहीं, परसों की चर्चा

 

अरे! सिर्फ दो की चर्चा

बाप रे! दो सौ की चर्चा

 

उन्हीं उन्हीं की दीगर चर्चा

घूमफिरकर एक ही चर्चा

 

असमय की गई चर्चा

कुसमय क्यों हुई चर्चा

 

बस, तेरी मेरी चर्चा

हद है! यही है चर्चा?

 

वाह! वाह!¡ खूब चर्चा

जित्ते मुंह उत्ती चर्चा

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नेट पर हिन्दी सामग्री का बाजार अब तेजी की ओर है. माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा अपने बेहद लोकप्रिय उत्पाद ऑफ़िस 2003/ 2007 को हमारी अपनी हिन्दी भाषा में ऑनलाइन सिखाने के लिए हिन्दी भाषा में प्रशिक्षण पाठ पिछले कुछ समय से उपलब्ध करवाया गया है. इसका होम पेज यहाँ है.

ऑनलाइन प्रशिक्षण में चरणबद्ध तरीके से चित्रों व स्क्रीनशॉटों के जरिए हिन्दी भाषा में बढ़िया प्रशिक्षण तैयार किया गया है जिसमें आपको वर्ड, एक्सेल, पावरपाइंट, आउटलुक इत्यादि पर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं.

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हालाकि हिन्दी प्रशिक्षण पाठ की भाषा बड़ी ही अजीब प्रतीत होती है, क्योंकि अनुवाद सीधा और सपाट सा, यंत्रचालित प्रतीत होता है. वर्तनी की गंभीर किस्म की गलतियाँ हैं. फिर भी, प्रशिक्षण का सार ग्रहण करने में समस्या तो नहीं ही होती और उम्मीद करते हैं कि  भविष्य में भाषा भी परिष्कृत कर ली जाएगी. भाषा का एक नमूना देखें -

 

पहली बार देखने पर, आप शायद Word के पिछले संस्करण से कोई निश्चित आदेश नहीं देखेगें. क्षुब्ध न हों. कुछ समूहों में निचले-दाँए कोने में छोटा डायगोनल तीर है बटन छवि.

तीर, संवाद बॉक्स लॉन्चर कहलाता है. यदि आप उसे क्लिक करेंगे, तो आप समूह से संबंधित अधिक विकल्प देखेंगे. अधिकाशंत: विकल्प संवाद बॉक्स के रूप में दिखाई देगें जिसे आप Word के पिछले संस्करण से पहचान सकते हैं. या वे परिचित से दिखने वाले कार्य फलक में दिख सकते हैं.

पिछले संस्करण के बारे में बात करते हुए, यदि आप आश्चर्य कर रहे हैं कि क्या आप Word के पिछले संस्करण जैसा दृश्य और अनुभव प्राप्त कर सकेंगे, तो उत्तर है, नहीं. लेकिन रिबन का थोड़ा उपयोग कर लेने के बाद, आप चीजों के स्थान से परिचित हो जाएगें और उनसे आसानी से कार्य करना पसंद करेगें.

 

कुछ डायरेक्ट लिंक आपके लिए -

एमएस वर्ड 2003 ऑनलाइन हिन्दी ट्यूटोरियल

एमएस वर्ड 2007 ऑनलाइन हिन्दी ट्यूटोरियल

लाइफ़लागर के तंबू उखड़ने और ई-स्निप जैसी सेवा के भरोसेमंद नहीं रहने के कारण इलाहाबाद राष्ट्रीय संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में इरफ़ान ने जब यह प्रश्न किया कि एमपी3 फ़ाइलों को इंटरनेट पर लोड करने का बढ़िया तरीका क्या है तो अफ़लातून ने अपने स्वयं के अनुभवों को वहाँ पर साझा किया कि एमपी3 फ़ाइलों को बेहतर तरीके से नेट पर कैसे अपलोड किया जा सकता है.

आपके लिए एक और बढ़िया विकल्प है - आर्काइव.ऑर्ग पर मीडिया फ़ाइलों को अपलोड करने का. आर्काइव.ऑर्ग के साथ ख़ूबी यह है कि यह कोई निजी कंपनी नहीं है, बल्कि यह अनुदान प्राप्त संस्था है जो कि नेट की सामग्री को अपने सर्वरों पर भंडारित करते रहती है. मीडिया फ़ाइलों को आप आसानी से भंडारित कर सकते हैं सदा सर्वदा के लिए, और इसके तंबू उखड़ने या सेवाओं को बन्द करने, खत्म करने, सीमित करने जैसी संभावना यहाँ अत्यंत क्षीण हैं. (कॉपीराइट वस्तुओं का ध्यान तो ख़ैर रखना ही होगा.)

आर्काइव.ऑर्ग पर एमपी3 फ़ाइलें ऑनलाइन प्लेयर हेतु अपलो़ड करना अत्यंत आसान है. इसकी विधि निम्न है -

अपने एमपी3 फ़ाइल को http://archive.org पर अपलोड करें. यदि आपने अपना खाता नहीं बनाया हो तो वहाँ पहले एक खाता बना लें. खाता बनाना बहुत आसान है. अपलोड की गई एमपी3 फ़ाइल की कड़ी कॉपी कर लें.

आपके एमपी3 फ़ाइल की कड़ी कुछ इस तरह (उदाहरण) होगी - http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3
अब जहाँ अपने ब्लॉग पोस्ट पर आपको ऑनलाइन ऑडियो प्लेयर एम्बेड करना है, वहां पर नीचे दिया गया कोड कॉपी कर पेस्ट कर दें :

<embed allowscriptaccess="always" flashvars="valid_sample_rate=true&amp;external_url=DOWNLOAD-LINK-OF-MP3" height="52" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" quality="high" src="http://www.odeo.com/flash/audio_player_standard_gray.swf" type="application/x-shockwave-flash" width="300" wmode="transparent"></embed>

अब यहाँ पर DOWNLOAD-LINK-OF-MP3 को अपने उस एमपी3 फ़ाइल की डाउनलोड कड़ी से बदल दें जो आपने आर्काइव.ऑर्ग (http://archive.org ) में अपलोड किया है और कड़ी पहले कॉपी कर रखा हुआ है.

यदि आप ऊपर उदाहरण में दिए गए एमपी3 कड़ी का प्रयोग करेंगे तो आपको कोड कुछ इस तरह दिखेगा -

<embed allowscriptaccess="always" flashvars="valid_sample_rate=true&amp;external_url=http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3" height="52" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" quality="high" src="http://www.odeo.com/flash/audio_player_standard_gray.swf" type="application/x-shockwave-flash" width="300" wmode="transparent"></embed>

अपने ब्लॉग पोस्ट को सहेज कर पोस्ट कर दें.

बस, हो गया!

ऊपर दिए गए कोड का वास्तविक प्रयोग कुछ यूं रहेगा -


ध्यान रहे, आर्काइव.ऑर्ग पर अपलोड किए एमपी3 फ़ाइल की डाउनलोड कड़ी भी साथ में दे दें, क्योंकि ऊपर दिया गया प्लेयर फ्लैश प्लेयर है, और यदि किसी प्रयोक्ता के तंत्र में फ्लैश इंस्टाल नहीं है तो ये नहीं चलेगा. फिर, बहुत से लोग एमपी3 डाउनलोड कर अपने मोबाइल प्लेयरों पर भी सुनते हैं. (ऊपर उदाहरण में दी गई कड़ी को सीधे चिपका दें, या फिर नीचे दिया गया कोड प्रयोग में लें - पर अपने स्वयं के डाउनलोड कड़ी से यहाँ दी गई कड़ी को अवश्य बदल लें)
<a href="http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3" target="_blank">डाउनलोड लिंक</a>

इलाहाबाद संगोष्ठी में चर्चा के दौरान यह तकनीकी प्रश्न किया गया था कि उन ब्लॉगर ब्लॉगों को फ़्लैग कैसे करें जिनमें नेविगेशन पट्टी को हटा दिया गया होता है.

report abuse

ब्लॉगस्पाट के ब्लॉगों में यह सुविधा दी गई है कि यदि आपको लगता है कि किसी ब्लॉग में आपत्तिजनक सामग्री है, तो ब्लॉगस्पाट ब्लॉग के सबसे ऊपरी खंड में दिए गए नेविगेशन पट्टी में ‘रिपोर्ट एब्यूज’ को क्लिक कर अपनी आपत्ति दर्ज करवा सकते हैं. और यदि आवश्यक परिपूर्ण मात्रा में ऐसी शिकायतें ब्लॉगस्पाट को मिलती हैं तो उस पर कार्यवाही की जाकर उस सामग्री को वे हटा भी देते हैं.

