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March, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुष्पों की रंगपंचमी -

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प्रकृति की होली (2)
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रंगों के त्यौहार होली पर मालवा अंचल – इन्दौर के आसपास का इलाक़ा जरा ज्यादा ही रंगीन हो जाता है. होली के पाँच दिन बाद रंगपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें फिर से एक बार रंगों से एक दूसरे को डुबोया जाता है. कहीं कहीं ‘गेर’ निकलती है जो एक प्रकार का बैंड-बाजों-नाच-गानों युक्त जुलूस होता है जिसमें नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है. जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है.

प्रकृति भी इस समय जम कर होली मनाती है. मेरे घर आँगन के एक गमले में खिले ये पुष्प भी होली और रंग पंचमी की शुभकामनाएँ देते प्रतीत होते हैं....



इस चित्र को पूरे आकार में यहाँ देखें

अच्छाइयों की होली...

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होली... बुराइयों की या अच्छाइयों की?

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कल रात पूरे देश में होलिका दहन का त्यौहार मनाया गया. बुराइयों को जलाने, खत्म करने के प्रतीक स्वरूप यह त्यौहार मनाया जाता है.

हमारे मुहल्ले में भी होलिका दहन का कार्यक्रम कुछ उत्साही बच्चों-बूढ़ों के सहयोग से साल-दर-साल मनाया जाता है. इस दफ़ा जो लकड़ियाँ एकत्र की गई थीं, वे किसी सूरत जलने दहकने का नाम नहीं ले रही थीं. किसी ने चुटकी ली कि बुराइयाँ आसानी से जलती खत्म नहीं होती हैं. अंतत: होलिका पर ढेर सारा घासलेट उंडेला गया तब वह धू-धू कर जली. मगर, ऐसा लगा कि बुराइयों को जलाने नष्ट करने के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार के जरिए हम अपनी बची खुची अच्छाइयों को भी नष्ट करने पर तुले हुए हैं.

हर साल होलिका के फलस्वरुप टनों लकड़ियाँ बिना किसी प्रयोजन के जला दी जाती हैं. धुआँ, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग तो सेकेण्डरी इफ़ेक्ट हैं. रास्तों – चौराहों पर खुले आम बड़े बड़े लट्ठे जला दिए जाते हैं जो सप्ताहों तक सुलगते रहते हैं, जिससे आम जनता को खासी परेशानी होती है. होलिका दहन पर इस साल भी सारा शहर धुँआमय हो गया था. स्थिति यह थी कि सांस लेने में दिक्कतें आ रही थी.

आस्था …

आप कम भ्रष्ट हैं या ज्यादा?

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सर्वाधिक भ्रष्ट?


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अब तक आदमी या तो ईमानदार होता था या भ्रष्ट होता था. परंतु आज के दौर में भ्रष्टता की भी कैटेगरी भाई लोगों ने बना ली है. यूपी के पूर्व प्रमुख सचिव अखंड प्रताप सिंह, जो अपने ही साथी अफ़सर बंधुओं के द्वारा “उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक भ्रष्ट अफसर” के शानदार खिताब से नवाज़े जा चुके थे, अंतत: सीबीआई की नज़रों में आ ही गए.

सवाल यह है कि सर्वाधिक भ्रष्ट का अर्थ क्या है? क्या इसके लिए कोई पोल - कोई वोटिंग हुई थी? सर्वाधिक भ्रष्ट के लिए कोई पैजेंट हुआ था? इस खिताब को पाने के क्या मापदंड थे? अगर यह अफसर सर्वाधिक भ्रष्ट था, तो उससे कम भ्रष्ट और न्यूनतम भ्रष्ट अफसर भी वहाँ होंगे. क्या सर्वाधिक भ्रष्ट उसे माना गया जो किसी काम के तय रेट से दस गुना या बीस गुना ज्यादा रिश्वत लेता था, या रिश्वत लेते समय वह अपने ख़ून के रिश्तों की भी परवाह नहीं करता था? या, किसी दिए गए वित्तीय कालखंड में उसने सबसे ज्यादा पैसे बनाए? अगर यह मापदंड जारी कर दिया जाता तो और दूसरे स्टेट के अफसरों का भी भला हो जाता.

