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September, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अरे! ये क्या हो गया? मेरे शहर का रावण ही चोरी हो गया!

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.रावण की चोरीअजीबो-गरीब किस्म की चोरी की वारदातों के बारे में आपने सुना होगा. परंतु आपने 20 फुट ऊंचे रावण के पुतले के चोरी चले जाने की वारदात के बारे में नहीं सुना होगा. लोगों का सही कहना है. घोर कलजुग आ गया है. अब तो चोर रावण को भी चोरी कर ले जाने लगे हैं. वैसे, दूसरे विचार में, चोर राम को थोड़े ही ले जाएगा चोरी करके. सीता को भी नहीं ले जाएगा. राम जैसा सत्यवादी उसका क्या भला करेगा और सत्यवती सीता से उसे क्या मिलेगा? उन्हें भी खिलाना पिलाना जो पड़ेगा. बहुत हुआ तो राम का मुकुट और धनुष बाण - यदि वे खालिस सोने के हुए तो - चोरी कर ले जाएगा अन्यथा चोर के काम का तो रावण ही है!*-**-*..
व्यंज़ल*-*
इस दौर में यारों सब हिसाब बदले गए
खबर ये है कि लोग रावण चुरा ले गए
प्रश्न मेरे मन में भी उठे थे बहुत मगर
जुबां पे आते आते जाने कहाँ चले गए
इन चोरों की अक्ल का अब क्या कहें
वक्त छोड़ गए, घड़ियाँ चुरा कर ले गए
वादे थे पाँच बरस में दुनिया बदलने के
रोटियों के बजाए टीवी से बहला ले गए
अंततः पराजितों में खड़ा हो गया रवि
विजेता होने के फ़ायदे कब के चले गए
**-**

पुस्तक चर्चा का उद् घाटन चुंबनों से...

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चुंबन ही चुंबन, ढेर सारे चुंबन...


पुस्तक चर्चा का खयाल जब तक मूर्त रुप लेगा, चलिए इसकी शुरूआत इस चिट्ठा-प्रविष्टि से कर डालते हैं. वैसे, मैंने पहले भी एक दो पुस्तकों के बारे में लिखा था जिसे अपने ज्ञानवर्धन के लिए, और दुनिया को बेहतर तरीके से समझने के लिए, मेरे विचार में हर व्यक्ति को पढ़ना ही चाहिए.कोई बीस साल पहले मैंने एक किताब खरीदी थी. तब मेरी मासिक आय थी छः सौ रुपए (तब मैं विद्युत मंडल में प्रशिक्षु के रूप में कार्यरत था), और किताब की कीमत थी - एक सौ पचहत्तर रुपए. किताब स्थानीय बाजार में उपलब्ध नहीं थी और मुम्बई की किताब दुकान ‘बुक चैनल' के जरिए पंजीकृत डाक से ही मंगाई जा सकती थी. अतिरिक्त खर्च था - पच्चीस रुपए. यानी की मेरी मासिक आय का एक तिहाई हिस्सा इस पुस्तक पर खर्च होना था.परंतु मैंने दूसरी बार कोई विचार किए बिना ही उस पुस्तक को अग्रिम राशि भेजकर मंगवाया था.वैसे तो आज भी मैं किताबों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में अपनी आय का अच्छा खासा हिस्सा खर्च करता हूँ, मगर वह किसी सूरत एक तिहाई नहीं होता, और सिर्फ एक किताब के लिए तो कतई नहीं. मैं सोचता हूँ कि उस वक्त उस एक किताब के …

आखिर इन पुरानी, विंटेज ग़ज़लों में क्या कमी थी?

