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2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

असुविधा के लिए खेद है...

परिवर्तन का दूसरा नाम जिंदगी है...
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ब्लॉगर के इस ब्लॉग को नया होस्ट भाई ईस्वामी की महती कृपा से मिला है, जो थोड़ा सा तेज़ तो है ही, ज्यादा सुविधाओं युक्त वर्ड प्रेस पर भी आधारित है. वहाँ यह नए रूप-रंग और नाम से अवतरित हुआ है. पर मूल स्वरूप लगभग यही रहेगा. आपको थोड़ी सी असुविधा तो होगी, जिसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ, परंतु गुज़ारिश है कि आप अपने पसंदीदा / बुकमार्क / पुस्तचिह्न को इस नई कड़ी पर बदल लें. हालाकि यह वर्तमान ब्लॉग एक अभिलेखागार के रूप में तो मौज़ूद रहेगा ही, और महीने के अंत में यत्र-तत्र छपी मेरी समस्त रचनाएँ यहाँ अवतरित होंगीं.

कोशिश रहेगी नियमित लेखन की, महीने में कम से कम 20-25 चिट्ठे, इस साल –(2005) के पूरे होते तक.

तो, प्रतिदिन पढ़ते रहिए : छींटे और बौछारें – टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र

धन्यवाद.

मलाई चाटने का आपको भी निमंत्रण - और कोई अप्रैल फूल नहीं!

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ये देश मलाईदार!

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सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
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व्यंज़ल
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सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

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एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को सफ़ाई देता हुआ- “उस लड़…

पुष्पों की रंगपंचमी -

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प्रकृति की होली (2)
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रंगों के त्यौहार होली पर मालवा अंचल – इन्दौर के आसपास का इलाक़ा जरा ज्यादा ही रंगीन हो जाता है. होली के पाँच दिन बाद रंगपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें फिर से एक बार रंगों से एक दूसरे को डुबोया जाता है. कहीं कहीं ‘गेर’ निकलती है जो एक प्रकार का बैंड-बाजों-नाच-गानों युक्त जुलूस होता है जिसमें नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है. जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है.

प्रकृति भी इस समय जम कर होली मनाती है. मेरे घर आँगन के एक गमले में खिले ये पुष्प भी होली और रंग पंचमी की शुभकामनाएँ देते प्रतीत होते हैं....



इस चित्र को पूरे आकार में यहाँ देखें

अच्छाइयों की होली...

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होली... बुराइयों की या अच्छाइयों की?

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कल रात पूरे देश में होलिका दहन का त्यौहार मनाया गया. बुराइयों को जलाने, खत्म करने के प्रतीक स्वरूप यह त्यौहार मनाया जाता है.

हमारे मुहल्ले में भी होलिका दहन का कार्यक्रम कुछ उत्साही बच्चों-बूढ़ों के सहयोग से साल-दर-साल मनाया जाता है. इस दफ़ा जो लकड़ियाँ एकत्र की गई थीं, वे किसी सूरत जलने दहकने का नाम नहीं ले रही थीं. किसी ने चुटकी ली कि बुराइयाँ आसानी से जलती खत्म नहीं होती हैं. अंतत: होलिका पर ढेर सारा घासलेट उंडेला गया तब वह धू-धू कर जली. मगर, ऐसा लगा कि बुराइयों को जलाने नष्ट करने के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार के जरिए हम अपनी बची खुची अच्छाइयों को भी नष्ट करने पर तुले हुए हैं.

हर साल होलिका के फलस्वरुप टनों लकड़ियाँ बिना किसी प्रयोजन के जला दी जाती हैं. धुआँ, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग तो सेकेण्डरी इफ़ेक्ट हैं. रास्तों – चौराहों पर खुले आम बड़े बड़े लट्ठे जला दिए जाते हैं जो सप्ताहों तक सुलगते रहते हैं, जिससे आम जनता को खासी परेशानी होती है. होलिका दहन पर इस साल भी सारा शहर धुँआमय हो गया था. स्थिति यह थी कि सांस लेने में दिक्कतें आ रही थी.

आस्था …

आप कम भ्रष्ट हैं या ज्यादा?

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सर्वाधिक भ्रष्ट?


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अब तक आदमी या तो ईमानदार होता था या भ्रष्ट होता था. परंतु आज के दौर में भ्रष्टता की भी कैटेगरी भाई लोगों ने बना ली है. यूपी के पूर्व प्रमुख सचिव अखंड प्रताप सिंह, जो अपने ही साथी अफ़सर बंधुओं के द्वारा “उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक भ्रष्ट अफसर” के शानदार खिताब से नवाज़े जा चुके थे, अंतत: सीबीआई की नज़रों में आ ही गए.

सवाल यह है कि सर्वाधिक भ्रष्ट का अर्थ क्या है? क्या इसके लिए कोई पोल - कोई वोटिंग हुई थी? सर्वाधिक भ्रष्ट के लिए कोई पैजेंट हुआ था? इस खिताब को पाने के क्या मापदंड थे? अगर यह अफसर सर्वाधिक भ्रष्ट था, तो उससे कम भ्रष्ट और न्यूनतम भ्रष्ट अफसर भी वहाँ होंगे. क्या सर्वाधिक भ्रष्ट उसे माना गया जो किसी काम के तय रेट से दस गुना या बीस गुना ज्यादा रिश्वत लेता था, या रिश्वत लेते समय वह अपने ख़ून के रिश्तों की भी परवाह नहीं करता था? या, किसी दिए गए वित्तीय कालखंड में उसने सबसे ज्यादा पैसे बनाए? अगर यह मापदंड जारी कर दिया जाता तो और दूसरे स्टेट के अफसरों का भी भला हो जाता.

जब मैं सरकारी सेवा में था, तो एक सीनियर इंजीनियर शर्माजी के बारे में लोग कहा करते थे कि बहुत भ्…

ताजमहल पर मेरा हक?

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ताजमहल पर मालिकाना हक?


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एक ख़बर के अनुसार, ताजमहल के निर्माण के 250 वर्षों के पश्चात्, आगरा के शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में उस के मालिकाना हक को लेकर तलवारें खिंच गईं हैं. हर एक की दलील यह है कि ताजमहल वस्तुत: उनके पंथ के व्यक्तियों की कब्र है, अत: मालिकाना हक उन्हीं का है. बोर्डों ने अपने-अपने दावे सरकार को सौंप दिए हैं. चर्चे हैं कि ताजमहल की मोटी वार्षिक आय पर निगाहें हैं. शहंशाह शाहजहाँ ने जिस प्रेम की अभिव्यक्ति की ख़ातिर इस खूबसूरत स्मारक का निर्माण करवाया था, उन्हें सपने में भी यह भान नहीं रहा होगा कि ताजमहल, ताज कॉरीडोर और मालिकाना हक जैसे छुद्र, विवादों में फँसता रहेगा.

अब अगर ऐसे दावे करने का हक किसी का बनता है, तो शीघ्र ही लाल क़िला और कुतुब मीनार पर भी दावे-प्रतिदावे करने वाले चले आएँगे. ये स्मारक विश्वधरोहर हैं, और इनपर किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा मालिकाना हक जताया जाना हास्यास्पद है. दरअसल, ताजमहल जैसे स्मारकों पर तो विश्व की प्रत्येक जनता का मालिकाना हक है.
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व्यंज़ल
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खुद पर नहीं अपना मालिकाना हक है
जताने चले जग में मालिकाना हक है

लोग कहते हैं ये मुल्क है तेरा…

प्रकृति की रंगीन बहार..

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प्रकृति कीहोली
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फ़ाल्गुन के महीने में प्रकृति भी अपनी रंग-बिरंगी छटाएँ बिखेरती है. जहाँ देखें वहीं फूलों की बहार. टेसू तो हर ओर ऐसे दीखते हैं, जैसे जंगल में अग्निदेवता साक्षात् उतर आए हों. प्रकृति आपके तन-मन में रंगीनियाँ भरने को आतुर प्रतीत होती है.

