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January, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरी तीसरी आँख...

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त्रिनेत्र
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अगर यह खबर सच है, कुछेक साल पहले के हर्बल पेट्रोल की तरह गलत खबर नहीं है, तो फिर निश्चित रूप से यह हमारे बहुत काम का है. जिनकी आँखें नहीं हैं, उनके लिए तो ख़ैर यह खोज वरदान है ही, मेरे जैसे लोग जिनकी दो-दो अच्छी-भली आँखें हैं, उनके लिए भी यह वरदान से कम नहीं है.

मैं भी चाहूँगा कि त्रिनेत्र धारी भगवान शिव की तरह मेरे भी तीन नेत्र हों. परंतु वे माथे पर, बीचों-बीच नहीं हों. मैं चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र मेरे सिर के पीछे की तरफ हो, जिससे कि मैं अपने पीठ पीछे बातें करने वालों को देख सकूँ. पीठ-पीछे वार करने वालों से बच सकूँ. और यह देख सकूँ कि मेरे पीठ पीछे क्या-क्या होते रहता है.

कभी मैं यह भी चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र पैरों में ठेठ अँगूठे के पास हो. ताकि मैं देख सकूँ कि देश दुनिया में टेबल के नीचे लेन-देन का व्यापार किस तरह चलते रहता है.

मैं यह भी चाहूँगा कि भोले भंडारी की तरह मेरे तीसरे नेत्र में वह शक्ति प्राप्त हो जिससे समाज की बुराइयों का अंत देखते ही हो जाए, और मेरा वह तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहे...
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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल यानी हज़ल के तर्ज पर)
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समाज…

इंडीब्लॉगीज़ के पुरस्कार विजेताओं ने शुरु की चैरिटी

इस दफ़ा के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के विजेता अमित और अतुल ने अपने-अपने पुरस्कार की राशि को चैरिटी के नाम समर्पित करने की घोषणा की है. उन्होंने पुरस्कार राशि से समाज के गरीब बच्चों के लिए नोटबुक्स खरीद कर वितरित करने का आग्रह मुझसे किया है.
मैंने पास ही के एक गांव में वहाँ के हाई स्कूल के प्रिंसिपल श्री करमरकर से इस सम्बन्ध में बात की. उनका कहना है कि गांव के प्राय: सभी बच्चे गरीब हैं. अभी दसवीं कक्षा के बच्चों की प्री-बोर्ड परीक्षा चल रही है. स्कूल में घोषणा कर दी गई है कि जो बच्चे प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रथम दस स्थान प्राप्त करेंगे उनमें से प्रत्येक को 100-100 रुपए मूल्य के नोटबुक्स पुरस्कार स्वरूप दिए जाएँगे. जाहिर है ये पुरस्कार अमित और अतुल के सहयोग से दिए जाएँगे. परीक्षा परिणाम फरवरी मध्य में आने की संभावना है. तदुपरांत गरीब परंतु सुपात्र बच्चों को ये नोटबुक्स प्रदान किए जाएँगे. उन बच्चों के विवरण आपको तब पढ़ने को मिलेंगे.

धन्यवाद अमित और अतुल. और धन्यवाद इंडीब्लॉ... ओह.. देबाशीष. (आख़िर भाई लोगों ने आपकी आइडेंटिटी ओपन करवा ही ली :))

लघुकथा

याचक

भरी दुपहरी में, ज्येष्ठ के महीने में, जब रोहिणी नक्षत्र में सूर्य अपनी पूरी तपन वातावरण में प्रेषित कर रहा था, एक याचक नंगे पाँव द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांग रहा था.

कुछ ने उस याचक की याचनामयी आवाज़ों को गर्मी के भय से अनसुना कर दिया और अपने द्वारों के पट नहीं खोले. कुछ ने उसे लाखों लानतें भी भेजीं, क्योंकि उसने अपनी द्रवित आवाज़ों से लोगों के आराम में खलल पैदा कर दिया था.

कुछ को उसकी याचनामयी आवाज और उसकी बीमार, कृशकाय काया असर कर गई और उसे कुछ-कुछ कहीं से मिल भी गया. एक को उसका दोपहर की तपती धूप में नंगे पाँव याचनारत रहना जरा ज्यादा ही द्रवित कर गया और उसने अपना फटा पुराना जूता जो कचरे के डब्बे में डालने के लिए अलग रख दिया था, निकाला और याचक को दे दिया, ताकि उसके पाँव को तपती धरती से थोड़ी राहत तो मिले.

याचक ने हजारों धन्यवाद देते हुए उस जूते को कृतज्ञता से तत्काल पहन लिया, परन्तु दो द्वारों के आगे जाने के उपरांत उसने उन जूतों को अपने पैर से उतारा और अपने थैले में रख लिया.