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पच्चीस साल पुरानी ग़ज़लें...जब फुरसतिया जी ने अपनी पंद्रह साल पुरानी रचना धो-पोंछकर बाहर निकाली, उसे प्रकाशित किया और तमाम तालियाँ भी (टिप्पणियाँ) बटोर लीं , तो मुझे भी खयाल आया कि ऐसी पंद्रह क्या, मेरे पास तो बीस-पच्चीस बरस पुरानी, ‘विंटेज' करार दी जा चुकी रचनाएँ हैं, और उन्हें प्रकाशित कर मैं भी ‘एकाध' टिप्पणी तो लूट ही सकता हूँ. लिहाजा आप सभी के लिए मेरी पच्चीस साल पुरानी ग़ज़लें प्रस्तुत हैं. ये ग़ज़लें तब की हैं, जब प्रेम परवान चढ़ा हुआ था, उतार-चढ़ाव की हिलोरें ले रहा था, और, जैसे कि कहावत है, सावन में हर ओर हरा ही हरा नजर आता है - एक युवा, प्रेम में पगे कवि को हर ओर प्रेम-प्यार ही नजर आता है. वह बिजली के खम्भे को भी उसी प्रेम-मयी तीव्रता से देखता है जितना अपनी प्रेयसी को.तो, इन ग़ज़लों में भले ही स्तरीयता न मिले, ‘ग़ज़ल' के बजाए ‘कूड़ा-करकट' महसूस हो, स्थापित लोग इन्हें ग़ज़ल के नाम पर कलंक मानें या सिर्फ घटिया तुकबंदी, मगर ये प्रेम प्यार में वैसे ही तीव्र अहसास से लिखी गई हैं जैसे ज्येष्ठ माह में चातक वर्षा की बूंदों के लिए रखता है.और, जैसा कि फुरसतिया को अपनी …

ये मरफ़ी महोदय कौन हैं?

ये मरफ़ी महोदय कौन हैं? और इनके नियम इतने विचित्र किन्तु सत्य क्यों हैं?
(नियमों की पूरी सूची के लिए इस पृष्ठ के सबसे नीचे स्क्रॉल करें. नए नियम यथा समय जोड़े जाएंगे व सूची अद्यतन की जाती रहेगी. अंतिम परिवर्धन - 13 अक्तूबर 2006)
मरफ़ी का ज्ञात (या अब तक अज्ञात, मरफ़ी के हिसाब से कहें तो,) सबसे पहला नियम है - "यदि कुछ गलत हो सकता है, तो वह होगा ही". कुछ का कयास है कि यह नियम एडवर्ड एयरफ़ोर्स के नॉर्थ बेस में सन् 1949 में अस्तित्व में आया. यह नियम वहाँ पदस्थ कैप्टन एडवर्ड ए मरफ़ी के नाम पर प्रसिद्ध हुआ. दरअसल, कैप्टन इंजीनियर मरफ़ी महोदय को एयर फ़ोर्स में एक परियोजना के तहत यह शोध करना था कि क्रैश की स्थिति में मनुष्य अधिकतम कितना ऋणात्मक त्वरण झेल सकता है. जाँच प्रणाली में ही आरंभिक खराबी का पता लगाने के दौरान मरफ़ी ने पाया कि एक ट्रांसड्यूसर की वायरिंग गलत तरीके से की गई थी. उसे देखते ही मरफ़ी महोदय के मुँह से बेसाख्ता निकला - "यदि किसी काम को गलत करने के तरीके होते हैं, तो लोग उसे ढूंढ ही लेते हैं." वहां का परियोजना प्रबंधक ऐसे ही और तमाम अन्य नियमों का शौकिया संकल…

नन्हें मुन्नों के लिए मरफ़ी के नियम

नन्हें मुन्ने बच्चों के लिए मरफ़ी के नियम
• जब आप अपने बच्चे को गोद में उठाकर चलना चाहते हैं तो वे हर हाल में खुद अपने पैरों पर चलना चाहते हैं.
• जब आप चाहते हैं कि आपका बच्चा खुद अपने पैरों से चलकर जाए तो वे किसी सूरत आपकी गोद नहीं छोड़ते हैं.
• जब आप बच्चा-गाड़ी लाते हैं, तो वह उसपर बैठकर नहीं, उसे धकेल कर चलना चाहते हैं.
• जब आप बच्चा-गाड़ी लाना भूल जाते हैं तो वो बच्चा-गाड़ी में जाने की जिद करते हैं.• किसी भोजन में जितना ज्यादा, गहरा और स्थाई धब्बा बनाने की क्षमता होती है, उस भोजन में किसी बच्चे के द्वारा कपड़ों में फैलाए जाने की उतनी ही ज्यादा संभावना होती है.
• उप-प्रमेय - किसी भोजन में स्थाई धब्बा लगाने की जितनी ज्यादा क्षमता होती है, उस भोजन के किसी बच्चे के द्वारा उतने ही मंहगे कपड़े व फर्नीचर पर फैलाए जाने की उतनी ही अधिक संभावना होती है.
• किसी बच्चे को आज जो पसंद है वह कभी भी कल पसंद नहीं होगा (विशेष रुप से भोजन).• किसी बच्चे के द्वारा गलती (या शैतानी) करने पर उसके अभिभावकों की झल्लाहट आसपास मौजूद व्यक्तियों की संख्या के सीधे अनुपात में होती है.• मेरा खिलौना नियम : यदि यह मेरा …

