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October, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अरे वाह! मेरी तो लॉटरी लग गई!!

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मेरे एक मित्र को पिछले दिनों एक ईमेल मिला जिसमें कहा गया था कि उसे याहू और विंडोज लाइव मेल के संयुक्त तत्वावधान में कोई सात लाख पौंड स्टर्लिंग (यानी कोई चार करोड़ रुपए) की लॉटरी उसके ईमेल खाते के नाम से खुली है. और उसे क्लेम करने के लिए कुछ जानकारियाँ मांगी गई थीं. हम सबको, जो कुछ समय से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं, यह भली प्रकार से पता है कि इस तरह के ईमेल कर लोगों को फांसा जाता है और शिकार बनाकर डाक्यूमेंटेशन और दीगर खर्चे के नाम से शिकार से पैसा ऐंठा जाता है और उन्हें उल्लू बनाया जाता है. मगर मेरा वह मासूम मित्र उनके जाल में फंस गया और उसने उस ईमेल का उत्तर दे दिया जिसमें उसने अपना मोबाइल नंबर भी दे दिया था. बस क्या था, उसके मोबाइल पर फोन आने लगे (ब्लैंक नंबर युक्त!) कि कोई आदमी इंगलैंड से चलकर एक बड़े बक्से में इंडियन करेंसी लेकर आ रहा है (जिसे यह बताया नहीं गया है कि उस बक्से में क्या रखा है) और उससे अपनी आइडेंटिटी और कोड बताकर 2000 पौंड के समतुल्य राशि देकर वह ईनाम वाला बक्सा ले लेना है. अब उस मित्र का माथा ठनका. उसने सोचा कि ये कैसा ईनाम है जो इंग्लैंड से चलकर बक्से में भा…

नारद, ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत् इत्यादि के आगे जहां और भी हैं...

जब नारद-बाजार प्रकरण हुआ था तो मैंने ब्लॉग पोस्ट नारद के आगे जहां और भी हैं.... में कहा था कि किसी संकलक को पूरा अधिकार है कि वो किसी भी चिट्ठे को हटाए या रखे. वो चाहे जिस चिट्ठे को हटा सकता है और चाहे जिसे रख सकता है. अपने लिए नियमावलियाँ बना सकता है. परंतु फिर, कोई तार्किकता तो होनी ही चाहिए. अब इस ताज़ातरीन प्रकरण में दुखद प्रसंग यह दिखाई देता है कि 9-2-11 को उसकी सामग्री के चलते नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्विता के चलते निकाला गया. इस बीच, चिट्ठाजगत् से भी कुछ चिट्ठे निकाले गए ऐसे आरोप भी लगे.एक चिट्ठाकार होने के नाते मेरे चिट्ठे किसी संकलक पर रहें या न रहें इससे भले ही मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता परंतु लोगों को पड़ सकता है जैसा कि आलोक को पड़ा - उन्हें लगा कि उनके चिट्ठे की सामग्री क्या इतनी आपत्तिजनक है कि एक सार्वजनिक संकलक से बाहर कर दी जाए. अब जबकि बहुत सी बातें जाने अनजाने स्पष्ट हुई हैं, तो यह निश्चित तौर पर लग रहा है कि सारा प्रसंग दुःखद किस्म का ही रहा है. प्रतिद्वंद्विता स्वस्थ क़िस्म की कतई नहीं रह पाई. वैसे, इस प्रकरण का एक मजेदार, अहम पहलू (टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र?) यह रह…

अर्ज किया है... अपने सी-बॉक्स को जरा ठीक करें...

