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October, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इज दिस संडे इंडियन सर्वोच्च?

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.डेयर टू थिंक बियांड? मेक ‘द संडे इंडियन' सर्वोच्च!‘डेयर टू थिंक बियांड' प्रश्न पूछने वाले आईआईपीएम - अरिंदम चौधरी (की कंपनी) ने हाल ही में एक नई पत्रिका - ‘द संडे इंडियन' - हिन्दी समेत पाँच भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करना शुरू किया है. हिन्दी पत्रिका मात्र दस रुपयों की है, और यह पुराने जमाने की चित्रमय पत्रिका ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' की याद दिलाती है.हिन्दी पत्रिका का टैग लाइन है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक'.अब तक तो देश का सर्वाधिक प्रसारित, सर्वाधिक पाठक संख्या वाला, सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वोत्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक इत्यादि --- इत्यादि तो पढ़ा था और मालूम था, परंतु ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' न तो पता था न थिंक करने का डेयर किया था. अभी भी नहीं मालूम कि यह क्या होता है...
लगता है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' का अर्थ समझने के लिए ‘आई मस्ट डेयर टू थिंक बियांड' ! ‘विल यू डेयर टू एक्सप्लेन मी मीनिंग ऑफ द ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक', मिस्टर अरिंदम आईआईपीएम चौधरी?'

ये रही आपकी दीपावली की बख्शीश...

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हिन्दी चिट्ठाकारों को आशीष का दीवाली तोहफ़ा : मुफ़्त हिन्दी शब्द संसाधक - वर्तनी जाँच सहित.**-**
आशीष ने 16000 हिन्दी शब्दों की वर्तनी जाँच कर सकने की क्षमता युक्त, हिन्दी का शब्द संसाधक - शब्द 1.0 जारी किया है. इसमें ई-स्वामी का हग औजार सम्मिलित है. सन जावा के द्वारा विंडोज़ व लिनक्स दोनों में ही चल सकने की क्षमता युक्त यह औज़ार चलने में अत्यंत आसान और बढ़िया है. इसके जरिए हिन्दी पाठों को नक़ल-कर चिपका कर या आरटीएफ़ फ़ाइल क़िस्म में किसी अन्य शब्द संसाधकों में तरलता से इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे चलाने के लिए इसे तंत्र पर संस्थापित करने की भी आवश्यकता नहीं होती. जिस डिरेक्ट्री में यह नक़ल किया होता है, वहां से इसको प्रारंभ करने वाली बैच फ़ाइल को चलाना भर होता है. मेरे वर्ड फ़ाइल को इस औजार ने बखूबी खोल कर सहेज लिया और इसकी वर्तनी जाँच क्षमता माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस जैसा समृद्ध भले ही न हो, परंतु है बहुत काम का. और अगर हिन्दी वर्तनी जाँच के लिए शब्द जुटाने का चिट्ठाकारों का सम्मिलित प्रयास रंग लाता है तो यह औजार निश्चित ही न सिर्फ उपयोगी होगा, बल्कि विकल्पहीन भी होगा...
वैसे तो…

हमारी दीवाली आपका दीवाला...

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. किसी की दीवाली किसी का दिवाला**-**विंडोज विष्टा ( या विस्ता? क्या अजीब नाम है - ट और ठ में जुबान फिसली तो जायका खराब हो जाए... पर यह तो भाषाओं का कमाल है - एक भाषा में गाली तो दूसरे में प्रशंसा...) इस साल के खत्म होते न होते, अंततः तमाम विश्व के कम्प्यूटरों में राज करने हेतु जारी हो जाएगा. विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम के इस संस्करण में बहुत सी नई ख़ूबियाँ हैं. तकनीकी व सुरक्षा संबंधी तो बहुत हैं, पर, आइए आज उस लाइसेंसिंग खूबी की चर्चा करते हैं जिसकी वजह से हमारी जेब का दीवाला निकलेगा और बिल्लू भैया की मनेगी हर दिन दीवाली.बिल्लू भाई सयाने व्यावसायी यूँ ही नहीं माने जाते रहे हैं. विश्व के सर्वाधिक धनी व्यक्ति वे यूँ ही नहीं बने हैं, और आज भी वे विश्व में प्रति मिनट सर्वाधिक कमाई करने वाले व्यक्ति हैं. अनुमान है कि विंडोज़ विस्टा उनकी तिजोरियों को और अधिक, ‘एक्सपोनेंशियली' भरेगा. विंडोज़ विस्टा में नया, अलग तरह का लाइसेंस होगा जिसके तहत आप उस ऑपरेटिंग सिस्टम को सिर्फ एक बार ही किसी अन्य दूसरे कम्प्यूटर पर स्थानांतरित कर सकेंगे. उदाहरण के लिए, जैसे कि आपने विंडोज़ विस्टा जनवरी 2007 में …