वोट बैंक का नया - पुराना चक्कर?

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राजनीति में रिश्तेदारी का क्या काम?

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और, मैं खुद को कोस रहा था...

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अद्यतन: कुछ मित्रों द्वारा सुझाए नए शीर्षक-
1 - यही कारण है कि तमाम विश्व में पर्यावरणवादियों की संख्या में इजाफ़ा हो रहा है!
2- पर्यावरणविद् बनने हेतु नया, ठोस कारण!
3- चलिए, अब तो कोई काम ही नहीं बचा, लिहाजा पर्यावरणविद् ही बन जाते हैं!

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माइक्रोसॉफ़्ट का नया, भारतीय-बहुभाषी फ़ॉनेटिक इनपुट औज़ार

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माइक्रोसॉफ़्ट का नया, भारतीय-बहुभाषी फ़ॉनेटिक इनपुट औज़ार.

लगता है कि भारतीय भाषाओं के लिए फ़ॉनेटिक इनपुट औजार ही अंततः लोकप्रिय और काम का होगा, भले ही इसमें एकाधिक कुंजियाँ ज्यादा दबानी पड़ती हों. फ़ॉनेटिक का अर्थ यह कि अंग्रेज़ी कुंजीपट में अगर हिन्दी में ‘कहानी’ टाइप करनी हो तो हमें टाइप करना होगा – kahaanii. चूंकि आपने इसे अंग्रेज़ी में टाइप किया हुआ है, तो भारतीय भाषाओं की इस ‘ख़ासियत’ कि जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है, इसे कंप्यूटर प्रोग्रामों की मदद से आसानी से दूसरी भारतीय भाषाओं मसलन गुजराती या पंजाबी में भी बदला जा सकता है.

माइक्रोसॉफ़्ट ने भारतीय भाषाओं की इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए खास “माइक्रोसॉफ़्ट फ़ॉनेटिक इनपुट औजार” बनाया है. इसकी प्रमुख खासियत ही यही है कि यह एक भाषा में लिखी इबारतों को दूसरी भाषा में, तथा फ़ॉनेटिक अंग्रेज़ी में भी आसानी से परिवर्तित (अनुवाद नहीं) कर देता है. तो, अगर आप बहुभाषी हैं – जैसा कि आमतौर पर हम सभी भारतीय होते हैं, हमारे लिए यह बड़े ही काम की चीज है. उदाहरण के लिए, अब मैं एक साथ ही - हिन्दी और पंजाबी में चिट्ठे लिख सकता हूँ. मे…

ब्लॉगर के सारे चिट्ठे एडसेंस विज्ञापनों से मुक्त!

