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November, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या है ये जीरो बेस्ड सिस्टम?

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हमें भी चाहिए जीरो बेस्ड सिस्टम...लालू की रेल देश भर में एक दिसम्बर से जीरो बेस्ड समय सारिणी लागू कर रही है. ये जीरो बेस्ड क्या होता है? दरअसल, भारत की सभी ट्रेनों को शून्य यानी रात के बारह बजे पर प्रारंभ होता मान लिया जाता है और फिर कम्प्यूटर सिमुलेशन के जरिए रेल पटरी की उपलब्धता, स्टेशन पर रुकने का समय, गति, कॉशन आर्डर, इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नई समय सारिणी बनाई गई है. यही शून्य आधारित समय सारिणी है. बताते हैं कि इसे लागू करने से ट्रेनों की गति में इजाफ़ा होगा और जो ट्रेन 500 किमी की दूरी 8 से 10 घंटे में तय करती थी अब वह 1 दिसम्बर से 5 से 7 घंटे में तय करेगी.अगर सचमुच ऐसा है तब तो यह जीरो बेस्ड सिस्टम बहुत अच्छा है. भारत में सरकार के हर विभाग में इसे लागू करना चाहिए. हर विभाग की गति इधर बहुत धीमी हो गई है. कोई फ़ाइल, सरकारी नियम के अनुसार 5 से 7 दिन में एक सेक्शन से दूसरे में खिसक जाना चाहिए, पर वह बिना वज़न के एक तो खिसकती ही नहीं और बहुत से कॉशन ऑर्डरों के साथ ले देकर 50 से 70 दिन में खिसक पाती है. जीरो बेस्ड सिस्टम से निश्चित ही इसमें कमी आएगी.भारतीय संसद में भी जीरो बेस्…

जैम - जम के पढ़ो...

जस्ट एनॉदर रीव्यू...
गाहे बगाहे, मैडपंच की याद दिलाती पत्रिका - जैम का मैं नियमित ग्राहक हूं. यह पत्रिका भारतीय डाक विभाग के भरोसे घर पर आती है चूंकि इसके मुरीद रतलाम में और नहीं हैं (यह यहाँ के न्यूज़ स्टैंड पर नहीं मिलती). परंतु सिर्फ आठ रुपल्ली (मैंने इसके बारे में पहले भी लिखा है) में मिलने वाली पत्रिका से पैसे कई गुना वसूल हो जाते हैं. और इसी वजह से बहुत बार डाक विभाग वाले मुझ पर अनुग्रह कर देते हैं - पैसा वसूलने ही नहीं देते.इस बार (15-29 नवंबर 06) का अंक और ज्यादा पैसा वसूलने वाला लगा. पिछला दो अंक तो डाक विभाग में गायब ही हो गया था. पता नहीं क्यों इस बार डाक विभाग वालों ने इस अंक को छोड़ दिया. बहरहाल, उनका बहुत-बहुत धन्यवाद. इस अंक में रोमन हिन्दी में (अक्षय बकाया जी बहुत खुश होंगे) ग़ज़ल नुमा एक कविता छपी है, जो मुझे मेरे कॉलेज जीवन की याद दिला गई. आप भी याद कर सकते हैं-इंजीनियरिंग शायरीमैं स्टूडेंट नंबर 786जब कॉलेज की सलाखों से बाहर देखता हूँदिन हफ़्ते महीनों को सेमेस्टर में बदलते देखता हूँइस कैंटीन से किसी सस्ते ढाबे की खुशबू आती हैये बिल्डिंग मुझे सेंट्रल जेल की याद दिल…

ओशोपुरम रतलाम में?

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महा आनंद के साथ महा निर्वाण...अगर आपको ओशो-नुमा, महा-आनंद के साथ-साथ महा-निर्वाण प्राप्त करना है तो आप आमंत्रित हैं रतलाम. यहाँ एक ऐसा ही स्थल है जहाँ आपके लिए यह सुविधा एक ही स्थल पर, एक साथ उपलब्ध है. मसीही कब्रस्तान के ठीक सामने महाकाल छोलेटिकिया और महाकाल पानी पताशे!सचमुच, नायाब जोड़ है कि नहीं?..