जब मैं सरकारी सेवा में था, तो एक सीनियर इंजीनियर शर्माजी के बारे में लोग कहा करते थे कि बहुत भ्…

ताजमहल पर मेरा हक?

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ताजमहल पर मालिकाना हक?


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एक ख़बर के अनुसार, ताजमहल के निर्माण के 250 वर्षों के पश्चात्, आगरा के शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में उस के मालिकाना हक को लेकर तलवारें खिंच गईं हैं. हर एक की दलील यह है कि ताजमहल वस्तुत: उनके पंथ के व्यक्तियों की कब्र है, अत: मालिकाना हक उन्हीं का है. बोर्डों ने अपने-अपने दावे सरकार को सौंप दिए हैं. चर्चे हैं कि ताजमहल की मोटी वार्षिक आय पर निगाहें हैं. शहंशाह शाहजहाँ ने जिस प्रेम की अभिव्यक्ति की ख़ातिर इस खूबसूरत स्मारक का निर्माण करवाया था, उन्हें सपने में भी यह भान नहीं रहा होगा कि ताजमहल, ताज कॉरीडोर और मालिकाना हक जैसे छुद्र, विवादों में फँसता रहेगा.

अब अगर ऐसे दावे करने का हक किसी का बनता है, तो शीघ्र ही लाल क़िला और कुतुब मीनार पर भी दावे-प्रतिदावे करने वाले चले आएँगे. ये स्मारक विश्वधरोहर हैं, और इनपर किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा मालिकाना हक जताया जाना हास्यास्पद है. दरअसल, ताजमहल जैसे स्मारकों पर तो विश्व की प्रत्येक जनता का मालिकाना हक है.
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व्यंज़ल
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खुद पर नहीं अपना मालिकाना हक है
जताने चले जग में मालिकाना हक है

लोग कहते हैं ये मुल्क है तेरा…

प्रकृति की रंगीन बहार..

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प्रकृति कीहोली
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फ़ाल्गुन के महीने में प्रकृति भी अपनी रंग-बिरंगी छटाएँ बिखेरती है. जहाँ देखें वहीं फूलों की बहार. टेसू तो हर ओर ऐसे दीखते हैं, जैसे जंगल में अग्निदेवता साक्षात् उतर आए हों. प्रकृति आपके तन-मन में रंगीनियाँ भरने को आतुर प्रतीत होती है.

पुष्पों के नियमित-अनियमित-सिमिट्रिकल रूप और रंग विन्यास दर्शकों के तन-मन को झंकृत-चमत्कृत तो करते ही हैं, अपनी भीनी-भीनी खुशबुओं की छटा से वे हमें मदमस्त भी करते हैं.

इस पुष्प को देखिए और मदमस्त होइए:



यह चित्र अपने पूरे आकार में यहाँ मौज़ूद है जिसे डाउनलोड कर आप अपना डेस्कटॉप वालपेपर बना सकते हैं.

क्रिकेट के बारे में जानकारियाँ...

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व्यंग्य
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एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट
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इससे पहले मैं क्रिकेट देखता सुनता नहीं था. खेलना तो खैर, दूर की बात है. परंतु जब सुना कि मियाँ मुशर्रफ़ क्रिकेट देखने भारत आ रहे हैं तो लगा कि क्रिकेट में कुछ तो होगा कि लोग दीवाने बने फिरते है. तो इस बार देखा. सुना था कि क्रिकेट इज़ ए फनी गेम. येप, इट इज़, जेंटलमेन. सचमुच दूसरे किसी भी खेल में मज़े का अंश उतना नहीं रहता जितना क्रिकेट में होता है. हॉकी, फ़ुटबाल से लेकर जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स – किसी भी खेल को लीजिए, उसमें खेल का मज़ा होता है. परन्तु क्रिकेट में तो मज़ा ही मज़ा होता है. मजे का खेल होता है.