वह दानवीर जिसने अपना जूता दिया था, अपने सत्कर्म से गदगद उस याचक को थोड़ा सा आगे जाकर भी देख रहा था कि उसका …

आर. के. लक्ष्मण का आम आदमी...

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आम आदमी को पद्म विभूषण

इस दफ़ा 26 जनवरी 2005 को पद्म पुरस्कारों में आम आदमी भी पुरस्कृत हुआ है. आर. के. लक्ष्मण को पद्म विभूषण का पुरस्कार प्रदान किया गया है. इसके लिए उन्हें ढेरों बधाईयाँ. आम आदमी की पीड़ा को अपनी कूँची से गढ़कर, अपने पैने व्यंग्य चित्रों से तो वे पिछले अर्द्ध शती से लोगों को बताते आ ही रहे हैं, समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा की विषमताओं पर भी वे तीख़े ब्रश चलाते हैं. वे धरती के सर्वकालिक महान कार्टूनकार हैं, जो समाज को आईना दिखाते आ रहे हैं. इस अवसर पर यह ग़ज़ल उन्हें समर्पित है:

*-**-*
ग़ज़ल
//**//
मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
हम खुद से खुद को छुपाते रहे

दूसरों की रोशनियाँ देख देख के
आशियाना अपना ही जलाते रहे

कहाँ तो चल दिया सारा जमाना
हम खिचड़ी अपनी बैठे पकाते रहे

यूँ दर्द तो है दिल में बहुत मगर
दुनिया को गुदगुदाते हँसाते रहे

कभी तो उठेगी हूक दिल में रवि
यही सोच कर ग़ज़लें सुनाते रहे

--**--

सानिया वायरस...

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सानिया वायरस का हमला...


अन्ना कुर्निकोवा वायरस के बाद टेनिस जगत में अब सानिया मिर्ज़ा वायरस का हमला हो चुका है. आस्ट्रेलियन ओपन में तीसरे दौर तक पहुँचने और सेरेना विलियम्स को तगड़ी टक्कर देने के बाद इस ख़ूबसूरत बाला का इन्फ़ेक्शन महामारी की तरह प्रिंट और दृश्य-श्रव्य माध्यम में फैल गया है. जहाँ सहारा समय ने पूरे पेज का सानिया पिनअप गर्ल फोटो प्रकाशित किया है तो वहीं सानिया दिन में 8-10 घंटे का इंटरव्यू दे रही है और पत्रकारों की कतारें हैं कि कम ही नहीं हो रहीं. टाइम्स ऑफ इंडिया के एडीटोरियल बहस में भी सानिया अवतरित हो गई. कई सालों बाद क्रिकेट को किसी एक व्यक्ति ने आखिरकार फ़ीका कर ही दिया.



इस ब्लॉग में भी इनफ़ैक्शन हो गया और ग़ज़लों में शब्द गुम हो गए. आशा करें कि यह इनफ़ैक्शन फैले. इसीलिए आइए, हम दुआ करें कि सानिया आगे और कामयाब हो, ताकि उससे प्रेरणा ले कुछ सानियाएँ और अवतरित हों और हम भारतीय, क्रिकेट से आगे की भी कुछ सोचें...

गंदे लोग

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महोदय, हम सचमुच गंदे लोग हैं.

गुरचरण दास ने अजमेर यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए पिछले सप्ताह टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि वहाँ के संगमरमर से बने सुंदर, ऐतिहासिक बड़ा दारा के चहुँओर कचरों का अंबार लगा हुआ था क्योंकि आसपास कचरा पेटी का अकाल था. लोग दीवारों की आड़ में सरेआम थूक मूत रहे थे क्योंकि आसपास कहीं कोई टॉयलेट नहीं था. बड़ा दारा एक पर्यटन स्थल भी है जहाँ हजारों की संख्या में सैलानी नित्य आते हैं.

भाई गुरचरण दास, यह स्थिति तो मेरे रतलाम में भी है. और रतलाम क्या भारत के प्राय: सभी नगरों, शहरों और गांवों में है. 2 लाख की जनसंख्या वाले पूरे रतलाम शहर में एक भी, फिर-से, एक भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है. अगर आप शहर में किसी काम से निकले हों और आपको जोर की पेशाब आने लगे तो आपके सामने, अपने सामने की किसी झाड़ या दीवार का आड़ लेकर मूतने के सिवा और क्या रास्ता हो सकता है? पान खाकर पीक थूकने के लिए तो खैर भारत में कहीं कोई समस्या ही नहीं है- कहीं भी थूक सकते हैं- सड़कों पर चलते चलते भी और बिल्डिंगों की सीढ़ियों पर भी... कहीं अगर कचरा पेटी या थूकदान होता भी है तो आदत से लाचार लोग उसक…

व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई...