जिन ब्लॉगस्पाट ब्लॉगों में नेविगेशन पट्टी दिखती है, उसमें तो कोई समस्या नहीं, मगर बहुत से ब्लॉगों में सजावट के नाम पर उसे हमेशा के लिए हटा दिया गया होता है. और आप ऐसे ब्लॉगो को चाह कर भी फ्लैग नहीं कर सकते जिनमें नेविगेशन पट्टी नहीं होता है. ऐसे ब्लॉगों को फ्लैग कैसे करें?

इसके लिए दो विधियाँ हैं –

1) पहली आसान सी विधि है – यदि आप फ़ायरफ़ॉक्स प्रयोग करते हैं तो ब्लॉगस्पाट नेवबार रिस्टोरर नाम के इस ग्रीजमंकी स्क्रिप्ट का प्रयोग करें. इस स्क्रिप्ट के जरिए आमतौर पर प्राय: सभी ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट के ब्लॉगों की नेविगेशन पट्टी दिखाई देने लगती है. अब आपको बस फ्लैग बटन पर क्लिक करना है.

2) दूसरी विधि में थोड़ी सी लंबी प्रक्रिया है. नीचे दिया गया यूआरएल देखें –

http://www.google.com/support/blogger/?hl=en&blog_URL=http%3A%2F%2Fblogname.blogspot.com%2F&action=flag&blog_ID=BLOGID

यहाँ पर, जिस ब्लॉग को आपको फ्लैग करना है, उसका ब्लॉग पता व ब्लॉग आईडी भरना होगा. जहाँ गाढ़े अक्षरों में blogname.blogspot.com लिखा है उसे फ्लैग किए जाने वाले ब्लॉग के यूआरएल से बदल दें जैसे कि flagblog.blogspot.com. तथा जहां पर BLOGID लिखा है वहाँ पर ब्लॉग की आईडी (यह अंकों में होता है) डाल दें. ब्लॉग की आईडी उस ब्लॉग के स्रोत (view > source) को देखकर आसानी से पता किया जा सकता है. नीचे दिए अनुसार ब्लॉगर ब्लॉग आईडी दिया गया होता है. आमतौर पर ये स्रोत पृष्ठ के ऊपरी क्षेत्रों में उपलब्ध होता है.

blog ID

अब आप इस कोड को अपने ब्राउजर के पता पट्टी में नकल कर चिपका दें. और एंटर कुंजी दबा दें. आपके सामने उस ब्लॉग को फ्लैग करने का ब्लॉगर का पेज नीचे दिए गए चित्रानुसार प्रकट हो जाएगा. अब कारण चुनने के लिए संबंधित रेडियो बटन पर क्लिक करें और अगला बटन दबाएँ और दिए गए निर्देशों का पालन करें. नेविगेशन पट्टी रहित तथाकथित ब्लॉग को आपने फ़्लैग कर ही दिया. बधाई!

flagging blogger blog

हाँ, ये ध्यान रखें कि आपके अकेले फ़्लैग करने से बात बनेगी नहीं. जल्द सुनवाई के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में हर संभावित क्षेत्रों से फ़्लैग होने चाहिए. साथ ही जेनुइन ब्लॉगों को फ़्लैग करने का कोई अर्थ नहीं होगा ये भी जान लें. ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बड़ा पैरोकार है!

आइए, आग को कुछ और हवा दें. दूर-सुदूर प्रांतों-देशों में कान-नाक-मुँह खोलकर अपने कम्प्यूटर के सामने चिंतित होकर ब्लॉगियाती-टिपियाती जनता के लिए, कि इलाहाबाद में क्या क्या न हुआ और क्यों न हुआ और हुआ तो क्यों हुआ इत्यादि के लिए   प्रस्तुत है सम्मेलन के कुछ हा – हा – ही – ही , हाय हैलो के ऑडियो वीडियो.

 

सबसे पहले मनीषा पाण्डेय को सुनें. उनका ओजस्वी वक्तव्य पूरा रेकॉर्ड न कर पाया इसका अफसोस है. – कारण - वही : हार्डवेयर फ़ेल्योर.

 

अब विनीत कुमार को सुनें. ऑडियो क्वालिटी बहुत खराब है – (सेमिनार हाल में ही ऑडियो गूंज रहा था बेसबब) मगर विनीत को सुनना उनको पढ़ने से ज्यादा आनंददायी है. यकीन मानें.

 

आगे विनीत से लिया गया छोटा सा साक्षात्कार. छोटा इसलिए, कि साक्षात्कार के बीच में ही बैटरी जाने कैसे माशाअल्ला हो गई और एक वीडियो करप्ट हो गया. फिर भी, जो थोड़ा सा बचा है वह भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि विनीत ने जब से ब्लॉग लिखना शुरू किया, उनका लेखन, उनकी लेखनी का तेवर, उनकी शैली सबकुछ कूदती फांदती नित्य नई ऊँचाईयाँ पाती गई. उन्होंने बातों बातों में बताया कि पिछले साल-डेढ़ साल में ही उन्हें कई-कई प्रमुख जगहों से नियमित लेखन के प्रस्ताव मिलते रहे हैं और उन्होंने हिन्दी लेखन से ही पच्चीस हजार रुपए से भी अधिक की आय इस छोटे से समय में अर्जित कर ली है. जहाँ हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाएँ बेहद कम, मात्र रस्मी पारिश्रमिक देती हैं, ऐसे में उनकी यह उपलब्धि अचंभित करती है.

 

विनीत का साक्षात्कार – भाग 1

 

विनीत का साक्षात्कार – भाग 2

वैसे तो अपने पास और भी दर्जनों एलीबाई हैं कि वहाँ उपस्थित चिट्ठाकारों ने सरकारी पैसे से और क्या क्या मौज मस्ती की, मगर हमने हांडी के चावल दिखा दिए हैं. तो दोस्तों, आपका तो पता नहीं, इधर से चिरकुटाई बन्द. अब से रेगुलर ब्लॉगिंग जारी आहे. जै चिट्ठाकारी - जै जै चिट्ठासंसार!

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जैसी कि पूर्व सूचना आपको थी, आज 28 अक्तूबर 2009 को भारतीय समयानुसार शाम 4 बजे से लेकर 5.30 बजे तक एक ऑनलाइन वेबकास्ट है. वेबकास्ट यानी इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन ट्यूटोरियल. इसमें वीडियो (स्क्रीनकास्ट) के जरिए विंडोज़ 7 को हिन्दी के लिए सेट करने व उनमें विभिन्न कुंजीपटों व इंटरनेट, हिन्दी फ़ॉन्टों में काम करने के बारे में विस्तार (ऑडियो वीडियो के माध्यम से) से बताया जाएगा. आपके प्रश्नों के उत्तर चैट के माध्यम से भी वहीं, तत्काल दिया जाएगा.

जाहिर है, यह वेबकास्टिंग मेरे द्वारा होस्ट की जा रही है.

इस वेबकास्ट में शामिल होने के लिए इस कड़ी पर 3.45 बजे शाम (भारतीय समयानुसार, इससे पहले यह कड़ी उपलब्ध तो होगी, पर काम नहीं करेगी) को क्लिक करें -

 

http://msevents.microsoft.com/cui/Register.aspx?culture=en-IN&EventID=1032429276&CountryCode=IN

 

पर, इससे पहले आपको अपने विंडोज में विंडोज लाइव मीडिया प्रोग्राम (LMSEtup.exe) इंस्टाल करना होगा जो आपको वेबकास्टिंग दिखाता है. यह प्रोग्राम यहाँ से डाउनलोड करें -

 

http://download.microsoft.com/download/4/F/7/4F712B94-C6A5-4A66-AD8F-53E04085B939/LMSetup.exe

 

तो चलिए, वेबकास्ट में मिलते हैं और कुछ सीखते हैं आज शाम 4 बजे.