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और, साथ ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ टैम्प्लेट को देखें.... चलिए, पहले सी-बॉक्स की बात करते हैं फिर समय बचा तो वो टैम्प्लेट भी देख लेंगे. बहुत से हिन्दी चिट्ठों में सी-बॉक्स लगाया गया है. चिट्ठों के बाजू पट्टी में सी-बॉक्स सूचनाओं के त्वरित आदान प्रदान के लिए सबसे सस्ता सुंदर और टिकाऊ किस्म का असबाब है. परंतु सी-बॉक्स की डिफ़ॉल्ट सेटिंग बहुत से हिन्दी चिट्ठा टैम्प्लेटों के लिए ठीक नहीं है. जैसे कि यह  – जैसा कि चित्र में दिखाई दे रहा है, नीचे का अहम हिस्सा कट रहा है. यहाँ प्रोफ़ाइल व स्माइली इत्यादि की कड़ियाँ हैं. इसी प्रकार, सी-बॉक्स हिन्दी में भी उपलब्ध है, जबकि कुछ चिट्ठाकार बंधुओं ने डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी ही लगाया हुआ है.  जैसे कि यह- सी-बॉक्स के आकार में आप आसानी से परिवर्तन कर सकते हैं. ताकि ये अहम हिस्से दिखाई दें. आप ये काम दो तरीके से कर सकते हैं. आप अपने सी-बॉक्स के खाते में जाकर वहाँ कंट्रोल पैनल में सी-बॉक्स ऑप्शन में फ़ॉर्म हाइट को डिफ़ॉल्ट 91 से बढ़ाकर 120 कर दें, या फिर अपने चिट्ठे में लेआउट में जाकर जहाँ आपने सी-बॉक्स का कोड लगाया है उसमें चित्र में दिए अनुसार डिफ़ॉल्ट ऊ…

ओएलपीसी (एक लैपटॉप कम्प्यूटर प्रति बच्चा) हिन्दी में

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मित्रों,कम्प्यूटर जगत् की महात्वाकांक्षी परियोजना ओएलपीसी (एक लैपटॉप प्रतिबच्चा) को हिन्दी भाषा में लाए जाने का कार्य प्रस्तावित है. शुरूआत के लिए इस स्थल पर दिए गए लैपटॉप में काम शुरू कैसे करें नाम के दस्तावेज  का हिन्दी में अनुवाद किया जाना है.मैंने इस दस्तावेज का हिन्दी अनुवाद प्रारंभ कर दिया है. समस्या है कि इसे आज और कल में ही पूरा करना है.तो यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त समय हो, और आप अनुवाद कर सकते हों तो शीघ्र ही मुझे बताएँ. यहाँ टिप्पणियों में या मुझे ईमेल कर (पता इसी चिट्ठे में बाजू पट्टी में है)अंतिम चार भाग नितिन के सिंह कर रहे हैं. शुरूआत के चार भाग को मैं कर रहा हूँ. बाकी के सात भागों के लिए आपके स्वयंसेवी प्रयासों की दरकार है...अद्यतन - बीच के चार भागों का अनुवाद -  कमल कर रहे हैं. शेष बच रहे हैं - 3 भाग. आपकी भागीदारी अपेक्षित है.अद्यतन # 2 - बाकी के तीन भागों का अनुवाद भी कमल कर रहे हैं. अतः अब संपूर्ण भागों का अनुवाद किया जा रहा है. आप सभी ने इस परियोजना में रूचि ली, आपका धन्यवाद.अद्यतन # 3 - अनुनाद व संजय ने अपने अपने स्तर पर (संभवतः संवाद नहीं होने के कारण, जिसका मुझे …

‘मैं चिट्ठाकार हूँ... कुछ भी लिख सकता हूँ.’

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पिछले दिनों इंदौर के एक पुलिस थाने में एक व्यक्ति को झाड़ पर बाँध कर इतना पीटा गया कि उसकी मृत्यु हो गई. इस तरह के अबू-गरीब किस्म के अत्याचार भारत के थानों में आम हैं. भारतीय पुलिस वसूली, भ्रष्टाचार और अत्याचार के लिए ज्यादा जानी जाती है बनिस्वत जनता की सेवा और उसकी रक्षा के. मेरे एक जहीन मित्र का सहपाठी पुलिस में टीआई है. एक दिन वो उससे मिलने उसके घर गया तो उस पुलिसिये ने मित्र की ओर इशारा करते हुए अपने बेटे से कहा – बेटा थोड़ा पढ़ लिख लेना ठीक ठाक नहीं तो बाद में मेरी तरह हर तरफ से गाली खाएगा. देखो ये मेरा दोस्त पढ़ लिख कर अफसर बन गया है. मैंने पढ़ने में कोताही की थी तो देखो कहाँ फंसा हूँ. मित्र ने मजाक में प्रतिवाद किया कि भइए, तुम भी तो थाने में टीआई हो, अच्छे अच्छों की हवा निकालते हो. इस पर उस पुलिसिए ने कहा – यार मैं सीरियस हूँ. लोग सामने तो भले ही सलाम ठोंकते हैं, परंतु पुलिस को पीठ पीछे गाली देते हैं. पुलिस (यहाँ ‘भारतीय’ समझा जावे) और अपराधी की जन्म कुंडली एक ही होती है. वो एक जैसे ही कर्म करते हैं. बस, पुलिस के पास ऐसा करने का लाइसेंस स्वरूप उसकी पदवी और वर्दी होती है. उस न…

