टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

October 2006

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डेयर टू थिंक बियांड? मेक ‘द संडे इंडियन' सर्वोच्च!

‘डेयर टू थिंक बियांड' प्रश्न पूछने वाले आईआईपीएम - अरिंदम चौधरी (की कंपनी) ने हाल ही में एक नई पत्रिका - ‘द संडे इंडियन' - हिन्दी समेत पाँच भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करना शुरू किया है. हिन्दी पत्रिका मात्र दस रुपयों की है, और यह पुराने जमाने की चित्रमय पत्रिका ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' की याद दिलाती है.

हिन्दी पत्रिका का टैग लाइन है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक'.

अब तक तो देश का सर्वाधिक प्रसारित, सर्वाधिक पाठक संख्या वाला, सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वोत्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक इत्यादि --- इत्यादि तो पढ़ा था और मालूम था, परंतु ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' न तो पता था न थिंक करने का डेयर किया था. अभी भी नहीं मालूम कि यह क्या होता है.

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लगता है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' का अर्थ समझने के लिए ‘आई मस्ट डेयर टू थिंक बियांड' !

‘विल यू डेयर टू एक्सप्लेन मी मीनिंग ऑफ द ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक', मिस्टर अरिंदम आईआईपीएम चौधरी?'

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हिन्दी चिट्ठाकारों को आशीष का दीवाली तोहफ़ा : मुफ़्त हिन्दी शब्द संसाधक - वर्तनी जाँच सहित.

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आशीष ने 16000 हिन्दी शब्दों की वर्तनी जाँच कर सकने की क्षमता युक्त, हिन्दी का शब्द संसाधक - शब्द 1.0 जारी किया है. इसमें ई-स्वामी का हग औजार सम्मिलित है. सन जावा के द्वारा विंडोज़ व लिनक्स दोनों में ही चल सकने की क्षमता युक्त यह औज़ार चलने में अत्यंत आसान और बढ़िया है. इसके जरिए हिन्दी पाठों को नक़ल-कर चिपका कर या आरटीएफ़ फ़ाइल क़िस्म में किसी अन्य शब्द संसाधकों में तरलता से इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे चलाने के लिए इसे तंत्र पर संस्थापित करने की भी आवश्यकता नहीं होती. जिस डिरेक्ट्री में यह नक़ल किया होता है, वहां से इसको प्रारंभ करने वाली बैच फ़ाइल को चलाना भर होता है.

मेरे वर्ड फ़ाइल को इस औजार ने बखूबी खोल कर सहेज लिया और इसकी वर्तनी जाँच क्षमता माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस जैसा समृद्ध भले ही न हो, परंतु है बहुत काम का. और अगर हिन्दी वर्तनी जाँच के लिए शब्द जुटाने का चिट्ठाकारों का सम्मिलित प्रयास रंग लाता है तो यह औजार निश्चित ही न सिर्फ उपयोगी होगा, बल्कि विकल्पहीन भी होगा.

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वैसे तो यह औजार फ़ॉनेटिक यानी ध्वन्यात्मक कुंजीपट इस्तेमाल करता है, परंतु इसका डिफ़ॉल्ट कुंजीपट को अक्षम कर देने के उपरांत यह आपके तंत्र पर स्थापित हिन्दी के किसी भी आईएमई से इनपुट लेने की क्षमता रखता है. जैसे कि मैंने इसमें डिफ़ॉल्ट इनस्क्रिप्ट कुंजीपट से टाइप किया तो कोई समस्या नहीं आई.

इतनी ख़ूबियों वाला हिन्दी का शब्द संसाधक आपके लिए मुफ़्त जारी किया है. अगर आप इस औजार को आजमाना चाहते हैं तो मुझे या सीधे आशीष से ash.shri AT gmail DOT com पर संपर्क करें. आशीष से भी निवेदन है कि वे इस औजार को सोर्सफ़ोर्ज पर (या कहीं भी जहाँ से आसानी से डाउनलोड किया जा सके) कहीं रख दें ताकि उपयोक्ताओं को डाउनलोड करने में आसानी तो हो ही, और हो सके तो इसे मुक्त स्रोत में जारी करें ताकि उपयोक्ता व अन्य डेवलपर इसमें मन माफ़िक, आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर इस्तेमाल / जारी भी कर सकें.

एक शानदार प्रस्तुति के लिए आशीष को नमन्.


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किसी की दीवाली किसी का दिवाला

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विंडोज विष्टा ( या विस्ता? क्या अजीब नाम है - ट और ठ में जुबान फिसली तो जायका खराब हो जाए... पर यह तो भाषाओं का कमाल है - एक भाषा में गाली तो दूसरे में प्रशंसा...) इस साल के खत्म होते न होते, अंततः तमाम विश्व के कम्प्यूटरों में राज करने हेतु जारी हो जाएगा. विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम के इस संस्करण में बहुत सी नई ख़ूबियाँ हैं. तकनीकी व सुरक्षा संबंधी तो बहुत हैं, पर, आइए आज उस लाइसेंसिंग खूबी की चर्चा करते हैं जिसकी वजह से हमारी जेब का दीवाला निकलेगा और बिल्लू भैया की मनेगी हर दिन दीवाली.

बिल्लू भाई सयाने व्यावसायी यूँ ही नहीं माने जाते रहे हैं. विश्व के सर्वाधिक धनी व्यक्ति वे यूँ ही नहीं बने हैं, और आज भी वे विश्व में प्रति मिनट सर्वाधिक कमाई करने वाले व्यक्ति हैं. अनुमान है कि विंडोज़ विस्टा उनकी तिजोरियों को और अधिक, ‘एक्सपोनेंशियली' भरेगा. विंडोज़ विस्टा में नया, अलग तरह का लाइसेंस होगा जिसके तहत आप उस ऑपरेटिंग सिस्टम को सिर्फ एक बार ही किसी अन्य दूसरे कम्प्यूटर पर स्थानांतरित कर सकेंगे. उदाहरण के लिए, जैसे कि आपने विंडोज़ विस्टा जनवरी 2007 में खरीदा, और आप जुलाई 2007 में चाहते हैं कि आपका सिस्टम अपग्रेड हो. तो उस समय तो आप उसी विंडोज़ विष्टा का इस्तेमाल कर सकेंगे. परंतु यदि आप फिर से दिसम्बर 2007 में अपना सिस्टम अपग्रेड करना चाहें या उस ऑपरेटिंग सिस्टम को उस कम्प्यूटर पर से हटा कर दूसरे पर चलाना चाहें तो यह आप नहीं कर सकेंगे. इसके लिए आपको विंडोज़ विष्टा की दूसरी प्रति खरीदनी होगी. आपके पास की विंडोज़ विष्टा की प्रति इसके लिए अनुपयोगी और बेकार होगी.

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माइक्रोसॉफ़्ट पहले भी अपने एक ही उत्पाद को कई कई नामों से, नए नए लबादों में लपेट कर चतुराई से बेचता रहा है. विंडोज़ के कोई दर्जन भर संस्करण हैं, जैसे कि विंडोज़ एक्सपी प्रोफ़ेशनल, होम एडीशन, मीडिया सेंटर एडीशन, स्टार्टर एडीशन इत्यादि इत्यादि. हर एक में बस थोड़ा सा फेर बदल होता है और कहीं कहीं फ़ंक्शनलिटी में आवश्यकतानुसार कमी-बेसी होती है. एक ही उत्पाद में थोड़ा मोड़ा फेरबदल कर उसे चतुराई से हर सेगमेंट में बेचा जाता है और यह भी ध्यान रखा जाता है कि एक सेगमेंट का उत्पाद दूसरे सेगमेंट के किसी काम का न रहे. यानी कि आपने विंडोज़ का प्रोफ़ेशनल संस्करण लिया हुआ है तो आवश्यकता पड़ने पर उसका सर्वर जैसा इस्तेमाल आप आसानी से नहीं कर सकेंगे. यही बात माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस समेत, और तमाम दूसरे उत्पादों का भी है.