कितना अंतर है, प्रिय, तुझमें और मुझमें...
प्रिये, मैं और तुम आज कंघे से कंघा मिलाकर बिना किसी जेंडर बायस के हर क्षेत्र में हम साथ साथ हैं और हमारे बीच की भिन्नता प्रायः खत्म हो रही है. परंतु सदियों से चले आ रहे इवाल्यूशन सिद्धांतों पर थोड़ा गौर करें, तो पाते हैं कि अंतर तो है बहुत... और यदि इसे जानें - समझें - स्वीकारें तो हमारा और हमारे समाज का थोड़ा होगा भला...
विभिन्न शोघों से यह सिद्ध हो चुका है कि आदतन*...
• पुरूष टीवी के अलग अलग चैनल बदल कर खुश होते हैं. महिलाएँ एक ही चैनल शांतिपूर्वक देखना पसंद करती हैं
• पुरूष शराब जैसी तीख़ी चीजें पसंद करते हैं, युद्ध करने में उन्हें आनंद आता है (इसी लिए डबल्यूडबल्यूएफ़ बहुत चलता है). इसके विपरीत महिलाएँ मीठे पदार्थ पसंद करती हैं एवं खरीदारी में उन्हें आनंद आता है.
• महिलाएँ जानती हैं कि वे कितने समझदार हैं, जबकि पुरूष सिर्फ सोचते हैं कि वे बहुत समझदार हैं.
• पुरूषों के मस्तिष्क की सुप्तावस्था में 70 प्रतिशत विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं. जबकि महिलाओं के मामले में सिर्फ 10 प्रतिशित विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं.
• महिलाओं में दाएँ ब…

आधुनिक युग की गीता...

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आधुनिक युग का वास्तविक धर्मग्रंथः व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई

अगर किसी पुस्तक को खरीद कर, नहीं तो मांग कर, नहीं तो चुरा कर (बाई-बोरो-आर-स्टील) पढ़ना आवश्यक है, तो वह एलन और बारबरा पीस की पुस्तक “व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई” (पुरूष क्यों झूठ बोलते हैं, और स्त्रियॉ क्यों रोती हैं) है.
इस युग की बाइबल, गीता और कुरान अगर किसी पुस्तक को कहा जाएगा तो वह इसी पुस्तक को कहा जाएगा. इस पुस्तक को आवश्यक रूप से पढ़ा जाने हेतु पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए. यह पुस्तक, चाहे आप स्त्री हों या पुरूष, आपकी आंखें हमेशा के लिए खोल देने के लिए, आपकी सोच को हमेशा के लिए बदल देने में पूर्णरूपेण सक्षम है. आइए देखें कि इस पुस्तक में आखिर है क्या?
दरअसल यह पुस्तक लेखक द्वय की अत्यंत प्रसिद्ध पूर्व पुस्तक “व्हाई मेन डोंट लिसन एण्ड वूमन कान्ट रीड मेप्स” (पुरूष सुन क्यों नहीं सकते और स्त्रियॉ नक्शे क्यों नहीं पढ़ सकतीं), जिसकी अब तक विश्व की 33 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है और जिसकी 60 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, का ही विस्तार है. अपनी पूर्व पुस्तक में लेखक द्वय ने विभिन्न खोजों, अध्ययनों एवं…

आओ आराम फरमाएँ...

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अलालों के लिए अच्छी (?) ख़बर
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हमारे जैसे अलालों के लिए ये अच्छी (?) ख़बर है. हम अलाल दुनिया की छाती में मूंग दलने के लिए औरों की अपेक्षा जरा ज्यादा समय तक जीवित रहेंगे. पर इसके साथ खतरा यह भी है कि दुनिया की धूल-गर्द, हिंसा-आतंकवाद, ग़रीबी-भुखमरी, प्राकृतिक आपदा-महामारी को भी हम अलालों को ज्यादा समय तक झेलना होगा. अगर आपमें इनको झेलने का दम है, तो फिर, ईश्वर के पास जल्दी जाने के लिए काहे को ताबड़तोड़ काम किए जा रहे हैं? काम धाम छोड़कर आइए, आराम फ़रमाइए और हमारी अलाल मंडली में आप भी शामिल हो जाइए और दीर्घ जीवन पाइए....

