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February, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे परालौकिक अनुभव...

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परालौकिक अनुभव की गूँज

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बात बहुत पुरानी है. तब नई नई नौकरी लगी थी. अम्बिकापुर जैसे पहाड़ी जिले के सामरी तहसील के मुख्यालय कुसमी में मेरे जैसे कोई दो दर्जन से अधिक बैचलर्स भिन्न भिन्न विभागों में कार्यरत थे. हममें से अधिकतर के कई छोटे छोटे ग्रुप थे, और हम काम के बाकी बचे समय में प्राय: मौज मस्ती करते रहते थे जिनमें शुमार होता था जंगल की सैर, तालाबों की तैर और अकसर ताश की रमी का खेल. क्योंकि तब न तो केबल था न टीवी और न ही कम्प्यूटर्स. हमारे ग्रुप में एक डाक्टर खेस, जो वहाँ के प्रायमरी हेल्थ सेंटर में पदस्थ थे, बड़े मस्तमौला थे और वे हर प्रकार का नशा करते थे. गाँजा, चरस, सिगरेट, तम्बाखू, शराब, हँड़िया (वहाँ की देशी शराब जो चावल को सड़ाकर और जंगली जड़ी बूटी मिलाकर तैयार की जाती है, जो पीने में थोड़ी सी खट्टी लगती है, परंतु सीधे सिर पर चढ़ती है) इत्यादि सब कुछ, और प्राय: एक साथ दो-तीन चीज़ों का नशा. सही मायनों में वे एडिक्ट थे. और अगर पहाड़ी क्षेत्र के नाते उन्हें कभी कोई नशे की चीज़ नहीं मिलती थी, तो वे अस्पताल में उपलब्ध जिंजर (कंसन्ट्रेटेड इथाइल अल्कोहल जो दवाई के काम आता है) को टॉलू…

वागर्थ में हिन्दी ब्लॉग...

राजेश रंजन, जो अभी रेडहैट पर हिन्दी का कार्यभार देख रहे हैं, ने एक लिंक भेजा है. वागर्थ में हमारे हिन्दी चिट्ठों की जमकर चर्चा हुई है. आप भी देखें:
http://vagarth.com/feb05/internet/index.htm

धन्यवाद राजेश.
रवि

तिरंगा- तेरा मान या अपमान?

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तिरंगे का अपमान?
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भारतीय खिलाड़ियों, या कहें कि भारत की जनता का ये दुर्भाग्य है कि तिरंगे के मान-अपमान के बारे में किसी लकीर-के-फकीर सरकारी बाबू या सोच-विहीन राजनेता (जिनके ऊपर इसे तय करने का भार है) तय करते हैं कि सही क्या है. वह तो भला हो न्यायालय का, अन्यथा तीन-चार साल पहले तो आप तिरंगे को अपने घर पर भी नहीं टाँग सकते थे. आम जनता को तिरंगे का दर्शन साल में सिर्फ दो दिन यानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही हो पाता था, वह भी किसी जर्जर, टूटते-फूटते, वर्षों से रँगाई-पुताई को मोहताज शासकीय कार्यालयों के ऊपर! और फिर कहा जाता है कि तिरंगे का अपमान न हो. तिरंगे का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है भला?
खेल मंत्री सुनील दत्त के प्रयासों के बावजूद खिलाड़ियों के द्वारा तिरंगे के उपयोग को उसके अपमान का कारण मान कर किसी सरकारी बाबू/सोच-विहीन राजनेता द्वारा फिर से मना कर दिया गया है. अगर हमारे खिलाड़ी अपने अमरीकी खिलाड़ी बंधु की तरह जो हर कहीं, गर्व से स्टार और स्ट्राइप लगाए फिरते हैं, अगर तिरंगा लगा लेते हैं तो यह भारत देश का और तिरंगे झंडे का अपमान होगा! इससे घटिया विचारधारा तो कुछ और हो ही नही…

बच्चों को इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार..

इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार गरीब, मेधावी विद्यार्थियों को पहुँचा…
धन्यवाद अमित और अतुल, आपके इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार की राशि से रतलाम के पास ग्राम सेजावता के शासकीय हाई स्कूल में कक्षा दसवीं के गरीब, परंतु मेधावी विद्यार्थियों को दिनांक 22 फरवरी को पुरस्कार प्रदान किया गया. दसवीं की प्री-बोर्ड परीक्षा में विषयवार अधिकतम अंक लाने वाले प्रत्येक विद्यार्थियों को रू.175/- मूल्य के नोट बुक्स तथा एक हीरो फाउन्टेन पेन रु. 25/- मूल्य के प्रदान किए गए. कुल सात पुरस्कार प्राचार्य श्री सुरेशचन्द्र करमरकर के हाथों से प्रदान किए गए जिसके विवरण निम्न हैं-
कुमारी मंगल कुंवर- हिन्दी भाषा, कु. ममता- अंग्रेजी, धनंजय- संस्कृत, कु. सुमित्रा- गणित, संतोष कुमार- विज्ञान, राजपाल- सामाजिक विज्ञान, कु. सुमित्रा- कुल सर्वाधिक अंक.
इनबच्चों के चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.ये बच्चे फटे-पुराने टाट पट्टियों में जमीन में बैठकर, टूटे फूटे भवनों में पढ़ाई करते हैं. और ऐसी घोर ग़रीबी में भी अपनी पढ़ाइयाँ जारी रख अच्छे अंक लाते हैं. आइए, इनके प्रयासों के लिए इन्हें दिल से बधाई दें.

मुझे शर्म आती नहीं...

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आइए, शर्म से जरा सिर झुकाएँ...
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हमारे भारत में एक ईनामी डाकू ददुआ सरेआम एक गांव में एक मंदिर बनवाता है, आसपास ऐलान करता है कि अमुक दिन मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. वह गांव वालों समेत सबको निमंत्रण भेजता है और इस आयोजन में पहले से ऐलान कर खुद भी भेष बदलकर पूजा अर्चना में शामिल होता है. और यह सब जानते हुए भी, वोटों की गणित के पीछे विधायक-सांसद (जिनमें उ.प्र. के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह का सांसद भतीजा भी शामिल है) भी उस आयोजन में शामिल होते हैं जिसमें दो लाख (जी हाँ, दो लाख) लोगों की उपस्थिति होती है.

और, हमारे असहाय भगवान अपनी प्राण प्रतिष्ठा का यह नाटक बुत बन कर देखते रहे. अगर भगवान में जान होती, तो वे भी शर्म से डूब मरते.

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व्यंज़ल
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राजा नए हुए हैं गूजर हो या ददुआ
मानव या तो मरा पड़ा या है बंधुवा

जाति-धर्म के समीकरणों में उलझा
मेरे देश का नेता हो गया है भड़ुआ

उस एक पागल की सच्ची बातों को
पीना तो होगा लगे भले ही कड़ुआ

अवाम का तो होना था ये हाल, पर
ये क़ौम किस लिए हो गई है रंडुवा

एक अकेला रवि भी क्या कर लेगा
इसीलिए वो भी खाता बैठा है लड़ुवा

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झगड़ने के फ़ायदे...

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आइए, झगड़ा करें

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लीजिए, यह भी ग़ज़ब है. झगड़ों के भी अपने फ़ायदे हैं. अध्ययनों के अनुसार, जो दम्पति आपस में झगड़ा करते रहते हैं, वे औरों की तुलना में ज्यादा फ़िट रहते हैं, उन्हें तनाव के फलस्वरूप होने वाले हृदय रोगों की संभावना कम होती है, इत्यादि इत्यादि.
लगता है अब हमें झगड़ने के लिए और झगड़ते रहने के लिए कारणों की तलाश करते रहना पड़ेगा. अब पति को अपने अख़बार के अध्ययन के बीच पत्नी के द्वारा किए गए किसी प्रकार के व्यवधान को सहने के बजाए उस पर झगड़ा किया जाना ही उचित होगा और पत्नी द्वारा यह देखे जाने के बाद कि पढ़ा गया अख़बार ठीक ढंग से मोड़ कर उचित प्रकार नहीं रखा गया है, कुढ़ कर चुप रहने या ताने मारने के बजाए, इस बात पर जमकर झगड़ा करना- पति-पत्नी दोनों की सेहत के लिए उचित रहेगा.