पुष्पों के नियमित-अनियमित-सिमिट्रिकल रूप और रंग विन्यास दर्शकों के तन-मन को झंकृत-चमत्कृत तो करते ही हैं, अपनी भीनी-भीनी खुशबुओं की छटा से वे हमें मदमस्त भी करते हैं.

इस पुष्प को देखिए और मदमस्त होइए:



यह चित्र अपने पूरे आकार में यहाँ मौज़ूद है जिसे डाउनलोड कर आप अपना डेस्कटॉप वालपेपर बना सकते हैं.

क्रिकेट के बारे में जानकारियाँ...

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व्यंग्य
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एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट
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इससे पहले मैं क्रिकेट देखता सुनता नहीं था. खेलना तो खैर, दूर की बात है. परंतु जब सुना कि मियाँ मुशर्रफ़ क्रिकेट देखने भारत आ रहे हैं तो लगा कि क्रिकेट में कुछ तो होगा कि लोग दीवाने बने फिरते है. तो इस बार देखा. सुना था कि क्रिकेट इज़ ए फनी गेम. येप, इट इज़, जेंटलमेन. सचमुच दूसरे किसी भी खेल में मज़े का अंश उतना नहीं रहता जितना क्रिकेट में होता है. हॉकी, फ़ुटबाल से लेकर जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स – किसी भी खेल को लीजिए, उसमें खेल का मज़ा होता है. परन्तु क्रिकेट में तो मज़ा ही मज़ा होता है. मजे का खेल होता है.

क्रिकेट के बारे में मैंने पिछले कुछ दिनों में तमाम अध्ययन किए, काफ़ी कुछ देखा, सुना और बहसें कीं. राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय क्रिकेट पत्र-पत्रिकाओं तथा क्रिकेट विशेषांकों का अध्ययन किया, इंटरनेट की क्रिकेट से सम्बन्धित तमाम साइटों की खाक छान डाली, टीवी पर लाइव मैचेस देखे, और साथ ही साथ रेडियो पर आँखों देखा हाल भी सुना. यही नहीं, मैंने अपने मुहल्ले में गली क्रिकेट भी खेली. प्रत्येक मैच के प्रारम्भ होने से पहले, मैच के दौरान और मैच …

व्यंग्य लघुकथा

लघुकथा
(विश्व की पहली ब्लॉगज़ीन निरंतर में पूर्व प्रकाशित)
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प्रशिक्षु : दृश्य एक
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को आकस्मिकता में अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो गायब थीं और घोषित कर दिया कि मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया. मरीज के सम्पन्न परिवार जनों को यह खासा नागवार ग़ुजरा और उन्होंने हल्ला मचाया कि मरीज का इलाज उचित प्रकार नहीं हुआ और एक प्रशिक्षु के हाथों ग़लत इलाज से मरीज को बचाया नहीं जा सका.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने उस प्रशिक्षु को फायर कर दिया.
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प्रशिक्षु: दृश्य दो
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने …

है कोई आपकी पहचान ?

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कीमत पहचान की
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उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान जब एक समारोह में बिना लाव लश्कर और पहचान पत्र के पहुँचे तो पुलिस के जवानों ने जो सुरक्षा के लिए वहाँ तैनात थे, उन्हें पहचाना नहीं और उनकी जाँच करने लगे. मंत्री महोदय को यह खासा नागवार गुज़रा और नतीजे में नौ पुलिस कर्मियों को निलंबन की सज़ा भुगतनी पड़ी.

ठीक इसके विपरीत, एक घटना मुझे याद आ रही है. मेरा एक मित्र पुलिस विभाग में वायरलेस में कार्यरत था. उसका एसपी नया-नया ट्रांसफर होकर आया था और अपने मातहत विभागों का निरीक्षण करता रहता था. एक दिन वह एसपी सिविल ड्रेस में वायरलेस विभाग में जा पहुँचा जहाँ मेरा मित्र मोर्स कोड की कुंजियों की ठकठकाहट के साथ गोपनीय संदेशों का आदान प्रदान कर रहा था. ऐसे में ही उस एसपी ने मित्र से कुछ पूछताछ करनी चाही. मित्र जो उसे पहचानता नहीं था, उस पर चिल्लाया और बोला – बास्टर्ड यू गेट आउट फ्रॉम हियर. डोंट यू सी आई एम बिज़ी इन इम्पॉर्टेंट इन्फ़ॉर्मेशन्स? और फिर अपने काम में जुट गया.

वह ऑफ़ीसर तत्काल बाहर चला गया. उसे अपनी ग़लती का न सिर्फ अहसास हुआ, बल्कि उसने मित्र को अपनी ड्यूटी में प्रतिबद्धता रखने के लिए शाबासी त…

यादें बचपन की...

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अनुगूंज: बचपन के यादों की गूँज...
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मेरी पहली खरीदारी
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उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था. माँ कोई सब्जी बना रही थी और घर में खड़ी लाल मिर्च खत्म हो गई थी. सब्जी में बघार लगाने के लिए मिर्च जरूरी थी. माँ दूसरे कामों में भी उलझी हुई थी, अत: यह कार्य उसने अपने लाड़ले को डरते डरते सौंपा. हाथ में चार आने का सिक्का दिया और कहा बेटा गली के आगे जो दूकान है वहाँ से चार आने की खड़ी मिर्ची ले आ. ले आएगा ना?

मैं उत्तेजित हुआ, हिरणों की तरह कुलाँचे लगाता दुकान तक पहुँच गया. मेरी निकर जरा ढीली हो रही थी, उसे संभालता हुआ दुकानदार को, जो एक दूसरे ग्राहक से उलझा हुआ था कम से कम दस बार एक ही सांस में बोल गया कि मुझे चार आने की मिर्ची चाहिए.

उस ग्राहक से निपटकर, आखिरकार दुकानदार ने अख़बार के एक टुकड़े में करारे लाल मिर्च को तौलकर पतले से धागे से पुड़िया बांधा और मुझे थमाया. जिस तेजी से मैं आया था, उसी तेजी से कूदता फांदता, एक हाथ में मिर्ची की पुड़िया और एक हाथ में निकर संभाले वापस घर लौटा और सगर्व पुड़िया माँ के हाथ में थमाया. दौड़ते भागते आने के कारण पुड़िया खुल गई थी और उसका धागा लटक रहा था.

माँ…

हिन्दी में ऑफ़िस सूट

हिन्दी में ऑफ़िस सूट: ओपन-ऑफ़िस हिन्दी

(ऑन लाइन हिन्दी समाचार पत्रिका प्रभासाक्षी में दि. 13 मार्च 05 को पूर्व प्रकाशित )

माइक्रोसॉफ़्ट के ऑफ़िस सूट के हिन्दी संस्करण के पिछले साल जारी होने के साथ ही कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के स्थानीय भाषाओं में स्थानीयकरण की होड़ मच गई है. जहाँ व्यवसायिक उत्पाद तो इस दौड़ में शामिल हो ही चुके हैं, मुक्त सॉफ़्टवेयर/ओपनसोर्स भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. बहुत से स्तरों पर, बहुत से स्थानों पर बहुत से लोग भिड़े हुए हैं – लगे हुए हैं स्थानीय भाषाओं में कम्प्यूटर और उनके अनुप्रयोगों को लाने हेतु ताकि कम्प्यूटरों के उपयोग को स्थानीय लोगों तक पहुँचने-पहुँचाने में अँग्रेज़ी की अनिवार्यता को खत्म किया जा सके. माइक्रोसॉफ़्ट का तमिल और हिन्दी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम तो है ही, ऑफिस सूट भी इन भाषाओं में है. ओपन सोर्स का लिनक्स इस मामले में थोड़ा सा धनवान है जहाँ इसके पास छ: भाषाओं में ऑपरेटिंग सिस्टम – हिन्दी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, मराठी और बंगाली में है तथा ऑफ़िस सूट हिन्दी और तमिल में है. और ढेरों अन्य भारतीय भाषाओं में काम जोरों से जारी है – व्यवसायिक प्लेटफ़ॉ…

गंगा भी ज़हरीली हो गई...