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ग़ज़ल
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यूँ तो बड़ा अलाल तू
करे है खूब सवाल तू

जाति-धर्म के किसलिए
मचाए बहुत बवाल तू

बैठा आँखें मींचे फिर
करे है क्यूँ मलाल तू

किसी अंधेरी राह का
बन के देख मशाल तू

सफल क्यों न हो रवि
सत्ता का बड़ा दलाल तू

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जी-मेल के जरिए करें हिन्दी में ई-मेल...

हिन्दी ई-मेल के लिए एक उत्तम औज़ार: जी-मेल

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यूं तो हिन्दी में ई-मेल के लिए आजकल दर्जनों साधन उपलब्ध हैं, परंतु प्राय: उन सबमें कुछ न कुछ खामियाँ हैं. ई-मेल के लिए प्रमुख रूप से दो क़िस्मों के औज़ार हमारे काम आते हैं, एक तो ई-मेल क्लाएंट तथा दूसरा वेब आधारित ई-मेल सेवा. हिन्दी में ई-मेल के लिए इन्हें आगे और दो क़िस्मों में बांटा जा सकता है. ऑस्की फ़ॉन्ट आधारित तथा यूनिकोड हिन्दी आधारित. दो-एक साल पहले तक ऑस्की फ़ॉन्ट आधारित सेवाएँ ही हमारे लिए एक मात्र विकल्प के रूप में मौज़ूद थी, जिनमें हम शुषा से लेकर वेबदुनिया तक के भिन्न भिन्न फ़ॉन्ट का उपयोग कर खुश हो लेते थे कि हम हिन्दी में ई-मेल कर ले रहे हैं. परंतु इन ई-मेल के हेडर, विषय पंक्ति इत्यादि के लिए अंग्रेजी अनिवार्य होता है. यह भी अनिवार्य होता है कि जिसको ई-मेल प्रेषित किया जा रहा है, उसके कम्प्यूटर में वह फ़ॉन्ट संस्थापित हो. भूले भटके कभी आपको किसी दूसरे कम्प्यूटर पर कहीँ और से हिन्दी में ई-मेल करने या उसे देखने की नौबत आती है या हिन्दी ई-मेल को किसी अन्य को, आगे अग्रेषित करना होता है, तो फिर वही फ़ॉन्ट संबंधी समस्याएँ उठ खड़ी…

फरार हो गया इंडिया...

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सारा मुल्क फरार है...


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बिहार के पाँच विधायक अर्से से फरार थे, जो, जाहिर है, चुनावी बेला पर नमूदार हो गए. इससे पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबूसोरेन को कोर्ट का समन जारी हुआ था तो वे मंत्री पद छोड़ कुछ दिनों तक फरार हो गए थे. इस बीच वे मीडिया को साक्षात्कार देते रहे. जब समन बीत गया तो वे प्रकट हो फिर मंत्री बन गए. यूं तो सारा देश फरार हो गया है. सोने की चिड़िया भारत, हिन्दुस्तान बचा है क्या? उसे हमने कहीं फरार करवा दिया है और जो हमारे पास बचा है वह प्लास्टिक, पॉलिथीन का इंडिया है...

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ग़ज़ल
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समग्र मुल्क फरार है
जिस्म है जाँ फरार है

अवाम बैठी मुँह खोले
और हाकिम फरार है

क़ैदी है जेल में लेकिन
वहाँ सिपाही फरार है

देखो दुनिया दीवानी
जिए वही जो फरार है

सोचे है रवि बहुत पर
उसका कर्म फरार है

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चक्कर चाय का

व्यंग्य:
चाय चलेगी?
अगर आपको किसी तरह की कोई खास बीमारी न हो, किसी तरह की कोई कसम आपने न खा रखी हो और आपके चिकित्सक ने अलग से आपको मना नहीं किया हो तो कोई अगर आपसे यह पूछे कि चाय चलेगी? तो भले ही आपका जवाब ना में हो, उस वक्त आपके चेहरे की चमक से सामने वाले को यह अंदाजा हो ही जाता है कि चाय की ज़रूरत आपको कितनी है. चाय तो चाय है. अगर आप दारू-शारू नहीं पीते हैं और चलो साथ में चाय भी नहीं पीते हैं, तब भी आप कहलाते हैं- टी-टोटलर. यानी चाय आपके साथ है, भले ही आप चाय के साथ नहीं हैं.

सुबह उठते ही चाय, फिर अख़बार के आ जाने के बाद ख़बरों के साथ चाय, फिर सुबह के नाश्ते के साथ चाय, फिर दफ्तर या दुकान पहुंचने पर काम की शुरूआत के लिए चाय, दोपहर की अतिआवश्यक चाय, दोपहर के भोजन के बाद जरूरी चाय, शाम की चाय और इस बीच टपक पड़े मेहमानों के स्वागत सत्कार के लिए चाय. यानी अपने जीवन के एक बड़े हिस्से की एक बड़ी जरूरत है चाय और सिर्फ चाय.