तो, दोस्तों, झगड़े को अब नई निगाह से देखो और झगड़ते रहो.
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व्यंजल (हास्य ग़ज़ल=हज़ल के तर्ज पर)
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प्रिये, है ये प्रेम, नहीं है झगड़ा
आओ यूँ सुलझाएँ अपना रगड़ा

जिंदगानी के चंद चार क्षणों में
ऊपर नीचे होते रहना है पलड़ा

करम धरम तो दिखेंगे सबको
चाहे जित्ता डालो उस पे कपड़ा

जब खत्म होगी तो सुखद होगी
यूँ पीड़ा को …

चित्रों के लिए मुफ़्त सेवा

अपने ब्लॉग चित्रों के लिए एक और मुफ़्त सेवा

फ्लिक्र (और ऐसे ही अन्य कई सेवाओं) के द्वारा अपने ब्लॉग के चित्रों पर काँट-छाँट-तोड़-मरोड़ किए जाने से परेशान यह बंदा कई दिनों से इंटरनेट की किसी मुफ़्त अच्छी सेवा की तलाश में था. अभी-अभी पता चला कि स्ट्रीमलोड न सिर्फ चित्र, बल्कि अन्य मीडिया जैसे कि वीडियो/ऑडियो स्ट्रीमिंग की भी मुफ़्त सुविधा (100 मे.बा. तक) प्रदान कर रही है, और वह भी बिना तोड़े-मरोड़े. अब देखना यह है कि यह भरोसेमंद और तेज सेवा है या नहीं. मेरे पिछले ब्लॉग में चिड़िया के घोंसले का चित्र स्ट्रीमलोड से ही है. अगर आपको सही दिख रहा है तो मुझे बताएँ और आप भी उपयोग करें.

असली चिड़िया नक़ली घोंसला

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कंकरीट के जंगल और पॉलिथीन के घोंसले

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पिछले दिनों हमारे घर के सामने हमारे छोटे से बग़ीचे में, सीढ़ियों के नीचे से जाती हुई बेल की शाखाओं पर सुंदर, नन्हे चिड़िया के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया. चिड़ी और चिड़ा दिन रात मेहनत करते, तिनका-तिनका जोड़ते और देखते ही देखते उनका घोंसला बन कर तैयार हो गया. पर यह क्या? जब घोंसला बनकर तैयार हुआ तो पता चला कि उसमें घासफूस, पत्ते और प्राकृतिक तिनके तो कम, पॉलिथीन के रेशे, काग़ज और पॉलिथीन थैलों के टुकड़े और न जाने क्या-क्या सिंथेटिक वस्तुएँ थीं. जिस घोंसले को अपने प्राकृतिक रूप में सुंदर, प्यारा और निर्मल दिखाई देना चाहिए था, वह इन पॉलीथीन और काग़ज़ के टुकड़ों के कारण बदसूरत और घिनौना हो गया था.

मनुष्य के ग़लत कार्यों का खामियाजा बेचारे नन्हे पशु पक्षी भुगत रहे हैं. उन्हें पेड़ पौधों के जंगल नसीब नहीं हो रहे हैं लिहाज़ा वे कंकरीट के जंगल में शौकिया तौर पर उगाए गए किसी पौधे की किसी शाखा के एक टुकड़े में पॉलीथीन का घोंसला बनाने को अभिशप्त हैं.

