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December, 2004 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नया साल नया संकल्प

नए साल के नए संकल्प :)

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आज सुबह-सुबह एक मित्र ने दुर्ग से फ़ोन पर बधाईयाँ देते हुए कहा कि तुम्हारा व्यंग्य लेख- ‘नए साल के नए संकल्प’ बहुत ही बढ़िया है, और पढ़ने में मज़ा आया. उसने आगे यह भी कहा कि मैं भी सोच रहा हूँ कि तुम्हारे बताए रास्ते का कोई संकल्प लूँ ताकि उसे निभाने में आसानी तो रहे ही, मजा भी आए.



मुझे कुछ आश्चर्य हुआ. मैंने उससे पूछा कि वह लेख तुमने कहाँ पढ़ा. मुझे लगा कि वह भी अब इंटरनेट पर सैर करता होगा. परंतु उसने कहा कि यहाँ का एक दैनिक अख़बार निकलता है उसमें तुम्हारा यह आलेख रविरतलामी के नाम से छपा है. मुझे सुखद आश्चर्य हुआ.



दरअसल यह आलेख इंटरनेट पर मेरी व्यक्तिगत साइट पर तथा विश्वजाल की हिन्दी पत्रिकाअभिव्यक्ति पर पिछले साल भर से है. अगर यह आलेख कहीं किसी प्रिंट मीडिया में छपा हुआ होता तो कब का किसी रोड साइड ठेले के समोसे-भजिए में लपेटा जाकर गुम हो चुका होता. परंतु अजर अमर इंटरनेट पर एक बार आपने इसे प्रकाशित कर दिया तो फिर यह भी अजर अमर हो गया. उस अख़बार ने इस लेख को इंटरनेट पर से ही उतारा और छाप दिया. धन्यवाद उस अख़बार को कि कम से कम उसने मेरा नाम भी लेख के साथ दि…

अनुगूंज में लालू की गूंज...

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जय हो श्री 1008 श्री लालू महाराजा की
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लालू भगवान:

पिछले दिनों पटना के बहादुरपुर इलाके में लालू भक्तों द्वारा लालू वंदना पंडाल बनाया गया जिसमें लालू, राबड़ी तथा सोनिया के देवी-देवताओं सरीखी तथा अटल बिहारी और आडवाणी की राक्षसों जैसी मूर्तियाँ बनाई गईं और ‘लालू नाम केवलम्’ के मंत्रों के साथ देवताओं के उत्थान और राक्षसों के विनाश की कामना करते हुए यज्ञ किया गया और आहुतियाँ दी गईं. कार्यक्रम में लोगों की अच्छी-खासी उपस्थिति भी रही. चुनाव जो सर पर हैं, और टिकट पाने के ख्वाहिशमंदों की संख्या भी कम नहीं है. जय हो श्री 1008 श्री लालू महाराजा की. इससे पहले लालू चालीसा की रचना हो चुकी है और उसकी प्रतियाँ भी छप-बंट चुकी हैं. लालू को उनके भक्त कृष्णावतार बताते हुए कई यज्ञ पहले भी कर चुके हैं. पर क्या लालू यह भक्ति उनके कुर्सी पर बने रहते रह पाएगी या फिर उनके सत्ताहीन होने के उपरांत भी जारी रहेगी? यह बात लालू स्वयं ज्यादा जानते होंगे.

लालू भगवान और भगवान विश्वकर्मा:

बारंबार हो रही रेल दुर्घटनाओं को देखते हुए लालू जी अपने अख़बार ‘राजद’ (जो लालू का लालू के लिए लालू के द्वारा है) में फर्माते हैं कि …

द ग्रेट इंडियन ट्रेन जरनी

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भारत में एकशानदाररेल यात्रा


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सिर्फ एक ? शायद नहीं. बल्कि भारत में आपको ऐसी कई शानदार यात्राएँ करने के लिए रोज बरोज मिलेंगी. वृत्तांत यूँ है: इनडिफरेंट, चलताऊ रवैये के कारण भारत की एक प्रमुख रेलगाड़ी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ जो दिल्ली से पटना (जो सौभाग्य से रेल मंत्री लालू यादव का शहर भी है) के बीच चलती है, पिछले दिनों बिना राशन पानी के पूरे बीस घंटे लगातार चलती रही और यात्री जिसमें नन्हे मुन्ने बच्चे भी थे, भूखे प्यासे परेशान होते रहे.

सम्पूर्ण क्रांति रेलगाड़ी में सभी श्रेणियों में यात्रियों के खाने पीने की व्यवस्था रेलगाड़ी के भीतर ही रसोई भंडार यान में भंडारित सामग्रियों से की जाती है, चूंकि दिल्ली से पटना की 20 घंटे की यात्रा में रेलगाड़ी बीच में सिर्फ दो स्थानों पर कुछ समय के लिए ही रूकती है. खाने पीने की व्यवस्था के लिए रेलवे द्वारा टिकट के साथ ही अलग से पैसा वसूल लिया जाता है.