देसीपंडित का क्रियाकर्म...

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देसीपंडित, चिट्ठा-चर्चा और रचनाकार**-**
पैट्रिक्स ने अंततः तमाम अटकलों को विराम देते हुए, अपने साथी चिट्ठाकारों कीसहमति असहमतिके साथ देसीपंडित को बन्द करने का फ़ैसला ले ही लिया.देसीपंडित को उन्होंने अपने व्यक्तिगत उत्साह से प्रारंभ किया था जो बढ़ते हुए दानवाकार हो चुका था और उसमें कोई दर्जन भर लिखने वाले लोग जुड़ चुके थे, और इक्का-दुक्का को छोड़कर बाकी सभी नियमित और अच्छा खासा लिखते थे.देसीपंडित का रूप कुछ-कुछ चिट्ठा-चर्चा जैसा ही है जिसमें तमाम विश्व में रह रहे भारतीयों के व भारत से संबंधित उदाहरण योग्य ताजा चिट्ठा पोस्टों के बारे में संक्षिप्त जानकारियाँ उस चिट्ठे की कड़ी समेत होती थी जिससे चिट्ठा-पाठकों को चिट्ठों के समुद्र में से बढ़िया मोती चुनने में मदद मिलती थी. क्या चिट्ठा-चर्चा का भविष्य भी लगभग वैसा ही होना है? अभी तो बमुश्किल 300 हिन्दी चिट्ठे हैं, रोजाना चिट्ठों का आंकड़ा यदा कदा 20 से पार जाता है, तो चिट्ठा-चर्चा में प्रायः सभी हिन्दी चिट्ठे अपना स्थान पा लेते हैं. परंतु जब ये आंकड़े हजारों लाखों में चले जाएंगे तो उनमें से रोज के लिए दर्जन भर, उदाहरण योग्य चिट्ठों क…

सॉफ़्टवेयर समीक्षा: एक और सरकारी 'मंत्र'?

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. एक और सरकारी मंत्र?**-**सरकारी उपक्रम सीडॅक द्वारा अंग्रेज़ी से हिन्दी में स्वचालित अनुवाद करने वाले सॉफ़्टवेयर ‘मंत्र' (या मंत्रा?) का लोकार्पण - आम जनता के मुफ़्त इस्तेमाल हेतु - बहुत ही धूमधाम से पिछले दिनों किया गया. धूमधाम से इसलिए कि उसका लोकार्पण भारत के (वर्तमान) सत्ताधारी नेताओं द्वारा किया गया. कम्प्यूटरों की दुनिया में सॉफ़्टवेयरों का लोकार्पण नेताओं के द्वारा किया जाना, मेरे खयाल में सिर्फ भारत जैसे अनूठे देशों में ही संभव हो पाता होगा.अभी माइक्रोसॉफ़्ट ने दिल्ली में एक्सबॉक्स 360 को जारी किया. एक रंगारंग समारोह में अक्षय कुमार ने उसे जारी किया. जनता को पता चला कि एक्सबॉक्स 360 भी क्या चीज है. जब भारत सरकार के मंत्री ने मंत्र को जारी किया तो शायद जनता ने समझा होगा कि यह भी शायद गरीबी हटाओ जैसी कोई योजना का मंत्र है जिसे आम जनता के लिए जारी किया गया है. परंतु यह आम जन तक नहीं पहुँच पाया - जनता ने समझ लिया होगा कि शायद यह ‘प्रीमियम' पर कालाबाजारियों को उपलब्ध हो जाता होगा - राशन के केरोसीन और अनाज की तरह...चलिए, अपने को लोकार्पण के तौर तरीकों से क्या? ‘मंत्र' ल…

सप्ताह के कार्टून...