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गंगा तेरा पानी ज़हरीला...
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मेरे जैसे करोड़ों धर्म-भीरुओं ने गंगा मैया के जल में अपने पापों और दुष्कर्मों को धोने की मंशा में शवों, अस्थियों, फूल-पत्रों, मूर्तियों, सिक्कों और न जाने क्या-क्या सदियों से विसर्जित किए हैं. फ़ैक्टरियों/शहरों के गटरों के विसर्जनों को गंगा में बहाए जाने की बात तो जुदा ही है. नतीजतन गंगा मैया के आँचल का पानी जहरीला तो होना ही था... हमारे इन कर्मों से हमारे पाप धुले नहीं वरन् बढ़े ही हैं. पर क्या हमें कभी इसका भान होगा भी?
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व्यंज़ल
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क्या कुछ नहीं ज़हरीली हो गई
अब ये गंगा भी ज़हरीली हो गई

आखिर कैसे हो क़ौम का इलाज
अब औषध भी ज़हरीली हो गई

अमृत अब से बुझती नहीं प्यास
अपनी लतें ही ज़हरीली हो गई

अंतत: शस्त्रागार बन गई दुनिया
दोस्ती की बातें ज़हरीली हो गई

प्रेमशास्त्र पढ़ जवाँ हुआ था रवि
मेरी चाल कैसे ज़हरीली हो गई
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सब धोखेबाज़ हैं यहाँ...

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संविधान के साथ धोखाधड़ी...
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झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज अर्जुन मुंडा की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्यपाल के फैसले को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया है.

इसके साथ ही नेताओं में विधायिका – न्यायपालिका में कौन बड़ा – किसका अधिकार कहां तक का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है. जहाँ बीजेपी स्वागत कर रही है (चूँकि यहाँ उसके फायदे की बात हो रही है) वहीं तमाम अन्य दल तिलमिलाए हुए हैं कि न्यायालय ओवरएक्टिविज्म दिखा रही है. परंतु न्यायालय को न्याय की परिभाषा फिर से बताने और यह बताने के लिए कि संविधान के साथ धोखाधड़ी राज्यपाल जैसे संविधान प्रमुखों द्वारा किया जा रहा है, किस ने मजबूर किया है? आज की स्तरहीन राजनीति ने, जहाँ सत्ता और कुर्सी की खातिर संविधान तो क्या, लोग अपने आप से भी धोखाधड़ी कर रहे हैं.

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व्यंज़ल
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ये मेरी मासूमियत है धोखाधड़ी नहीं
खुद की सेवा है कोई धोखाधड़ी नहीं

तमाम उम्र रहे हैं तंगहाल तो क्या
तसल्ली तो है किया धोखाधड़ी नहीं

गुजर गया दौर ईमान की बातों का
जीना असंभव जहाँ धोखाधड़ी नहीं

कोई फर्क बचा नहीं पहचानोगे कैसे
क्या छल और क्य…

संतों के लिए विवाद...

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शीर्षक ही काफ़ी है...

इस खबर का शीर्षक ही पूर्ण है पूरी कहानी कहने को, फिर क्या खबर और क्या खबरों की खबर... हे.. हे... हे.... हाय.. हाय... ऊँ.. ऊँ... (बहुत ज्यादा हँसने के बाद रोना आता ही है :)

आयातित रुपिया...

व्यंग्य

इम्पोर्टेड रुपया?

इधर मैंने वह खबर पढ़ी, उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ. नतीजतन मेरी रातों की नींदें डिस्टर्ब हो गईं और अनिद्रा, अर्द्धनिद्रा में मुझे हॉरिबल, हॉटिंग सपने दिखाई पड़ने लगे. सपनों का यह सिलसिला जारी है. इससे पहले कि इन भयंकर सपनों को भुगतकर मैं और भी ज्यादा डिस्टर्ब हो जाऊँ, आपको भी थोड़ा डिस्टर्ब करूं अपने सपने सुनाकर.

रॉबर्ट के हाथ में भी वही अख़बार था. वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही अख़बार पढ़ रहा था. खबर पढ़ कर उसकी भी आंखें फटी रह गईं. वह भी घबरा गया. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में नए नोट नहीं छपवा सकने के कारण विदेशों से नए नोट छपवाकर मंगवाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा. उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ…

लंबित है मेरा देश...

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ये देश लंबित है…
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2 लाख फ़ाइलें निपटारे के लिए वर्षों से लंबित... और वह भी मंत्रालय में जहाँ शासकीय निर्णय होते हैं... देश, प्रांत और समाज के विकास के लिए. फिर अन्य सरकारी विभागों की बात तो छोड़ ही दें.

दरअसल सारा सरकारी कार्यालयीन तंत्र ही जंग खाया हुआ है. मैंने भी 20 वर्ष सरकारी सेवा में गुजारे हैं. सरकारी ऑफ़िसों की स्थिति सचमुच शोचनीय है और कोई भी बदलना नहीं चाहता. धूल-खाती, सड़ती हुई फ़ाइलों के बंडलों के बीच बैठने वाले सरकारी अफसर और बाबू कार्यालयीन समय में देर से आते हैं और समय से पूर्व चले जाते हैं. कोई काग़ज़, मसलन किसी का जेनुइन आवेदन किसी कार्यालय में पहुँचता है, तो वहाँ का आवक बाबू उस पर ठप्पा लगाकर, क्रमांक व दिनांक डालकर आवक फ़ाइल में लगा देता है. उसके पश्चात् उस फ़ाइल का अंतहीन सफर शुरू हो जाता है. अगर उस फ़ाइल में संबंधित अफसर को कोई काम नहीं करना है, तो उसपर कोई टीप लिख देगा, कोई जानकारी मांग लेगा या उसे अपने ऊपर-नीचे किसी अन्य अफसर के पास निर्णय के लिए भेज देगा. यानी अपनी कोर्ट में बाल नहीं रखेगा ताकि जिम्मेवारी न ठहराई जा सके. फ़ाइलों को लंबित रखने का सारा काम बड़े…

मैं सरकार हूँ...

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क्योंकि ये सरकार मेरी है...

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मुलायम सिंह ने अपने भाई, जो कि यूपी के पीडबल्यूडी मंत्री भी हैं, के निजी कालेज के लिए 34.5 करोड़ रुपयों का अनुदान स्वीकृत किया है. क्यों न करें? आखिर समाजवादी सरकार उनकी अपनी है और वे अपने भाई, भतीजे और अपने समाज का भला नहीं करेंगे तो क्या राह चलता दूसरा आदमी करेगा? समाजवादी/साम्यवादी पार्टियों-नेताओं का छद्म समाजवाद/साम्यवाद का इससे बढ़िया उदाहरण और नहीं हो सकता. हिन्दुत्ववादी-सेकुलरवादी पार्टियों के छद्म विचारधाराओं के बारे में भी भारतीय बुद्धिजीवियों को पता है कि ये सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने-बचाने के लिए वोटरों के सामने रोना रोते रहते हैं.

यह स्थिति भारत में हर कहीं है. प्राइवेट स्कूलों कालेजों की संख्या अधिकतर नेताओं के परिवारों की हैं. पेट्रोल पंपों के छद्म मालिक नेता हैं. इसीलिए तो सरकार बनाने, सरकार में शामिल होने के लिए तमाम तरह की मारा मारी चलती रहती है और, शहाबुद्दीन की तरह कुछ नेता तो खुले आम यहाँ तक कहते हैं कि हम अपनी सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक, किसी भी एक्स्ट्रीम तक जाएंगे. देश सेवा के लिए आज कोई सरकार में शामिल नहीं होता. सरकार का रू…

हिंग्लिश?