कोहरे (?) के कारण पटना से दिल्ली आने वाली सम्पूर्ण क्रांति रेलगाड़ी बहुत अधिक देरी से दिल्ली पहुँची. जब यह दिल्ली पहुँची तो इसके वापस पटना लौटने का समय हो गया था. चूंकि यही रैक वापस पटना जाती है, अत: ताब…

चुनाव साड़ी और मिठाइयाँ

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चुनाव आया मिठाईयों का मौसम लाया

चुनाव का मौसम आया तो लालू यादव को याद आया कि अरे, उन्हें रेल मंत्री बने तो साल भर होने जा रहा है और उन्होंने दलित महिलाओं को अभी तक मिठाई नहीं खिलाई है. अत: वे चले मिठाई खिलाने. जेब से करारे नोटों की गड्डियाँ निकालीं और सौ-सौ रूपए मिठाई खाने के लिए बाँटने लगे. अब निगोड़ा चुनाव का मौसम बीच में टपक पड़ा सो वे क्या करें. लोगों ने बेकार ही इसे चुनाव के साथ जोड़ दिया. या शायद अच्छा ही किया. अब बिहार का हर दलित यह उम्मीद तो कर ही सकता है कि लालू के राज में भले ही उसे कुछ न मिले, पाँच साल में कम से कम एक बार सौ रूपए की मिठाई खाने को तो मिल सकेगी.

लालू भाग्यशाली हैं कि मिठाई खाने के लिए पैसे पाने के होड़ में कोई भगदड़ नहीं मची और कोई मरा नहीं. पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान (लालजी टण्डन के जन्मदिवस की खुशी में) महिलाओं को अटल बिहारी बाजपेयी के चुनाव क्षेत्र लखनऊ में साड़ी बाँटी गई थी जिसमें भगदड़ मचने से कई महिलाओं की मौत हो गई थी. पिछले दिनों मेरे शहर में नगर निगम चुनाव हुए और पार्षद पद के कुछ प्रत्याशियों ने वोटरों को जम कर मुफ़्त में दारू पिलाई. अब यह जुदा बात …

भारतीय भाषणबाजियाँ

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भारत और भाषण
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इन्फ़ोसिस के नारायणमूर्ति कहते हैं कि नेताओं को भाषण देने के बजाए काम करना चाहिए. भारत में अब भाषणों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए.

बात वाजिब है. परंतु नेताओं का कोई काम भाषण के बगैर हो सकता है क्या? वे खांसते छींकते भी हैं तो भाषणों में. वे खाते पीते ओढ़ते बिछाते सब काम भाषणों में करते हैं. कोई उद्घाटन होगा, कोई समारोह होगा तो कार्यक्रम का प्रारंभ भाषणों से होगा और अंत भी भाषणों से होगा. संसद के भीतर और बाहर तमाम नेता भाषण देते नजर आते हैं, और उससे ज्यादा इस बात पर चिंतित रहते हैं कि उनकी बकवास को हर कोई ध्यान से सुने. दो रेलगाड़ियाँ आपस में भिड़ती हैं तो मांग की जाती है कि रेल्वे मंत्री वक्तव्य दें. कहीं कोई घोटाला होता है तो विरोधी चिल्लाते हैं कि प्रधानमंत्री वक्तव्य दें. राजनेताओं का तो खाना ही हजम नहीं होता होगा जब तक वे भाषण नहीं देते हों. मुझे तो लगता है कि कोई नेता अपनी प्रेयसी से प्रेम का इजहार भाषणों से ही करता होगा. आज भारत की पूरी सियासत वक्तव्यमय-भाषणमय हो गई है.

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ग़ज़ल
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गुम गया मुल्क भाषणों में
जनता जूझ रही राशनों में

नेताओं की है कोई जरूरत

ये इंडियन क़ानून है !

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बाजी.कॉमः प्रा-जी, ये इंडियन क़ानून है !

बाजी.कॉम के सीईओ अवनीश बजाज को पिछले दिनों नई दिल्ली में गिरफ़्तार कर 6 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. उनका जुर्म? उनका जुर्म ये है कि वे बाजी.कॉम जैसे विश्वस्तर के इंटरनेट आधारित स्वचालित ऑनलाइन खरीद-बिक्री केंद्र सुविधा मुहैया करवाने वाले पोर्टल के भारतीय मूल के सीईओ हैं.

किसी व्यक्ति ने बाजी.कॉम पर एमएमएस आधारित अश्लील सीडी बेचने के लिए रख दी, और उसकी कुछ प्रतियाँ बिक भी गईँ. बाजी.कॉम पर जाहिर है, रजिस्ट्रेशन शर्तों को हामी भरने के उपरांत कोई भी रजिस्टर्ड व्यक्ति उन शर्तों का उल्लंघन करते हुए कुछ भी बेच सकता है, चूंकि लाखों की तादाद में खरीदी बिक्री किए जाने वाले सामानों पर व्यक्तिगत निगाह रखना असंभव तो है ही, बल्कि आज के जमाने में ऐसा करना मूर्खता भी है. यही बाजी.कॉम पर हुआ और जिस व्यक्ति ने अश्लील सीडी बेची, उसे तो खैर पकड़ा ही गया, परंतु बाजी.कॉम के सीईओ को भी भारतीय पुलिस ने पकड़ लिया कि भाई अश्लील सीडी बिकी तो तेरी दुकान से ही है !