इलाहाबाद में मैंने अपनी प्रस्तुति में चिट्ठाकारी में निहित खतरों के बारे में भी बताया था. अभिषेक ओझा ने कई पोस्टों में ब्लॉगिंग के खतरे के बारे में विस्तृत विवरण दिए हैं. इनमें से एक है – अनर्गल, व्यक्तिगत आक्षेप. यह टिप्पणी सुरेश चिपलूणकर के चिट्ठे से ली गई है. मुलाहिजा फरमाएँ :)





Vishal Pandey said...



सुरेश जी आपने सही मुद्दा उठाया है। जैसे नामवर जी मठाधीश है वैसे ही हमारे हिन्दी ब्लाग जगत के भी कुछ मठाधीश है। इनमे से दो को हम सब बखूबी जानते है। एक गंजी होती खोपडी वाला मरियल सा शख्स और दूसरा बाहर निकले दाँतो वाला हँसोड। आप यदि इन दोनो के चमचे नही तो हिन्दी ब्लाग जगत की मलाई कभी नही खा सकते।
आज हिन्दी बलाग जगत का विकास क्यो नही हुआ। ऐसे लोगो के कारण जो भाई-भतीजावाद को बढावा देते रहे और गूगल से हिन्दी प्रोमोशन के नाम पर पैसे उगाहते रहे। पैसे तो पा गये पर कुनबा बढाओ की नीति छूटी नही। आप ही बताये क्यो चिठठा-चर्चा मे खास ब्लागो की ही चर्चा होती है। यदि ये हिन्दी के सेवक है और उस नाम से पैसे कमा रहे है तो सभी चिठ्ठो की चर्चा करे।
मरियल से दूसरे मठाधीश को हिन्दी ब्लागिंग के नाम पर छत्तीसगढ से पैसा मिलता है। यहाँ हुये ब्लागिंग सम्मेलन मे भी उसने अपने चमचो को बुलाया था रेल की टिकट दिलवा कर। यह पूरा रैकेट है। इन्हे "हिन्दी ब्लाग माफिया" कह सकते है।
हिन्दी ब्लाग जगत आज की स्थिति मे दुर्गन्ध भरे तालाब की तरह है जिन्हे ऐसे मठाधीश सडा रहे है और सडाते रहेंगे।
वे लोग अच्छे है जो हिन्दी ब्लागिंग का मोह त्याग चुके है। हम भी उनमे शामिल है। बस आपको पढने चले आते है।
26 October, 2009 12:46 AM


यह रही स्क्रीनशॉट – ताकि सनद रहे:
mahajaal par suresh chiplunkar par raviratlami and anoop shukla
तो, यदि आप ब्लॉगिंग में हैं, तो इन खतरों से बच नहीं सकते. इन खतरों को मोल लेना ही होगा. कोई भी आपके किसी भी हिस्से की धज्जियाँ कभी भी कहीं भी बड़े बेखौफ़ तरीके से उड़ा सकता है.
जाहिरा तौर पर, आपकी जानकारी के लिए, टिप्पणीकार विशाल पाण्डेय का ब्लॉगर प्रोफ़ाइल बन्द है याने बेनामी?. अब जनता को कैसे पता चले कि ये मरियल... और हँसोड़ के बीच या इधर उधर ऊपर नीचे कहाँ ठहरते हैं?

अब शायद अगली बारी आपकी है. ठंडे पानी का गिलास, ब्लॉगिंग करते समय सदा साथ में रखें. :)

व्यंज़ल  तो बनता है न भाई? मुलाहिजा फरमाएँ -

चलने के खतरे हैं फिरने के खतरे हैं
यहाँ तो बोलने बताने में खतरे हैं

जंगलों का तो अजब हाल है साहब
अब हाथियों को चींटियों से खतरे हैं

बात भी करो तो किससे और कैसी
इस जमाने में बात-बेबात के खतरे हैं

जमाना बहुत बदल गया है यारों
अब औरों से नहीं अपनों से खतरे हैं

अज्ञानी मूढ़ रवि ये नहीं जानता
जियादा तो खुद को खुद से खतरे हैं

क्या आप जानते हैं कि अजित वडनेरकर कभी अहमद हुसैन – मोहम्मद हुसैन के शिष्य हुआ करते थे और वे एक उम्दा गायक भी हैं? देखिए उनके लाइव परफ़ॉर्मेंस का वीडियो – जब से हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए.

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(वीडियो – साभार अनूप शुक्ल के कैमरे से)

windows 7

विंडोज का हर संस्करण चलने चलाने में अपने पूर्व के संस्करणों से बहुत कुछ भिन्न होता है. विंडोज 7 में हिन्दी कैसे चलाएँ? विंडोज 7 में नया क्या है? विंडोज 7 में इंटरनेट-नेटवर्किंग कैसे करें? इत्यादि. यह सब और बहुत कुछ जानिए मुफ़्त वेबकास्ट से.

अब तक का सर्वश्रेष्ठ, चलने में तीव्र और आसान, अत्यधिक सुरक्षित विंडोज संस्करण 7 बस आने वाला ही है. 22 अक्तूबर 09 को इसे अधिकृत रूप से तमाम विश्व में जारी किया जा रहा है. इसके कुछ शानदार पहलुओं के बारे में तथा इसमें कैसे काम करें इत्यादि के बारे में जीवंत वेबकास्टों की शृंखला 23 से 30 अक्तूबर 09 के बीच चलेगी. विवरण निम्न है –

windows 7 webcast

(चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)

  • 23 अक्तूबर - विंडोज 7 खेल-खेल में – अभिषेक कांत व अन्य विशेषज्ञ
  • 26 अक्तूबर - विंडोज 7 परफ़ॉर्मेंस के नये आयाम – शांतनु कौशिक
  • 27 अक्तूबर - विंडोज 7 इंटरनेट व होम नेटवर्किंग – एलन बी तुलादार व रमेश के.
  • 28 अक्तूबर - विंडोज 7 में हिन्दी में काम कैसे करें – रविशंकर श्रीवास्तव
  • 29 अक्तूबर - विंडोज 7 मनोरंजन व मीडिया सेंटर – सौमित्र सेनगुप्ता
  • 30 अक्तूबर - विंडोज 7 एसेंशियल्स: विंडोज लाइव – मनन कक्कड़

समय : प्रथम वेबकास्ट को छोड़कर जो कि 2 से 4.30 बजे तक है, बाकी के सारे वेबकास्ट 4.00 से 5.30 बजे तक हैं. अपने शेड्यूलर को अभी अद्यतन कर लें.

जैसा कि ऊपर सूची में स्पष्ट है, 28 अक्तूबर का ‘हिन्दी में काम कैसे करें’ सत्र मेरा होगा.

यदि आप भविष्य में विंडोज 7 पर काम करना चाहते हैं (जो कि बहुत संभव है क्योंकि इसमें तमाम ख़ूबियाँ हैं) तो इन वेबकास्टों में जरूर शामिल हों. इन जानकारी पूर्ण वेबकास्टों में आप मुफ़्त शामिल हो सकते हैं.

अधिक विवरण के लिए यहाँ जाएँ

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वैसे तो हर पोस्ट की हर टिप्पणी (स्पैम को छोड़ दें) अमूल्य और अनमोल होती है, मगर किसी ब्लॉग पर आपकी एक टिप्पणी के बदले पाँच रुपए का दान दिया जा रहा है तो वहाँ आप एक टिप्पणी तो दे ही सकते हैं?

अनघ देसाई इस दफ़ा दीपावली कुछ खास तरीके से मना रहे हैं. वे अपने ब्लॉग पर 15 अक्तूबर से 19 अक्तूबर 2009 के बीच मिले प्रत्येक टिप्पणी के बदले 5 रुपए का दान देंगे. इसी तरह इस दौरान फेसबुक/ईमेल/ट्विटर पर (स्पैम नहीं) मिले शुभकामना संदेशों पर वे 0.25 रुपए का दान देंगे तथा प्रत्येक एसएमएस पर वे 0.50 रुपए का दान देंगे. उनके इस विचार को लोगों ने हाथों हाथ लिया है और बहुत से लोग अनघ के साथ दान देने के लिए जुड़ गए हैं और मामला इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रुपए 17.50 प्रति शुभकामना संदेश तक जा चुका है. ये दान बालिका शिक्षा (एजुकेटिंग गर्ल चाइल्ड) के लिए दिए जाएंगे.