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.रेलवे में 100 भोजन इंसपेक्टरों की भर्ती...
नेताओं को अब हर पद के लिए पेंशन, पेंशन ही पेंशन...

ईश्वर आदमी स्वरूप है या औरत स्वरूप है या वह छक्का है?

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नेट पर चोरी और शोधपत्रों की जोड़ा-जोड़ी? परंतु भाया, आखिर यह नेट बनाया किस लिए है?
वह तो कैच लेते समय टांग पर मुए मच्छर ने काट लिया और कैच छूट गया नहीं तो मैच का नजारा ही कुछ और होता...

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मरफ़ी के व्यापारिक नियम...

. मरफ़ी के वाणिज्य-व्यापार के नियम
• किसी भी परियोजना के प्रथम 90% चरण पूरे होने में उसका 90% समय लगता है तथा बाकी के 10% में अतिरिक्त 90% समय लगता है.
• यदि आप अपना काम 24 घंटों में भी नहीं कर पाते हैं तो रात में भी काम करें.
• पीठ पर शाबासी की थपकी और कूल्हे पर लात पड़ने में सिर्फ कुछ इंच का ही अंतर होता है.
• अपनी स्थिति को विकल्प हीन न बनने दें. क्योंकि जब आपका कोई विकल्प नहीं होगा तो आपकी पदोन्नति भी नहीं होगी.• इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या करते हैं. फर्क इससे पड़ता है कि आप कहते फिरते हैं कि आपने क्या-क्या किया है और क्या-क्या करने वाले हैं.
• किसी भी वेतन वृद्धि के उपरांत, महीने के आखिर में आपके पास पहले की अपेक्षा पैसे कम ही बच रह पाते हैं.
• जितनी ज्यादा अशिष्टता आप दिखाएँगे उतनी ज्यादा अशिष्टता आपको मिलेगी.
• अपने आपको गंभीर बना कर और हाथों में फ़ाइल पकड़ कर शान से आप कहीं भी जा सकते हैं.• सुबह-सुबह एक जीवित केकड़े को समूचा निगल लीजिए. फिर यकीन मानिए, पूरे दिन आपके साथ इससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता.
• अपने व्यापारिक पत्र में कभी भी दो प्रश्न एक साथ नहीं पूछें. जवाब उस प्रश्न…

ब्लॉगस्ट्रीट पर हिन्दी के कदम...

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ब्लॉग स्ट्रीट पर पहले भी हिन्दी के कुछ चिट्ठों के प्रथम सौ पायदानों में कदम आ चुके हैं. इस सप्ताह की रैंकिंग में इस चिट्ठे को 81 वीं रैंकिंग प्राप्त हुई है.

अंग्रेजी चिट्ठों की भीड़ (पांच हजार से ऊपर) में हिन्दी के जमते कदम कुछ तो सुकून देते हैं :)

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व्यंग्य: मेरी चाहत

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.मेरी चाहत का वह नायाब इलेक्ट्रॉनिक वस्तु ...किसी भी दिए गए समय में हर किसी की कोई न कोई चाहत होती है. बहुतों को सुबह उठते ही चाय की चाहत होती है, तो बहुतों को अख़बार की. अधिसंख्य को बढ़िया हाजत की चाहत होती है जो आजकल की मिलावटी दुनिया में दिनों दिन मुश्किलतर होता जा रहा है, लिहाजा कायम-नित्यम चूर्णों का बाजार गर्म होता जा रहा है. और इस पल, हो सकता है इस पृष्ठ को कदापि न पढ़ने की आपकी चाहत हो रही हो - यह चिट्ठा पोस्ट है या विज्ञापन पोस्ट. चिट्ठे में विज्ञापन है या विज्ञापन में चिट्ठा. जितना विज्ञापन इस चिट्ठे में है उतनी तो पुराने चावल के बोरों में इल्लियाँ भी नहीं होतीं और यहाँ तो मामला ‘चावल' चुनें या ‘इल्लियाँ' वाला है!ठीक है, चलिए, मैं दूसरे तरीके से बात करता हूँ. क्या यह आपकी चाहत नहीं है जो आपकी सांसों को लगातार चला रही है, प्राणवायु को अंदर बाहर कर रही है? आपकी जीने की चाहत है जो आपकी सांसों को चलाए हुए है. परंतु मैं अलग हूँ. मैं अपनी उस एक ऐसे ‘ऑल-इन-वन' किस्म के तकनीकी ग़जॅट (उपकरण) की चाहत में मरा जा रहा हूँ जो न सिर्फ मेरा सारा कार्य निपटाने में सक्षम हो, बल्क…