मंड्रिवा लिनक्स 2007 - बढ़िया, बहुभाषी, लिनक्स

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मंड्रिवा लिनक्स 2007 : बहुभाषी लिनक्स हेतु एक शानदार विकल्प.मंड्रिवा लिनक्स 2007 में 65 से अधिक भाषाओं का समर्थन है. हिन्दी, गुजराती, पंजाबी, तमिल इत्यादि समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं का भी इसमें समर्थन है. मंड्रिवा संस्थापक का हिन्दी अनुवाद धनञ्जय शर्मा का है. मंड्रिवा को अपने कम्प्यूटर पर हिन्दी में संस्थापित करने के लिए निम्न, आसान चरण अपनाएँ-मंड्रिवा लिनक्स 2007 संस्थापना के सबसे पहले चरण में भाषा चयन संवाद में जाने के लिए (जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिया गया है) F2 कुंजी को दबाएँ. अगले स्क्रीन पर आपको मंड्रिवा 2007 में उपलब्ध समर्थित भाषाओं की सूची दिखाई देगी. उस भाषा को चुनें जिसे आप डिफ़ॉल्ट अंग्रेज़ी के अतिरिक्त संस्थापित करना चाहते हैं. यदि आप एक से अधिक भाषा संस्थापित करना चाहते हैं तो Multi Languages टैब पर क्लिक करें. फिर उसमें उपलब्घ जितनी भाषाओं को संस्थापित करना चाहते हैं, उसे चुनें. ..
परंतु यह ध्यान रखें कि कुंजीपट भाषा खाका को अंग्रेज़ी में ही रखें, चूंकि टर्मिनल पर आपको हिन्दी में कमांड देने की सुविधा अभी नहीं है, और हो सकता है कि संस्थापना के दौरान कमांड देने क…

कितना खोखला है आदमी अंदर से...

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आदमी आतंकित है बंदर सेदिल्ली में बंदर का आतंक इतना ज्यादा हो गया कि एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय पृष्ठों में इस आतंक को जगह मिल गई. लगता है कि संपादक का व्यक्तिगत आतंक का अनुभव रहा होगा. कोई बंदर उनके दफ़्तर में घुस आया होगा और बोला होगा कि अरे! संपादक, तुम्हारे बंधु-बांधवों ने हमारे रहने के ठौर ठिकाने - जंगलों को काट लिया है और उस पर यह दफ़्तर बना दिया है तो अब हम कहाँ रहने जाएँ. दफ़्तर खाली करो. और यह कह कर बत्तीसी निकाल कर चिढ़ाया होगा. ऐसे में आतंक का संपादकीय निकलना ही है. और इससे पहले कि बंदर मुझे आकर आतंकित करे, बंदर के आतंक को समर्पित है यह व्यंज़ल -व्यंज़ल*****आदमी आतंकित है बंदर सेकितना कमजोर है अंदर से
वो गए जमाने की बातें थींअब सब मिलता है नंबर से
प्यार की परिभाषाएं बहुत हैंसोच मिलता नहीं चंदर से
कुछ नहीं होगा यकीन करोजिंदा है अब तक लंगर से
कम या ज्यादा का है फर्क?पराजय तो हुआ है अंतर से
रवि मानता है कि व्यवस्थाअनुकूल हो जाता है जंतर से*****चंदर = धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता' का एक पात्रजंतर = रिश्वत..
सप्ताह के कुछ कार्टून :-









इंडीब्लॉगीज़ 2006 पुरस्कारों का आगाज़...