इन कारणों से मुक्त स्रोत की वकालत करने वाले, लिनक्स जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने की सलाहें देते रहे हैं. सर्वरों के लिये तो लिनक्स अपने पैर जमा चुका है, परंतु एंड यूज़र के डेस्कटॉप पर इसके पैर जमने में अभी खासा समय लगेगा. अभी भी लिनक्स का प्रचालन कठिन है और आम प्रयोग के अनुप्रयोग संख्या में बहुत कम हैं. जाहिर है, विडोज़ की दीवाली में तो अभी फुलझड़ियाँ ही फुलझलड़ियाँ रहनी हैं.
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आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

अपने घरों की दीवारों को रोशन करने के बजाए, आइए, आज अपने भीतर आशा, विश्वास, आस्था और प्रेम का कोई दीप जलाएँ...


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देसीपंडित, चिट्ठा-चर्चा और रचनाकार

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पैट्रिक्स ने अंततः तमाम अटकलों को विराम देते हुए, अपने साथी चिट्ठाकारों की सहमति असहमति के साथ देसीपंडित को बन्द करने का फ़ैसला ले ही लिया.

देसीपंडित को उन्होंने अपने व्यक्तिगत उत्साह से प्रारंभ किया था जो बढ़ते हुए दानवाकार हो चुका था और उसमें कोई दर्जन भर लिखने वाले लोग जुड़ चुके थे, और इक्का-दुक्का को छोड़कर बाकी सभी नियमित और अच्छा खासा लिखते थे.

देसीपंडित का रूप कुछ-कुछ चिट्ठा-चर्चा जैसा ही है जिसमें तमाम विश्व में रह रहे भारतीयों के व भारत से संबंधित उदाहरण योग्य ताजा चिट्ठा पोस्टों के बारे में संक्षिप्त जानकारियाँ उस चिट्ठे की कड़ी समेत होती थी जिससे चिट्ठा-पाठकों को चिट्ठों के समुद्र में से बढ़िया मोती चुनने में मदद मिलती थी. क्या चिट्ठा-चर्चा का भविष्य भी लगभग वैसा ही होना है? अभी तो बमुश्किल 300 हिन्दी चिट्ठे हैं, रोजाना चिट्ठों का आंकड़ा यदा कदा 20 से पार जाता है, तो चिट्ठा-चर्चा में प्रायः सभी हिन्दी चिट्ठे अपना स्थान पा लेते हैं. परंतु जब ये आंकड़े हजारों लाखों में चले जाएंगे तो उनमें से रोज के लिए दर्जन भर, उदाहरण योग्य चिट्ठों को छांटने में सबको सचमुच का पसीना तो आएगा ही, और तब इसकी असली उपयोगिता सिद्ध भी हो सकेगी, और तब इसमें जुड़े लेखकों, चिट्ठाचर्चाकारों, जिनमें इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल है, के वास्तविक प्रतिबद्धताओं का पता चल सकेगा.

तो बात चल रही थी देसीपंडित को बन्द करने की. हालाकि पैट्रिक्स ने देसीपंडित अपने व्यक्तिगत उत्साह से प्रारंभ किया था और सारा प्रबंधन उनका व्यक्तिगत था, बाद में इसमें बहुत से लोग जुड़े, और एक प्रकार से यह भारतीय चिट्ठाकारों का सार्वजनिक मिलन स्थल बन गया. एक तरह से देसीपंडित सार्वजनिक सम्पत्ति बन गया था. हिन्दी चिट्ठों के बारे में आरंभ में देबाशीष और अनूप इसमें लिखते थे और बाद में विनय लिखने लगे थे. जब देसीपंडित दानव का आकार लेने लगा तो आवश्यक खर्चों के लिए विज्ञापनों और चंदे के जरिए पैसा जुटाया गया. दिन के बेहतरीन, पठनीय चिट्ठों के उदाहरण लिखने वाले चिट्ठा समीक्षक, देसीपंडित के जरिए उद्धृत चिट्ठाकारों तथा देसीपंडित के पाठकों - सभी के लिए देसीपंडित उनका अपना, खास बन गया था. इसे पैट्रिक्स न सिर्फ बन्द कर रहे हैं, इंटरनेट की दुनिया से इसे मिटा भी रहे हैं. इसके पीछे वे कारण दे रहे हैं - देसीपंडित उनका ‘व्यक्तिगत समय' व ‘श्रम' आवश्यकता से अधिक खाने लगा है! पर, वे ‘कहीं' यह भी कह रहे हैं कि भविष्य में कभी दिमाग में विचार आया तो देसीपंडित को वापस लाया जाएगा.

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चिट्ठा-चर्चा का आरंभिक विचार देबाशीष-अनूप द्वय का था. तो क्या किसी दिन इन्हें यह लगेगा कि चिट्ठा-चर्चा उनका ज्यादा समय खा रहा है तो उसे बंद कर देंगे? रचनाकार के आरंभिक प्रकाशन के समय बहुत से रचनाकार मित्रों ने सहभागिता की सहमति जताई थी. आरंभिक उत्साह और अपनी रचनाओं के आरंभिक इंटरनेट-दर्शन के पश्चात् वह उत्साह तेजी से ठंडा पड़ गया चूंकि रचनाकार अवैतनिक-अव्यावसायिक है, और रचनाकारों को कोई भुगतान नहीं कर सकता. पूर्वप्रकाशित रचनाओं के रचनाकार पर पुनर्प्रकाशन के लिए भी कई लेखकों द्वारा पारिश्रमिक के प्रश्न चिह्न लगाए जाते रहे हैं. ऊपर से रचनाओं को छांट-बीन कर टाइप करने-करवाने की समस्या तो चिरंतन है ही.

पैट्रिक्स जो आज देसीपंडित के लिए सोच रहे हैं व उसे बंद करने को तत्पर दीख रहे हैं, उस स्थिति से निरंतर तो गुजर ही चुका है रचनाकार के पुराने दिन भी कुछ ऐसे ही बीते हैं. इनपुट अधिक लेना व व्यक्तिगत तौर पर जुड़े व्यक्तियों के लिए आउटपुट ज्यादा नहीं निकलना. परंतु क्या रचनाकार को इंटरनेट से पूरा मिटा देना बुद्धिमत्ता है? शायद इसी वजह से मैंने रचनाकार के लिए अलग सर्वर या उसके स्वयं के डोमेन नाम जैसे विकल्पों के बारे में कभी भी नहीं सोचा. कम से कम जब तक गूगल का सार्वजनिक ब्लॉगर रचनाकार जैसे सार्वजनिक चिट्ठों को होस्ट करेगा, इंटरनेट पर उसका वजूद तो बना ही रहेगा. और, जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं उस पर अपना इनपुट दे पाने में समर्थ नहीं हूँ, तो मैं खुशी - खुशी किसी उत्साही व्यक्ति को इसका प्रबंधन सौंपने को आतुर रहूंगा. और, भले ही रचनाकार लँगड़ा कर चले, चलते चलते बीमार पड़ जाए, मैं इसकी मृत्यु की कामना, और इसके दाह संस्कार का प्रबंध तो कभी भी नहीं करूंगा. और, इसीलिए रचनाकार की प्रकृति को मैंने व्यक्तिगत से आगे ले जाकर व्यावसायिक और पेशेवराना रुप देने की कोशिश की है जो आगे भी जारी रहेगी. अगर देसीपंडित यह रूप धरता तो न तो कभी यह बंद होता , और जो सहयोग इसे मिल रहा था जो रुप इसका बन रहा था, उससे तो यह कहाँ से कहाँ पहुँच जाता. परंतु आज यह अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहा है.