क्रिकेट के बारे में मैंने पिछले कुछ दिनों में तमाम अध्ययन किए, काफ़ी कुछ देखा, सुना और बहसें कीं. राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय क्रिकेट पत्र-पत्रिकाओं तथा क्रिकेट विशेषांकों का अध्ययन किया, इंटरनेट की क्रिकेट से सम्बन्धित तमाम साइटों की खाक छान डाली, टीवी पर लाइव मैचेस देखे, और साथ ही साथ रेडियो पर आँखों देखा हाल भी सुना. यही नहीं, मैंने अपने मुहल्ले में गली क्रिकेट भी खेली. प्रत्येक मैच के प्रारम्भ होने से पहले, मैच के दौरान और मैच …

व्यंग्य लघुकथा

लघुकथा
(विश्व की पहली ब्लॉगज़ीन निरंतर में पूर्व प्रकाशित)
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प्रशिक्षु : दृश्य एक
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को आकस्मिकता में अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो गायब थीं और घोषित कर दिया कि मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया. मरीज के सम्पन्न परिवार जनों को यह खासा नागवार ग़ुजरा और उन्होंने हल्ला मचाया कि मरीज का इलाज उचित प्रकार नहीं हुआ और एक प्रशिक्षु के हाथों ग़लत इलाज से मरीज को बचाया नहीं जा सका.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने उस प्रशिक्षु को फायर कर दिया.
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प्रशिक्षु: दृश्य दो
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने …

है कोई आपकी पहचान ?

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कीमत पहचान की
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उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान जब एक समारोह में बिना लाव लश्कर और पहचान पत्र के पहुँचे तो पुलिस के जवानों ने जो सुरक्षा के लिए वहाँ तैनात थे, उन्हें पहचाना नहीं और उनकी जाँच करने लगे. मंत्री महोदय को यह खासा नागवार गुज़रा और नतीजे में नौ पुलिस कर्मियों को निलंबन की सज़ा भुगतनी पड़ी.

ठीक इसके विपरीत, एक घटना मुझे याद आ रही है. मेरा एक मित्र पुलिस विभाग में वायरलेस में कार्यरत था. उसका एसपी नया-नया ट्रांसफर होकर आया था और अपने मातहत विभागों का निरीक्षण करता रहता था. एक दिन वह एसपी सिविल ड्रेस में वायरलेस विभाग में जा पहुँचा जहाँ मेरा मित्र मोर्स कोड की कुंजियों की ठकठकाहट के साथ गोपनीय संदेशों का आदान प्रदान कर रहा था. ऐसे में ही उस एसपी ने मित्र से कुछ पूछताछ करनी चाही. मित्र जो उसे पहचानता नहीं था, उस पर चिल्लाया और बोला – बास्टर्ड यू गेट आउट फ्रॉम हियर. डोंट यू सी आई एम बिज़ी इन इम्पॉर्टेंट इन्फ़ॉर्मेशन्स? और फिर अपने काम में जुट गया.

वह ऑफ़ीसर तत्काल बाहर चला गया. उसे अपनी ग़लती का न सिर्फ अहसास हुआ, बल्कि उसने मित्र को अपनी ड्यूटी में प्रतिबद्धता रखने के लिए शाबासी त…

यादें बचपन की...

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अनुगूंज: बचपन के यादों की गूँज...
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मेरी पहली खरीदारी
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उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था. माँ कोई सब्जी बना रही थी और घर में खड़ी लाल मिर्च खत्म हो गई थी. सब्जी में बघार लगाने के लिए मिर्च जरूरी थी. माँ दूसरे कामों में भी उलझी हुई थी, अत: यह कार्य उसने अपने लाड़ले को डरते डरते सौंपा. हाथ में चार आने का सिक्का दिया और कहा बेटा गली के आगे जो दूकान है वहाँ से चार आने की खड़ी मिर्ची ले आ. ले आएगा ना?

मैं उत्तेजित हुआ, हिरणों की तरह कुलाँचे लगाता दुकान तक पहुँच गया. मेरी निकर जरा ढीली हो रही थी, उसे संभालता हुआ दुकानदार को, जो एक दूसरे ग्राहक से उलझा हुआ था कम से कम दस बार एक ही सांस में बोल गया कि मुझे चार आने की मिर्ची चाहिए.