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ग़ज़लों का ओवरडोज़

दोस्तों, एक सप्ताह के लिए बंदा ऑफलाइन होने जा रहा है. अब जबकि सुबह की कॉफ़ी को तो भले ही छोड़ा जा सकता है, इंटरनेट को नहीं, तब सप्ताह भर के लिए ऑफलाइन होना मज़ाक सा लगता है. परंतु छत्तीसगढ़ / बस्तर के बीहड़ों में जाना है, जहाँ इंटरनेट के पग अभी पहुँच नहीं पाए हैं. लिहाजा मेरी कुछ पुरानी ग़ज़लें जिनमें से कुछ यदा कदा प्रकाशित भी हो चुकी हैं और लंबे समय से जियोसिटीज़ में भी थीं, यहाँ ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. सप्ताह भर आराम से पढ़िए और मुझे गरियाइए कि क्या फूहड़ ग़ज़लें लिखी हैं… हे..हे...हे...
ग़ज़ल 01
पानी की कीमत किसी पसीने से पूछना
बयार क्यों बहती नहीं उल्टी मत पूछना

जोड़ घटाना गुणा भाग के गणितीय सूत्र
राजनीति में ऐसे चले आए क्या पूछना

सत्ता- कुर्सी के खेल में नियम- कायदे
वो भला आदमी चले- चला था पूछना

नया क्या आत्मघाती का बेरोजगार होना
जेहन में आता है फिर क्यों ये पूछना

रवि, खुदा ने तो तुझे बनाया था बेजात
फिर क्यों सभी जात तेरी चाहते हैं पूछना

ग़ज़ल -02
जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषा…

कैसे, किसलिए विचार?

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सुदर्शनी विचार?
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सरकार द्वारा पिछली दफा जारी भारत के जनसंख्या आंकड़ों पर हर कोई अपनी अपने अपने चश्मे से दृष्टि डाल रहा है, और जनसंख्या विस्फोट की असली समस्या पर कोई दृष्टि डालने को तैयार ही नहीं है. आग में घी डाल रहे हैं रा स्व संघ प्रमुख सुदर्शन जो यह कहते हैं कि प्रत्येक हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए. उनकी धर्म सम्बन्धी गणनाओं के अनुसार हिन्दुओं के भारत में अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है, चूंकि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. (जबकि वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, वर्तमान दर पर ऐसा होने में हजारों साल लगेंगे)

अगर हिन्दू के अल्पसंख्यक होने का खतरा है तो फिर चार क्या हमें तो चौबीस बच्चे पैदा करने चाहिए. हमें जीवन भर बच्चे ही पैदा करते रहने चाहिए. हर साल एक. फिर देखो हम तो दुनिया में दो चार साल में ही बहु संख्यक हो जाएंगे. भारत में तो हैं ही, पूरी दुनिया में बहुसंख्यक हो जाएँगे. मुसलमान ही क्या, वर्तमान वैश्विक ईसाई समुदाय को भी हम अल्प संख्यक बना देंगे. पूरा विश्व हिन्दू मय हो जाएगा. कितना मजा आएगा तब. भले ही हम कीड़े मकोड़े की तरह जीवन जी रहे हों, बच्चे पैद…

अपनी इंजीनियरी बताइए...

इंजीनियर्स कैसे करते हैं...