चाय आज के वक्त का जीवन जल है. जरा याद कीजिए जब पिछली मर्तबा आप किसी काम से किसी कार्यालय में पधारे थे तो दफ्तर के भीतर और दफ्तर के बाहर चाय की दुकान का नजारा कैसा था?

जहाँ…

भारतीय छवि...

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यही है भारत की सही तस्वीर...

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आर. के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया के ताज़ा अंक में कहते हैं:


“सुनामी पीड़ितों, भूकंप पीड़ितों को तो तमाम तरह से सहायता मिल जाती है, परंतु हमारे जैसे लोगों की जो राजनीतिक गलतियों और सड़ते शासन तंत्र के पीड़ित हैं, कोई सहायता नहीं करता. आखिर क्यों ?”

शहरों के प्रत्येक हाई राइस बिल्डिंग या शापिंग माल के पीछे ऐसे सैकड़ों झोंपड़ पट्टे तो मिलेंगे ही, गांवों में तो अधिसंख्य झोपड़ियाँ ही मिंलेंगी जहाँ आवश्यक सुविधाओं का घोर अभाव है. ऐसे में लोगों को अपने नित्यकर्म से निपटने का एक मात्र सहारा रेल पटरियों का किनारा ही तो बच पाती हैं...

सच है, इनके लिए जिम्मेदार हमारी राजनीतिक गलतियाँ और सड़ते हुए शासन तंत्र के अलावा और कौन हो सकता है?

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ग़ज़ल
..**..

माफ़ी के काबिल नहीं हैं ये गलतियाँ
तब भी हो रहीं गलतियों पे गलतियाँ

मौज की दृश्यावली लगती तो है पर
पीढ़ियों को सहनी होगी ये गलतियाँ

जब भी पकड़ा गया फरमाया उसने
भूल से ही हो रहीं थीं ये गलतियाँ

अब तो दौर ये आया नया है यारो
सच का जामा पहने हैं ये गलतियाँ

कभी अपनी भी गिन लो रवि तुमने
दूसरों की तो खूब गिनी ये गलतिया…

प्रिये तुझे पुकारे मेरे अनुगूंज...

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में प्यार की गूंज

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अनुगूँज के इस दफा के आयोजन के लिए आज से करीब अठारह वर्ष पहले, अपनी प्रेयसी [वर्तमान में भाग्य (दुर् या सौ ¿¿) से पत्नी] को लिखे गए प्रेम पत्र के एक हिस्से की एक झलक आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है:


आज, ऐसे शब्द, काफ़ी कुछ सोचता हूँ तो, लिखने की तो बात ही क्या, ज़ेहन में ही नहीं आ पाते.. मैं थोड़ा रोमांटिक होने लगता हूँ तो बीवी को बच्चे, घर-परिवार दिखने लगते हैं और कभी वह मूड में होती है तो मुझे मेरा टर्मिनल और डेड लाइन... वाह क्या खूबसूरत दिन थे वे भी...

धन्यवाद अनुगूँज, तूने पुराने दिनों के खूबसूरत लम्हों को एक बार फिर याद दिला दिया...

मैं खुश नहीं हूँ...

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कृत्रिम खुशी ¿

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आउटलुक पत्रिका के ताज़ा अंक में एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि आम भारतीयों में से 75% खुश हैं. आश्चर्य. घोर आश्चर्य.

लगता है सर्वेक्षण के ये नतीजे भी पिछले लोकसभा चुनावों के एक्ज़िट पोल के नतीज़ों की तरह सिरे से ग़लत हैं.

कारण, मैं कतई खुश नहीं हूँ. कतई नहीं. मैं खुश भी कैसे हो सकता हूँ ? मैं तो इस ग्रह का महादुःखी प्राणी हूँ, और मेरे जैसों का प्रतिशत कम कतई नहीं हो सकता. मेरे दुःखी, महादुःखी होने के कारण कई हैं. कुछ आपके सामने पेश करता हूँ:

• मेरे शहर में दिन में छ: घंटे (जी हाँ, दिन में, काम के समय) घोषित बिजली कटौती होती है और अघोषित दो-तीन घंटे अतिरिक्त. अंधेरे में काम करिए और खुश रहिए... पूरे भारत में (कुछ क्षेत्र को छोड़कर) यही हाल है. मैं खुश नहीं हो सकता.
• मेरे देश में मुम्बई-पूना हाइवे जैसा सिर्फ एकमात्र सड़क है. जबकि बाकी जगह सड़कें गड्ढों, भारी ट्रैफ़िक और सिंगल लेन के कारण बेहाल हैं. मैं रतलाम से इंदौर के बीच की 100 कि.मी. की दूरी (तथा कथित राष्ट्रीय राजमार्ग से) छ: घंटे में भी पूरी नहीं कर पाता हूँ. मैं खुश नहीं हो सकता...
• …