उस ग्राहक से निपटकर, आखिरकार दुकानदार ने अख़बार के एक टुकड़े में करारे लाल मिर्च को तौलकर पतले से धागे से पुड़िया बांधा और मुझे थमाया. जिस तेजी से मैं आया था, उसी तेजी से कूदता फांदता, एक हाथ में मिर्ची की पुड़िया और एक हाथ में निकर संभाले वापस घर लौटा और सगर्व पुड़िया माँ के हाथ में थमाया. दौड़ते भागते आने के कारण पुड़िया खुल गई थी और उसका धागा लटक रहा था.

माँ…

हिन्दी में ऑफ़िस सूट

हिन्दी में ऑफ़िस सूट: ओपन-ऑफ़िस हिन्दी

(ऑन लाइन हिन्दी समाचार पत्रिका प्रभासाक्षी में दि. 13 मार्च 05 को पूर्व प्रकाशित )

माइक्रोसॉफ़्ट के ऑफ़िस सूट के हिन्दी संस्करण के पिछले साल जारी होने के साथ ही कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के स्थानीय भाषाओं में स्थानीयकरण की होड़ मच गई है. जहाँ व्यवसायिक उत्पाद तो इस दौड़ में शामिल हो ही चुके हैं, मुक्त सॉफ़्टवेयर/ओपनसोर्स भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. बहुत से स्तरों पर, बहुत से स्थानों पर बहुत से लोग भिड़े हुए हैं – लगे हुए हैं स्थानीय भाषाओं में कम्प्यूटर और उनके अनुप्रयोगों को लाने हेतु ताकि कम्प्यूटरों के उपयोग को स्थानीय लोगों तक पहुँचने-पहुँचाने में अँग्रेज़ी की अनिवार्यता को खत्म किया जा सके. माइक्रोसॉफ़्ट का तमिल और हिन्दी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम तो है ही, ऑफिस सूट भी इन भाषाओं में है. ओपन सोर्स का लिनक्स इस मामले में थोड़ा सा धनवान है जहाँ इसके पास छ: भाषाओं में ऑपरेटिंग सिस्टम – हिन्दी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, मराठी और बंगाली में है तथा ऑफ़िस सूट हिन्दी और तमिल में है. और ढेरों अन्य भारतीय भाषाओं में काम जोरों से जारी है – व्यवसायिक प्लेटफ़ॉ…

गंगा भी ज़हरीली हो गई...

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गंगा तेरा पानी ज़हरीला...
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मेरे जैसे करोड़ों धर्म-भीरुओं ने गंगा मैया के जल में अपने पापों और दुष्कर्मों को धोने की मंशा में शवों, अस्थियों, फूल-पत्रों, मूर्तियों, सिक्कों और न जाने क्या-क्या सदियों से विसर्जित किए हैं. फ़ैक्टरियों/शहरों के गटरों के विसर्जनों को गंगा में बहाए जाने की बात तो जुदा ही है. नतीजतन गंगा मैया के आँचल का पानी जहरीला तो होना ही था... हमारे इन कर्मों से हमारे पाप धुले नहीं वरन् बढ़े ही हैं. पर क्या हमें कभी इसका भान होगा भी?
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व्यंज़ल
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क्या कुछ नहीं ज़हरीली हो गई
अब ये गंगा भी ज़हरीली हो गई

आखिर कैसे हो क़ौम का इलाज
अब औषध भी ज़हरीली हो गई

अमृत अब से बुझती नहीं प्यास
अपनी लतें ही ज़हरीली हो गई

अंतत: शस्त्रागार बन गई दुनिया
दोस्ती की बातें ज़हरीली हो गई

प्रेमशास्त्र पढ़ जवाँ हुआ था रवि
मेरी चाल कैसे ज़हरीली हो गई
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सब धोखेबाज़ हैं यहाँ...

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संविधान के साथ धोखाधड़ी...
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झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज अर्जुन मुंडा की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्यपाल के फैसले को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया है.