अपना भारत नं 1...

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भारत के खाते में एक और तमगा
नं1 की स्थिति में रहने पर हम सबको आनंद आता है. श्रेष्ठ और सर्वश्रेष्ठ की चाहत सबको होती है. दुनिया इसी धुरी पर चलती है नहीं तो कब का विराम हो जाता.अपना प्यारा देश भारत भी कई मामलों में विश्व में नं1 है. हर्ष का विषय है कि एक बार फिर यह नं1 की स्थिति पर है. इस खुशी के मौके पर आप सबको बधाइयाँ व आने वाले वर्षों में यह स्थान बरकरार रहे इसके लिए शुभकामनाएँ. आखिर हम आप सभी के सद्प्रयासों से यह स्थान हासिल हुआ है. अतः बधाईयों व शुभकामनाओं के असली हकदार तो हमीं हैं...
**-**आज का व्यंज़ल चिट्ठाचर्चा में पूर्वप्रकाशितकैसा है तेरे भीतर का आदमी झांक जरा
फल यहीं है, प्रयास को पहले आंक जरा
रोते रहे हैं भीड़ में अकेले पड़ जाने का
मुखौटा छोड़, दोस्ती का रिश्ता टांक जरा

फिर देखना कि दुनिया कैसी बदलती है
चख के देख अनुराग का कोई फांक जरा
दौड़ कर चले आने को लोग बैठे हैं तैयार
दिल से बस एक बार लगा दे हांक जरा

जनता समझेगी तेरे विचारों को भी रवि
अपने अबूझे चरित्र को पहले ढांक जरा
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हिन्दी का मुफ़्त व मुक्त वर्तनी जाँचक......

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हिन्दी वर्तनी जाँचक संस्थापित करने हेतु सरल, चरण दर चरण मार्गदर्शनसही हिन्दी लिखने की आप सबकी कवायदें जारी हैं. इस बात पर तो किसी की दो राय नहीं हो सकती कि हम सभी को, जहाँ तक संभव हो सके सही हिन्दी लिखने का प्रयास करना ही चाहिए. कम्प्यूटरों के इस युग में वर्तनी की जाँच और उसे सही करने का लगभग सारा कार्य अंग्रेज़ी समेत तमाम अन्य भाषाओं में सॉफ़्टवेयरों के द्वारा स्वचालित ही होता है. हिन्दी भाषा के लिए वर्तनी जाँचक उपलब्ध कराने के प्रयास कई स्तरों पर जारी हैं. माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस में वर्तनी जाँचक उपलब्ध है, जिसमें अरविंद कुमार का तैयार किया गया वृहत समांतर हिन्दी कोश भी समाहित है. इसके बावजूद हिन्दी भाषा की क्लिष्टता के कारण यह वर्तनी जाँचक हिन्दी शब्दों के परिवर्तित रूपों यथा - ‘लड़कियों' या ‘आवेदनकर्ता' को गलत बताता है. अर्थ साफ है - हिन्दी के लिए पूरी तरह सही वर्तनी जाँचक बनाने हेतु हमें लंबा सफर तय करना होगा. माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी उत्पाद अत्यंत महँगा भी है, और शौकिया रूप से लिखने वालों को मात्र सही हिन्दी लिखने के नाम पर इसे खरीदने की सलाह देना उचित नहीं है. हालाँकि य…

क्या आप भारत देश में फिर से जन्म लेना चाहेंगे?