अनघ के इस पोस्ट पर टिप्पणी करें

अनघ को ईमेल से शुभकामना संदेश भेजें. ईमेल पता उनके प्रोफ़ाइल से यहाँ से हासिल करें.

ट्विटर पर शुभकामना संदेश #deepwish विषय से भेजें (अपने ट्विटर पोस्ट में #deepwish जोड़ दें बस). अनघ का ट्विटर पृष्ठ

बूंद बूंद से घट भरता है. मुक्त हस्त से टिप्पणी करें, ईमेल/ट्विटर से शुभकामना भेजें (दान दें) !

corporate blogging in India

आदमी की (सद्यः संशोधित?) मूल भूत आवश्यकताओं में अब शामिल हैं – रोटी, कपड़ा, मकान और जी हाँ, सही पहचाना - ब्लॉगिंग! बहुत पहले की मजाक में कही गई बात अब सत्य प्रतीत होती दीखती है. आदमी (और, औरतों की भी,) की मूलभूत आवश्यकताओं में अब रोटी, कपड़ा और मकान के साथ साथ इंटरनेट तो जुड़ ही गया है. फ़िनलैण्ड विश्व का ऐसा पहला देश बन गया है जहाँ इंटरनेट – वो भी 1 एमबीपीएस ब्रॉडबैण्ड को अब व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में शामिल मान लिया गया है और इसके लिए क़ानून बना दिया गया है. इधर, इंटरनेट से ब्लॉगिंग जुड़ा हुआ है. तो हम आगे क्यों न एक बात मजाक में ही सही, कहें – आदमी की मूल भूत आवश्यकताओं में अब शामिल हैं – रोटी, कपड़ा, मकान और ब्लॉगिंग!

और, जब चहुँओर ब्लॉगिंग की धूम मच रही हो तो कार्पोरेट जगत में, कार्पोरेट स्टाइल में कार्पोरेट ब्लॉगिंग क्यों नहीं? कार्पोरेट ब्लॉगिंग नाम के किताब में राजीव करवाल और प्रीति चतुर्वेदी ने इसी विषय को केंद्र में रखते हुए बहुत सी काम की बातें बताईं हैं. डेढ़ सौ पृष्ठों की इस किताब का मूल्य तीन सौ पैंतालीस रुपए है जो कि थोड़ा ज्यादा प्रतीत होता है, मगर जब बात कार्पोरेट जगत की कही जाएगी तो मामला थोड़ा महंगा तो होगा ही! वैसे किताब के पन्ने व लेआउट, प्रिंटिंग इत्यादि उच्च श्रेणी के हैं.

किताब में नौ अध्याय है जिसमें कार्पोरेट ब्लॉगिंग परिदृश्य से लेकर मार्केटिंग, उत्पादकता, उपभोक्ता इत्यादि तमाम पहलुओं में ब्लॉगिंग के जरिए ज्यादा से ज्यादा कैसे कुछ हासिल किया जा सकता है यह बताने की कोशिश उदाहरणों के साथ की गई है. कई मामले में लेखक द्वय सफल भी रहे हैं, तो कहीं कहीं उबाऊ, दोहराए गए विवरण भी हैं. हर अध्याय के अंत में टिप्पणियाँ और संदर्भ नाम से किताबों, सीडी, व नेट के कड़ियों युक्त संदर्भ दिए हैं, जिससे विषय संबंधी अतिरिक्त ज्ञान हासिल तो किया ही जा सकता है, तथ्यों की पुष्टि भी की जा सकती है.

जब आईबीएम और डिज़्नी जैसी विशालकाय बहु-राष्ट्रीय कंपनियाँ ब्लॉगों का उपयोग उत्पाद/परियोजना में अभिनवता लाने तथा आंतरिक परियोजना प्रबंधन जैसे उपायों के लिए भी कर रही हैं, तो कार्पोरेट जगत में ब्लॉगों की लोकप्रियता और उपादेयता स्वयंसिद्ध है ही. क्लीयरट्रिप.कॉम जैसे उपक्रमों के उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे इन कार्पोरेट सेक्टरों ने ब्लॉगों का शानदार, व्यवहारिक प्रयोग अपने उत्पादों के बारे में जानकारियों को जनजन तक पहुँचाने में, ग्राहकों से फ़ीडबैक लेने व उन्हें उच्च स्तरीय सुविधाएँ प्रदान करने में कैसे किया.

नेटकोर के राजेश जैन भारत में कार्पोरेट ब्लॉगिंग के पुरोधाओं में से एक रहे हैं जो ईमर्जिक – राजेश जैन का ब्लॉग नाम से अपना ब्लॉग लिखते हैं. आज की तिथि में सैकड़ों बड़ी और नामी भारतीय कंपनियों के सीईओ तथा कंपनियों के स्टाफ़ में से ही, कार्पोरेट ब्लॉगिंग करते हैं – जाहिर है, अपने व्यवसाय को एक नई दिशा देने के लिए.

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कार्पोरेट ब्लॉगिंग इन इंडिया

लेखक गण - राजीव करवाल एवं प्रीति चतुर्वेदी

प्रकाशक – विज़्डम ट्री, 4779/23, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2

पृष्ठ – 127, मूल्य 345.00 रुपए.

आईएसबीएन नं. – 978-81-8328-131-7

bharosa

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ये भरोसे का बड़ा चक्कर है. आपको भले ही अपने आप पर भरोसा न हो, मगर दुनिया है कि आप पर पूरा भरोसा करती है. ठीक वैसे ही जैसे आप अपने बच्चे के ऊपर भरोसा करते हैं कि वो बड़ा होकर पढ़ लिख कर आई.ए.एस. अफ़सर बनेगा. बड़ा नाम और नांवा कमाएगा. भरोसा बाद में टूटे या रहे – जिसके कि बहुतेरे कारक और कारण हो सकते हैं, जैसे कि उसे तो बड़ा होकर सलमान बनने का भरोसा है जिसे आपका आई.ए.एस अफ़सर बनने-बनाने का भरोसा खुद टूटते टूटते तोड़ देगा. मगर, जैसा भी हो, भरोसा अभी तो बना रहता है ना! पालक के मन में भी और बालक के मन में भी.

मुझे भी अपने आप पर भरोसा भले ही नहीं हो, मगर मैं भी दूसरों पर पूरा भरोसा करता हूं, और दूसरे भी अपने आप पर भले न करें, मुझ पर पूरा, पक्का भरोसा करते हैं. वैसे, भरोसा रिलेटिव होता है. सापेक्ष. निरपेक्ष वो कतई नहीं होता. किसी का भरोसा तोड़ने टूटने के उतने ही ज्यादा चांसेज होते हैं जितना ज्यादा भरोसा होता है.

किसी शासकीय कार्यालय में किसी काम के लिए जाओ तो आपको अपने काम के होने का कितना भरोसा होता है? यदि कोई ईमानदार अफ़सर मिल गया तो काम होने को भरोसा तो नहीं होता है, मगर इस बात का पूरा भरोसा होता है कि काम नहीं होगा. फिर आप भरोसे लायक अफ़सर को ढूंढते हैं जो कुछ ले-देकर आपका काम कर दे. जैसे ही आपको भरोसे लायक अफ़सर का पता चलता है, आपका भरोसा तंत्र पर फिर से कायम हो जाता है.