इंडीब्लॉगीज़ चिट्ठा पुरस्कारों 2006 के लिए आपने अपनी कमर कस ली है कि नहीं...दोस्तों, प्रतिष्ठित चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ 2006 के लिए सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. आप बहुत से मामलों में मदद कर सकते हैं, और इस पुरस्कार से सम्बद्ध हो सकते हैं, जैसे- आप अपने आप को निर्णायक के रूप में पंजीकृत कर सकते हैं, कोई पुरस्कार प्रायोजित कर सकते हैं, या फिर कोई चिट्ठा ही नामांकित कर सकते हैं. आप यह भी सुझा सकते हैं कि इस वर्ष किन किन वर्गों में पुरस्कार होने चाहिएँ और किनमें नहीं!इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार की प्रतिष्ठा इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि पिछले वर्ष माइक्रोसॉफ़्ट ने इंडिक-ब्लॉगर पुरस्कार बांटे. इनमें हिन्दी पुरस्कारों में ही बड़ी भ्रांतियाँ रहीं, और आमतौर पर यह माना गया कि पुरस्कार देने में कुछ अहम बातों का ध्यान नहीं रखा गया. पुरस्कार के साथ दिए जा रहे गुडीज़ भी माइक्रोसॉफ़्ट के आकार और इंडीब्लॉगीज़ के आकार के अनुरूप सम्मानजनक नहीं थे.और, आपको विश्वास हो या न हो, इनाम मिलना तो दूर की बात, आज तक माइक्रोसॉफ़्ट की तरफ से किसी तरह की आधिकारिक सूचना इनके विजेताओं को नहीं मिली है. जबकि माइक्रोसॉफ़्…

आदम और हव्वा की सामयिक टिप्पणियाँ...

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सप्ताह के कार्टून...



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आइए चिट्ठों में कुछ व्यावसायिकता की बातें करें...

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. हर चिट्ठाकार व्यावसायिक है...चिट्ठाकारिता पर व्यावसायिकता की बातें होने लगे तो मेरे कान खड़े होना स्वाभाविक है. और इससे पहले कि देबाशीष की लिखी रीव्यू-मी की समीक्षा मैं पूरा पढ़ पाता, मैंने अपने आप को रीव्यू-मी की साइट पर पंजीकृत पाया.रीव्यू-मी पर पंजीकरण का सारा सिलसिला अत्यंत आसान है. बस अपना नाम पता और अपने चिट्ठे का नाम भरें, वैध ई-मेल भरें और बस हो गया. हाँ, आपको यहां पंजीकृत होने के लिए, पहली और अंतिम आवश्यकता, अपने जीवन के कम से कम 14 वसंत देख चुके होने चाहिएँ.पंजीकरण के बाद बारी आती है अपने ब्लॉग को रीव्यू-मी पर समीक्षा लिखने हेतु जमा करने व उसे स्वीकृत करवाने की. आपके ब्लॉग को स्वीकृत करने के लिए रीव्यू-मी की कुछ शर्तें हैं. मैंने अपना हिन्दी चिट्ठा जमा किया तो पता चला कि यह तो पहले ही स्वीकृत है! फिर अंग्रेज़ी चिट्ठे को जमा करना चाहा तो पता चला कि यह भी पहले से ही स्वीकृत है! मेरे दो-दो चिट्ठों को रीव्यू-मी के लिए समीक्षा लिखने लायक पहले से ही मान लेने के पीछे क्या राज है यह सही-सही तो नहीं पता, परंतु लगता है कि इसमें पहले से लगे गूगल एडसेंस का बड़ा योगदान है. जो हो, मुझे …

मुझे क्षमा कीजिए... ओह, नहीं, परम क्षमा कीजिए...