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अँग्रेज़ी में हिन्दी कि हिन्दी में अँग्रेज़ी?
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शनिवार को टाइम्स ऑफ इन्डिया तथा इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पृष्ठों पर दो विरोधाभासी चीज़ें एक साथ दिखाई दिए. परंतु ये कोई राजनीतिक नज़रिया या टीका टिप्पणी नहीं थे.

भले ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र हो जिसकी जनता अँग्रेज़ी भाषा बोलती है, परंतु इस अँग्रेज़ी में हिन्दी भी घुलती मिलती दिखाई देने लगी है. हिन्दी में अँग्रेज़ी तो खैर, एक इमल्शन की तरह घुल मिल गई है, और प्राय: आम बोलचाल तथा अब तो गंभीर लेखन में भी, अँग्रेजी के शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है. मैंने अपनी ग़ज़लों में कई मर्तबा अँग्रेज़ी के शब्दों का बख़ूबी प्रयोग किया है.

ट्रू ह्मूमन ग्लोबलाइज़ेशन - विश्वमानववाद का इससे सटीक उदाहरण और क्या हो सकता है भला.

हर शख्स को अब ग़ज़ल कहना होगा

राही, कोई नई राह बना जिससे कि तेरे पीछे आने वाले राही तुझे याद करें...
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जावेद अख़्तर, जिन्हें इस साल के फ़िल्मफ़ेयर के पाँचों नॉमिनेशन उनके गीतों के लिए मिले थे, ग़जलों के बारे में बेबाकी से कहते हैं कि – इतनी खूबसूरत ट्रेडिशन का धीरे-धीरे लोगों को इल्म कम होता जा रहा है. ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में इसकी दो पंक्तियों में – इशारों में, कॉम्पेक्ट तरीके से कही जाने वाली बातों का खासा योगदान रहा है, जो ग़ज़लकारों को मेहनत से लिखने के लिए मज़बूर करती हैं. इसके साथ ही इसके रदीफ, क़ाफिए और मकता-मतला जैसी पारंपरिक और नियमबद्ध चीज़ें भी ग़ज़ल लिखने के दौरान कठिनाइयाँ पैदा करती हैं.

मगर, फिर भी लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं और क्या खूब लिख रहे हैं. भले ही पाठक, श्रोता और प्रशंसक नदारद हों – ग़ज़लें आ रही हैं... हिन्दी में भी और उर्दू में भी. और, मेरा तो यह मानना है कि पारंपरिक और नियमबद्ध रचना के पीछे पड़ने की जरूरत ही नहीं है. रचना ऐसी रचिए जिसमें पठनीयता हो, सरलता हो, प्रवाह हो और जिसे रच-पढ़ कर मज़ा आए. बस. कट्टरपंथी आलोचक तो हर दौर में अपनी बात कहते ही रहेंगे और उनसे हमें घबराना नहीं चाहिए, जैस…

आपके लिए नया शब्द भंडार...

हास्य व्यंग्य
नई शब्दावली नए शब्द
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इंटरनेट और इन्फ़ॉर्मेशन तकनॉलाजी ने नित्य नए नए शब्दों और वाक्याँशों को जन्म दिया है. उदाहरण के लिए ब्लॉग, जिसे हम हिन्दी में चिट्ठा कहते हैं. परंतु इससे इतर हमारे भारत में कुछ समय से नए नए शब्दों का गठन सप्रयास-अनायास हुआ है, और आपकी सामाजिक शब्दावली के भंडार में ऐसे नए-नए शब्दों का समावेश हुआ होगा. आइए, आपकी पुनश्चर्या के लिए एक बार फिर से इन नए शब्दों और उनके अर्थों पर चर्चा करते हैं. कुछ खास नए शब्द ये हैं, जिन्हें जानना समझना हर भारतीय के लिए आवश्यक है. क़यास लगाए जा रहे हैं कि इन शब्दों को प्रत्येक भारतीय जनता को समझने-समाझने के लिए सरकार कोई अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही है!
• गरीब रैला: इस नए शब्द का जन्म स्थान पटना है. इसका अर्थ गरीबों के लिए पटना तक की मुफ़्त यात्रा, बस-ट्रक मालिकों तथा रेलवे के लिए जबरिया मुफ़्त-बिना टिकट यात्रा तथा राजनीतिज्ञों के लिए एक-दूसरे को अपना बाहुबल दिखाना है. महा रैला इसका अपभ्रंश है.
• हल्ला बोल : परिवर्तन इसी का नाम है. लखनऊ कहाँ एक समय तहजीब को लखनवी अंदाज से पहचाना जाता था और अब नेताओं की कृपा से हल्ला…

सरकार से डरो भाई...

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डरावनी सरकार!

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दैनिक भास्कर के 28 फरवरी के अंक में प्रीतीश नंदी ग्राफ़िक डिटेल में लिखते हैं कि सरकार और उसके नुमाइंदे आम जनता को डराने और तंग करने के अलावा और कुछ खास नहीं करते. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आमतौर पर यह बात सही है. मुझे एक हृदयविदारक घटना याद आती है. पिछली छुट्टियों में रेल सफर के दौरान गांव के एक गरीब परिवार की दास्तान सुनने को मिली. वह अपना गांव छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में शहर को जा रहा था. उस गरीब से रास्ते में कुछ पुलिस वालों ने पैसे उगाह लिए. इस लिए नहीं कि उसके पास टिकट नहीं था. वह भला आदमी तो सही टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. उसे इस लिए तंग किया गया चूंकि सरकारी क़ायदे के अनुसार उसे अपना गांव छोड़ने के लिए गांव के सरपंच से लिखवा कर लाना था (क्योंकि शासन ने गांवों से पलायन रोकने के लिए यह क़ानून बनाया है) जो वह नहीं लाया है!

सच है, सरकार डराती और तंग करती है. भले ही वह गांव का ग़रीब हो या प्रीतीश नंदी जैसा शख्स.
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व्यंज़ल
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लोगों को डराती और तंग करती है सरकार
लूली लंगड़ी क़ौम किस तरह से दे ललकार

जनता की सरकार है या सरकार की जनता
सरकार के लिए भी कोई सरकार …

मेरे परालौकिक अनुभव...

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परालौकिक अनुभव की गूँज

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बात बहुत पुरानी है. तब नई नई नौकरी लगी थी. अम्बिकापुर जैसे पहाड़ी जिले के सामरी तहसील के मुख्यालय कुसमी में मेरे जैसे कोई दो दर्जन से अधिक बैचलर्स भिन्न भिन्न विभागों में कार्यरत थे. हममें से अधिकतर के कई छोटे छोटे ग्रुप थे, और हम काम के बाकी बचे समय में प्राय: मौज मस्ती करते रहते थे जिनमें शुमार होता था जंगल की सैर, तालाबों की तैर और अकसर ताश की रमी का खेल. क्योंकि तब न तो केबल था न टीवी और न ही कम्प्यूटर्स. हमारे ग्रुप में एक डाक्टर खेस, जो वहाँ के प्रायमरी हेल्थ सेंटर में पदस्थ थे, बड़े मस्तमौला थे और वे हर प्रकार का नशा करते थे. गाँजा, चरस, सिगरेट, तम्बाखू, शराब, हँड़िया (वहाँ की देशी शराब जो चावल को सड़ाकर और जंगली जड़ी बूटी मिलाकर तैयार की जाती है, जो पीने में थोड़ी सी खट्टी लगती है, परंतु सीधे सिर पर चढ़ती है) इत्यादि सब कुछ, और प्राय: एक साथ दो-तीन चीज़ों का नशा. सही मायनों में वे एडिक्ट थे. और अगर पहाड़ी क्षेत्र के नाते उन्हें कभी कोई नशे की चीज़ नहीं मिलती थी, तो वे अस्पताल में उपलब्ध जिंजर (कंसन्ट्रेटेड इथाइल अल्कोहल जो दवाई के काम आता है) को टॉलू…

वागर्थ में हिन्दी ब्लॉग...