चाहिए एक अदद सार्थक सहमति...

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अब तक तो सिर्फ सहमति और असहमति का नाम सुना था. आदमी या तो सहमत होता था या असहमत. और कुछ मेरी तरह के लोग जो संतुलन में यकीन रखते हैं, - जिसमें नॉनएलाइन्ड बने रहने में भारतीय राजनीति का भी बड़ा योगदान रहा था – न तो सहमत होते थे और न असहमत. बस मुंडी हिलाने में यकीन रखते थे. जो समझना हो समझ लो. सहमत या असहमत. अपने फायदे के लिए, दूसरों के फायदे के लिए, सबके फायदे के लिए. जो भी हो, बात सहमति और निरी असहमति पर ही टिकी रहती थी. परंतु अब तो बड़ी समस्या हो गई है. यदि आप किसी बात पर सहमत होते हैं तो अब इतने भर से काम नहीं चलेगा. आपको सार्थक सहमति दर्शानी होगी. सार्थकता का बोध अतिरिक्त रूप से दिखाना होगा, बताना होगा. और यदि आप असहमत हैं तो आपको सार्थक (या अनर्थक?) असहमति जतानी होगी. सार्थकता (या अनर्थकता) का अंश उसमें घुसाना होगा तभी बात बनेगी. हमारे जैसे सिर हिलाने वालों के लिए तो और समस्या है. अब पोकर फेस जैसा चेहरा बनाकर सिर हिलाने से काम नहीं बनेगा. उसमें कुछ सार्थकता लाने के लिए आँख मिचकाने होंगे और नाक भौं सिकोड़ने होंगे और बॉडी लैंगुएज बदलना होगा, होठों में मुस्कान या विद्रूपता लाना होगा …

आइए, हिन्दी में कुछ जांच पड़ताल करें...

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यदि हमारा ईमेल पता कुछ ऐसा हो – रवि@रतलामी.कॉम , या फिर हमारे ब्लॉग का पता कुछ यूँ हो – एचटीटीपी://चकल्लस.ब्लॉगस्पॉट.कॉम तो कितना सुंदर हो! पर, अब धीरे धीरे ये संभव होने लगेगा. इस क्षेत्र में एक कदम आगे बढ़ाया जा चुका है और हिन्दी नामधारी जाल-पतों के परीक्षण किए जा रहे हैं. आपसे आग्रह है कि आप भी इनका परीक्षण करें. व अपने अनुभव बांटें. परीक्षण क्यों आवश्यक हैं?हम सभी विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों में सैकड़ों तरह के अनुप्रयोग इस्तेमाल करते हैं. ये सभी अनुप्रयोग अब तक के मानक, अंग्रेजी जाल पतों व ईमेल पतों को ही समझ पाते हैं. और इनमें से बहुत से तो यूनिकोड कम्पायलेंट भी नहीं हैं. और इनमें हिन्दी नामधारी जालपतों का इस्तेमाल करने पर आप सभी के अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं. इन अनुभवों के आधार पर हिन्दी जालपतों की भविष्य की योजनाएँ बनाई जा सकेंगी व अनुप्रयोगों को हिन्दी जालपता सक्षम बनाया जा सकेगा. मैंने कुछ जांच परख की हैं, जिन्हें आप यहाँ पर देख सकते हैं. कुछ इसी तरीके से आप भी यह जांच-परख कर सकते हैं व अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं. इसके लिए या तो आप इसी विकि पृष्ठ पर खाता खोल कर अपना अनुभव लिख द…

क्या आप ब्लॉगिंग में गलती से आ गए हैं....?