अब आप पूछेंगे कि भरोसे के लायक अफ़सर और बाबू कैसे मिलेंगे? ये मिलेंगे तो आप इन्हें कैसे पहचानेंगे? इन्हें पहचानने का तरीका क्या है? इनकी पहचान क्या है? तो, भरोसा रखिए, कुछ क्लू हमेशा अपने साथ रखिए. ये क्लू आपके भरोसे को कभी नहीं तोड़ेंगे. भई, सीधा सादा गणित है. मसलन – कोई अस्तव्यस्त सा बाबू पान चबाता मिल जाए जिसके शर्ट में पान की पीक के दाग-वाग दिख रहे हों तो समझो कि वो भरोसे का आदमी है. यदि उसके हाथ में जलती सिगरेट का टुकड़ा दबा दिख जाए तो समझो कि वो तो पक्के भरोसे का आदमी है. आपका काम हुआ ही समझो. क्योंकि सरकारी तनख्वाह में, जिसका तैंतीस परसेंट तो सरकार टैक्स के रूप में वेतन देने के पहले ही काट लेती है, कोई सरकारी मुलाजिम सिगरेट के कश अपनी तनख्वाह के पैसे से कैसे मार सकता है भला?

अब पानी और बिजली का ही ले लीजिए. इनके नहीं रहने का भरोसा सबको है. कम से कम हम भारतीयों को तो इसका पूरा भरोसा है कि सुबह नल खोलो तो पाँच में से तीन मर्तबा पानी नहीं निकलेगा क्योंकि तमाम वजहों से नल आया ही नहीं होता है. बिजली रानी पर तो इतना भरोसा है कि दिन में जब तक आधा दर्जन बार उतने ही घंटों के लिए जब तक गुल नहीं हो जाती उसे बिजली रानी कहलाने का हक नहीं. यही हाल रेलवे का है. प्लेटफ़ॉर्म की गंदगी, रिजर्वेशन की सीट नहीं मिलने, जनरल डिब्बे में भीड़ भड़क्का का भरोसा किसे नहीं होता? भारतीय सड़कों पर गड्ढे और स्पीड ब्रेकर हर किलोमीटर में तीन-पाँच के हिसाब से नहीं मिलने का भरोसा किसे नहीं होता?

अब इससे पहले कि इन पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते मेरे लेखन से आपका भरोसा उठ जाए, मामला यहीं समाप्त करते हैं. मुलाहिजा फरमाएँ एक पर्याप्त भरोसे का व्यंज़ल –

व्यंज़ल

देखिए किस पर भरोसा कर रहे हैं लोग

केवल गुंडों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की इंतिहा कहिए कि खुद को छोड़

दूसरे तीसरे पर भरोसा कर रहे हैं लोग


ये तो सचमुच का कमाल हो गया यारों

राजनीतिज्ञों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की जरूरत है कि प्यार तज कर

घृणा नफरत पर भरोसा कर रहे हैं लोग


कतई भरोसा नहीं है रवि को खुद पर

फिर भी उस पे भरोसा कर रहे हैं लोग

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(स्क्रीनशॉट – साभार अदालत ब्लॉग)

Piyara sahab
देश-विदेश के जाने-माने पत्रकार-संपादक-स्तंभकार राजकुमार केसवानी ताज़ा-ताज़ा हिन्दी ब्लॉग जगत में कूदे हैं. बाजे वाली गली नाम का उनका हिन्दी ब्लॉग देखते ही देखते अच्छा खासा चर्चित हो गया है. संगीत को ओढ़ते बिछाते फिरते और संगीत में रमते से प्रतीत होते राजकुमार केसवानी के संग्रह में पुराने जमाने के विनाइल और लाख के बने एलपी, एसपी, ईपी के हजारों रेकार्ड हैं. उनके पास अभी भी चालू हालत में गियर से चलने वाला बाजा है जिसे चाभी भरकर बजाया जाता है. इसमें गाना सीधे सुई-और-डायाफ्राम से घूमते रेकार्ड के जरिए बजता है. ध्वनि पैदा करने के लिए इसमें इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी नहीं है – और इस वजह से जादुई संगीत का वातावरण पैदा होता है. जिन्होंने रूबरू इसे सुना है (मैंने अभी अभी ही इसे सुना है,), वही इसके जादू को महसूस कर सकते हैं.
हाल ही में राजकुमार केसवानी से लंबी बातचीत हुई. उनके हिन्दी ब्लॉग जगत के थोड़े से समय के अनुभव तथा उनके प्रिय शगल संगीत पर हुई बातचीत और उनके बाबा आदम के जमाने के मगर अभी भी बढ़िया काम कर रहे चाबी वाले बाजे पर बजते गाने के बेहद दिलचस्प वीडियो आप भी देखें -


भाग 1 :  हिन्दी ब्लॉग जगत में अभी परिपक्वता दूर-दूर तक नजर नहीं आती :


भाग 2 : समय के साथ संगीत की पसंदगी बदलती ही है :

राजकुमार केसवानी का चाबी वाला बाजा

बाजा बजाने की तैयारी

बजता हुआ ग्रामोफ़ोन - एंटीक पीस?

और, अंत में देखें-सुनें राजकुमार केसवानी के अनमोल संग्रह से गौहर जान  के स्वर में रेकॉर्ड प्लेयर पर बजता गीत. यह गीत भारत में शुरूआती दौर में रेकॉर्ड किए गए चंद गीतों में से एक है.

सबसे ऊपर का चित्र - राजकुमार केसवानी के अनमोल खजाने से : गायक पियारा साहब का दशकों पुराना रेकॉर्ड - पियारा साहब कलकत्ता के महाराजा के दरबारी गायक थे

BANWARI LAL CHOKSE

वैसे तो बनवारी लाल चौकसे की आत्मकथात्मक किताब ‘श्रमिक से पद्मश्री’ स्मरणिका के रूप में ज्यादा नजर आती है मगर स्वेट मार्डेनों, दीपक चोपड़ाओं और जमात में ताज़ा तरीन शामिल हुए रश्मि बंसलों जैसे तमाम प्रेरणास्पद लेखकों की तमाम किताबों के जैसी प्रेरणा यह एक किताब पाठक के मन में भर सकती है.

किताब बहुत ही सहज और बेहद सरल भाषा में लिखी गई है. शुरुआत के पन्नों में कुछ अनावश्यक से बधाई संदेशों को स्थान दे दिया गया है, और आखिरी के पृष्ठों में चित्रों के चयन में तारतम्यता नहीं बरती गई है, बावजूद इसके पूरी किताब पठनीय और बेहद प्रेरणास्पद है.

किताब में बनवारी लाल चौकसे ने ये बताया है कि किस तरह उन्होंने एक दिहाड़ी श्रमिक – दैनिक वेतनभोगी मजदूर के रूप में अपना कैरियर एक नामालूम सी प्राइवेट कंपनी में प्रारंभ किया और अपनी लगन, अपनी क्षमता, नित्य सीखने की ललक, हर कार्य में, हर जाब में अपना शतप्रतिशत झोंक देने की प्रतिबद्धता के बल पर न सिर्फ बहुत ही कम समय में बीएचईएल व भारत के सर्वोच्च श्रम पुरस्कारों को प्राप्त किया, बल्कि भारत सरकार के बेहद प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार भी प्राप्त किया. अगर आप समझते हैं कि पद्म पुरस्कार चंद रसूख वालों को मिलता है, तो आप गलत हैं. बनवारी लाल चौकसे जैसे लोग इसके अपवाद हैं. वे भारत के चंद सर्वाधिक पुरस्कृत तकनीकज्ञों में से एक हैं.

प्रस्तुत है किताब के कुछ प्रेरणास्पद अनुच्छेद -

मैं वर्ष 1973 में ओमेगा इंडस्ट्री में हेल्पर के रूप में कार्यरत था. इस संस्थान में मेरा कार्य मशीनों की साफ सफाई तथा जाबों को मशीन पर लोड-अनलोड करने वाला था. एक दिन मैं स्टील की प्लेटों को स्टोर से शॉप फ्लोर में ला रहा था. प्लेटें काफी वजनदार होने के कारण मुझे बहुत परेशानी हो रही थी. मेरे इस कार्य को ओमेगा इंडस्ट्रीज के मालिक श्री प्रकाश साहब देख रहे थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि कहाँ रहते हो तथा शिक्षा क्या है? मैं डर गया कि वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे. लेकिन उन्होंने प्रेम से कहा कि बेटा इतना कठिन कार्य तुम्हारे बस का नहीं है. तुम भेल में ट्रेनिंग क्यों नहीं कर लेते! मैं तुम्हारी मदद करूंगा. अब मैं पूरी तरह से यह समझने लगा कि वे इस बहाने से अब मुझे काम पर नहीं बुलाएंगे. लेकिन परिणाम उल्टा ही हुआ. उन्होंने अपने अधीनस्थों के माध्यम से मुझे ट्रेनिंग की जानकारी भिजवाई तथा यह भी आश्वासन दिया कि जब तक तुम्हारा प्रशिक्षण के लिए चयन नहीं हो जाता, यहाँ पर काम करते रहो. मैं इस घटना को याद करते हुए यह कहना चाहता हूं कि कठिन परिश्रम से अंजान लोग भी आपकी मदद कर सकते हैं.”