राजेश रंजन, जो अभी रेडहैट पर हिन्दी का कार्यभार देख रहे हैं, ने एक लिंक भेजा है. वागर्थ में हमारे हिन्दी चिट्ठों की जमकर चर्चा हुई है. आप भी देखें:
http://vagarth.com/feb05/internet/index.htm

धन्यवाद राजेश.
रवि

तिरंगा- तेरा मान या अपमान?

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तिरंगे का अपमान?
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भारतीय खिलाड़ियों, या कहें कि भारत की जनता का ये दुर्भाग्य है कि तिरंगे के मान-अपमान के बारे में किसी लकीर-के-फकीर सरकारी बाबू या सोच-विहीन राजनेता (जिनके ऊपर इसे तय करने का भार है) तय करते हैं कि सही क्या है. वह तो भला हो न्यायालय का, अन्यथा तीन-चार साल पहले तो आप तिरंगे को अपने घर पर भी नहीं टाँग सकते थे. आम जनता को तिरंगे का दर्शन साल में सिर्फ दो दिन यानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही हो पाता था, वह भी किसी जर्जर, टूटते-फूटते, वर्षों से रँगाई-पुताई को मोहताज शासकीय कार्यालयों के ऊपर! और फिर कहा जाता है कि तिरंगे का अपमान न हो. तिरंगे का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है भला?
खेल मंत्री सुनील दत्त के प्रयासों के बावजूद खिलाड़ियों के द्वारा तिरंगे के उपयोग को उसके अपमान का कारण मान कर किसी सरकारी बाबू/सोच-विहीन राजनेता द्वारा फिर से मना कर दिया गया है. अगर हमारे खिलाड़ी अपने अमरीकी खिलाड़ी बंधु की तरह जो हर कहीं, गर्व से स्टार और स्ट्राइप लगाए फिरते हैं, अगर तिरंगा लगा लेते हैं तो यह भारत देश का और तिरंगे झंडे का अपमान होगा! इससे घटिया विचारधारा तो कुछ और हो ही नही…

बच्चों को इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार..

इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार गरीब, मेधावी विद्यार्थियों को पहुँचा…
धन्यवाद अमित और अतुल, आपके इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार की राशि से रतलाम के पास ग्राम सेजावता के शासकीय हाई स्कूल में कक्षा दसवीं के गरीब, परंतु मेधावी विद्यार्थियों को दिनांक 22 फरवरी को पुरस्कार प्रदान किया गया. दसवीं की प्री-बोर्ड परीक्षा में विषयवार अधिकतम अंक लाने वाले प्रत्येक विद्यार्थियों को रू.175/- मूल्य के नोट बुक्स तथा एक हीरो फाउन्टेन पेन रु. 25/- मूल्य के प्रदान किए गए. कुल सात पुरस्कार प्राचार्य श्री सुरेशचन्द्र करमरकर के हाथों से प्रदान किए गए जिसके विवरण निम्न हैं-
कुमारी मंगल कुंवर- हिन्दी भाषा, कु. ममता- अंग्रेजी, धनंजय- संस्कृत, कु. सुमित्रा- गणित, संतोष कुमार- विज्ञान, राजपाल- सामाजिक विज्ञान, कु. सुमित्रा- कुल सर्वाधिक अंक.
इनबच्चों के चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.ये बच्चे फटे-पुराने टाट पट्टियों में जमीन में बैठकर, टूटे फूटे भवनों में पढ़ाई करते हैं. और ऐसी घोर ग़रीबी में भी अपनी पढ़ाइयाँ जारी रख अच्छे अंक लाते हैं. आइए, इनके प्रयासों के लिए इन्हें दिल से बधाई दें.

मुझे शर्म आती नहीं...

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आइए, शर्म से जरा सिर झुकाएँ...
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हमारे भारत में एक ईनामी डाकू ददुआ सरेआम एक गांव में एक मंदिर बनवाता है, आसपास ऐलान करता है कि अमुक दिन मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. वह गांव वालों समेत सबको निमंत्रण भेजता है और इस आयोजन में पहले से ऐलान कर खुद भी भेष बदलकर पूजा अर्चना में शामिल होता है. और यह सब जानते हुए भी, वोटों की गणित के पीछे विधायक-सांसद (जिनमें उ.प्र. के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह का सांसद भतीजा भी शामिल है) भी उस आयोजन में शामिल होते हैं जिसमें दो लाख (जी हाँ, दो लाख) लोगों की उपस्थिति होती है.

और, हमारे असहाय भगवान अपनी प्राण प्रतिष्ठा का यह नाटक बुत बन कर देखते रहे. अगर भगवान में जान होती, तो वे भी शर्म से डूब मरते.

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व्यंज़ल
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राजा नए हुए हैं गूजर हो या ददुआ
मानव या तो मरा पड़ा या है बंधुवा

जाति-धर्म के समीकरणों में उलझा
मेरे देश का नेता हो गया है भड़ुआ

उस एक पागल की सच्ची बातों को
पीना तो होगा लगे भले ही कड़ुआ

अवाम का तो होना था ये हाल, पर
ये क़ौम किस लिए हो गई है रंडुवा

एक अकेला रवि भी क्या कर लेगा
इसीलिए वो भी खाता बैठा है लड़ुवा

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झगड़ने के फ़ायदे...

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आइए, झगड़ा करें

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लीजिए, यह भी ग़ज़ब है. झगड़ों के भी अपने फ़ायदे हैं. अध्ययनों के अनुसार, जो दम्पति आपस में झगड़ा करते रहते हैं, वे औरों की तुलना में ज्यादा फ़िट रहते हैं, उन्हें तनाव के फलस्वरूप होने वाले हृदय रोगों की संभावना कम होती है, इत्यादि इत्यादि.
लगता है अब हमें झगड़ने के लिए और झगड़ते रहने के लिए कारणों की तलाश करते रहना पड़ेगा. अब पति को अपने अख़बार के अध्ययन के बीच पत्नी के द्वारा किए गए किसी प्रकार के व्यवधान को सहने के बजाए उस पर झगड़ा किया जाना ही उचित होगा और पत्नी द्वारा यह देखे जाने के बाद कि पढ़ा गया अख़बार ठीक ढंग से मोड़ कर उचित प्रकार नहीं रखा गया है, कुढ़ कर चुप रहने या ताने मारने के बजाए, इस बात पर जमकर झगड़ा करना- पति-पत्नी दोनों की सेहत के लिए उचित रहेगा.

तो, दोस्तों, झगड़े को अब नई निगाह से देखो और झगड़ते रहो.
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व्यंजल (हास्य ग़ज़ल=हज़ल के तर्ज पर)
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प्रिये, है ये प्रेम, नहीं है झगड़ा
आओ यूँ सुलझाएँ अपना रगड़ा

जिंदगानी के चंद चार क्षणों में
ऊपर नीचे होते रहना है पलड़ा

करम धरम तो दिखेंगे सबको
चाहे जित्ता डालो उस पे कपड़ा

जब खत्म होगी तो सुखद होगी
यूँ पीड़ा को …

चित्रों के लिए मुफ़्त सेवा

अपने ब्लॉग चित्रों के लिए एक और मुफ़्त सेवा

फ्लिक्र (और ऐसे ही अन्य कई सेवाओं) के द्वारा अपने ब्लॉग के चित्रों पर काँट-छाँट-तोड़-मरोड़ किए जाने से परेशान यह बंदा कई दिनों से इंटरनेट की किसी मुफ़्त अच्छी सेवा की तलाश में था. अभी-अभी पता चला कि स्ट्रीमलोड न सिर्फ चित्र, बल्कि अन्य मीडिया जैसे कि वीडियो/ऑडियो स्ट्रीमिंग की भी मुफ़्त सुविधा (100 मे.बा. तक) प्रदान कर रही है, और वह भी बिना तोड़े-मरोड़े. अब देखना यह है कि यह भरोसेमंद और तेज सेवा है या नहीं. मेरे पिछले ब्लॉग में चिड़िया के घोंसले का चित्र स्ट्रीमलोड से ही है. अगर आपको सही दिख रहा है तो मुझे बताएँ और आप भी उपयोग करें.