देसीपंडित के भविष्य पर सैकड़ों लोगों ने अपने अपने विचार रखे हैं - कुछ समर्थन में तो कुछ दुःख और चिंता जताते हुए. पैट्रिक्स अपने स्वयं के चिट्ठे पर चाहे जो कुछ सोचें कर सकते हैं चाहे जिन कारणों से, जब चाहें चालू-बंद कर सकते हैं, देसीपंडित को नहीं. उन्हें तमाम चिट्ठाकारों की भावनाओं को समझना होगा, उन्हें भी जवाब देना होगा. जब बहुत से विकल्प पैट्रिक्स के सामने खुले हैं तो उन्हें अपनाने में उन्हें क्या झिझक, कैसी शर्म?

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एक और सरकारी मंत्र?

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सरकारी उपक्रम सीडॅक द्वारा अंग्रेज़ी से हिन्दी में स्वचालित अनुवाद करने वाले सॉफ़्टवेयर ‘मंत्र' (या मंत्रा?) का लोकार्पण - आम जनता के मुफ़्त इस्तेमाल हेतु - बहुत ही धूमधाम से पिछले दिनों किया गया. धूमधाम से इसलिए कि उसका लोकार्पण भारत के (वर्तमान) सत्ताधारी नेताओं द्वारा किया गया. कम्प्यूटरों की दुनिया में सॉफ़्टवेयरों का लोकार्पण नेताओं के द्वारा किया जाना, मेरे खयाल में सिर्फ भारत जैसे अनूठे देशों में ही संभव हो पाता होगा.

अभी माइक्रोसॉफ़्ट ने दिल्ली में एक्सबॉक्स 360 को जारी किया. एक रंगारंग समारोह में अक्षय कुमार ने उसे जारी किया. जनता को पता चला कि एक्सबॉक्स 360 भी क्या चीज है. जब भारत सरकार के मंत्री ने मंत्र को जारी किया तो शायद जनता ने समझा होगा कि यह भी शायद गरीबी हटाओ जैसी कोई योजना का मंत्र है जिसे आम जनता के लिए जारी किया गया है. परंतु यह आम जन तक नहीं पहुँच पाया - जनता ने समझ लिया होगा कि शायद यह ‘प्रीमियम' पर कालाबाजारियों को उपलब्ध हो जाता होगा - राशन के केरोसीन और अनाज की तरह...

चलिए, अपने को लोकार्पण के तौर तरीकों से क्या? ‘मंत्र' लोकों में बढ़िया चले अपुन को इससे मतलब है. वैसे भी, आम खाने से मतलब होना चाहिए, न कि उनकी गुठलियाँ गिनने और छिलके के रंग की मीमांसा करने से.

इस परियोजना से सृजनशिल्पी जी भी जुड़े रहे हैं - जिन्होंने इस सॉफ़्टवेयर में अनुवादों में हिन्दी वर्तनी जाँच के महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, और अभी भी कोई दो लाख शब्दों की वर्तनी जाँच के महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं. मंत्र सॉफ़्टवेयर की जाँच के दौरान यह पाया गया कि हिन्दी में मात्रा व वर्तनी की ग़लतियाँ नगण्य ही हैं. इसके लिए सृजनशिल्पी व उनकी टोली बधाई के पात्र हैं.

‘मंत्र' को जाँच-परख कर चलाकर देखने की और काम में लेने की मेरी ख्वाहिश, जिस दिन से यह समाचार सुना था, तब से थी. मैंने तुरंत ही उस सॉफ़्टवेयर को डाउनलोड करने की कोशिश की, जिसकी कड़ी सृजनशिल्पी जी ने उपलब्ध करवाई थी. जिस स्थल से डाउनलोड करना था, वहाँ कड़ी ठीक से दिखाई नहीं दे पा रही थी और दरअसल पंजीकरण के उपरांत वास्तविक डाउनलोड कड़ी आपके ईमेल में प्राप्त होती थी. किसी वजह से आपका डाउनलोड टूट जाता है तो आपको नए सिरे से पंजीकरण करवाना पड़ता है क्योंकि वह कड़ी सिर्फ एक बार डाउनलोड हेतु उपलब्ध होती है. जैसे तैसे दो-तीन बार के प्रयासों से अंततः मैंने मंत्र को डाउनलोड करने में सफलता प्राप्त कर ही ली.

अब बारी आई संस्थापना की. विंडोज़ एक्स पी पर संस्थापित करने के दौरान यह बीच में ही अटक गया. संस्थापना संवाद में यह बताया गया कि आपके कंप्यूटर पर ‘एमएसएसक्यूएल संस्करण 7' संस्थापित नहीं है अतः मंत्र आपके तंत्र पर संस्थापित नहीं हो सकता. यानी कि एक मुफ़्त सॉफ़्टवेयर मंत्र को चलाने के लिए आपको मुफ़्त डाटाबेस सर्वर ‘माईएसक्यूएल' की जगह बिल्लू भाई के स्वामित्व वाली एमएसएसक्यूएल सर्वर चाहिए होगा जो कि हजारों रुपए में मिलता है. एमएसएसक्यूएल मेरे पास तो था नहीं, लिहाजा मंत्र की जाँच अटकी पड़ी रही. 45 मेगाबाइट डाउनलोड, जिसके लिए मेरे एडसेंस से अर्जित किए गए खरी कमाई के, प्रति मेगाबाइट रुपए 1.20 के हिसाब से पैसे लग चुके थे, बेकार ही पड़े हुए मेरा मुँह चिढ़ा रहे थे.

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मैंने आसपास तलाश करने की कोशिश की. पता चला कि कंप्यूटर सिखाने वाली संस्था के पास एमएसएसक्यूएल संस्करण 7 संस्थापित है जिससे वह विद्यार्थियों को पढ़ाता है. मैंने यह जानने की कोशिश नहीं कि उसका संस्करण असली है या नकली. प्रारंभ में वह भी आशंकित सा हो रहा था, परंतु जब मैं उनके पास गया और मंत्र के कसीदे पढ़े कि यह सॉफ़्टवेयर आपके अंग्रेज़ी पाठों को हिन्दी में बदलने की क्षमता रखता है और आप भी इसका मुफ़्त इस्तेमाल कर सकते हैं चूँकि यह सबके लिए मुफ़्त जारी किया गया है, तब आरंभिक संकोच व उहापोह के बाद अंततः उनके कंप्यूटर पर मंत्र के जाँच की सहमति बन ही गई.

मंत्र को संस्थापित करने के लिए कंप्यूटर पर पहले से ही संस्थापित होना आवश्यक है यह तो पता ही था. इस कंप्यूटर पर जिसमें एमएसएसक्यूएल संस्करण 7 पहले से संस्थापित था, मंत्र का पहला चरण तो सही संस्थापित हो गया. दूसरे चरण में डाटाबेस कॉन्फ़िगुरेशन करते समय मंत्र ने एमएसएसक्यूएल के उपयोक्ता sa का पासवर्ड पूछा. यह क्या? यह तो एमएसएसक्यूएल संरक्षित उपयोक्ता होता है. परंतु चलिए, ढूंढ ढांढकर इसका भी पासवर्ड नया बनाकर दिया गया. और, इस तरह अंततः मंत्र संस्थापित हो ही गया.