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हे! भगवान, मुझे भी हर जन्म में इसी पावन भूमि में पैदा करना.टाइम्स ऑव इंडिया तथा टाइम्स न्यूज सर्विस द्वारा किये गए एक साझा सर्वेक्षण में यह बात उभर कर सामने आई है कि आम औसत भारतीयों में से 89 प्रतिशत की यह कामना है कि अगले जन्म में भी वे पवित्र भारत भूमि में जन्म लें.आपकी क्या राय है? चलिए, जो भी हो, उन कारणों को गिना सकते हैं आप?मेरी भी राय आम जनों की राय से मिलती जुलती है. मैं भी अगले जन्म में भारत भूमि में ही जन्म लेना चाहूँगा. मैं अगले तो क्या हर जन्म में, जन्म-जन्मांतर में भारत भूमि में जन्म लेना चाहूँगा, बशर्तें जो हालात आज हैं, वही बरकरार रहें. और, अगर किसी स्थापित नेता के घर जन्म मिले तो सोने में सुहागा!बात भारत देश में ही पुनर्जन्म लेने के कारणों की हो रही थी. आपके भारत में पुनर्जन्म लेने या नहीं लेने के, अपने कारण हो सकते हैं और हो सकता है कि वे, मेरे कारणों से जुदा हों. मैं आपके उन कारणों को जानना चाहूँगा. बहरहाल, क्या आप मेरे कारणों को नहीं जानना चाहेंगे? तो लीजिए, आगे पढ़िए -..
भारत देश में मेरे पुनः पुनः जन्म लेने की इच्छा के पीछे कुछ पुख्ता कारण:1 मैं यहाँ पर अपनी पेट…

आधुनिक भारतीय जोरो...

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इनसे मिलिए, ये हैं आधुनिक भारतीय जोरो.

इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने को भयंकर रूप से उत्साहित...

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हिन्दी पखवाड़े की भेंट

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हिन्दी पखवाड़े की भेंट - ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग हिन्दी में

पिछले सप्ताह हिन्दी पखवाड़ा हर साल की तरह शांति से बीत गया. पूरे देश में हिन्दी की शान में कहीं कसीदे पढ़े गए तो कहीं हिन्दी की बदहाली का रोना रोया गया.संयोग की बात यह रही कि हिन्दी सॉफ़्टवेयर जगत में एक महत्वपूर्ण कदम की शुरूआत इस पखवाड़े में हुई. ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग जो कि माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस की तरह का ऑफ़िस सूट है, जो कि मुक्त व मुफ़्त इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है, के नए संस्करण 2.04-rc2 में हिन्दी भाषा का भी पैक 13 सितम्बर 2006 को जारी किया गया है, जिसमें रेड हैट के राजेश रंजन द्वारा अनूदित यूज़र इंटरफ़ेस (मेन्यू इत्यादि) तथा मेरे द्वारा अनूदित मदद फ़ाइलों का समावेश किया गया है.हिन्दी का पैक विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म - यथा विंडोज, लिनक्स इत्यादि के लिए भी अलग अलग उपलब्ध है जिसे अलग से संस्थापित किया जा सकता है. इसके लिए आपके कंप्यूटर पर ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग संस्करण 2 पहले से संस्थापित होना आवश्यक है...
ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग का हिन्दी का पैक आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं-http://oootranslation.services.openoffice.org/pub/OpenOffice.org/2.0.4rc2/सॉफ़्टवेयर का ड…

हाशिए पर भविष्य

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नया ज्ञानोदय : एक संग्रहणीय विशेषांक
नया ज्ञानोदय का अक्तूबर 2006 का तीन सौ पृष्ठों का संग्रहणीय विशेषांक बच्चों के ऊपर लिखी गई रचनाओं पर केंद्रित है. इस अंक में मेरे द्वारा अनूदित कहानी - "एक कहानी छोटी सी एमी की" पृष्ठ 211 पर प्रकाशित हुई है. यह मार्मिक कहानी रचनाकार के पृष्ठों पर पहले ही आ चुकी है. अगर आपने नहीं पढ़ी हो तो अवश्य पढ़ें. यह कहानी बाद में भास्कर मधुरिमा में भी संक्षिप्त रुप में प्रकाशित हुई थी...
आज का कार्टून :

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