इसके साथ ही नेताओं में विधायिका – न्यायपालिका में कौन बड़ा – किसका अधिकार कहां तक का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है. जहाँ बीजेपी स्वागत कर रही है (चूँकि यहाँ उसके फायदे की बात हो रही है) वहीं तमाम अन्य दल तिलमिलाए हुए हैं कि न्यायालय ओवरएक्टिविज्म दिखा रही है. परंतु न्यायालय को न्याय की परिभाषा फिर से बताने और यह बताने के लिए कि संविधान के साथ धोखाधड़ी राज्यपाल जैसे संविधान प्रमुखों द्वारा किया जा रहा है, किस ने मजबूर किया है? आज की स्तरहीन राजनीति ने, जहाँ सत्ता और कुर्सी की खातिर संविधान तो क्या, लोग अपने आप से भी धोखाधड़ी कर रहे हैं.

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व्यंज़ल
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ये मेरी मासूमियत है धोखाधड़ी नहीं
खुद की सेवा है कोई धोखाधड़ी नहीं

तमाम उम्र रहे हैं तंगहाल तो क्या
तसल्ली तो है किया धोखाधड़ी नहीं

गुजर गया दौर ईमान की बातों का
जीना असंभव जहाँ धोखाधड़ी नहीं

कोई फर्क बचा नहीं पहचानोगे कैसे
क्या छल और क्य…

संतों के लिए विवाद...

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शीर्षक ही काफ़ी है...

इस खबर का शीर्षक ही पूर्ण है पूरी कहानी कहने को, फिर क्या खबर और क्या खबरों की खबर... हे.. हे... हे.... हाय.. हाय... ऊँ.. ऊँ... (बहुत ज्यादा हँसने के बाद रोना आता ही है :)

आयातित रुपिया...

व्यंग्य

इम्पोर्टेड रुपया?

इधर मैंने वह खबर पढ़ी, उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ. नतीजतन मेरी रातों की नींदें डिस्टर्ब हो गईं और अनिद्रा, अर्द्धनिद्रा में मुझे हॉरिबल, हॉटिंग सपने दिखाई पड़ने लगे. सपनों का यह सिलसिला जारी है. इससे पहले कि इन भयंकर सपनों को भुगतकर मैं और भी ज्यादा डिस्टर्ब हो जाऊँ, आपको भी थोड़ा डिस्टर्ब करूं अपने सपने सुनाकर.

रॉबर्ट के हाथ में भी वही अख़बार था. वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही अख़बार पढ़ रहा था. खबर पढ़ कर उसकी भी आंखें फटी रह गईं. वह भी घबरा गया. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में नए नोट नहीं छपवा सकने के कारण विदेशों से नए नोट छपवाकर मंगवाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा. उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ…

लंबित है मेरा देश...

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ये देश लंबित है…
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2 लाख फ़ाइलें निपटारे के लिए वर्षों से लंबित... और वह भी मंत्रालय में जहाँ शासकीय निर्णय होते हैं... देश, प्रांत और समाज के विकास के लिए. फिर अन्य सरकारी विभागों की बात तो छोड़ ही दें.

दरअसल सारा सरकारी कार्यालयीन तंत्र ही जंग खाया हुआ है. मैंने भी 20 वर्ष सरकारी सेवा में गुजारे हैं. सरकारी ऑफ़िसों की स्थिति सचमुच शोचनीय है और कोई भी बदलना नहीं चाहता. धूल-खाती, सड़ती हुई फ़ाइलों के बंडलों के बीच बैठने वाले सरकारी अफसर और बाबू कार्यालयीन समय में देर से आते हैं और समय से पूर्व चले जाते हैं. कोई काग़ज़, मसलन किसी का जेनुइन आवेदन किसी कार्यालय में पहुँचता है, तो वहाँ का आवक बाबू उस पर ठप्पा लगाकर, क्रमांक व दिनांक डालकर आवक फ़ाइल में लगा देता है. उसके पश्चात् उस फ़ाइल का अंतहीन सफर शुरू हो जाता है. अगर उस फ़ाइल में संबंधित अफसर को कोई काम नहीं करना है, तो उसपर कोई टीप लिख देगा, कोई जानकारी मांग लेगा या उसे अपने ऊपर-नीचे किसी अन्य अफसर के पास निर्णय के लिए भेज देगा. यानी अपनी कोर्ट में बाल नहीं रखेगा ताकि जिम्मेवारी न ठहराई जा सके. फ़ाइलों को लंबित रखने का सारा काम बड़े…

मैं सरकार हूँ...