मंत्र को चालू कर एक छोटे से अंग्रेज़ी पाठ को अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करने के निर्देश दिए गए. परंतु यह क्या? जो हिन्दी इसने दिखानी चाही वह विंडोज98 पर दिखाई देने वाले खंडित यूनिकोड हिन्दी जैसा दिख रहा था. मामले की तह पर पहुँचे तो पता चला कि इनकी हिन्दी ‘इस्की' हिन्दी है - लीप ऑफ़िस में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी. यानी कि हिन्दी यूनिकोड में नहीं. यूनिकोड हिन्दी का इस्तेमाल करने के लिए आपको इसके द्वारा अनुवादित पाठ को अन्य किसी बाहरी औजार के जरिए यूनिकोड में बदलना पड़ेगा. आज के इंटरनेट युग में हिन्दी के समुचित उपयोग के लिए यूनिकोड हिन्दी तो प्रथम आवश्यकता है - सीडॅक - कब सीखोगे? जब दुनिया बहुत आगे निकल चुकी होगी?.

ठीक है, हम बाहरी औजार की सेवा से अनुवादित हिन्दी का भी बखूबी इस्तेमाल कर सकते हैं - बशर्तें अनुवादित हिन्दी बढ़िया हो. बढ़िया ? और वह भी मशीनी, कम्प्यूटरी - स्वचालित अनुवाद से? ठीक है, ठीक है, कामचलाऊ अनुवाद भी चलेगा, और आवश्यकतानुसार हम उसे संपादित कर बढ़िया बना लेंगे.

तो उस कचरा दिखाई दे रही हिन्दी को लीप फ़ॉन्ट संस्थापित कर देखा गया. हिन्दी तो बढ़िया दिखाई दे रही थी, परंतु अनुवाद?

अनुवाद कैसा है यह तो आप, पाठक - तय करें. कुछ अनुवादों के स्क्रीनशॉट इस लेख में हैं. चित्रों को पूरे, बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें.

मुझे तो लगता है कि ‘मंत्र' को आम उपयोग में आने में अभी बहुत समय लगेगा - अच्छा खासा समय लगेगा. हाँ, इसकी एक बात अच्छी है - आप इसे अपने अनुसार प्रशिक्षित कर सकते हैं, और अगर इसके डाटाबेस में यदि कोई अंग्रेज़ी पाठ इसके हिन्दी अनुवाद सहित उपलब्ध होता है तो यह पूर्णतः शुद्ध अनुवाद करता है. अन्यथा आपने स्वचालित अनुवाद का हास्यास्पद रूप देखा ही है - My name is Ravi को ‘अपनी नाम रावी है' तथा I am six years old को ‘मैं पूर्वाह्न छः पुराने वर्षों' अनुवादित करता है!

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रेलवे में 100 भोजन इंसपेक्टरों की भर्ती...

नेताओं को अब हर पद के लिए पेंशन, पेंशन ही पेंशन...

ईश्वर आदमी स्वरूप है या औरत स्वरूप है या वह छक्का है?

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नेट पर चोरी और शोधपत्रों की जोड़ा-जोड़ी? परंतु भाया, आखिर यह नेट बनाया किस लिए है?
वह तो कैच लेते समय टांग पर मुए मच्छर ने काट लिया और कैच छूट गया नहीं तो मैच का नजारा ही कुछ और होता...


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मरफ़ी के वाणिज्य-व्यापार के नियम

• किसी भी परियोजना के प्रथम 90% चरण पूरे होने में उसका 90% समय लगता है तथा बाकी के 10% में अतिरिक्त 90% समय लगता है.
• यदि आप अपना काम 24 घंटों में भी नहीं कर पाते हैं तो रात में भी काम करें.
• पीठ पर शाबासी की थपकी और कूल्हे पर लात पड़ने में सिर्फ कुछ इंच का ही अंतर होता है.
• अपनी स्थिति को विकल्प हीन न बनने दें. क्योंकि जब आपका कोई विकल्प नहीं होगा तो आपकी पदोन्नति भी नहीं होगी.

• इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या करते हैं. फर्क इससे पड़ता है कि आप कहते फिरते हैं कि आपने क्या-क्या किया है और क्या-क्या करने वाले हैं.
• किसी भी वेतन वृद्धि के उपरांत, महीने के आखिर में आपके पास पहले की अपेक्षा पैसे कम ही बच रह पाते हैं.
• जितनी ज्यादा अशिष्टता आप दिखाएँगे उतनी ज्यादा अशिष्टता आपको मिलेगी.
• अपने आपको गंभीर बना कर और हाथों में फ़ाइल पकड़ कर शान से आप कहीं भी जा सकते हैं.

• सुबह-सुबह एक जीवित केकड़े को समूचा निगल लीजिए. फिर यकीन मानिए, पूरे दिन आपके साथ इससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता.
• अपने व्यापारिक पत्र में कभी भी दो प्रश्न एक साथ नहीं पूछें. जवाब उस प्रश्न का आएगा जिसके बगैर आपका काम चल सकता होता है, और दूसरे महत्वपूर्ण प्रश्न के बारे में कोई बात नहीं कही गई होती है.
• जब आपका बॉस उत्पादकता के बारे में बात करता है तो वह अपने स्वयं के बारे में कतई नहीं बोल रहा होता है.

• यदि आप पहली दफा में सफल नहीं होते हैं तो कम से कम एक बार फिर कोशिश करिए, फिर भले ही छोड़ दीजिए. मूर्ख बने रहने में कोई तुक नहीं.
• जब कभी भी आपका बॉस ऑफिस से घर छोड़ देने के लिए कहता है, तो प्रायः हर हमेशा आपके कार में बीयर की बोतलें लुढ़की पड़ी हुई होती हैं.
• बॉस हमेशा सही होता है. तब भी, जब वह खुद जानता होता है कि वह सही नहीं है.

• मां हमेशा कहती थी कि ऐसे कठिन दिन तो जीवन में आएंगे ही. परंतु उन्होंने यह नहीं बताया था कि इतने सारे आएंगे.
• बॉस के आगे और गधे के पीछे न चलें.
• विविध (मिसलेनियस) खाते में तो सारे ब्रह्मांड का आंकड़ा घुसाया जा सकता है.
• किसी भी मींटिग के समापन में तथा चाय-पानी के समय में कभी भी देरी नहीं करें.

• गलतियाँ मनुष्य से होती ही हैं, क्षमा कंपनी के नियमों में नहीं होता.
• कोई भी व्यक्ति कितना ही सारा काम कर सकता है बशर्ते वह कार्य उसे आबंटित न किया गया हो.
• महत्वपूर्ण पत्र जिनमें कोई त्रुटियाँ नहीं होती हैं, उनमें डाक में हस्तांतरण के दौरान त्रुटियाँ उत्पन्न हो जाती हैं.
• वह अंतिम व्यक्ति जिसने नौकरी छोड़ी या जिसे निकाल दिया गया वही हर गलत चीज के लिए जिम्मेदार माना जाता रहता है - जब तक कि आगे कोई नौकरी न छोड़ दे या नौकरी से न निकाल दिया जाए.

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• पहली दफा काम करने के लिए कभी भी पर्याप्त समय नहीं होता, परंतु उसे दुबारा करने के लिए हमेशा पर्याप्त से अधिक समय रहता है.
• उप-प्रमेय - किसी भी दिए गए काम को करने के लिए कार्यकर्ता के पास कभी भी पर्याप्त समय नहीं होता, जबकि पर्यवेक्षक के पास पर्याप्त से अधिक समय होता है.
• किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान का नाम जितना ज्यादा महात्वाकांक्षी प्रतीत होगा, उत्पादकता में वह उतना ही छोटा होगा.
• यदि आप अच्छे कार्यकर्ता हैं तो आपको सारे काम दे दिए जाएंगे. यदि आप सचमुच अच्छे हैं तो आप स्वयं ही वहां से बाहर चले जाएंगे.