हाल ही में मैंने क्लिफ़र्ड साहनी की लिखी किताब “वर्ल्ड’स बेस्ट प्रोफ़ेशनल जोक्स” पढ़ी. अमूनन चुटकुलों की किताबों में या कहीं और जगह (रीडर्स डाइजेस्ट को छोड़कर) मौलिक चुटकुले कम ही मिल पाते हैं. घूम फिर कर वही पुराने, घिसे-पिटे चुटकुले दोहराए जाते हैं. परंतु पुस्तक महल, दिल्ली से प्रकाशित महज़ साठ रूपयों की इस किताब में बहुत से लतीफ़े मुझे नए-नए से लगे. इन्हीं में एक पुराना लतीफ़ा (पृष्ठ 75, संस्करण 2004) फिर पढ़ने में आया. पर है यह बहुत मज़ेदार. आप भी पढ़िए:
• इंजीनियर्स प्रिज़ीशियन से करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स इंपल्स में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स जब करते हैं, शॉक्ड हो जाते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स लार्ज कैपेसिटी में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स अधिक फ्रिक्वेंसी और कम रेज़िस्टेंस में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स हाई फ्रिक्वेंसी और ज्यादा पॉवर में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स स्ट्रेस और स्ट्रेन में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स लेस इनर्जी तथा ग्रेटर एफिशिएंसी में करते हैं
• केमिकल इंजीनियर्स फ्लूइड स्टेट में करते हैं
• पेट्रो…

नज़राना

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110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत
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भारत में 110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत पुलिस, यातायात पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों को दी जाती है. यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों को करों और अन्य शुल्कों के रूप में सालाना प्राप्त होने वाली राशि से 30 अरब रुपए ज्यादा है. प्राय: हर मार्ग पर ट्रकों / वाहनों से वसूली करती दिखाई देती पुलिस इन आंकड़ों की पुष्टि करती है. हाल ही में पुलिस का मुख्य काम यह हो गया था कि वह मुम्बई जैसे महानगर से लेकर मेवासा गांव तक वह यह सुनिश्चित करे कि दो पहिया वाहन चालक हेलमेट पहन कर ही वाहन चलाएँ. हेलमेट निर्माताओं ने भी रिश्वत का सहारा अपने उत्पादों को बेचने के लिए ले लिया लगता है. पुलिस के अनुसार हेलमेट पहन कर आप संपूर्ण सुरक्षित हो जाएँगे- भीड़ भरी, अनियंत्रित ट्रैफिक सहित, गड्ढों से परिपूर्ण सड़कों में. धन्य है!

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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
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जीवन के शर्त में शामिल है रिश्वत
मयस्सर है कफन जो होगी रिश्वत

क़िस्सों में भी नहीं प्यार की बातें
भाई-भाई के रिश्तों में घुसी रिश्वत

ऐसे दौर की कामना नहीं थी हमें
अपने आप को देना पड़े है रिश्व…

व्हेयर हिन्दी इज़ गोइंग?

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बिकाज़ इंडिया हिन्दी इज़ गोइंग प्लेसेस...


(टाइम्स इन्टरनेशनल के लिए जारी विज्ञापन की क़तरन)

आपका ईमेल पता?

व्यंग्य
पते की बात
आपका पता आपके लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा औरों के लिए है, ख़ासकर तब जब आपके पते में 10 जनपथ, 7 रेसकोर्स रोड या ए.बी. रोड जैसे मार्ग या फिर नरीमन पाइंट, एक्सप्रेस टावर, प्रेस कॉम्प्लेक्स या चेतक सेंटर जैसे पहचान चिह्न हों. आपका पता महज एक पता हो सकता है या फिर आपका संपूर्ण अता-पता बताने वाला साधन भी हो सकता है. आपका पता आपके रहन-सहन, स्टेटस-सिंबल और दुनिया भर के, ढेर सारे अन्य कई ढंके छिपे चीजों के बारे में विस्तार से प्रकाश डालने वाला साधन भी हो सकता है. मसलन, कनाट प्लेस का चपरासी और नरीमन पाइंट का गार्ड भी हो सकता है कि अपनी ड्यूटी करने को मर्सिडीज़ बैंज में आएँ और उधर साइबेरिया का लैंडलॉर्ड भी जरा-जरा सी सुविधाओं को तरसे.

किसी का पता बहुत छोटा होता है तो किसी का बहुत लंबा. छोटे पते तो तत्काल याद हो जाते हैं परंतु बड़े-बड़े पते याद रखना मुश्किल होता है. परंतु आदमी अगर बड़ा है तो उसका मीलों लंबा पता भी लोग जाने कैसे याद रख लेते हैं. एक गाँव का गरीब रमई अपने पते में अपने नाम के आगे गांव, ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत इत्यादि सभी कुछ लिख डालने के बाद भी अपनी च…

सखि, बिजली आई...