असली चिड़िया नक़ली घोंसला

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कंकरीट के जंगल और पॉलिथीन के घोंसले

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पिछले दिनों हमारे घर के सामने हमारे छोटे से बग़ीचे में, सीढ़ियों के नीचे से जाती हुई बेल की शाखाओं पर सुंदर, नन्हे चिड़िया के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया. चिड़ी और चिड़ा दिन रात मेहनत करते, तिनका-तिनका जोड़ते और देखते ही देखते उनका घोंसला बन कर तैयार हो गया. पर यह क्या? जब घोंसला बनकर तैयार हुआ तो पता चला कि उसमें घासफूस, पत्ते और प्राकृतिक तिनके तो कम, पॉलिथीन के रेशे, काग़ज और पॉलिथीन थैलों के टुकड़े और न जाने क्या-क्या सिंथेटिक वस्तुएँ थीं. जिस घोंसले को अपने प्राकृतिक रूप में सुंदर, प्यारा और निर्मल दिखाई देना चाहिए था, वह इन पॉलीथीन और काग़ज़ के टुकड़ों के कारण बदसूरत और घिनौना हो गया था.

मनुष्य के ग़लत कार्यों का खामियाजा बेचारे नन्हे पशु पक्षी भुगत रहे हैं. उन्हें पेड़ पौधों के जंगल नसीब नहीं हो रहे हैं लिहाज़ा वे कंकरीट के जंगल में शौकिया तौर पर उगाए गए किसी पौधे की किसी शाखा के एक टुकड़े में पॉलीथीन का घोंसला बनाने को अभिशप्त हैं.

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ग़ज़लों का ओवरडोज़

दोस्तों, एक सप्ताह के लिए बंदा ऑफलाइन होने जा रहा है. अब जबकि सुबह की कॉफ़ी को तो भले ही छोड़ा जा सकता है, इंटरनेट को नहीं, तब सप्ताह भर के लिए ऑफलाइन होना मज़ाक सा लगता है. परंतु छत्तीसगढ़ / बस्तर के बीहड़ों में जाना है, जहाँ इंटरनेट के पग अभी पहुँच नहीं पाए हैं. लिहाजा मेरी कुछ पुरानी ग़ज़लें जिनमें से कुछ यदा कदा प्रकाशित भी हो चुकी हैं और लंबे समय से जियोसिटीज़ में भी थीं, यहाँ ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. सप्ताह भर आराम से पढ़िए और मुझे गरियाइए कि क्या फूहड़ ग़ज़लें लिखी हैं… हे..हे...हे...
ग़ज़ल 01
पानी की कीमत किसी पसीने से पूछना
बयार क्यों बहती नहीं उल्टी मत पूछना

जोड़ घटाना गुणा भाग के गणितीय सूत्र
राजनीति में ऐसे चले आए क्या पूछना

सत्ता- कुर्सी के खेल में नियम- कायदे
वो भला आदमी चले- चला था पूछना

नया क्या आत्मघाती का बेरोजगार होना
जेहन में आता है फिर क्यों ये पूछना

रवि, खुदा ने तो तुझे बनाया था बेजात
फिर क्यों सभी जात तेरी चाहते हैं पूछना

ग़ज़ल -02
जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषा…

कैसे, किसलिए विचार?

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सुदर्शनी विचार?
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सरकार द्वारा पिछली दफा जारी भारत के जनसंख्या आंकड़ों पर हर कोई अपनी अपने अपने चश्मे से दृष्टि डाल रहा है, और जनसंख्या विस्फोट की असली समस्या पर कोई दृष्टि डालने को तैयार ही नहीं है. आग में घी डाल रहे हैं रा स्व संघ प्रमुख सुदर्शन जो यह कहते हैं कि प्रत्येक हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए. उनकी धर्म सम्बन्धी गणनाओं के अनुसार हिन्दुओं के भारत में अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है, चूंकि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. (जबकि वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, वर्तमान दर पर ऐसा होने में हजारों साल लगेंगे)

अगर हिन्दू के अल्पसंख्यक होने का खतरा है तो फिर चार क्या हमें तो चौबीस बच्चे पैदा करने चाहिए. हमें जीवन भर बच्चे ही पैदा करते रहने चाहिए. हर साल एक. फिर देखो हम तो दुनिया में दो चार साल में ही बहु संख्यक हो जाएंगे. भारत में तो हैं ही, पूरी दुनिया में बहुसंख्यक हो जाएँगे. मुसलमान ही क्या, वर्तमान वैश्विक ईसाई समुदाय को भी हम अल्प संख्यक बना देंगे. पूरा विश्व हिन्दू मय हो जाएगा. कितना मजा आएगा तब. भले ही हम कीड़े मकोड़े की तरह जीवन जी रहे हों, बच्चे पैद…

अपनी इंजीनियरी बताइए...

इंजीनियर्स कैसे करते हैं...

हाल ही में मैंने क्लिफ़र्ड साहनी की लिखी किताब “वर्ल्ड’स बेस्ट प्रोफ़ेशनल जोक्स” पढ़ी. अमूनन चुटकुलों की किताबों में या कहीं और जगह (रीडर्स डाइजेस्ट को छोड़कर) मौलिक चुटकुले कम ही मिल पाते हैं. घूम फिर कर वही पुराने, घिसे-पिटे चुटकुले दोहराए जाते हैं. परंतु पुस्तक महल, दिल्ली से प्रकाशित महज़ साठ रूपयों की इस किताब में बहुत से लतीफ़े मुझे नए-नए से लगे. इन्हीं में एक पुराना लतीफ़ा (पृष्ठ 75, संस्करण 2004) फिर पढ़ने में आया. पर है यह बहुत मज़ेदार. आप भी पढ़िए:
• इंजीनियर्स प्रिज़ीशियन से करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स इंपल्स में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स जब करते हैं, शॉक्ड हो जाते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स लार्ज कैपेसिटी में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स अधिक फ्रिक्वेंसी और कम रेज़िस्टेंस में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स हाई फ्रिक्वेंसी और ज्यादा पॉवर में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स स्ट्रेस और स्ट्रेन में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स लेस इनर्जी तथा ग्रेटर एफिशिएंसी में करते हैं
• केमिकल इंजीनियर्स फ्लूइड स्टेट में करते हैं
• पेट्रो…

नज़राना

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110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत
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भारत में 110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत पुलिस, यातायात पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों को दी जाती है. यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों को करों और अन्य शुल्कों के रूप में सालाना प्राप्त होने वाली राशि से 30 अरब रुपए ज्यादा है. प्राय: हर मार्ग पर ट्रकों / वाहनों से वसूली करती दिखाई देती पुलिस इन आंकड़ों की पुष्टि करती है. हाल ही में पुलिस का मुख्य काम यह हो गया था कि वह मुम्बई जैसे महानगर से लेकर मेवासा गांव तक वह यह सुनिश्चित करे कि दो पहिया वाहन चालक हेलमेट पहन कर ही वाहन चलाएँ. हेलमेट निर्माताओं ने भी रिश्वत का सहारा अपने उत्पादों को बेचने के लिए ले लिया लगता है. पुलिस के अनुसार हेलमेट पहन कर आप संपूर्ण सुरक्षित हो जाएँगे- भीड़ भरी, अनियंत्रित ट्रैफिक सहित, गड्ढों से परिपूर्ण सड़कों में. धन्य है!