हिन्दी शब्द संसाधक: माध्यम

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माध्यम: पुराने तथा नए हिन्दी कुंजीपट के बीच एक सेतु

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यूनिकोड हिन्दी इंटरनेट के लिए तयशुदा भाषा एनकोडिंग बन चुका है, और देर सबेर प्रत्येक हिन्दी उपयोक्ता को यूनिकोड अपनाना ही होगा. कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम करते हुए मुझे 15 साल से अधिक हो रहे हैं, जब डॉस आधारित अक्षर ही हमारा हिन्दी का एकमात्र सहारा हुआ करता था. तब से तो गंगा बहुत बह चुकी है!

परन्तु यूनिकोड हिन्दी अभी भी बहुत सारे अनुप्रयोगों, खासकर कुछ लोकप्रिय डीटीपी तथा अन्य पुराने सभी अनुप्रयोगों में समर्थित नहीं है. ऐसी स्थिति में यूनिकोड हिन्दी को अपनाया ही नहीं जा सकता चूंकि ये यूनिकोड हिन्दी को ???? के रूप में छापते हैं. जब तक इन अनुप्रयोगों के हिन्दी यूनिकोड समर्थित नए संस्करण जारी नहीं किए जाते तब तक हमारे सामने एक ही विकल्प बचता है- पुराने हिन्दी फ़ॉन्ट का प्रयोग. कृतिदेव हिन्दी फ़ॉन्ट डीटीपी प्रयोगों के लिए न सिर्फ अच्छा है, वरन् इसके हजारों रूप हैं जो इसे समृद्ध बनाते हैं. स्थानीय स्तर पर इसका प्रयोग आने वाले कुछ सालों तक तो जारी ही रहेगा.

समस्या तब आती है, जब आप यूनिकोड हिन्दी तथा कृतिदेव दोनों ही प्रयोग करते हैं…

मोबाइल भी चला हिन्दी में...

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ना फिसल पकड़

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भारतीय भाषाओं के दिन निश्चित ही वापस गए हैं. पहले पहल नोकिया के मोबाइल में हिन्दी आया और अब सेमसंग ने अपने नए मोबाइल में तीन अन्य भारतीय भाषाओं क्रमश: हिन्दी, मराठी तथा तमिल को भी शामिल किया है. अगर हम अपने मोबाइल से अपनी मातृभाषा में बात करते हैं, तो इसका मेन्यू और मैसेंजिंग सेवाएँ अँग्रेज़ी में क्योंकर अनिवार्य होना चाहिए?

इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम में भी हिन्दी और पंजाबी (उत्तर भारत में) के विकल्प उपलब्ध हैं, और उपयोग में बड़े ही आसान हैं. इनमें भी नई भाषाएँ जुड़ती जा रही हैं.

मगर, कुछ सीधे अनुवाद, जैसे कि नोकिया का ‘ना फिसल पकड़’ जो कि ‘एन्टी स्लिप ग्रिप’ का अनुवाद है, बड़ा ही ऊटपटाँग सा है. इसके बजाए हिन्दी की खूबसूरती को बरकरार रखते हुए अनुवाद किए जाने चाहिएँ, यथा- ‘पकड़ ऐसी जो छूटे नहीं’ अन्यथा लोग हिन्दी (या अन्य कोई भी भारतीय भाषा) को हिकारत और अनुपयोगी नजरों से ही देखते रहेंगे. फिर भी, शुरूआत तो हुई ही है, और इसके सुधरने में ज्यादा कुछ लगेगा नहीं...

जन गण मन... जय हे...

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न्यायिक अति-सक्रियता

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कुछ समय से देश में जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आई हुई है. न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अति-सक्रियता में बदल गई सी लगती है. न्यायालय भी अख़बारों की खबरों का संज्ञान लेकर उस पर अपने निर्णय देने लगे हैं. कुछ उत्साही लालों को ऊटपटाँग जनहित याचिकाएँ लगाने पर न्यायालयों की फटकारें भी मिलीं हैं और जुर्माना भी भरने पड़े हैं. अब बात राष्ट्रगान पर आकर ठहर गई है.

सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ में सिंध का नाम फ़ालतू है चूंकि वह पाकिस्तान में है इस लिए उसे हटाया जाए. (आश्चर्य है कि किसी होशियार को 57 साल बाद यह बात समझ में आई) सिंध की बजाए कश्मीर होना चाहिए, अत: इस सम्बन्ध में समुचित आदेश पारित किए जाने चाहिएँ. क्या बढ़िया याचिका है. न्यायालय ने भी उसे स्वीकार कर लिया है. यह और बढ़िया है. जनाब ग़ालिब, (ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करें) अब आपके किसी शेर में किसी को कोई नुक्ता फ़ालतू लगेगा, तो समझ लो कि वह न्यायालय में जनहित याचिका लगाने ही वाला है...

राष्ट्रगान में सिंध क्या जमीन के एक टुकड़े का नाम भर है? तो बजाए इसके कि सिंध शब्द…

क़ीमती तोहफ़ा

लघुकथा
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“दुल्हन दिखने में कैसी थी?” अजीज मित्र, प्रतीक के विवाह पार्टी से देर रात मेरे लौटने पर पत्नी ने मुझसे पूछा. वह अस्वस्थता की वजह से साथ नहीं जा पाई थी और पार्टी के बारे में जानने को उत्सुक प्रतीत हो रही थी.
“सुन्दर ही रही होगी” मैंने उबासी लेते हुए कहा.
“रही होगी – मतलब?”
“यार हम लोग अपने नए प्रोजेक्ट की चर्चा कर रहे थे, सो ध्यान नहीं दिया”
“तुम भी कमाल करते हो. शादी की पार्टी में जाकर दूल्हा दुल्हन को देखने के बजाए प्रोजेक्ट डिस्कस कर आते हो.” उसने मेरा कोट हाथ में लेते हुए थोड़ी नाराजगी से कहा.
“वो तो हरीश मिल गया था, उसे हर हाल में प्रोजेक्ट परसों तक डिलीवर करना है. परेशान हो रहा था बेचारा”
“अरे तुमने तो गिफ़्ट का ये लिफ़ाफ़ा भेंट किया ही नहीं” उसने कोट की जेब में से शुभकामना वाला लिफ़ाफ़ा निकाला जिसमें शगुन के रुपए रखे थे.
“नहीं तो, मैंने तो बाकायदा शादी की बधाई के साथ लिफ़ाफ़ा दूल्हे के हाथ में थमाया था” मैं सोच में पड़ गया कि मैंने लिफ़ाफ़ा थमाया भी था या नहीं.
“तो फिर वह कोई और लिफ़ाफ़ा होगा. याद करो अपने दोस्त को तुम क्या भेंट कर आए”
“ओह माई गॉड, लगता है मैंने डैडी क…
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असफल राज्य

पटना के बेऊर जेल में बंद पप्पू यादव के लिए बिहार से बाहर कोई ऐसा जेल ढूंढा जा रहा है, जहाँ पर वह जश्न नहीं मना सके, दरबार नहीं लगा सके और मोबाइल फोन से मंत्रियों से बात नहीं कर सके. सीबीआई द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे 6 जेलों की सूची भी दी जा चुकी है. जेल में ही रहकर वे लोक सभा का चुनाव तो जीत ही चुके हैं

एक पूर्णत: असफल हो चुके राज्य का इससे बेहतरीन उदाहरण और क्या हो सकता है?

कल को किसी कक्कू करीमी को जेल में रखने के लिए भारत से बाहर किसी अन्य देश में, मज़बूत-सुरक्षित जेल की तलाश होगी. इसके लिए हमें अभी से खोजबीन प्रारंभ कर देनी चाहिए अन्यथा ऐन मौके पर समस्या उत्पन्न हो सकती है. धन्य है सरकार!

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ग़ज़ल
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कहीं गुम हो गई सरकार
जेलों में लग रहे दरबार

लगी है लाइन में जनता
पपुआ की करती जयकार

मुजरिम हो गए हैं नरेश
और हैं फरियादी बदकार

मुल्क के महीपति होंगे
सरगनाओं के भी सरदार

रवि तुझे कुछ करने को
अब तो है खासा दरकार

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नक़ली इबादतें...

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दिखावटी प्रार्थना
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पिछले दिनों बीजेपी के बड़े, नामी-गिरामी नेता, जिनमें आडवाणी तथा संघ और जागरण मंच के गोविंदाचार्य भी शामिल थे, कामाक्षी मंदिर में एकत्र हुए और शंकराचार्य की जल्द रिहाई के लिए पूजा अर्चना की.

हे भगवान! यह कैसा घोर कलियुग आ गया है. जो शंकराचार्य उठते बैठते भगवत् भजन में लगे रहते थे और जिनके साथ हमेशा भगवत् रूपी दंडिका साथ रहती है, उनकी रिहाई के लिए उसके भक्त जन माँ कामाक्षी से प्रार्थना कर रहे हैं. कैसा उल्टा पुल्टा कार्य हो रहा है ईश्वर. प्रलय आने में, लगता है देर नहीं है.