नवम्बर 2000 में मुझे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण के लिए सिंगापुर के अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में आमंत्रित किया गया था. उन दिनों भेल संस्थान की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण कार्पोरेट कार्यालय द्वारा सारे अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम स्थगित कर दिए गये थे.

लेकिन कार्पोरेट प्रबंधन ने मेरी उपलब्धियों तथा पहली बार ऐसे आमंत्रण के लिए मुझे तथा मेरे साथ दो अधिकारियों को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण के लिए भेजा गया था. प्रस्तुति का विषय गुणता सर्किल के नेता के रूप में मेरी उपलब्धियाँ था.

वहां मंच पर मुझसे एक प्रश्न पूछा गया – यदि कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्थान आपको उच्च वेतन पर अपने यहाँ नौकरी प्रदान करे तो आप क्या जाएंगे?

मेरा उत्तर था कि जिस संस्थान एवं राष्ट्र ने मुझे इतने संसाधन उपलब्ध करवाकर आज जिस मंच पर लाकर खड़ा किया है, मैं उस देश तथा अपने उस संस्थान को छोड़ने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोच सकता...”

अपनी किताब के आखिरी हिस्से में वे सफलता के कुछ सूत्र गिनाते हैं –

  • कार्य के प्रति अपनत्व
  • नितांत जिज्ञासु बने रहना
  • पूर्ण विश्वास रखें एवं मनोयोग बनाए रखें
  • गलतियों को छिपाए नहीं और संकोच से बचें
  • स्वयं को असहाय व कमजोर न समझें
  • अहं भाव को त्यागकर परोपकारी बनें
  • समय के महत्व को जानें

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श्रमिक से पद्मश्री

आत्मकथा

लेखक : बनवारी लाल चौकसे

प्रकाशक – इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज रोड, भोपाल मप्र 462016

आईएसबीएन नं. 978-81-89107-27-7

पृष्ठ 136, मूल्य – 125/- रु.

यदा कदा हम सभी का सामना रीअल, वास्तविक चीजों से हो जाता है, और हम सन्न खड़े देखते रह जाते हैं. ऐसे ही कुछ वास्तविक चीजों से सामना पिछले दिनों अनायास हो गया. आप भी दर्शन-लाभ लें.

यह है द रीअल कैटल क्लास -

 

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पौराणिक महत्व की, दैव नगरी – उज्जयिनी के रेलवे विश्रामगृह का 30 सितम्बर 09 की रात्रि का चित्र है यह. बताने की जरूरत नहीं कि हम भी शामिल थे रीअल कैटल क्लास में – झाबुआ तक के रात्रिकालीन सफर के दौरान क्षणिक विश्राम की तलाश में :)

 

और, यह हैं  असली मदर मैरी.

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एक और एंगल से नहीं सराहेंगे?

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(सभी चित्र – सौजन्य :  रेखा)




हमारी नामी कंपनी 'सो फ्लां' ने एक लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में पेश किया है. लिमिटेड एडीशन की सिर्फ 3000 लँगोटियाँ तैयार की गई हैं. इन लँगोटियों की ढेरों ख़ासियतें हैं जो इन्हें व इनके खरीदारों और प्रयोगकर्ताओं को विशिष्ट बनाती हैं. पहली खासियत तो ये है  कि इन्हें अति विशिष्ट किस्म के खद्दर से बनाया गया है. वही खद्दर, जो देश के नेताओं को आजादी के पहले और आजादी के बाद बहुत ही मुफीद बैठता आ रहा है अब तक. खद्दर के लिए कच्चा माल खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया के वर्जिन जंगलों से आयातित किया गया है. इसकी रुई प्राकृतिक रूप से उगे पौधों से तैयार की गई है और पूर्णतः जैविक पैदावार है, न कि रासायनिक और कृत्रिम रूप से उगी. इसे खास तौर पर डिजाइन किए गए हीरा मोती माणिक्य मढ़े करघे की सहायता से हाथ से बुना गया है. लँगोटी का डिजाइन प्रसिद्ध फ्रेंच फ़ैशन डिजाइनर 'विव सेंट फोरें' द्वारा रीडिजाइन कर बनाया गया है.
इसके बॉर्डर में विशेष किस्म के प्लेटिनम अलॉय का प्रयोग किया गया है जिससे लँगोटी सुन्दर, आकर्षक तो दिखती ही है, इस्तेमाल में नर्म और मुलायम भी होती है. इसकी ड्यूरेबिलिटी के लिए विशेष ट्रीटमेंट दिया गया है जिससे कि इसका प्रयोग एक बार में लगातार पाँच साल तक एक ही कुर्सी पर बैठकर किया जा सकता है.
गाँधी लँगोटी की एक और महत्वपूर्ण खासियत ये है कि आप नेता हों या अफसर, गाँधी लँगोटी डालकर बेशक भ्रष्टाचार के नए-नए, विशाल कारनामे कर सकते हैं. आपके ऊपर कोई आँच नहीं आएगी. आपने जो गाँधी लँगोटी का कैमोफ्लॉज पहना हुआ होगा. गाँधी लँगोटी आपको हर किस्म के चुनाव में (पूरे भारत में इसकी गारंटी है) जितवाने में सहायक होगा. आप लँगोटी की आड़ में आप चाहे कितने मतदाता खुले आम खरीद सकते हैं – कोई चुनाव आयोग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा – क्योंकि उसे तो आपकी गाँधी लँगोटी ही दिखाई देगी. गाँधी लँगोटी की ये भी खासियत है कि ये अपने मालिक के लिए अच्छे और मलाईदार पद वाली कुर्सियों की व्यवस्था खुद करेगा.

चूंकि गाँधी लँगोटी को लिमिटेड एडीशन के रूप में सीमित संख्या में जारी किया गया है, अतः इसके मालिक और प्रयोगकर्ता समाज में विशेष इज्जत और मान सम्मान के हकदार होंगे. वे समाज के एलीट क्लास और श्रेष्ठी वर्ग के लोग होंगे जो गाँधी लँगोटी को अफोर्ड कर सकेंगे. जाहिरा तौर पर ऐसे में चंद बड़े नेताओं, उद्योगपतियों और बड़े अफसरों के हाथ में ही गाँधी लँगोटी पहुँच पाएगी. और ऐसे में गाँधी लँगोटी धारकों को हर कहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में माना जाएगा और उनका स्वागत सत्कार किया जाता रहेगा.

इन लँगोटियों की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इन्हें सर्वसिद्धि यंत्र के रूप में प्रयोग में लिया जा सकता है. आपका काम कहीं रुक रहा हो, अड़ रहा हो, कहीं फंस रहा हो, बस एक अदद गाँधी लँगोटी की दरकार है आपको. एक अदद गाँधी लँगोटी सामने वाले अफसर/नेता/मंत्री को गिफ़्ट कर दें. गाँधी लँगोटी का असर चौबीस घंटे के भीतर होगा और आपका रुका हुआ काम बन जाएगा. वैसे भी गाँधी लँगोटी को खास इन्हीं कामों को ध्यान  में रख कर डिजाइन किया गया है.

इन लँगोटियों की वैसे तो और भी ढेरों खासियतें हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता और इन्हीं खासियतों के चलते लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में जारी होते ही सोल्ड आउट हो गई और सुना है कि अब उसकी ब्लैक मार्केटिंग हो रही है. एक शीर्ष के वित्तीय सलाहकार के मुताबिक इन्वेस्टमेंट के लिहाज से भी गाँधी लँगोटी पर निवेश करना एक समझदारी भरा निर्णय होगा. इसीलिए गाँधी लँगोटी चाहे जितनी खरीद सकें खरीद लें.