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क्योंकि ये सरकार मेरी है...

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मुलायम सिंह ने अपने भाई, जो कि यूपी के पीडबल्यूडी मंत्री भी हैं, के निजी कालेज के लिए 34.5 करोड़ रुपयों का अनुदान स्वीकृत किया है. क्यों न करें? आखिर समाजवादी सरकार उनकी अपनी है और वे अपने भाई, भतीजे और अपने समाज का भला नहीं करेंगे तो क्या राह चलता दूसरा आदमी करेगा? समाजवादी/साम्यवादी पार्टियों-नेताओं का छद्म समाजवाद/साम्यवाद का इससे बढ़िया उदाहरण और नहीं हो सकता. हिन्दुत्ववादी-सेकुलरवादी पार्टियों के छद्म विचारधाराओं के बारे में भी भारतीय बुद्धिजीवियों को पता है कि ये सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने-बचाने के लिए वोटरों के सामने रोना रोते रहते हैं.

यह स्थिति भारत में हर कहीं है. प्राइवेट स्कूलों कालेजों की संख्या अधिकतर नेताओं के परिवारों की हैं. पेट्रोल पंपों के छद्म मालिक नेता हैं. इसीलिए तो सरकार बनाने, सरकार में शामिल होने के लिए तमाम तरह की मारा मारी चलती रहती है और, शहाबुद्दीन की तरह कुछ नेता तो खुले आम यहाँ तक कहते हैं कि हम अपनी सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक, किसी भी एक्स्ट्रीम तक जाएंगे. देश सेवा के लिए आज कोई सरकार में शामिल नहीं होता. सरकार का रू…

हिंग्लिश?

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अँग्रेज़ी में हिन्दी कि हिन्दी में अँग्रेज़ी?
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शनिवार को टाइम्स ऑफ इन्डिया तथा इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पृष्ठों पर दो विरोधाभासी चीज़ें एक साथ दिखाई दिए. परंतु ये कोई राजनीतिक नज़रिया या टीका टिप्पणी नहीं थे.

भले ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र हो जिसकी जनता अँग्रेज़ी भाषा बोलती है, परंतु इस अँग्रेज़ी में हिन्दी भी घुलती मिलती दिखाई देने लगी है. हिन्दी में अँग्रेज़ी तो खैर, एक इमल्शन की तरह घुल मिल गई है, और प्राय: आम बोलचाल तथा अब तो गंभीर लेखन में भी, अँग्रेजी के शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है. मैंने अपनी ग़ज़लों में कई मर्तबा अँग्रेज़ी के शब्दों का बख़ूबी प्रयोग किया है.

ट्रू ह्मूमन ग्लोबलाइज़ेशन - विश्वमानववाद का इससे सटीक उदाहरण और क्या हो सकता है भला.

हर शख्स को अब ग़ज़ल कहना होगा

राही, कोई नई राह बना जिससे कि तेरे पीछे आने वाले राही तुझे याद करें...
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जावेद अख़्तर, जिन्हें इस साल के फ़िल्मफ़ेयर के पाँचों नॉमिनेशन उनके गीतों के लिए मिले थे, ग़जलों के बारे में बेबाकी से कहते हैं कि – इतनी खूबसूरत ट्रेडिशन का धीरे-धीरे लोगों को इल्म कम होता जा रहा है. ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में इसकी दो पंक्तियों में – इशारों में, कॉम्पेक्ट तरीके से कही जाने वाली बातों का खासा योगदान रहा है, जो ग़ज़लकारों को मेहनत से लिखने के लिए मज़बूर करती हैं. इसके साथ ही इसके रदीफ, क़ाफिए और मकता-मतला जैसी पारंपरिक और नियमबद्ध चीज़ें भी ग़ज़ल लिखने के दौरान कठिनाइयाँ पैदा करती हैं.