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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
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जीवन के शर्त में शामिल है रिश्वत
मयस्सर है कफन जो होगी रिश्वत

क़िस्सों में भी नहीं प्यार की बातें
भाई-भाई के रिश्तों में घुसी रिश्वत

ऐसे दौर की कामना नहीं थी हमें
अपने आप को देना पड़े है रिश्व…

व्हेयर हिन्दी इज़ गोइंग?

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बिकाज़ इंडिया हिन्दी इज़ गोइंग प्लेसेस...


(टाइम्स इन्टरनेशनल के लिए जारी विज्ञापन की क़तरन)

आपका ईमेल पता?

व्यंग्य
पते की बात
आपका पता आपके लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा औरों के लिए है, ख़ासकर तब जब आपके पते में 10 जनपथ, 7 रेसकोर्स रोड या ए.बी. रोड जैसे मार्ग या फिर नरीमन पाइंट, एक्सप्रेस टावर, प्रेस कॉम्प्लेक्स या चेतक सेंटर जैसे पहचान चिह्न हों. आपका पता महज एक पता हो सकता है या फिर आपका संपूर्ण अता-पता बताने वाला साधन भी हो सकता है. आपका पता आपके रहन-सहन, स्टेटस-सिंबल और दुनिया भर के, ढेर सारे अन्य कई ढंके छिपे चीजों के बारे में विस्तार से प्रकाश डालने वाला साधन भी हो सकता है. मसलन, कनाट प्लेस का चपरासी और नरीमन पाइंट का गार्ड भी हो सकता है कि अपनी ड्यूटी करने को मर्सिडीज़ बैंज में आएँ और उधर साइबेरिया का लैंडलॉर्ड भी जरा-जरा सी सुविधाओं को तरसे.

किसी का पता बहुत छोटा होता है तो किसी का बहुत लंबा. छोटे पते तो तत्काल याद हो जाते हैं परंतु बड़े-बड़े पते याद रखना मुश्किल होता है. परंतु आदमी अगर बड़ा है तो उसका मीलों लंबा पता भी लोग जाने कैसे याद रख लेते हैं. एक गाँव का गरीब रमई अपने पते में अपने नाम के आगे गांव, ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत इत्यादि सभी कुछ लिख डालने के बाद भी अपनी च…

सखि, बिजली आई...

बेमौसम बहार
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आज सुबह-सुबह जब नियमित-अनियमित बिजली कटौती नहीं हुई तो सुखद आश्चर्य हुआ. परंतु फिर ध्यान आया कि भई, यह व्यवस्था तो सिर्फ आज के लिए है चूंकि शहर में आज मुख्यमंत्री, पूर्वप्रधानमंत्री-लोकसभा-नेताप्रतिपक्ष पधार रहे हैं. इनके स्वागत के लिए शहर में पिछले सप्ताह भर से तैयारियाँ चल रही थीं. अविरल बिजली प्रवाह के अलावा इन नेताओं के क्षणिक प्रवास से शहर को और भी बहुत सी सौगातें मिलीं. मुलाहिजा फ़रमाएँ:

• जिन क्षेत्रों-सड़कों से इन नेताओं को गुजरना है, उन की साफ़ सफाई की गई, सड़कों के गड्ढे भरे गए, स्पीड ब्रेकर्स हटाए गए तथा नए सिरे से डामरीकरण किया गया. कुछ सड़कों को चौड़ा भी किया गया. उन सड़कों के आसपास के अतिक्रमण हटाए गए तथा सड़कों पर रेहड़ी लगाने वाले, वाहन पार्क करने वालों को भगा दिया गया. पहली मर्तबा लगा कि शहर में सड़क नाम की कुछ चीज़ें हैं.
• शहर के पेयजल प्रदाय के लिए नगर निगम ने करोड़ों की लागत से एक ओवरहेड टंकी बनाई थी. परंतु उद्घाटन के अभाव में वह पिछले पाँच वर्षों से अनुपयोगी पडा हुआ था, तथा उसमें दरारें पड़ गई थीं, उसमें टूटफूट हो गई थी. मुख्यमंत्री के हाथो…

अश्लील प्रश्न...

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रे मूर्ख, अश्लील कौन?

एक तरफ तो एक सरकारी एजेंसी बीएसएनएल पूरे भारत में इंटरनेट के लिए बहुत ही सस्ती दरों पर ब्राडबैंड ला रही है, वहीं दूसरी तरफ एक दूसरी सरकारी एजेंसी बहुत ही बेवकूफाना तरीके से ऐसे क़ानून ला रही है, जिससे आम आदमी इंटरनेट का उपयोग करने से भी डरेगा. और ऐसा हुआ भी है. उत्तर-प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से साइबर कैफ़े में छापा मारकर उपयोक्ता – मालिक दोनों को ही गिरफ़्तार किया गया कि वे अश्लील साइट देख-दिखा रहे थे. अवनीश बजाज का उदाहरण ताज़ातरीन है ही.

परंतु जिन्होंने ये क़ानून बनाया है उन्हें इंटरनेट तकनॉलाज़ी, स्पॉम, ब्राउज़र हाइजेकर्स, वॉर्म/वायरस, पॉप-अप विंडोज़ तथा मिलते-जुलते नाम वाले स्पूफ़्ड पॉर्न साइटों के बारे में जानकारी है भी या नहीं? मुझे नहीं लगता. मेरे ई-मेल पर प्रतिदिन दर्जनों-सैकड़ों की संख्या में स्पॉम आते हैं जिनमें अधिकतर वायग्रा या पॉर्न साइटों के होते हैं. और ऐसा तो प्राय: हर ईमेल उपयोक्ता के साथ होता है. बेचारे गरीब बिल गेट्स को प्रतिदिन दस लाख ईमेल प्राप्त होते हैं. आप क्या सोचते हैं उनमें क्या होता होगा? उनमें अधिकतर ऐसे ही ईमेल होते हैं. अगर बे-ध्य…

मेरी तीसरी आँख...

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त्रिनेत्र
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अगर यह खबर सच है, कुछेक साल पहले के हर्बल पेट्रोल की तरह गलत खबर नहीं है, तो फिर निश्चित रूप से यह हमारे बहुत काम का है. जिनकी आँखें नहीं हैं, उनके लिए तो ख़ैर यह खोज वरदान है ही, मेरे जैसे लोग जिनकी दो-दो अच्छी-भली आँखें हैं, उनके लिए भी यह वरदान से कम नहीं है.

मैं भी चाहूँगा कि त्रिनेत्र धारी भगवान शिव की तरह मेरे भी तीन नेत्र हों. परंतु वे माथे पर, बीचों-बीच नहीं हों. मैं चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र मेरे सिर के पीछे की तरफ हो, जिससे कि मैं अपने पीठ पीछे बातें करने वालों को देख सकूँ. पीठ-पीछे वार करने वालों से बच सकूँ. और यह देख सकूँ कि मेरे पीठ पीछे क्या-क्या होते रहता है.

कभी मैं यह भी चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र पैरों में ठेठ अँगूठे के पास हो. ताकि मैं देख सकूँ कि देश दुनिया में टेबल के नीचे लेन-देन का व्यापार किस तरह चलते रहता है.

