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January, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अप्रैल 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

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ये देश मलाईदार!

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सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
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व्यंज़ल
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सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

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एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को …

मई 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

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व्यंग्य
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दलों में विभाजन : एक शाश्वत सत्य


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इस बात से कुछ लोग बहुत खुश हुए होंगे और कुछ लोग बहुत दुःखी कि कांग्रेस पार्टी एक बार फिर विभाजित हो गई. जनता दल कितनी असंख्य बार विभाजित हुई है, किसी को गिनती नहीं पता. पर, मेरी तरह, बहुत से ऐसे लोग भी होंगे जिन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा होगा और न ही उन्हें चिंता होगी कि किस दल में कितनी बार कितने अंतराल से किस तरह विभाजन होता रहता है. जो लोग दुःखी हो रहे हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं है कि विभाजन एक शाश्वत सत्य है – यथार्थ है. या फिर वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि विभाजन तो एक प्राकृतिक क्रिया है – प्रकृति का स्वभाव है. हालांकि राजनीतिक दलों में विभाजन की यह प्रकृति या प्राकृतिक क्रिया कभी-कभार ही लागू होता है और जो विभाजन होते हैं, उनके पीछे बड़े-बड़े और भारी भरकम कारक और कारण होते हैं. और जो लोग खुश हो रहे होंगे, वे भी शायद यह अहसास नहीं कर रहे होंगे कि विभाजन की पीड़ा से वे भी पहले गुजर चुके हैं और शायद भविष्य में यह पीड़ा उन्हें फिर भोगना पड़े.

प्रकृति में कोई कली खिलती है, कोई अंकुरण होता है तो कोशिकाओं के विभाजन से. हमा…

छींटें और बौछारें में जून 05 में प्रकाशित रचनाएँ

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सरकारी कंपनियों का निज़ीकरण: एक बहस
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सेंटौर होटल के निजीकरण के परिप्रेक्ष्य में सीपीएम के दीपांकर मुखर्जी और बीजेपी के अरूण शौरी आज आमने सामने हैं और अखबारों के माध्यम से एक दूसरे पर पृष्ठ भर भर के आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं. यह जो वाद विवाद चल रहा है उसके पीछे न जाते हुए आइए चर्चा करें बाल्को की जिसे सरकार ने सबसे पहले निजी हाथों में स्टारलाइट कंपनी को बेचा था. उस समय भी भारी बवाल मचा था. सब तरफ हल्ला मचा था और केंद्र की बीजेपी सरकार के विरूद्ध छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्य मंत्री अजीत जोगी आमने सामने थे. बाद में कोर्ट ने जब मामला साफ किया था तो सबका मुंह बन्द हुआ था.



बाल्को की चिमनी: वर्तमान में एशिया की सबसे बड़ी चिमनी

एक बार जब निजी करण हो गया, तो इस काम में मुखर विरोध करने वाले अजीत जोगी बाल्को के एक्सटेंशन प्लान को धड़ाधड़ स्वीकृति देते देखे गए.

जो सरकारी बाल्को, मरियल चाल चलता हुआ, पिछले कई दशकों से एक ही रफ़्तार में, एक जैसा प्रॉडक्शन दे रहा था, निजी हाथों में आते ही सरपट दौड़ने लगा. इसकी कैपेसिटी एक्सटेंशन की योजना न सिर्फ रेकॉर्ड समय में पूरी हुई, बल्कि तीन साल…

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