• जब भी आपका बॉस आपके डेस्क पर आता है, तो हमेशा ही आप कोई बेकार सा कार्य कर रहे होते हैं.
• यदि कोई यह कहता है कि वह ‘बिला-नागा' उस काम को अवश्य ही कर देगा तो फिर तो वह नहीं ही करेगा.
• कॉन्फ्रेंसों में वही लोग जाते हैं जिन्हें असल में वहाँ जाना नहीं चाहिए होता है.
• भूतकाल में हमेशा किसी काम के लिए पर्याप्त बल मौजूद रहता है.

• उसी गलती को लोग दुबारा नहीं दोहराते, वे बार-बार दोहराते हैं.
• यदि किसी कार्य का अंतिम समय (लास्ट मिनट या डेड लाइन) नहीं होता है तो वह कार्य कभी भी पूरा नहीं होता है.
• किसी ऑफ़िस में किसी अफ़सर का अधिकार उसके द्वारा रखे जाने वाले पेनों की संख्या के व्युत्क्रमानुपाती होती है.
• यदि आपको समझ नहीं आ रहा है कि क्या करना चाहिए, या आज करने को कोई काम नहीं है तो जल्दी-जल्दी चलें और व्यस्त दिखें.

• आपके सर्वाधिक अरुचिकर कार्य के लिए आपको सर्वाधिक प्रशंसा मिलती है.
• सप्ताहांत में कोई बीमार नहीं होता.
• किसी कार्य को पूरा कर लेने के लिए नियमों पर न चलना कोई बहाना नहीं है.
• उप-प्रमेय - नियमों पर चलकर कभी भी कोई काम पूरा नहीं किया जा सकता.
• जब आप किसी कठिन समस्या में उलझ जाते हैं तो आप उसे आसान बना सकते हैं - यह प्रश्न पूछ कर - आपका प्रतिद्वंद्वी इसे कैसे करता?

• आप चाहे जैसे और जितना काम कर लें, संगठन के लिए आपका काम कभी भी पर्याप्त नहीं होता.
• पदनाम जितना लंबा और आकर्षक होगा उतना ही महत्वहीन कार्य होगा.
• मशीनें जो चलते चलते खराब हो जाती हैं, मेकेनिक के आने पर स्वयमेव ठीक हो जाती हैं.
• प्रगति तो हर दूसरे मंगलवार को ही मिल सकती है, और वह मंगलवार वर्तमान वाला कभी नहीं होता.

• जब किसी काम में गलती हो जाती है तो उसे ठीक करने में लगाए गए प्रयास उसे और ज्यादा गलत कर देते हैं.
• हर तरह की छुट्टी और अवकाश स्वयं को छोड़कर बाकी सबके लिए तमाम समस्याएँ पैदा करता है.
• सफलता भाग्य पर ही निर्भर है, किसी भी असफल से पूछ लें.
• किसी भी कार्य का मूल्य उसके लिए तय किए गए समय सीमा (डेडलाइन) की अवधि के व्युत्क्रमानुपाती होता है.

मरफी के नियमों की अब तक प्रकाशित पूरी सूची यहाँ देखें :

मरफी के नियमों की सूची

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ब्लॉग स्ट्रीट पर पहले भी हिन्दी के कुछ चिट्ठों के प्रथम सौ पायदानों में कदम आ चुके हैं. इस सप्ताह की रैंकिंग में इस चिट्ठे को 81 वीं रैंकिंग प्राप्त हुई है.

अंग्रेजी चिट्ठों की भीड़ (पांच हजार से ऊपर) में हिन्दी के जमते कदम कुछ तो सुकून देते हैं :)

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मेरी चाहत का वह नायाब इलेक्ट्रॉनिक वस्तु ...

किसी भी दिए गए समय में हर किसी की कोई न कोई चाहत होती है. बहुतों को सुबह उठते ही चाय की चाहत होती है, तो बहुतों को अख़बार की. अधिसंख्य को बढ़िया हाजत की चाहत होती है जो आजकल की मिलावटी दुनिया में दिनों दिन मुश्किलतर होता जा रहा है, लिहाजा कायम-नित्यम चूर्णों का बाजार गर्म होता जा रहा है. और इस पल, हो सकता है इस पृष्ठ को कदापि न पढ़ने की आपकी चाहत हो रही हो - यह चिट्ठा पोस्ट है या विज्ञापन पोस्ट. चिट्ठे में विज्ञापन है या विज्ञापन में चिट्ठा. जितना विज्ञापन इस चिट्ठे में है उतनी तो पुराने चावल के बोरों में इल्लियाँ भी नहीं होतीं और यहाँ तो मामला ‘चावल' चुनें या ‘इल्लियाँ' वाला है!

ठीक है, चलिए, मैं दूसरे तरीके से बात करता हूँ. क्या यह आपकी चाहत नहीं है जो आपकी सांसों को लगातार चला रही है, प्राणवायु को अंदर बाहर कर रही है? आपकी जीने की चाहत है जो आपकी सांसों को चलाए हुए है. परंतु मैं अलग हूँ. मैं अपनी उस एक ऐसे ‘ऑल-इन-वन' किस्म के तकनीकी ग़जॅट (उपकरण) की चाहत में मरा जा रहा हूँ जो न सिर्फ मेरा सारा कार्य निपटाने में सक्षम हो, बल्कि दूसरों के भी ढेरों काम कर सके! और, इसमें वास्तविक विस्तारणीयता व परिवर्धनीयता (स्केलेबिलिटी और अपग्रेडेबिलिटी) हो ताकि यह कभी भी पुराना न पड़े - जी हाँ, कभी भी पुराना न हो अन्यथा आज तो मैं कोई भी ग़जॅट खरीदता हूँ, छः महीने बमुश्किल गुजरते हैं और वह चलन से बाहर हो जाता है!

मैं निश्चित रूप से इसे ‘आई-मॉड' नाम देना चाहूंगा. ‘आई' कूल है यानी कि सदाबहार और सफल है जैसा कि ‘आई-पॉड' में ‘आई' कूल यानी कि सदाबहार-सफल है. ऊपर से आई-मॉड की तुक आई-पॉड से पूरी तरह से मिलती जुलती है. जाहिर है, इसके नामकरण में कोई समस्या नहीं है. वास्तविक समस्या तो उपयोगिताओं को शामिल करने का है - क्या-क्या छोंड़ें और क्या-क्या जोड़ें!

मेरे आई-मॉड में, जो कि किसी भी खूबसूरत स्त्री के खूबसूरत हाथों में आसानी से समा सकने वाले आकार का होगा, में निम्न सक्षमताएँ तो होनी ही चाहिएँ-

ट्राई बॅण्ड, ड्यूअल प्लेटफ़ॉर्म (सीडीएमए/जीएसएम दोनों), जीपीआरएस, वॅप इनेबल्ड मोबाइल फ़ोन की सुविधा हो - ताकि मेरा मोबाइल भारत में मोबाइल फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लिए चल रहे वर्तमान युद्ध में जीवित बना रह सके.

पीडीए (पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट) हो जिसमें विंडोज सीई / पॉम ओएस दोनों ही हों (पता नहीं कि कौन सा कब अच्छा परफ़ॉर्म करे), व ब्लूटूथ सक्षम हो (आखिर मुझे हर दूसरे मिनट में अपने ईमेल जाँच करने होते हैं तथा न्यूज़-फ़ीड ताज़ा करने होते हैं)

अंतर्निर्मित पूर्ण व्यवसायिक कैमरा व कैमकॉर्डर हो जिसमें अंतर्निर्मित मिनिएचर डीवीडी रेकॉर्डर हो - आखिर पिकासा, फ्लिकर और यू ट्यूब आपके लिए मुफ़्त उपलब्ध किसलिए हैं?