मैं यह भी चाहूँगा कि भोले भंडारी की तरह मेरे तीसरे नेत्र में वह शक्ति प्राप्त हो जिससे समाज की बुराइयों का अंत देखते ही हो जाए, और मेरा वह तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहे...
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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल यानी हज़ल के तर्ज पर)
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समाज…

इंडीब्लॉगीज़ के पुरस्कार विजेताओं ने शुरु की चैरिटी

इस दफ़ा के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के विजेता अमित और अतुल ने अपने-अपने पुरस्कार की राशि को चैरिटी के नाम समर्पित करने की घोषणा की है. उन्होंने पुरस्कार राशि से समाज के गरीब बच्चों के लिए नोटबुक्स खरीद कर वितरित करने का आग्रह मुझसे किया है.
मैंने पास ही के एक गांव में वहाँ के हाई स्कूल के प्रिंसिपल श्री करमरकर से इस सम्बन्ध में बात की. उनका कहना है कि गांव के प्राय: सभी बच्चे गरीब हैं. अभी दसवीं कक्षा के बच्चों की प्री-बोर्ड परीक्षा चल रही है. स्कूल में घोषणा कर दी गई है कि जो बच्चे प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रथम दस स्थान प्राप्त करेंगे उनमें से प्रत्येक को 100-100 रुपए मूल्य के नोटबुक्स पुरस्कार स्वरूप दिए जाएँगे. जाहिर है ये पुरस्कार अमित और अतुल के सहयोग से दिए जाएँगे. परीक्षा परिणाम फरवरी मध्य में आने की संभावना है. तदुपरांत गरीब परंतु सुपात्र बच्चों को ये नोटबुक्स प्रदान किए जाएँगे. उन बच्चों के विवरण आपको तब पढ़ने को मिलेंगे.

धन्यवाद अमित और अतुल. और धन्यवाद इंडीब्लॉ... ओह.. देबाशीष. (आख़िर भाई लोगों ने आपकी आइडेंटिटी ओपन करवा ही ली :))

लघुकथा

याचक

भरी दुपहरी में, ज्येष्ठ के महीने में, जब रोहिणी नक्षत्र में सूर्य अपनी पूरी तपन वातावरण में प्रेषित कर रहा था, एक याचक नंगे पाँव द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांग रहा था.

कुछ ने उस याचक की याचनामयी आवाज़ों को गर्मी के भय से अनसुना कर दिया और अपने द्वारों के पट नहीं खोले. कुछ ने उसे लाखों लानतें भी भेजीं, क्योंकि उसने अपनी द्रवित आवाज़ों से लोगों के आराम में खलल पैदा कर दिया था.

कुछ को उसकी याचनामयी आवाज और उसकी बीमार, कृशकाय काया असर कर गई और उसे कुछ-कुछ कहीं से मिल भी गया. एक को उसका दोपहर की तपती धूप में नंगे पाँव याचनारत रहना जरा ज्यादा ही द्रवित कर गया और उसने अपना फटा पुराना जूता जो कचरे के डब्बे में डालने के लिए अलग रख दिया था, निकाला और याचक को दे दिया, ताकि उसके पाँव को तपती धरती से थोड़ी राहत तो मिले.

याचक ने हजारों धन्यवाद देते हुए उस जूते को कृतज्ञता से तत्काल पहन लिया, परन्तु दो द्वारों के आगे जाने के उपरांत उसने उन जूतों को अपने पैर से उतारा और अपने थैले में रख लिया.

वह दानवीर जिसने अपना जूता दिया था, अपने सत्कर्म से गदगद उस याचक को थोड़ा सा आगे जाकर भी देख रहा था कि उसका …

आर. के. लक्ष्मण का आम आदमी...

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आम आदमी को पद्म विभूषण

इस दफ़ा 26 जनवरी 2005 को पद्म पुरस्कारों में आम आदमी भी पुरस्कृत हुआ है. आर. के. लक्ष्मण को पद्म विभूषण का पुरस्कार प्रदान किया गया है. इसके लिए उन्हें ढेरों बधाईयाँ. आम आदमी की पीड़ा को अपनी कूँची से गढ़कर, अपने पैने व्यंग्य चित्रों से तो वे पिछले अर्द्ध शती से लोगों को बताते आ ही रहे हैं, समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा की विषमताओं पर भी वे तीख़े ब्रश चलाते हैं. वे धरती के सर्वकालिक महान कार्टूनकार हैं, जो समाज को आईना दिखाते आ रहे हैं. इस अवसर पर यह ग़ज़ल उन्हें समर्पित है:

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ग़ज़ल
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मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
हम खुद से खुद को छुपाते रहे

दूसरों की रोशनियाँ देख देख के
आशियाना अपना ही जलाते रहे

कहाँ तो चल दिया सारा जमाना
हम खिचड़ी अपनी बैठे पकाते रहे

यूँ दर्द तो है दिल में बहुत मगर
दुनिया को गुदगुदाते हँसाते रहे

कभी तो उठेगी हूक दिल में रवि
यही सोच कर ग़ज़लें सुनाते रहे

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सानिया वायरस...

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सानिया वायरस का हमला...


अन्ना कुर्निकोवा वायरस के बाद टेनिस जगत में अब सानिया मिर्ज़ा वायरस का हमला हो चुका है. आस्ट्रेलियन ओपन में तीसरे दौर तक पहुँचने और सेरेना विलियम्स को तगड़ी टक्कर देने के बाद इस ख़ूबसूरत बाला का इन्फ़ेक्शन महामारी की तरह प्रिंट और दृश्य-श्रव्य माध्यम में फैल गया है. जहाँ सहारा समय ने पूरे पेज का सानिया पिनअप गर्ल फोटो प्रकाशित किया है तो वहीं सानिया दिन में 8-10 घंटे का इंटरव्यू दे रही है और पत्रकारों की कतारें हैं कि कम ही नहीं हो रहीं. टाइम्स ऑफ इंडिया के एडीटोरियल बहस में भी सानिया अवतरित हो गई. कई सालों बाद क्रिकेट को किसी एक व्यक्ति ने आखिरकार फ़ीका कर ही दिया.



इस ब्लॉग में भी इनफ़ैक्शन हो गया और ग़ज़लों में शब्द गुम हो गए. आशा करें कि यह इनफ़ैक्शन फैले. इसीलिए आइए, हम दुआ करें कि सानिया आगे और कामयाब हो, ताकि उससे प्रेरणा ले कुछ सानियाएँ और अवतरित हों और हम भारतीय, क्रिकेट से आगे की भी कुछ सोचें...

गंदे लोग

चित्र
महोदय, हम सचमुच गंदे लोग हैं.

गुरचरण दास ने अजमेर यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए पिछले सप्ताह टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि वहाँ के संगमरमर से बने सुंदर, ऐतिहासिक बड़ा दारा के चहुँओर कचरों का अंबार लगा हुआ था क्योंकि आसपास कचरा पेटी का अकाल था. लोग दीवारों की आड़ में सरेआम थूक मूत रहे थे क्योंकि आसपास कहीं कोई टॉयलेट नहीं था. बड़ा दारा एक पर्यटन स्थल भी है जहाँ हजारों की संख्या में सैलानी नित्य आते हैं.

भाई गुरचरण दास, यह स्थिति तो मेरे रतलाम में भी है. और रतलाम क्या भारत के प्राय: सभी नगरों, शहरों और गांवों में है. 2 लाख की जनसंख्या वाले पूरे रतलाम शहर में एक भी, फिर-से, एक भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है. अगर आप शहर में किसी काम से निकले हों और आपको जोर की पेशाब आने लगे तो आपके सामने, अपने सामने की किसी झाड़ या दीवार का आड़ लेकर मूतने के सिवा और क्या रास्ता हो सकता है? पान खाकर पीक थूकने के लिए तो खैर भारत में कहीं कोई समस्या ही नहीं है- कहीं भी थूक सकते हैं- सड़कों पर चलते चलते भी और बिल्डिंगों की सीढ़ियों पर भी... कहीं अगर कचरा पेटी या थूकदान होता भी है तो आदत से लाचार लोग उसक…

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