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ब्लॉगर की परम क्षमा?
ब्लॉगर की लोकप्रियता के कारण और इसके विशाल उपयोक्ता, डाटाबेस और स्पैमरों की मार के चलते यह हमेशा ही भार से दबा चलता है. इसी वजह से इसमें हमेशा कुछ न कुछ तकनीकी समस्याएँ होते रहती हैं जिससे औसतन, ब्लॉगर दिन में दो बार डाउन होता ही है.पिछले दिनों भी बहुत समस्याएँ हुईं. ऐसे में सभी ब्लॉगर उपयोक्ताओं को ब्लॉगर स्टेटस की ताजा जानकारी रखना उचित होगा. अपने न्यूज रीडर पर ब्लॉगर स्टेटस फ़ीड का ग्राहक बनना ज्यादा उचित होगा. फ़ीड का यूआरएल यह है-http://blogger-status.blogspot.com/atom.xmlब्लॉगर भी शराफ़त दिखाता है. जब भी समस्या होती है, अपने उपयोक्ताओं से क्षमा मांगता है. जब ज्यादा समस्या होती है तो ज्यादा क्षमा मांगता है. और जब परम (सुपर) समस्या होती है तो?वह परम (सुपर) क्षमा मांगता है!
अद्यतन: ब्लॉगर की तरफ से ब्लॉगर बज़ में भी क्षमा प्रार्थना की गई है, और विस्तार से पिछले सप्ताह की लगातार हो रही समस्या के बारे में बताया गया है. यह भी बताया गया है कि ब्लॉगर के सर्विस इंजीनियर, विश्वास कीजिए, ब्लॉगरों से ज्यादा परेशान रहे!हाँ, सुकून की खबर यह है कि अब ब्लॉगर बीटा इस्तेमाल क…

इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए

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इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए - गौरवशाली 150 वां अंक
विज्ञान और सूचना तकनीक का ज्ञान बांटने वाली पत्रिका - ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' भोपाल (मध्यप्रदेश) से पिछले 19 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है. 7 नवंबर को इसके 150 वें अंक के लोकार्पण के अवसर पर मेरा भी एक प्रस्तुतिकरण था. विषय था - ‘हिन्दी कम्प्यूटिंग - भूत, वर्तमान और भविष्य'. रवीन्द्र भवन के खचाखच भरे हाल में जब हिन्दी की गाथा सुनाई गई, तो सुई-टपक सन्नाटा छाया रहा. लोग कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करते तो हैं, परंतु कम्प्यूटरों में हिन्दी भी छा चुकी है, यह उन्हें पता ही नहीं है!प्रस्तुतीकरण में विंडोज, लिनक्स तथा गूगल (खोज व मेल) के साथ साथ हिन्दी चिट्ठा जगत के कुछ स्क्रीनशॉट दिखाए गए तो सभागार प्रफुल्लित हो उठा. और देर तक तालियाँ बजती रहीं.‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' पत्रिका का प्रकाशन भोपाल की संस्था आईसेक्ट (आल इंडिया सोसाइटी फ़ॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कम्प्यूटर टेक्नॉलाज़ी) करती है. आईसेक्ट की परिकल्पना आज से बीस वर्ष पूर्व संतोष चौबे ने की थी. वे अभियांत्रिकी में स्नातक थे और आईएएस के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा में थे. उन्होंन…

मरफ़ी के नए नए नियम कुछ ऐसे ही तो बनते हैं...

मरफ़ी के नए नियमों का जन्म...पिछले सप्ताह एक कार्यशाला के सिलसिले में मैं प्रवास पर था. सोचा था कि समय चुराकर कुछ कार्यों तो इस बीच निपटा ही लिया जाएगा - मसलन साप्ताहिक, सोमवारी चिट्ठाचर्चा लेखन - चूंकि अब जालस्थल पर बहुत से औजार उपलब्ध हैं जिनसे ऐसे कम्प्यूटरों पर भी हिन्दी में काम किया जा सकता है जिनमें हिन्दी की सुविधा नहीं भी हो. परंतु कार्यक्रम बहुत ही कसा हुआ था, और अंतिम क्षणों में अनूप जी से निवेदन करना पडा.कितना सही है मरफ़ी का यह नियम: जब आप सोचते हैं कि कोई कार्य आप जैसे भी हो कर ही लेंगे, तो किसी न किसी बहाने, हर हाल में वह कार्य नहीं ही हो पाता है!कार्यशाला के आयोजकों ने हमें इंटरनेशनल हॉस्टल पर ठहराया था, जहाँ सुविधाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की थीं. इसका स्नानागार ही मेरे मकान के लिविंग रूम जितना बड़ा था, जिसका फर्श इटालियन मार्बल का था, और डिजाइनर शॉवर लगा हुआ था - यानी सब कुछ भव्य, क्लास था.भले ही मैं अपने घर में पत्नी द्वारा स्नान के लिए स्नानागार में अकसर धकिया कर भेजा जाता हूँ, परंतु इस भव्य स्नानागार को देखते ही लगा कि अरे! मैं तो सदियों से नहीं नहाया हूँ, और रात्रि क…