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ब्लॉगर के चिट्ठे विज्ञापन मुक्त कैसे पढ़ेंब्लॉगर के कुछ चिट्ठे कल देरी से लोड हो रहे थे. स्थानीय सर्वरों में कुछ पंगा हो गया होगा. तो मैंने सोचा कि प्रॉक्सी - पीकेब्लॉग्स की शरण ली जाए, जिसने ब्लॉगर पर प्रतिबंध के दौरान हम सब भारतीय चिट्ठाकारों की बहुत मदद की थी.और, ये क्या? चिट्ठों में से गूगल के एडसेंस विज्ञापन ग़ायब?तो दोस्तों, अगर गूगल का एडसेंस विज्ञापन अगर आपकी आत्मा को घायल करता है, चिट्ठा पढ़ने के दौरान खीज पैदा करता है, तो पीकेब्लॉग्स जैसे प्रॉक्सी की शरण ले सकते हैं.परंतु, यहाँ पीकेब्लॉग्स भी व्यावसायिक हो गया दीखता है. उसने एडसेंस के विज्ञापनों को तो कुचल डाले, परंतु अपना स्वयं का पारदर्शी सा विज्ञापन डाल दिया, जो कि नीचे स्थिति पट्टी पर तैरता रहता है और अनजाने में क्लिक भी हो सकता है अतः इसका इस्तेमाल करते समय जरा होशियार रहें. परंतु पीकेब्लॉग्स जैसे दर्जनों अन्य प्रॉक्सी भी तो हैं - और बहुतेरे विज्ञापन मुक्त हैं...
पीकेब्लॉग्स (http://pkblogs.com ) के जरिए चिट्ठों को पढ़ने के लिए पीकेब्लॉग्स के यूआरएल में अपना चिट्ठा नाम जोड़ दें, बस. उदाहरण के लिए पीकेब्लॉग्स के जरिए इस…

अब तो समाज-सेवा भी लाभ के बगैर नहीं, और आप बातें करते हैं!

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गूगल की नई विचार धारा: पूर्णतः ‘व्यावसायिक और लाभदायक' समाज-सेवा.इंटरनेट की दुनिया को ‘खोज' के साथ साथ ‘एडसेंस' और ‘एडवर्ड' जैसे नायाब प्रयोगों के जरिए ‘बदल कर' रख देने वाले गूगल ने एक नई विचारधारा प्रस्तुत की है. व्यावसायिक, लाभदायक समाज-सेवा.गूगल द्वारा 1 बिलियन डॉलर की आरंभिक राशि के साथ एक ट्रस्ट बनाया गया है जो कि तमाम विश्व में गरीबी, बीमारी और ऐसे ही अन्य वैश्विक समस्याओं को खत्म करने में योगदान देगी. परंतु इस ट्रस्ट की यह ख़ासियत यह है कि ट्रस्ट कुछ राशि व्यापार व्यवसाय में लगाकर उस पर लाभ भी कमाएगी. व्यापारिक संस्थानों द्वारा समाज सेवा का विचार सदियों पुराना है. भारत में टाटा घराना प्रारंभ से ही समाज सेवा में रहा है. टाटा घराने के सहयोग से आरंभ हुआ टाटाइंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च इसका अप्रतिम उदाहरण है. अभी कुछ समय पहले ही यह खबर आई थी कि वॉरेन बफ़ेट ने अपनी अधिकांश सम्पत्ति बिल एंड मलिंडा गेट्स फाउण्डेशन को समाज सेवा हेतु दान में दे दी है. सुधा मूर्ति का मुख्य पेशा समाज सेवा है - और वे यह कार्य बरसों से कर रही हैं.परंतु गूगल की विचारधारा तो सचमुच क्…

महाब्लॉगर को जन्म दिवस की महा-बधाईयाँ...