बेमौसम बहार
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आज सुबह-सुबह जब नियमित-अनियमित बिजली कटौती नहीं हुई तो सुखद आश्चर्य हुआ. परंतु फिर ध्यान आया कि भई, यह व्यवस्था तो सिर्फ आज के लिए है चूंकि शहर में आज मुख्यमंत्री, पूर्वप्रधानमंत्री-लोकसभा-नेताप्रतिपक्ष पधार रहे हैं. इनके स्वागत के लिए शहर में पिछले सप्ताह भर से तैयारियाँ चल रही थीं. अविरल बिजली प्रवाह के अलावा इन नेताओं के क्षणिक प्रवास से शहर को और भी बहुत सी सौगातें मिलीं. मुलाहिजा फ़रमाएँ:

• जिन क्षेत्रों-सड़कों से इन नेताओं को गुजरना है, उन की साफ़ सफाई की गई, सड़कों के गड्ढे भरे गए, स्पीड ब्रेकर्स हटाए गए तथा नए सिरे से डामरीकरण किया गया. कुछ सड़कों को चौड़ा भी किया गया. उन सड़कों के आसपास के अतिक्रमण हटाए गए तथा सड़कों पर रेहड़ी लगाने वाले, वाहन पार्क करने वालों को भगा दिया गया. पहली मर्तबा लगा कि शहर में सड़क नाम की कुछ चीज़ें हैं.
• शहर के पेयजल प्रदाय के लिए नगर निगम ने करोड़ों की लागत से एक ओवरहेड टंकी बनाई थी. परंतु उद्घाटन के अभाव में वह पिछले पाँच वर्षों से अनुपयोगी पडा हुआ था, तथा उसमें दरारें पड़ गई थीं, उसमें टूटफूट हो गई थी. मुख्यमंत्री के हाथो…

अश्लील प्रश्न...

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रे मूर्ख, अश्लील कौन?

एक तरफ तो एक सरकारी एजेंसी बीएसएनएल पूरे भारत में इंटरनेट के लिए बहुत ही सस्ती दरों पर ब्राडबैंड ला रही है, वहीं दूसरी तरफ एक दूसरी सरकारी एजेंसी बहुत ही बेवकूफाना तरीके से ऐसे क़ानून ला रही है, जिससे आम आदमी इंटरनेट का उपयोग करने से भी डरेगा. और ऐसा हुआ भी है. उत्तर-प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से साइबर कैफ़े में छापा मारकर उपयोक्ता – मालिक दोनों को ही गिरफ़्तार किया गया कि वे अश्लील साइट देख-दिखा रहे थे. अवनीश बजाज का उदाहरण ताज़ातरीन है ही.

परंतु जिन्होंने ये क़ानून बनाया है उन्हें इंटरनेट तकनॉलाज़ी, स्पॉम, ब्राउज़र हाइजेकर्स, वॉर्म/वायरस, पॉप-अप विंडोज़ तथा मिलते-जुलते नाम वाले स्पूफ़्ड पॉर्न साइटों के बारे में जानकारी है भी या नहीं? मुझे नहीं लगता. मेरे ई-मेल पर प्रतिदिन दर्जनों-सैकड़ों की संख्या में स्पॉम आते हैं जिनमें अधिकतर वायग्रा या पॉर्न साइटों के होते हैं. और ऐसा तो प्राय: हर ईमेल उपयोक्ता के साथ होता है. बेचारे गरीब बिल गेट्स को प्रतिदिन दस लाख ईमेल प्राप्त होते हैं. आप क्या सोचते हैं उनमें क्या होता होगा? उनमें अधिकतर ऐसे ही ईमेल होते हैं. अगर बे-ध्य…

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

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