अगर माँ कामाक्षी अपनी पूजा अर्चना से प्रसन्न होतीं तो शंकराचार्य कभी भी जेल के सींखचों के पीछे नहीं होते. बीजेपी को भी यह बात मालूम है. परंतु वोटों के गणित में वे अपने समीकरण लगाने में लगे हैं. जनता भी जानती है, परंतु आप कब तक भोली, मासूम जनता को मूर्ख बना सकते हैं? जब पेट में दाना नहीं होगा तो राम का मंदिर कैसे याद आएगा.

हे माँ कामाक्षी, तू सबकी प्रार्थनाओं में छिपी भावनाओं को बखूबी जानती है. मेरी तुझसे प्रार्थना है कि इस सुंदर धरा को पंडित-मौलवी जैसे पैरासाइटों से तथा जनता को मूर्ख बनाने वाल…

इंडीब्लॉग अवॉर्ड 2004 की नामज़दगियाँ

दोस्तों,
इंडीब्लॉगी2004 पुरस्कारों के लिए मुझ नाचीज़ को भी जूरी बनाया गया था. मैंने भी अपने तईं कुछ पुरस्कार नामजद किए हैं...पर मैं यह कबूल करता हूँ कि मैंने हजारों सक्षम ब्लॉगों में से सिर्फ कुछ सौ पचास को ही देखे हैं, और हो सकता है कि इन नामों में वास्तविक उपयुक्त ब्लॉग न आ पाए हों... अत: सभी ब्लॉगों / ब्लॉगरों से दिली क्षमायाचना सहित...

(a) इस साल का इंडीब्लॉग
प्राय: सभी विषयों में दिव्यदृष्टि पूर्वक लगातार लिखने के लिए...

(b) सर्वोत्तम ह्मूमिनिटीज़ इंडीब्लॉग
क्योंकि वह उतना भी सुस्त नहीं है जितने कि हम उसके जानकारी परक ब्लॉग पढ़ने में...

(c) सर्वोत्तम खेल इंडीब्लॉग
सभी आम भारतीयों की तरह मैं भी कोई खेल नहीं खेलता. भाई ओलंपिक रेकॉर्ड भी तो यही कहते हैं... (सिवाय गली क्रिकेट के, जिसे मैं किसी कोण से खेल नहीं मानता :).

अत:, रे मूर्ख इस बारे में कोई नामजदगी न कर...

(d) सर्वोत्तम विज्ञान/तकनॉलाजी इंडीब्लॉग
हे भगवान!ये तो इतना लिखते हैं कि अपने जीवनकाल में कोई पढ़ भी पाएगा! और वह भी

सही, जानकारी परक...

(e) सर्वोत्तम इंडीब्लॉग डिरेक्ट्री/सेवा

यह तो आसान सा सवाल था...

(f) सर्वोत्तम टैग लाइन…

लहरों को कोई इल्जाम न दो...

चित्र
सुनामी: कतरनें बोलती हैं…
*-*-*

हमें इसका ही इंतजार था. अन्यथा भारतीय मूल के टेड मूर्ति; जो प्रशांत महासागर के 26 देशों के लिए सुनामी भविष्यवाणी करने वाले तंत्र को स्थापित करने वाले महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहे हैं; ने भारतीय सरकार को कई दफा चेताया, बताया, अनुरोध किया, परंतु भारतीय इतिहास में सुनामी कभी आया ही नहीं था, लिहाजा सरकार को उस पर फालतू पैसे फेंकने की क्या जरूरत थी? अब अंतत: भारत के राष्ट्रपति ने सुनामी के गुज़र जाने के एक सप्ताह बाद घोषणा की है कि भारत में भी सुनामी भविष्यवाणी तंत्र लगाया जाएगा.

भारतीय सरकारी तंत्र के चलताऊ एटिट्यूड के बारे में ये क़तरनें जो कहती हैं क्या वे नाकाफ़ी हैं?


*-*-*
ग़ज़ल
*+*
न लगाओ कोई इल्जाम इन लहरों को
गिन रखे हैं खूब तुमने भी लहरों को

बातें प्रतिरोध की करते हो खूब मगर
सर से यूँ गुजर जाने देते हो लहरों को

कुछ भी असम्भव नहीं अगर ठानो तो
बहुतों ने बाँध के रख दिए हैं लहरों को

तुझमें जिंदगी है मस्ती भी मौज भी
आओ तैर के ये बात बताएँ लहरों को

अठखेलियों में है कितनी पहेलियाँ रवि
क्या कोई समझ भी पाया है लहरों को

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