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सर्वाधिक पढ़े जाने वाले, सर्वप्रिय हिन्दी चिट्ठाकार, अनूप शुक्ला 'फ़ुरसतिया' जी के जन्मदिवस 15 सितम्बर पर उन्हें ढेरों बधाईयाँ! यथा - नाम -विपरीत गुण को साकार करते हुए फ़ुरसतिया जी इस दिन इतने व्यस्त रहे कि मेरे और प्रत्यक्षा के ईपत्रिया साक्षात्कार के जवाब देर रात तक प्रेषित कर पाए. वैसे, ग़लती हमारी भी थी जो हमने सोचा कि हम प्रश्न टिकाएँगे और चैट में हासिल प्रत्युत्तर की तरह दन्न से जवाब हासिल हो जाएगा.
बहरहाल, बहुतों के बड़के भैया और बहुतों के समस्या-सलाहकार , महाब्लॉगर अनूप शुक्ला के रविरतलामी और प्रत्यक्षा द्वारा लिए गए ईपत्रिया साक्षात्कार जिसे 15 सितम्बर को जन्मदिवस शुभकामना स्वरूप यहाँ पोस्ट होना था, एक दिन की देरी प्रस्तुत है. अनूप तथा पाठकों से क्षमायाचना सहित.
अनूप को एक बार फिर जन्म दिवस की ढेरों बधाईयाँ, और चिट्ठा-शुभकामनाएँ कि वे अपने चिट्ठा लेखन में नित नए आयाम बनाएँ, नए रिश्ते बनाएँ, और चिट्ठाकारों को नई दिशाएँ दें.
रविरतलामी के प्रश्न:
प्रश्न - अपने जन्म दिवस के खास मौक़े पर महाब्लॉगर किस विषय पर लिखना चाहेगा?उत्तर- चाहता तो यह हूं कि ऐसा कुछ लिखूं कि यह '…

यूनिकोड फ़ाइलों को पीडीएफ़ में परिवर्तित करना...

यूनिकोड हिन्दी फ़ाइलों को पीडीएफ़ फ़ाइलों में कैसे परिवर्तित करें?सबसे बढ़िया तरीका तो है कि आप नया, ताजातरीन एडॉब एक्रोबेट ले आएँ. इसमें यूनिकोड का पूरा समर्थन अब उपलब्ध हो गया है. परंतु इसमें आपको जेब से मोटी रकम खर्चनी होगी. आइए, आपको बढ़िया, फोकटिया रास्ता सुझाते हैं.दो तरीके आपके काम के हो सकते हैं.पहला तरीका - मुफ़्त का ओपनऑफ़िस http://www.openoffice.org 2 का इस्तेमाल करें. यूनिकोड हिन्दी फ़ाइलों को ओपनऑफ़िस 2 में खोलें. वैसे आप पूरी तरह से, बढ़िया तरह से ओपनऑफ़िस में यूनिकोड हिन्दी में हर तरह के दस्तावेज़ बना सकते हैं - वर्ड डाक्यूमेंट से लेकर स्प्रेडशीट और प्रेज़ेंटेशन इत्यादि सबकुछ. तो आपका हिन्दी का दस्तावेज़ ओपनऑफ़िस 2 में खुला है. अब आप उसे फ़ाइल>निर्यात मेन्यू के जरिए चुनें पीडीएफ़ , और बस हो गया. है ना आसान. इसमें आपके दस्तावेज़ों की कड़ियाँ, वेब पते इत्यादि भी सुरक्षित और नेविगेशन योग्य बने रहते हैं. हींग लगे न फ़िटकरी और रंग चोखा...
दूसरा तरीका है - इंटरनेट पर उपलब्ध तमाम तरह के पीडीएफ़ परिवर्तकों का इस्तेमाल. ये पीडीएफ़ परिवर्तक आपके कम्प्यूटर पर एक किस्म के प्रिंट…

अनुगूंज पर अनुवादित शब्दों की गूंज...

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अनुगूंज में अनुवादित शब्दों की गूंजयह शब्द भंडार मूलतः गनोम ग्लॉसरी से निकाला गया है. इस अनुवाद में बहुत से अ-हिंदीभाषियों का भी योगदान है. अतः वर्तनी की गलतियाँ हो सकती हैं. अतः वास्तविक इस्तेमाल करते समय वर्तनी सुधार लेने हेतु निवेदन है. इस अनुवाद भंडार को दिल्ली की सराय संस्था (http://www.sarai.net) के सहयोग से आयोजित हिन्दी अनुवाद कार्यशाला में तैयार किया गया है, तथा इसके अधिकांश अनुवादों को हिन्दी लिनक्स तंत्र में इस्तेमाल किया गया है.*****.******abort = रोक दें *Abstract = सार *Accelerator = उत्प्रेरक *Accept = मानना *access = पहुँच *Account = खाता *Active = सक्रिय *Actor = कर्ता *Actuator = *Add = जोड़ें *Address = पता *Adjust = अनुकूल बनाना *Administration = प्रशासन *Aggregate = योग *Alarm = चेतावनी *Align = पंक्तिबद्ध*Allow = अनुमति दें *Alpha = अल्फा *alpha channel = अल्फा चेनेल *Analog = ऐनालॉग *Analysis = विश्लेषण *Anchor = ऐंकर, लंगर *AND = एनडी *Animation = चलचित्र *Anonymous = अज्ञात, अनजान *Answer mode = उत्तर विधि *Antialiasing = एंटीएलिय…

लाभकारी अश्लीलता..