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अंतर्निर्मित स्पीकर सहित एएम-एफ़एम-वर्डस्पेस रेडियो तथा अंतर्निर्मित एफएम ट्रांसमीटर हो - मैं खाते-पीते-सोते मुझे संगीत चाहिए - और जितनी ज्यादा विविधता होगी उतना ही अच्छा.

अंतर्निर्मित टीवीट्यूनर कार्ड हो - आजकल की खूबसूरत महिलाएँ भले ही हवा पानी के बगैर जिंदा रह लें, सास-बहू सीरियलों के बगैर जिंदा नहीं रह सकतीं. यही हाल आकर्षक पुरुषों का है - वे बिग-ब्रदर व क्रिकेट जैसे लाइव शो व खेल के बगैर जिंदा नहीं रह सकते.

विस्तारणीयता सहित, हॉट स्वेपेबल, न्यूनतम 20 जीबी फ़लॅश मेमोरी हो. मेमोरी जितनी ज्यादा हो उतना ही अच्छा.

बाहर खींच कर निकाला जा सकने वाला स्विस-आर्मी चाकू सेट हो - बढ़िया स्विस-आर्मी चाकू के बगैर कोई भी भद्र पुरुष इस धरती पर सही ढंग से जीने की कामना नहीं कर सकता.

अंतर्निर्मित, शक्तिशाली टॉर्चलाइट तथा मिनिएचर पंखा हो जो कि मेरे जैसे भारतीयों के लिए अतिआवश्यक वस्तु की श्रेणी में आता है.

व्यक्तिगत एयर आयोनाइज़र, इलेक्ट्रॉनिक वाटर प्यूरीफ़ायर हो - प्रदूषित हवा और पानी से निजात पाने के लिए.

इलेक्ट्रिक शॉक गन हो - यह गन भले ही खूबसूरत स्त्रियों के उनके अपने बचाव के लिए बनाई गई है, परंतु भद्र पुरुषों की रक्षा करने में भी यह उतना ही समर्थ है.
इलेक्ट्रॉनिक मच्छर भगाने वाला यंत्र हो - मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, मंकीगुनिया और दर्जनों अन्य मच्छर जन्य बीमारियों से बचाव के लिए यह आज प्राथमिक आवश्यकताओं में आता है.

अलग किया जा सकने वाला बहु उपयोगी बाल पाइंट पेन हो जिससे कागज के साथ-साथ पीडीए के वर्ड दस्तावेज़ में भी लिखा जा सके.

स्कैनर - जो अंतर्निर्मित कैमरे के जरिए काम करे तथा मिनिएचर प्रिंटर हो.

मिनिएचर एलसीडी प्रोजेक्टर हो - जिसमें श्वेत दीवार पर 17 इंच चमकीले रंगीन छवि उतारने की क्षमता हो. आप भी इस बात की ताकीद करेंगे कि किसी फुरसत की दोपहरी में बड़े स्क्रीन पर क्रिकेट मैच या फ़ैशन शो देखने का अपना अलग ही आनंद है.

बैटरी की जरूरत कभी न हो - यह वातावरण की व सूर्य की रौशनी से, और हो सके तो शोर व ध्वनि प्रदूषण से अपनी शक्ति बनाए.

प्लेटिनम से बना ढांचा जिसमें असली हीरों से पच्चीकारी की गई हो (अब यह तो स्टेटस सिंबल और री सेल वेल्यू के लिए है - इससे आई-मॉड की फंक्शनलिटी से कोई लेना-देना नहीं).


शायद इतना बहुत है. मैं अपने आई-मॉड में हर्ले डेविडसन जैसे मोटरबाइक की फंक्शनलिटी व वैल्यू भी घुसाना चाहूँगा, परंतु फिर इसे किसी खूबसूरत स्त्री के खूबसूरत हाथों में समाना भी तो चाहिए!

(चित्र : साभार, डिजिट पत्रिका)

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भारत के खाते में एक और तमगा


नं1 की स्थिति में रहने पर हम सबको आनंद आता है. श्रेष्ठ और सर्वश्रेष्ठ की चाहत सबको होती है. दुनिया इसी धुरी पर चलती है नहीं तो कब का विराम हो जाता.

अपना प्यारा देश भारत भी कई मामलों में विश्व में नं1 है. हर्ष का विषय है कि एक बार फिर यह नं1 की स्थिति पर है. इस खुशी के मौके पर आप सबको बधाइयाँ व आने वाले वर्षों में यह स्थान बरकरार रहे इसके लिए शुभकामनाएँ. आखिर हम आप सभी के सद्प्रयासों से यह स्थान हासिल हुआ है. अतः बधाईयों व शुभकामनाओं के असली हकदार तो हमीं हैं.

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आज का व्यंज़ल चिट्ठाचर्चा में पूर्वप्रकाशित

कैसा है तेरे भीतर का आदमी झांक जरा
फल यहीं है, प्रयास को पहले आंक जरा

रोते रहे हैं भीड़ में अकेले पड़ जाने का
मुखौटा छोड़, दोस्ती का रिश्ता टांक जरा


फिर देखना कि दुनिया कैसी बदलती है
चख के देख अनुराग का कोई फांक जरा

दौड़ कर चले आने को लोग बैठे हैं तैयार
दिल से बस एक बार लगा दे हांक जरा


जनता समझेगी तेरे विचारों को भी रवि
अपने अबूझे चरित्र को पहले ढांक जरा

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हिन्दी वर्तनी जाँचक संस्थापित करने हेतु सरल, चरण दर चरण मार्गदर्शन

सही हिन्दी लिखने की आप सबकी कवायदें जारी हैं. इस बात पर तो किसी की दो राय नहीं हो सकती कि हम सभी को, जहाँ तक संभव हो सके सही हिन्दी लिखने का प्रयास करना ही चाहिए. कम्प्यूटरों के इस युग में वर्तनी की जाँच और उसे सही करने का लगभग सारा कार्य अंग्रेज़ी समेत तमाम अन्य भाषाओं में सॉफ़्टवेयरों के द्वारा स्वचालित ही होता है. हिन्दी भाषा के लिए वर्तनी जाँचक उपलब्ध कराने के प्रयास कई स्तरों पर जारी हैं. माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस में वर्तनी जाँचक उपलब्ध है, जिसमें अरविंद कुमार का तैयार किया गया वृहत समांतर हिन्दी कोश भी समाहित है. इसके बावजूद हिन्दी भाषा की क्लिष्टता के कारण यह वर्तनी जाँचक हिन्दी शब्दों के परिवर्तित रूपों यथा - ‘लड़कियों' या ‘आवेदनकर्ता' को गलत बताता है. अर्थ साफ है - हिन्दी के लिए पूरी तरह सही वर्तनी जाँचक बनाने हेतु हमें लंबा सफर तय करना होगा. माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी उत्पाद अत्यंत महँगा भी है, और शौकिया रूप से लिखने वालों को मात्र सही हिन्दी लिखने के नाम पर इसे खरीदने की सलाह देना उचित नहीं है. हालाँकि यह बाजार में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ हिन्दी जाँचकों में से एक है जो यूनिकोड का समर्थन करता है.