मगर, फिर भी लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं और क्या खूब लिख रहे हैं. भले ही पाठक, श्रोता और प्रशंसक नदारद हों – ग़ज़लें आ रही हैं... हिन्दी में भी और उर्दू में भी. और, मेरा तो यह मानना है कि पारंपरिक और नियमबद्ध रचना के पीछे पड़ने की जरूरत ही नहीं है. रचना ऐसी रचिए जिसमें पठनीयता हो, सरलता हो, प्रवाह हो और जिसे रच-पढ़ कर मज़ा आए. बस. कट्टरपंथी आलोचक तो हर दौर में अपनी बात कहते ही रहेंगे और उनसे हमें घबराना नहीं चाहिए, जैस…

आपके लिए नया शब्द भंडार...

हास्य व्यंग्य
नई शब्दावली नए शब्द
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इंटरनेट और इन्फ़ॉर्मेशन तकनॉलाजी ने नित्य नए नए शब्दों और वाक्याँशों को जन्म दिया है. उदाहरण के लिए ब्लॉग, जिसे हम हिन्दी में चिट्ठा कहते हैं. परंतु इससे इतर हमारे भारत में कुछ समय से नए नए शब्दों का गठन सप्रयास-अनायास हुआ है, और आपकी सामाजिक शब्दावली के भंडार में ऐसे नए-नए शब्दों का समावेश हुआ होगा. आइए, आपकी पुनश्चर्या के लिए एक बार फिर से इन नए शब्दों और उनके अर्थों पर चर्चा करते हैं. कुछ खास नए शब्द ये हैं, जिन्हें जानना समझना हर भारतीय के लिए आवश्यक है. क़यास लगाए जा रहे हैं कि इन शब्दों को प्रत्येक भारतीय जनता को समझने-समाझने के लिए सरकार कोई अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही है!
• गरीब रैला: इस नए शब्द का जन्म स्थान पटना है. इसका अर्थ गरीबों के लिए पटना तक की मुफ़्त यात्रा, बस-ट्रक मालिकों तथा रेलवे के लिए जबरिया मुफ़्त-बिना टिकट यात्रा तथा राजनीतिज्ञों के लिए एक-दूसरे को अपना बाहुबल दिखाना है. महा रैला इसका अपभ्रंश है.
• हल्ला बोल : परिवर्तन इसी का नाम है. लखनऊ कहाँ एक समय तहजीब को लखनवी अंदाज से पहचाना जाता था और अब नेताओं की कृपा से हल्ला…

सरकार से डरो भाई...

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डरावनी सरकार!

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दैनिक भास्कर के 28 फरवरी के अंक में प्रीतीश नंदी ग्राफ़िक डिटेल में लिखते हैं कि सरकार और उसके नुमाइंदे आम जनता को डराने और तंग करने के अलावा और कुछ खास नहीं करते. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आमतौर पर यह बात सही है. मुझे एक हृदयविदारक घटना याद आती है. पिछली छुट्टियों में रेल सफर के दौरान गांव के एक गरीब परिवार की दास्तान सुनने को मिली. वह अपना गांव छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में शहर को जा रहा था. उस गरीब से रास्ते में कुछ पुलिस वालों ने पैसे उगाह लिए. इस लिए नहीं कि उसके पास टिकट नहीं था. वह भला आदमी तो सही टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. उसे इस लिए तंग किया गया चूंकि सरकारी क़ायदे के अनुसार उसे अपना गांव छोड़ने के लिए गांव के सरपंच से लिखवा कर लाना था (क्योंकि शासन ने गांवों से पलायन रोकने के लिए यह क़ानून बनाया है) जो वह नहीं लाया है!

सच है, सरकार डराती और तंग करती है. भले ही वह गांव का ग़रीब हो या प्रीतीश नंदी जैसा शख्स.
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व्यंज़ल
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लोगों को डराती और तंग करती है सरकार
लूली लंगड़ी क़ौम किस तरह से दे ललकार

जनता की सरकार है या सरकार की जनता
सरकार के लिए भी कोई सरकार …

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