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अश्लीलता का लाभांश - भाग 2**-**पूर्व में आपने पढ़ा कि किस तरह मेन स्ट्रीम की मीडिया चाहे वह टेलिविजन हो या अख़बार-पत्रिकाएँ - अपने प्रसार और टीआरपी रेटिंग के लिए अश्लीलता का खंभा ऐन केन प्रकारेण थामे ही रखती हैं.क्या कला जगत् इससे अछूता है?मुम्बई में पिछले दिनों एक कला प्रदर्शनी लगाई गई जिसका तो नाम ही अश्लील था - टिट्स एन क्लिट्स एन एलीफ़ेंट्स डिक. प्रदर्शनी में उत्थित लिंगों के विविध स्वरूपों के कल्पनीय-अकल्पनीय कला स्वरूपों की नुमाइशें थीं. वैसे, कोकाकोला की तिरछी रखी, अस्सी अंश कोण बनाती बोतल से कला के जिस स्वरूप का आभास दिलाया जा रहा था वह किसी पेय के कर्वी बोतल की मार्केंटिग स्ट्रेटेजी से भिन्न कतई नहीं था.कला ऐसी होनी चाहिए?






फ़वद तमकंत की पेंटिंग - स्ट्रीट कल्चर का विज्ञापनआर्ट इंडिया का ताज़ा अंक (वॉल्यूमXI, संस्करण II, तिमाही II) भी चिल्ला चिल्ला कर इसी धारणा को सत्यापित करता दीखता है. इसके भीतर के पृष्ठों में स्थापित, स्थापित होने के लिए संघर्षशील और नौसिखिए - तमाम किस्म के कलाकारों की तमाम तरह की कलाकृतियाँ हैं. कुछ कलाकृतियों को आर्ट गैलरी के विज्ञापनों में उद्धृत किया गय…

मरफ़ी के अध्ययन-अध्यापन नियम

(शिक्षक दिवस पर समर्पित - मरफ़ी के नियम को सत्य करता हुआ - दो दिन बाद!)मरफ़ी के कुछ विद्यार्थीय - शिक्षकीय नियम... • कक्षा में लगी घड़ी हमेशा गलत समय बताती है.
• स्कूल लगने का घंटा जल्दी बजता है, छुट्टी की घंटी देर से बजती है.
• स्कूल की घंटी दोपहर के खाने की छुट्टी के समय तीव्र गति से चलने लगती है.
• जब विद्यार्थी कमरे में होते हैं तभी महाविपदा आती है
• शिक्षकों के लिए हर मजेदार विषय विद्यार्थियों के लिए उबाऊ होता है.
• विद्यार्थियों द्वारा किसी विषय को समझे जाने की संभावना उस विषय की व्याख्या के लिए शिक्षक द्वारा लिए गए समय व किए गए श्रम के उलटे अनुपात में होती है.
• कक्षा की लंबाई (समय), उबाऊ शिक्षक व उबाऊ विषय के सीधे अनुपात में होती है.
• विद्यार्थी अच्छे परिणाम लाते हैं तो उन्हें प्रशंसा व पुरस्कार मिलते हैं. विद्यार्थी जब फेल होते हैं तो उन्हें उनके शिक्षक घटिया पढ़ाते हैं.
• स्कूल का सबसे शरारती बच्चा स्कूल के प्राचार्य का बेटा होता है.
• जिस दिन शिक्षक के स्कूल पहुँचने में देरी हो जाती है, उसकी मुलाकात गेट पर प्राचार्य से अवश्य होती है.
उपप्रमेय - जिस दिन विद्यार्थी देर से स्कूल पहुँचत…

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