वर्तनी जाँचक हेतु सबसे बड़ी समस्या शब्द संग्रह की है. सही वर्तनी युक्त शब्दों का संग्रह अगर उपलब्ध हो तो ओपनऑफ़िस जैसे ऑफ़िस सूट हेतु वर्तनी जाँचक तैयार करना आसान है. ओपनऑफ़िस के लिए सोलह हजार शब्दों का डेमो वर्तनी जाँचक हंस्पैल फ़ॉर्मेट में कुछ समय से उपलब्ध था जिसे प्रायः संस्थापित करना और चलाना मुश्किल भरा था. अब ओपनऑफ़िस संस्करण 2.0 में हंस्पैल इंजिन को अंतर्निर्मित कर दिया गया है, जिससे आपको सिर्फ डिक्शनरी फ़ाइल (शब्द सूची फ़ाइल) को ओपनऑफ़िस डिरेक्ट्री में जोड़ना होता है और आपका काम बन जाता है. इसमें शब्दकोश जोड़ने हेतु विज़ॉर्ड भी है, जिससे यह कार्य और आसान हो जाता है.

आइए आपको ओपनऑफ़िस 2.0 (या अधिक) में हिन्दी वर्तनी जाँचक शामिल करने के लिए सरल, चरण दर चरण मार्गदर्शन देते हैं. उम्मीद है, इन चरणों को पूरा कर आप आधारभूत वर्तनी जाँचक की संस्थापना तो कर ही लेंगे और ‘दिल' और ‘दील' में लिखने में आ रही गलतियों को तो ठीक कर ही लेंगे.

चरण 1: अगर आपके कंप्यूटर पर ओपनऑफ़िस 2.0 (या अधिक) संस्थापित नहीं है तो इसे यहाँ http://download.openoffice.org/2.0.3/index.html से डाउनलोड कर संस्थापित करें. ओपनऑफ़िस संस्थापना की डिरेक्ट्री ध्यानपूर्वक नोट कर रखें. लिनक्स तथा विंडोज़ दोनों ही प्लेटफ़ॉर्म के लिए ओपनऑफ़िस उपलब्ध है. तथा यह मार्गदर्शन दोनों ही परिस्थितियों के लिए है.

चरण 2: ये दो फ़ाइलें hi_IN.dic तथा hi_IN.aff जो हिन्दी शब्दकोश की फ़ाइलें हैं, इन्हें डाउनलोड करें तथा अपने कम्प्यूटर पर ओपनऑफ़िस की डिरेक्ट्री में निम्न डिरेक्ट्री में नक़ल (कॉपी) करें-
[OOo_path]/share/dict/ooo/

यहाँ पर [OOo_path] का अर्थ होगा - C:/Program Files/Open Office/ यदि आपने ओपनऑफ़िस को विंडोज़ में सी ड्राइव के प्रोग्राम फ़ाइल डिरेक्ट्री में ओपन ऑफ़िस सब डिरेक्ट्री में संस्थापित किया होगा. यह पथ आपके कंप्यूटर पर ओपनऑफ़िस की संस्थापना के अनुसार अलग भी हो सकता है. यदि आपने ओपनऑफ़िस को लिनक्स में संस्थापित किया है तो रेडहैट व फ़ेदोरा हेतु rpm -ql [package name] कमांड के जरिए संस्थापित प्रोग्राम की डिरेक्ट्री पता कर सकते हैं.

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चरण 3: उक्त डिरेक्ट्री, [OOo_path]/share/dict/ooo/ में dictionary.lst नाम की फ़ाइल आपको मिलेगी. इस फ़ाइल को संपादित कर हमें हिन्दी शब्दकोश की जानकारी इसमें जोड़नी होगी. इस फ़ाइल को नोटपैड में खोलें. तथा यह लाइन अंतिम पंक्ति में वहाँ जोड़ें जहाँ से तारीख क्षेत्र प्रारंभ होते हैं -

DICT hi IN hi_IN HYPH hi IN hyph_hi_IN

आपकी फ़ाइल कुछ वैसी ही दिखनी चाहिए जैसा कि चित्र में दिखाई दे रहा है. परिवर्तन पश्चात् फ़ाइल को सहेजें. ध्यान दें कि अगर आपने फ़ाइल सही ढंग से संपादित नहीं की होगी तो आपका वर्तनी जाँचक कार्य ही नहीं करेगा.

चरण 4: अब ओपनऑफ़िस प्रारँभ करें. Tools > Options में जाएँ तथा Language Settings के बाजू में दिए गए छोटे से धन चिह्न को क्लिक करें. Languages पर क्लिक करें तथा CTL के सामने दिए ड्राप डाउन सूची पर क्लिक कर हिन्दी को चुनें. वहीं पर सबसे नीचे दिए गए Enabled for Complex Text Layout को भी चुनें. फिर Writing Aids को चुनें तथा User Defined Dictionaries में जाकर New चुनें. वहाँ उपलब्ध सूची में से Hindi चुनें तथा इसे कोई नाम दें, जैसे कि Hindi. OK बटन पर क्लिक करें.

चरण 5: अब ओपनऑफ़िस को बन्द कर फिर से चालू करें.

चरण 6: बधाई! आपको कुछ नहीं करना है. हिन्दी के कुछ अक्षर टाइप करें व देखें कि यह आपकी लिखी वर्तनी को जाँचता है या नहीं. अगर आपने सबकुछ सही किया होगा तो आपकी लिखी इबारतों में आपकी गलतियाँ तत्काल ढूंढ निकालेगा. आप दिल को दील लिखेंगे तो यह उसे लाल रंग से रंग देगा. मगर रुकिए, इसका शब्द भंडार सिर्फ सोलह हजार शब्दों का है. अतः आप देखेंगे कि जो हिन्दी शब्द इसके भंडार में पहले से नहीं होंगे उन्हें यह गलत बताएगा. उदाहरण के लिए रावण, जैसा कि चित्र में दिखाई दे रहा है. परंतु फिर, रावण को कौन अपने शब्द भंडार में रखना चाहेगा?


अभी हाल ही में चिट्ठाकार समूह में विविध स्रोतों से एकत्र किए गए करीब एक लाख हिन्दी शब्दों को प्रूफ कर सही करने की सहमति बनी है. अगर यह कार्य पूरा हो जाता है तो आम जरूरत लायक एक बढ़िया सा हिन्दी का मुक्त स्रोत का वर्तनी जाँचक उपलब्ध हो सकेगा. और बहुत संभव है कि आने वाले कुछ समय में यह ओपनऑफ़िस के नए संस्करणों में अंतर्निर्मित आएगा, और आपको इसे अलग से संस्थापित करने की आवश्यकता ही नहीं होगी.

तो, अंततः आपने अपने लिए हिन्दी का वर्तनी जाँचक संस्थापित कर ही लिया.

आपको बधाइ.

अरे नहीं, ऊपर तो गलत लिखा गया था, जिसे मेरे वर्तनी जाँचक ने बता दिया. आपको बधाई!

पुनश्चः अगर आपको इन चरणों में कोई समस्या आती है, या आप ओपनऑफ़िस में हिन्दी वर्तनी जाँचक संस्थापित करने में सफल नहीं हो पाते हैं तो टिप्पणियों के जरिए निःसंकोच अपनी समस्याएँ रखें. उनका निदान इसी स्थल पर देने की कोशिश की जाएगी.
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हे! भगवान, मुझे भी हर जन्म में इसी पावन भूमि में पैदा करना.

टाइम्स ऑव इंडिया तथा टाइम्स न्यूज सर्विस द्वारा किये गए एक साझा सर्वेक्षण में यह बात उभर कर सामने आई है कि आम औसत भारतीयों में से 89 प्रतिशत की यह कामना है कि अगले जन्म में भी वे पवित्र भारत भूमि में जन्म लें.