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गलतियाँ कौन नहीं करता? हम सभी गलतियाँ करते फिरते हैं. कुछ लोग जानबूझ कर गलती करते हैं, तो कुछ लोग जाने-अनजाने. कुछ विशेष किस्म की, ख़ूबसूरत गलतियाँ करने का अपना अलग मजा होता है – जैसे लड़कपन में प्रेम करने की गलती. मनमोहन सिंह कहते हैं कि वे राजनीति में गलती से आ गए. अब ये जुदा बात है कि वे इस तरह की प्रदूषित राजनीति में ठहर कर, बने रह कर नित्यप्रति गलतियाँ क्यों कर रहे हैं भला. शायद ये भी खूबसूरत किस्म की ही गलती है जो वे कर रहे हैं. मनमोहन सिंह जैसे इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो राजनीति में लोग गलती से नहीं आते. वे तो राजनीति में बाकायदा केलकुलेटेड मूव से आते हैं. अलबत्ता उन्हें चुनकर गरीब जनता जरूर गलती करती है. और, पप्पू यादवों, और शहाबुद्दीनों जैसों को चुनकर तो वो और भी भारी गलतियाँ करती है, और बारंबार गलतियाँ करती रहती है. कभी कभी हम बहुत सोच-समझकर, ठोंक बजाकर, ऊंच-नीच देखकर, आगा-पीछा जानकर कोई निर्णय लेते हैं तो पाते हैं कि वो तो हमारे जीवन का सबसे बड़ा गलत निर्णय था. यदि आपको यकीन नहीं हो तो जरा बाजार घूम आएँ. दस में से नौ – ठोंक बजाकर जमाए गए पति-पत्नी के जोड़े सिरे से ग…

अब गूगल एसएमएस के जरिए मोबाइल से इंटरनेट पर ढूंढें

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भारत में गूगल ने मोबाइल फोनों के जरिए एसएमएस सेवा से इंटरनेट पर ढूंढने की सुविधा प्रदान की है. आपको इसके लिए 54664 ('5GOOG') को अपना सर्च टर्म (ढूंढा जाने वाला शब्द या वाक्यांश) एसएमएस करना होगा और गूगल तत्काल ही आपको वापस आपके मोबाइल फोन पर एसएमएस कर परिणाम देगा. यह सेवा प्रीमियम सेवा है जिसमें आपको आपके मोबाइल फोन सेवा प्रदाता के अनुसार प्रति एसएमएस तीन रुपए तक का भुगतान करना होगा. इनकमिंग एसएमएस के लिए कोई शुल्क नहीं है. मैंने ढूंढने की कुछ कोशिश की. ‘रविरतलामी’ हिन्दी को यह समझ नहीं पाया. (गूगल साइट पर सिमुलेटेड खोज का चित्र) अंग्रेजी में मैंने जान बूझकर सर्च टर्म भरा ravi tatlami तो इसने बाकायदा इंटेलिजेंट प्रश्न पूछा – डिड यू मीन रवि रतलामी? और फिर बताया कि ऐसा कोई परिणाम नहीं मिला. Ravi ratlami पर भी कोई परिणाम नहीं मिला. (मेरे रिलायंस मोबाइल फोन पर वास्तविक खोज परिणाम का चित्र ) गूगल इंडिया मोबाइल एसएमएस खोज साइट पर सर्च करने के लिए एक सिमुलेटेड मॉडल रखा हुआ है. वहां पर दर्शाए अनुसार movies Bhopal या movies Indore का कोई परिणाम नहीं मिला. हाँ, movies Delhi पर खोज प…

भारतीय पुलिस अकादमी का सर्वर फ़िशिंग साइटों का अड्डा!