अपने चिट्ठे पर पुस्तचिह्नक कैसे लगाएँ?

अपने चिट्ठे पर पुस्तचिह्नक लगाएँ देबाशीष से उनके इस पोस्ट पर पुस्तचिह्नकों की सुंदर सी लड़ी के बारे में पूछा तो पता चला कि यह कार्य वर्डप्रेस के एक प्लगइन के जरिए उन्होंने किया है. ब्लॉगर के लिए प्लगइन की आवश्यकता तो नहीं है, हाँ, अगर आप गूगल पर खोजें तो आपको पता चलेगा कि पुस्तचिह्नकों की लड़ियों के लिए ब्लॉगर टैम्प्लेट डालने हेतु बहुत से जाल स्थलों पर ढेरों तैयार स्क्रिप्ट तथा कोड उपलब्ध तो हैं ही, आपके मनपसंद पुस्तचिह्नकों की लड़ियों के लिए स्वचालित रूप से स्क्रिप्ट तैयार करने की बहुत सी साइटें भी हैं. अगर आप इस चिट्ठे पर तथा रचनाकार पर लगे पुस्तचिह्नकों का जैसा का तैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं तो नीचे दिए गए कोड को नकल कर अपने ब्लॉगर टैम्प्लेट में चिपकाएँ. अब सवाल है किस स्थान पर. पुस्तचिह्नकों का इस्तेमाल चिट्ठा प्रविष्टि या संपूर्ण चिट्ठा के लिए किया जा सकता है. यह कोड चिट्ठा प्रविष्टि के लिए है. अतः बेहतर होगा कि इसे चिट्ठा प्रविष्टि के अंत में जहाँ टिप्पणियां खत्म होती हैं, वहां इसे चिपकाएं (वैसे आप चिट्ठे के आरंभ में भी, शीर्षक के ठीक बाद इसे चिपका सकते हैं, या बाजू पट्टी में…

सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जगदीप डांगी से एक खास साक्षात्कार

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ग्रामीण परिवेश में कार्यरत हिन्दी भाषा के लिए समर्पित सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जगदीप डांगी का एक खास साक्षात्कार(जगदीप डांगी मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे गंजबासौदा में रहकर हिन्दी सॉफ़्टवेयर विकास में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें) 1) क्या आप पाठकों को अपने बारे में कुछ बता सकते हैं? ग्रामीण पृष्ठभूमि से होते हुए भी कम्प्यूटर के प्रति आपके अनुराग और उत्साह के पीछे कौन से कारण रहे?मैं म.प्र. के विदिशा जिला के एक छोटे से शहर गंजबासौदा का निवासी हूँ। पांच भाइयों में मैं सबसे छोटा व अपने माता-पिता का सबसे लाड़ला बेटा हूँ। मैंने सन् 2001 में एस.ए.टी.आई. विदिशा से बी.ई. स्नातक सी.एस.ई. शाखा के तहत उत्तीर्ण की। मेरी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई। हायर सैकेण्डरी शिक्षा गणित-विज्ञान विषयों के साथ की और प्रथम श्रेणी में 84 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की और जिला प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान व म.प्र. प्रावीण्य सूची में तीसवाँ स्थान प्राप्त किया। इसके उपरान्त घर पर ही पी.ई.टी. परीक्षा की तैयारी की और इसे उत्तीर्ण किया जिससे मेरा बी.ई., सी.एस.ई. शाखा के तहत …

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