गाँधी लँगोटी के बाजार से उत्साहित हमारी कंपनी जल्द ही गाँधी लाठी, गाँधी घड़ी, गाँधी खड़ाऊँ, गाँधी धोती के लिमिटेड एडीशन जारी करने जा रही है. इनमें भी एक से बढ़कर एक खासियतें होंगी. अग्रिम बुकिंग चालू है. इससे पहले कि आप पीछे रह जाएँ, गाँधी को लपक लें. गाँधी की लँगोटी ही सही!
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व्यंज़ल

यहाँ कहीं दिखती नहीं लँगोटियाँ
क्या हमने पहनी भी हैं लँगोटियाँ


यथा राजा तथा प्रजा के तर्ज पर
लोगों ने कब से तज दी लँगोटियाँ


मेरे शहर की सूरत यूँ बदल गई
यहाँ सरे आम धुलती है लँगोटियाँ


वक्त ने सब उलट कर रख दिया
पैंट के ऊपर पहनते हैं लँगोटियाँ


अपने  को छुपाने में लगा है रवि
पहन कर लँगोटियों पे लँगोटियाँ
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(स्क्रीनशॉट – साभार नई-दुनिया ईपेपर)

जो लोग इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड से हिन्दी टाइपिंग सीखना चाहते हैं, उनके लिए बाजार में इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर आसानी से नहीं मिलता. जो हिन्दी स्टीकर बाजार में मिलते हैं वो रेमिंगटन (कृतिदेव) के ही होते हैं. इस समस्या के हल के लिए अर्जुन राव चावला ने एक बढ़िया गूगल डॉक बनाया है, जिसमें तेलुगु इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड को छापा जा सकता है. इसका आसान प्रयोग चिट्ठाजगत-गिरगिट के जरिए मैंने किया है जिससे आप हिन्दी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर छाप  सकते हैं.

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यही नहीं इसके जरिए गिरगिट समर्थित अन्य निम्न भारतीय भाषाओं में भी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर छापा जा सकता है.

 Bangla, Devanagari, Gujarati, Gurmukhi, Kannada, Malayalam, Oriya, Roman(eng), Tamil, Telugu

स्टीकर छापने के लिए पीछे की ओर गोंद लगे काग़ज़ का प्रयोग करें, या फिर सादे काग़ज़ पर छाप कर फ़ेविकोल इत्यादि से चिपकाएं. ध्यान रहे कि गोंद ज्यादा न लगाएं, अन्यथा आपका कुंजीपट खराब हो सकता है. आप चाहें तो इसे सादे काग़ज़ पर छाप कर अपने कीबोर्ड के बाजू में संदर्भ के लिए रख सकते हैं.

अद्यतन : -

  सुधन्व जोगलेकर ने बताया है कि हिन्दी/मराठी के लिए एक बढ़िया प्रिंट किया जा सकने वाला इमेज फ़ाइल नीचे दिये पते पर उपलब्ध है जिसका प्रिंट आउट लेकर स्टीकर बनाया जा सकता है -

http://aksharyogini.sudhanwa.com/kbdlayout.jpg

sada aachar

वैसे, यूं तो आदमी, आदमी ही होता है. मगर कभी वो कुत्ता, कभी उल्लू, कभी गधा और कभी सूअर बन जाता है. यदा कदा कुछ अतिरेकी मामलों में वो बैल या शेर भी बन जाता है. मगर सड़ा अचार?

आधुनिक, कलियुग में वो सड़ा अचार भी बनने लगा है. यही तो कलियुग की पराकाष्ठा है कि अब आदमी हर काल्पनिक रूप से संभव निम्नतम रूप धारण कर सकता है. वो यह भी बन सकता है, वो वह भी बन सकता है और वो सड़ा अचार भी बन सकता है. खासकर भारत की धरती पर. यहाँ की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसी खासियत है कि आदमी देखते देखते, दन्न से सड़ा अचार बन जाता है. एक दिन पहले तक वो पूज्यनीय, आदरणीय होता है, मगर किसी शानदार सुबह को पता चलता है कि अरे! वो तो सड़ा अचार हो गया है! आइए, जरा पड़ताल करें कि आदमी आखिर सड़ा अचार कब और क्यूं बन जाता है.

आदमी अगर बड़ा नेता है तो वो सड़ा अचार तब बन जाता है जब उसका करिश्मा खतम हो जाता है. उसके उठाए मुद्दे वोट खैंचू रूप से प्रभावी नहीं रहते. वो अपने दम पर अपने दल के, अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव नहीं जितवा सकता.

ठीक इसके उलट, आदमी अगर वोटर है, तो वो नेताओं के नजरों में भले ही हर पांचवें साल ऐन चुनावों के वक्त देवता माफ़िक हो, मगर चुनावों के निपटते ही वो सड़ा अचार के माफ़िक हो जाता है जो बिलावजह उनके द्वारा किए गए चुनावी वायदों को पूरा करने करवाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ा रहता है.

आदमी अगर सरकारी अफसर है तो वो सड़ा अचार तब होता है जब वो ईमानदार होता है, रिश्वत नहीं लेता-देता और इस तरह से न तो वो जनता के किसी काम का होता है और न अपने बीवी बच्चों के. वो तो पूरे सिस्टम के लिए सड़ा अचार होता है – जो लेन-देन के चैनल को ब्रेक करता है. और, जाहिर है, ऐसे सड़े अचार अकसर लूप लाइन में पड़े रहते हैं.

कई मामलों में आदमी सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो धर्मांधता का चश्मा पहन लेता है – पर फिर यहां बड़ी विडंबना यह होती है कि उसे अपने अलावा दूसरे सभी विधर्मी और सड़े अचार नजर आते हैं.

आदमी अगर बड़ा साहित्यकार है तो वो सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो खुद तो लिखना अर्से से बन्द कर चुका होता है, मगर साहित्य की वर्तमान दशा पर, समकालीन साहित्यकारों पर, नवोदित रचनाकारों पर, सुधी पाठकों पर यानी कि सब पर अपनी भड़ास निकालता होता है कि लोग साहित्य का कचरा कर रहे हैं और इस तरह से वो अपने आप को छोड़ बाकी की सारी साहित्यिक जनता को सड़ा अचार बताने पर तुला होता है. कुछ एक्स्ट्रीम केसेज में वो प्रेमचंद और भारतेंदु को भी सड़ा अचार सिद्ध करने में तुल जाता है.

आदमी अगर संपादक है तो वो यकीनन उन तमाम लेखकों की नजर में सड़ा अचार होता है जिन्हें वो संपादक नहीं छापता. और इसके ठीक विपरीत ये लेखक संपादक की नजरों में सड़े अचार होते हैं जो सड़े अचार की माफ़िक घोर अपठनीय-अप्रकाशनीय रचनाओं पर रचनाएँ लिख मारते हैं. वैसे, इसे मरफ़ी के सड़े अचार का नियम कहा जा सकता है और यह सामान्य नियम सर्वत्र, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है. उदाहरण के लिए, प्रेमी-प्रेमिका विवाह पश्चात् एक दूसरे के लिए सड़े अचार के माफ़िक हो जाते हैं.

बहुत हो ली सड़े अचार की बातें. और इससे पहले कि मुंह का जायक़ा खराब हो और आप इस सड़ियल व्यंग्य को सड़े अचार का विशेषण दे दें, आपके लिए एक सड़ा अचार आई मीन, एक शेर पेशे-नज़र है -

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मेरे देश का सिस्टम कुछ यूँ है यारों

यहाँ आदमी बन गया है सड़ा अचार

machhar kanoon

नए क़ानून के मुताबिक, अब अगर आपके घर में कोई मच्छर दरियाफ़्त किया जाएगा, यदि आप मच्छरों को अपने घरों में प्रश्रय दे रहे होंगे तो आपके ऊपर शुद्ध 500 रुपयों का जुर्माना किया जाएगा. %$#@ बहुत हो गया. मच्छरों से तो अब क़ानून बनाकर ही निपटा जा सकेगा. मेरे नगर की म्यूनिसिपल कमेटी ये क़ानून बना रही है. कल को सारे देश में ये लागू किया जाएगा. इतने बढ़िया क़ानून से देश का कौन सा राज्य, कौन सा शहर और कौन सा गांव अछूता रह सकेगा भला? वो तो इन %#@ अनपढ़ मच्छरों का कसूर है, वरना मच्छरों के लिए क़ानून तो कब का बन चुका होता कि मनुष्यों को काटना मना है और खासकर नेता टाइप को तो कतई नहीं.