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जी, हाँ. ये कोई सनसनी नहीं है, बल्कि ये अत्यंत मजेदार, सच्ची खबर है. एफ़सेक्योर एंटीवायरस के ताजा ब्लॉग प्रविष्टि में इस बात का खुलासा किया गया है. भारतीय राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद के एक सर्वर पर हैकरों ने अपना अड्डा जमा लिया है और अपनी फिशिंग गतिविधियाँ इस पर से चला रहे हैं. इससे पहले एक भारतीय बैंक की साइट पर भी हमले हुए थे, और हालिया समाचारों के अनुसार चीनी हैकरों ने भारतीय अफ़सरों के ईमेल खाते हैक कर लिए थे. एफ़ सेक्योर ने पुलिस अकादमी के जालस्थल प्रबंधक को इत्तिला दे दी है, और, उन्हें उम्मीद है कि अकादमी अपना जालस्थल न सिर्फ दुरुस्त कर लेगी, बल्कि आगे के लिए सचेत भी हो जाएगी – आखिरकार, पुलिस अकादमी के पाठ्यक्रम में साइबर अपराधों पर लगाम लगाना भी शामिल है! यह है तू डाल-डाल, मैं पात-पात का सीधा सच्चा उदाहरण! पूरी खबर (अंग्रेज़ी में) यहाँ पढ़ें चित्र – साभार : एफ़ सेक्योर--------------Technorati tags: , , , , , , , , , , ,

माइक्रोसॉफ़्ट का भारतीय भाषाओं का मुफ़्त फ़ॉन्ट परिवर्तक

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हिन्दी के पारंपरिक फ़ॉन्ट को यूनिकोड में परिवर्तित करने के लिए हमारे पास अब कई तरीके के औजार हैं, और कुछ तो ऑनलाइन भी हैं, जो वास्तव में बढ़िया काम करते हैं.
माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया द्वारा कुछ इसी तरह का एक बेहतरीन औजार मुफ़्त इस्तेमाल हेतु कुछ समय पूर्व जारी किया गया है.
टीबीआईएल (ट्रांसलिट्रेशन बिटवीन इंडियन लैंगुएज) डाटा कन्वर्टर नाम का यह प्रोग्राम न सिर्फ हिन्दी भाषी बल्कि अन्य भारतीय भाषी लोगों के लिए भी बड़े काम का है और बढ़िया है.
टीबीआईएल डाटा कन्वर्टर को आप माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया के जाल स्थल पर यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. यह कोई 6.5 मेबा की संपीडित (जिप) फ़ाइल है जिसे आप अनजिप कर सेटअप प्रोग्राम चला सकते हैं. संस्थापना आसान है, और इसका इस्तेमाल भी बहुत ही आसान है.
इस मुफ़्त के प्रोग्राम के जरिए आप अपने अर्जुन, कृतिदेव, चाणक्य, लीप ऑफ़िस, आकृति, शुषा, एपीएस, भास्कर, वेब-दुनिया इत्यादि हिन्दी फ़ॉन्टों को यूनिकोड में बदल सकते हैं और यूनिकोड हिन्दी को भी वापस इन फ़ॉन्टों में बदल सकते हैं.
इतना ही नहीं, आप एक भाषा की सामग्री (जैसे कि हिन्दी सामग्री) को दूसरी भाषा …

ट्रांसलिट्रेशन का प्रतिच्छेदन....

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क्या आप इस जाल स्थल पर लिखी गई बातों को पढ़ सकते हैं? यह जाल स्थल है – हिन्दी के जाने माने चिट्ठाकार जगदीश भाटिया का जो पंजाबी में भी लिखते हैं. http://punjabi1.wordpress.com/यदि आपको लिपि समझ में नहीं आती है तो आपका उत्तर होगा नहीं. परंतु आप इस जाल स्थल पर लिखी गई इबारतों को आप आसानी से पढ़ सकते हैं और बहुत संभव है कि इसमें लिखी गई अधिकतर बातों को आप समझ भी सकते हैं. यह कोई नया, हिन्दी का जालस्थल नहीं है, बल्कि वही, ऊपर दिया गया, जगदीश भाटिया का पंजाबी भाषा का जाल स्थल ही है. बस, इसकी पंजाबी लिपि को भोमियो के जरिए हिन्दी में ट्रांसलिट्रेट कर दिया गया है. http://bhomiyo.com/hi.xliterate/punjabi1.wordpress.com/मैंने तो पूरी की पूरी पंजाबी पढ़ ली और पूरा का पूरा समझ गया. ओए, तुसी चंगा लिखे हो जगदीश जी.कुछ कुछ यही हाल है गुजराती के इस चिट्ठे का: http://bhomiyo.com/hi.xliterate/kartikm.wordpress.com/और, बंगाली के इस चिट्ठे के बारे में आपका क्या विचार है? http://bhomiyo.com/hi.xliterate/bn.globalvoicesonline.org/2007/10/05/302/और, यदि आप तेलुगु को देवनागरी में पढ़ें, तो शायद ये भाषा भी एकद…

किसी चिट्ठे की फ़ीड आसानी से सब्सक्राइब कैसे करें?