आपकी क्या राय है? चलिए, जो भी हो, उन कारणों को गिना सकते हैं आप?

मेरी भी राय आम जनों की राय से मिलती जुलती है. मैं भी अगले जन्म में भारत भूमि में ही जन्म लेना चाहूँगा. मैं अगले तो क्या हर जन्म में, जन्म-जन्मांतर में भारत भूमि में जन्म लेना चाहूँगा, बशर्तें जो हालात आज हैं, वही बरकरार रहें. और, अगर किसी स्थापित नेता के घर जन्म मिले तो सोने में सुहागा!

बात भारत देश में ही पुनर्जन्म लेने के कारणों की हो रही थी. आपके भारत में पुनर्जन्म लेने या नहीं लेने के, अपने कारण हो सकते हैं और हो सकता है कि वे, मेरे कारणों से जुदा हों. मैं आपके उन कारणों को जानना चाहूँगा. बहरहाल, क्या आप मेरे कारणों को नहीं जानना चाहेंगे? तो लीजिए, आगे पढ़िए -

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भारत देश में मेरे पुनः पुनः जन्म लेने की इच्छा के पीछे कुछ पुख्ता कारण:

1 मैं यहाँ पर अपनी पेट्रोल वाली गाड़ी में किट लगवा कर सस्ते केरोसीन या सबसीडी वाली रसोई गैस से आसानी से, बिना किसी समस्या से चलाते रह सकता हूँ. पर्यावरण की तो ऐसी की ....कभी-कभी, यदा-कदा, नाम की कोई चेकिंग होती है तो मैं सौ रुपए देकर आराम से बच निकल सकता हूँ. यही हाल लाइसेंस व गाड़ियों के इंश्योरेंस के लिए भी है.


2 मैं भारत देश की गड्ढों युक्त सड़कों पर ऑटो व टैम्पो के बीच अट-कट मारते हुए कहीं से भी दाएँ-बाएँ निकल लेता हूँ. चारों ओर ट्रैफ़िक ही ट्रैफ़िक होता है - फिर सेंस कहाँ से आएगा और ऐसे में सेंस की जरूरत ही नहीं है. सेंस-लेस ड्राइविंग का कितना मजा होता है. भारत की हर गली और सड़क पर यह मजा मिलता है.
3 मुझे कहीं अचानक अकस्मात रेल यात्रा करनी होती है तो भीड़ भरे डब्बों का भय मुझे नहीं सताता. टीटी महोदय को नए हरे नोट देकर बिना टिकट के ही रिजर्वेशन और एसी में सफर कर सकता हूँ. ऊपर से टिकट की राशि के आधे से ही मेरा सफर पूरा हो सकता है. वह तो उड़ानों में प्राइवेट पार्टियाँ घुस आईं, नहीं तो वहां भी मौज रहती. उम्मीद है इस मामले में सरकार कुछ करेगी.
4 मैं आसानी से अपना कोई भी अवैध काम कर सकता हूँ. जेसिका लाल जैसा सार्वजनिक हत्याकांड कर मैं आसानी से बरी हो सकता हूँ, अबू सलेम जैसा आतंकवादी बनकर हीरो के रूप में रह सकता हूँ - साथ ही चुनाव लड़कर देश का नेता भी बन सकता हूँ. सरकारी दफ़्तरों में भी मैं अपना कोई भी - जी हाँ, एक बार फिर से, कोई भी अवैध काम आसानी से करवा सकता हूँ. बस, वहाँ जमे अफ़सरों-बाबुओं को थोड़ी सी रिश्वत देने की दरकार होती है.


5 देस की पार्लियामेंट पर हमला कर मैं अपनी सजा माफ़ करवाने के लिए तमाम पार्टियों को एकजुट कर सकता हूँ - जैसे कि अभी अफ़जल मामले में हो रहा है - वोट बैंक की खातिर! मैं यहाँ आसानी से, बिना किसी सज़ा के भय के हर कहीं सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक स्थलों पर थूक-मूत सकता हूँ. देश में सार्वजनिक शौचालय जनसंख्या के हिसाब से हैं नहीं. लगता है कि पूरे देश को अघोषित रूप से सार्वजनिक शौचालय मान लिया गया है. और, यह कितना अच्छा है!
6 .....
ऐसे और भी कारण हैं जो सैकड़ों पृष्ठों में समा सकते हैं - इतना कि मैं बता-बता कर थक जाऊँ और आप पढ़कर इतना बोर हो जाएँ कि दोबारा इस चिट्ठे की ओर रुख ही न करें. इसीलिए आइए, अब आपके कारणों के बारे में बात करते हैं. क्या आप नहीं गिनाना चाहेंगे आपके अपने कारणों को?...

हिन्दी पखवाड़े की भेंट - ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग हिन्दी में

पिछले सप्ताह हिन्दी पखवाड़ा हर साल की तरह शांति से बीत गया. पूरे देश में हिन्दी की शान में कहीं कसीदे पढ़े गए तो कहीं हिन्दी की बदहाली का रोना रोया गया.

संयोग की बात यह रही कि हिन्दी सॉफ़्टवेयर जगत में एक महत्वपूर्ण कदम की शुरूआत इस पखवाड़े में हुई. ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग जो कि माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस की तरह का ऑफ़िस सूट है, जो कि मुक्त व मुफ़्त इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है, के नए संस्करण 2.04-rc2 में हिन्दी भाषा का भी पैक 13 सितम्बर 2006 को जारी किया गया है, जिसमें रेड हैट के राजेश रंजन द्वारा अनूदित यूज़र इंटरफ़ेस (मेन्यू इत्यादि) तथा मेरे द्वारा अनूदित मदद फ़ाइलों का समावेश किया गया है.

हिन्दी का पैक विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म - यथा विंडोज, लिनक्स इत्यादि के लिए भी अलग अलग उपलब्ध है जिसे अलग से संस्थापित किया जा सकता है. इसके लिए आपके कंप्यूटर पर ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग संस्करण 2 पहले से संस्थापित होना आवश्यक है.

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ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग का हिन्दी का पैक आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं-

http://oootranslation.services.openoffice.org/pub/OpenOffice.org/2.0.4rc2/

सॉफ़्टवेयर का डेवलपमेंट तथा अनुवाद साइकल अलग अलग होने के कारण अकसर यह होता है कि जब तक आप किसी संस्करण के अनुवादों को पूरा कर लेते हैं, नया संस्करण आ जाता है जिसमें पुराने अनुवादों में कुछ परिवर्तन परिवर्धन करने होते हैं. ऐसे अनुवाद फ़जी (कच्चा अनुवाद) श्रेणी में डाल दिए जाते हैं. तो हो सकता है कि आपको बहुत सी जगह (20 प्रतिशत तक) हिन्दी के बजाए अंग्रेज़ी ही दिखाई दे, मगर आगे के कार्यों के लिए यह आधार तो रहेगा ही.

ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग मदद के कुछ स्क्रीनशॉट :




नया ज्ञानोदय : एक संग्रहणीय विशेषांक

नया ज्ञानोदय का अक्तूबर 2006 का तीन सौ पृष्ठों का संग्रहणीय विशेषांक बच्चों के ऊपर लिखी गई रचनाओं पर केंद्रित है. इस अंक में मेरे द्वारा अनूदित कहानी - "एक कहानी छोटी सी एमी की" पृष्ठ 211 पर प्रकाशित हुई है. यह मार्मिक कहानी रचनाकार के पृष्ठों पर पहले ही आ चुकी है. अगर आपने नहीं पढ़ी हो तो अवश्य पढ़ें. यह कहानी बाद में भास्कर मधुरिमा में भी संक्षिप्त रुप में प्रकाशित हुई थी.

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