वैसे भी सरकारें किसी समस्या से निपटने में अक्षम रहती हैं तो वो नए क़ानून बना डालती हैं. कम से कम सरकारों को कोई दोष तो नहीं दे सकता कि वे अकर्मण्य बैठी रहती हैं. तो नया क़ानून बन गया. जनता को अब चाक चौबन्द चौकन्ना रहना होगा. म्यूनिसिपल कमेटी का कोई दारोगा – डॉग शिट स्क्वॉड किस्म का ही – अब आपके घर पर कभी भी दस्तक दे सकता है. रात को बारह बजे, जब आप अपनी मसहरी में शांति की, चैन की नींद सो रहे होंगे, आपके घर की डोर बैल की चीखती आवाज आपकी नींद तोड़ेगी. आप पाएंगे कि दरवाजे पर म्यूनिसिपल कमेटी का मॉस्किटो स्क्वॉड का इंस्पेक्टर व्यंग्यात्मक मुस्कान लिए खड़ा है. वो दन्न से अंदर घुसता है. आपके बेडरुम में फट से घुसता है. मसहरी देख उसकी मुस्कान और चौड़ी हो जाती है. हो न हो इस घर में मच्छर तो होंगे ही तभी तो ये %$**& मसहरी लगा कर चैन की नींद सो रहा है. वो इधर उधर नजर मारता है. एक मच्छर उसे जल्दी ही नजर आ जाता है. वो फटाक से अपनी पेंट में से चालान की रसीद निकालता है. आपकी मजबूरी है. जुर्माने के पाँच सौ देकर रसीद लीजिए, या मामला आधे में निपटाइए, नहीं तो जेल की हवा खाइए. आपने क़ानून तोड़ा है. आपने अपने घर पर मच्छर को प्रश्रय जो दिया है.

सरकार बड़े बड़े दावे करेगी कि इस क़ानून से ये फ़ायदा हुआ वो फ़ायदा हुआ. जुर्माने से इतने हजार लोगों से उतने लाख वसूले. पर इस क़ानून के बाद भी जब स्थिति नियंत्रण में नहीं आएगी, तो सरकार फिर जागेगी. वो फिर से कड़े कदम उठाएगी. इस क़ानून में कड़े प्रावधान रखेगी. जुर्माना पाँच सौ के बजाए पाँच हजार कर देगी. कैद की न्यूनतम सीमा छः महीने के बजाए साल भर कर देगी. नतीजतन आपको आपके घर रात में बारह बजे घंटी बजाने वाला म्यूनिसिपल कमेटी का मॉस्किटो स्क्वॉड के दारोगा की मुस्कान जरा ज्यादा ही फैली हुई मिलेगी.

आपके झगड़ालू पड़ोसी को आपसे बदला लेने का नया तरीका मिल जाएगा. वो दर्जन भर मच्छर आपके घर छोड़ देगा और म्यूनिसिपल के दारोगा को इत्तिला कर देगा – देखो! इसके घर में एक नहीं, पूरे दर्जन भर मच्छर हैं! वैसे, राज की बात बताऊँ, इस इफ़ेक्टिव आइडिये को आप अपने खड़ूस बॉस के ऊपर प्रभावी तरीके से लागू कर सकते हैं. किसी शाम उनसे मिलने के बहाने चले जाएँ, कुछ चापलूसी मक्खन बाजी कर आएं, और इस बीच डिबिया में साथ लाए मच्छरों को निगाह बचा कर छोड़ दें. दारोगा को पहले से ही टिप दे कर रहें. वो तो आपके बाहर आने का इंतजार खुशी से करता मिलेगा.

वैसे, इस क़ानून से जनता कुछ कमाई भी कर सकती है. आप कछुआ छाप मच्छर भगाओ अगरबत्ती, आलआउट मच्छर भगाओ मशीन तथा मच्छर मार रैकेटों का धंधा चालू कर सकते हैं. इनका स्टाक एकत्र कर इनकी कालाबाजारी कर इनमें अच्छा खासा मुनाफ़ा कमा सकते हैं. इन कंपनियों के शेयरों में निवेश कर सकते हैं, क्योंकि इन कंपनियों का भविष्य मच्छरों के कारण बहुत ही बढ़िया चल रहा है और चलता रहेगा.

अब तो मच्छर मियाँ के कसीदे गाने का समय आ गया है. सरकार के लिए भी, सरकारी कारिंदों के लिए भी, और जनता के लिए भी. क्यों न मच्छर-चरित-मानस का पाठ किया जाए?

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हिन्दी में सर्च करने की बढ़िया सुविधा गूगल में है. परंतु आम प्रयोग के दौरान सर्च विकल्प में पिछले चौबीस घंटों या किसी मामले में पिछले बारह घंटों का सर्च विकल्प ही मौजूद रहता है. सवाल ये है कि ट्विटर की तरह गूगल में भी हिन्दी में रीयल टाइम सर्च कैसे करें.


रीयल टाइम सर्च माने कि पिछले पाँच मिनट के दौरान (या पिछले चालीस सेकण्ड के दौरान,) प्रकाशित हुए हिन्दी पन्नों में किसी खास शब्द से ढूंढना.

एक छोटा सा गूगल हैक है. आप भी आजमाएँ. कुछ मजेदार परिणामों (या शून्य परिणाम,) के लिए तैयार रहें.
नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट के अनुसार ब्राउजर के एड्रेस बार में गूगल सर्च स्ट्रिंग भरें. जिस हिन्दी शब्द को खोजना है, उसे ‘है’ के बदले प्रतिस्थापित करें. यहाँ पर qdr:n5 का प्रयोग पिछले पाँच मिनट के दौरान प्रकाशित हिन्दी के नए पन्नों में ‘है’ शब्द को ढूंढने के लिए किया गया है. यदि आप पिछले 25 या 47 मिनट के दौरान खोजबीन करना चाहते हैं तो उसे 5 के बदले 25 या 47 कर दें.


कुछ ब्राउज़रों में सर्च स्ट्रिंग भरने के बाद एंटर करने पर यह कमांड कुछ यूँ दिख सकता है:
http://www.google.com/search?q=%E0%A4%B9%E0%A5%88&hl=hi&output=search&tbs=qdr:n5&tbo=1
(ऊपर दिए गए लिंक को आप क्लिक कर यह गूगल सर्च खोल सकते हैं)
परिणाम कुछ यूं नमूदार होगा –

 (चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)
यदि आप सेकण्डों के भीतर रीयल टाइम ढूंढना चाहते हैं तो जरा सा परिवर्तन नीचे दिए स्क्रीनशॉट के अनुसार करें.

http://www.google.com/search?q=%E0%A4%B9%E0%A5%88&hl=hi&output=search&tbs=qdr:s59&tbo=1
(ऊपर दिए गए लिंक को क्लिक कर आप यह गूगल सर्च खोल सकते हैं)
यहाँ पर पिछले 59 सेकण्ड में वेब पर प्रकाशित हुए हिन्दी पन्नों में ‘है’ शब्द का खोज का परिणाम दिखाएगा. यहां पर आप देखेंगे कि qdr:n को qdr:s कर दिया गया है. n मिनट के लिए है, s सेकण्ड के लिए है.
ऊपर दिए गए सर्च का परिणाम कुछ यह रहा –

 (चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)
मजेदार बात ये है कि गूगल हर बार ये बताता है कि यह सुविधा अनुपलब्ध है. फिर भी वो सर्च परिणाम दिखाता है!
हैप्पी सर्चिंग!
 

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