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मेरे पिछले आलेख पर हरिराम जी ने पूछा – कुछ स्पष्ट करें-- उदाहरण के लिए इस टिप्पणी को लिखने के लिए खुले बॉक्स के ऊपर की कड़ी "सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें (Atom)" प्रकट हुई। उस पर क्लिक किया तो एक default नामक फाइल सेव हो गई। इस फाइल को कहाँ, कैसे और क्या करना है?तो आइए, देखते हैं कि किसी चिट्ठे या चिट्ठे की टिप्पणी की फ़ीड सब्सक्राइब करने का सबसे आसान तरीका क्या हो सकता है. हम सभी फ़ॉयरफ़ॉक्स इस्तेमाल करते ही हैं. (ऑपेरा 9 तथा इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 में भी लगभग यही प्रक्रिया है. हरिराम जी, कृपया ध्यान दें - आईई6 में संभवतः यह उपलब्ध नहीं है, अत: या तो अपना ब्राउजर अद्यतन करें या दिए गए वैकल्पिक ब्राउज़रों का इस्तेमाल करें) फ़ॉयरफ़ॉक्स में अपना पसंदीदा चिट्ठा खोलें. जैसे कि उड़नतश्तरी. वहां पता-पट्टी में दाईं ओर आपको नारंगी रंग में सफेद धारियों युक्त एक वर्गाकार चिह्न दिखाई देगा. यह चिह्न हर उस जाल पृष्ठ पर दिखाई देता है जिसकी फ़ीड उपलब्ध होती है. उस चिह्न पर क्लिक करें. आपके लिए विकल्प चयन पृष्ठ खुलेगा. जिसमें लिखा होगा – सब्सक्राइब टू दिस फ़ीड यूजिंग – लाइव बुकमार्क. लाइ…

ये फ़ीड क्या है, ये फ़ीड? और, आपके चिट्ठे की पूरी फ़ीड क्यों जरूरी है?

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मेरे पिछले आलेख – आप चिट्ठा किसलिए लिखते हैं पर ममता जी ने टिप्पणी दी- जानकारी देने का शुक्रिया पर हम अभी पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं.इस पर शास्त्री जी ने टिप्पणी कीममता जी ने जो कहा वह अधिकतर चिट्ठाकरों के लिये सत्य है. अत: मेरा अनुरोध है कि "फीड क्या है" नाम से एक या दो सचित्र लेख और छाप देंतो मैंने उन्हें यह प्रत्युत्तर दिया था – शास्त्री जी, धन्यवाद, आपकी टिप्पणी मेरे जेहन में है और शीघ्र ही इस पर कुछऔर लिखता हूँ.इसके जवाब में उनका उत्तर आया - कृपया यह ध्यान में रखें कि मुझ जैसे तकनीकीव्यक्ति को फीड के बारे में समझने में बहुतसंघर्ष करना पडा था. आम चिट्ठाकर की बाततो और कठिन है. अत: आपका यह लेख अंधे कोदो आंखें देने के समान होगातब मेरी भी आंखें खुली. आमतौर पर एक तकनीकी लेखक अपने आपको सामने रख कर लेख लिखता है (जैसे कि मैं) और इसी कारण वो अपनी बात समझाने में असफल हो जाता है. यदि वो अपने पाठक को, पाठक के तकनीकी स्तर को सामने रखकर लेख लिखे तो बात निश्चित ही दूसरी हो सकती है. आरएसएस, एटम और नए नवेले जेसन फीड पर – कि ये क्या हैं और कैसे काम करते हैं, बहुत कुछ लिखा जा चुका है और …

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