यानी बाजी.कॉम को करना यह था कि जो भी वस्तु उस पोर्टल पर खरीदी बिक्री के लिए आए, उसे उसका सीईओ व्…
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हिंदीमेंटाइपकरनामुश्किल? कतईनहीं



क्या आपको पता है कि कम्प्यूटर में काम करने के लिए 12 भारतीय भाषाओं हेतु 126 प्रकार के कुंजी पटल विन्यास उपलब्ध हैं? अकेले हिंदी में
ही दर्जनों कुंजीपटल विन्यास -सुषा से लेकर इनस्क्रिप्ट तक हैं. कम्प्यूटरों के
लिए हिंदी का आज भी कोई मानक कुंजी पटल नहीं है. अब तक तो अंग्रेजी फ़ॉन्ट को हिंदी रूप देकर और उसके आधार पर अपना नया कुंजीपटल विन्यास बनाकर लोगों ने छोटा रास्ता निकाला था जिससे भला होने के बजाए नुकसान ही ज्यादा हुआ. फिर किसी ने अपना माल मुफ़्त उपयोग के लिए भी जारी नहीं किया (इसमें सरकारी एजेंसियाँ भी शामिल हैं, जो जनता के टैक्स का भारी भरकम पैसा भकोस लेती हैं – पर यहाँ बेचारे डेवलपरों को न कोसें, बल्कि योजना बनाने वाले सरकारी बाबुओं को कोसें), भले ही लोग पायरेसी के लिए भी उस उत्पाद (उदा. लीप ऑफ़िस) को न पूछें. वो तो भला हो भारतभाषा जैसी भली
जगह से आए शुषा सीरीज के मुफ़्त फ़ॉन्ट का जिसके दम खम पर
आज हिन्दी की कई साइटें बख़ूबी चल रही हैं.


परंतु यूनिकोड के प्रचलन में आने से हम में से प्रत्येक को अंततः यूनिकोड फ़ॉन्ट का रास्ता पकड़ना ही होगा. इंटरनेट पर …
यिप्पी ! याहू ! हुर्रे ! इंडीब्लॉगीमें माइक्रोसॉफ़्ट पुरस्कार ! !

मुझे माफ कीजिएगा यदि मैं उत्तेजना में आकर ज्यादा ही उछलकूद मचा रहा होऊंगा. परंतु बात ही कुछ ऐसी है. इंडीब्लॉगी 2004 में पुरस्कारों की सूची में कुछ और नाम जुड़ गए हैं, और उनमें है माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा भी एक पुरस्कार प्रदाय किए जाने की घोषणा. धन्यवाद माइक्रोसॉफ़्ट तथा धन्यवाद दीपक गुलाटी जिनके प्रयासों से माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा पुरस्कार प्रायोजित किया गया. अब कुल मिलाकर आधा दर्जन से ज्यादा पुरस्कार हो गए हैं.

तो दोस्तों अपने नॉमिनेशन्स और अपने ब्लॉगों की धार और पैनी कीजिए और शामिल होइए इंडीब्लॉगी 2004 में. एक अच्छी खबर यह भी है कि नॉमीनेशन की तारीख आगे बढ़ कर 31 दिसम्बर हो चुकी है. अतः बन पड़े तो छूट चुके अपने दोस्तों को भी खबर कर दें. अधिक जानकारी के लिए इंडीब्लॉगी देखें.
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इंडिया क्रम्बलिंग ?

इंडियन एक्सप्रेस में पिछले कुछ दिनों से समाचार सीरीज छप रहा है कि किस प्रकार कर्नाटक की नई सरकार सत्ता में आते ही बैंगलोर के लिए लिए गए पिछली सरकार के निर्णयों, कार्यों और खासकर विकास कार्यों को जानबूझ कर रोक रही है. जिसके कारण बैंगलोर बर्बाद होता जा रहा है. यह सब क्षेत्रीय राजनीति के तहत हो रहा है. प्रदेश तथा देश के विकास कार्यों से राजनीतिज्ञों को कोई लेना देना नहीं है.
यह स्थिति कमोबेश भारत भर में है. दरअसल राजनीतिज्ञों को अपनी और अपनी पार्टी के अलावा अन्य किसी के विकास में कोई दिलचस्पी नहीं है. जो भी कार्य किए जाते हैं वह सत्तारूढ़ पार्टी की भलाई के लिहाज से किए जाते हैं. किसी पार्टी की सरकार अगर कोई काम करती है, तो विरोधी पार्टी को उसमें भ्रष्टाचार नज़र आता है. सरकार बदलते ही उसमें मीन मेख निकाल कर उन कार्यों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं. नतीजतन भारत देश जहाँ साधनों संसाधनों की कोई कमी नहीं है, जहाँ का तहाँ खड़ा है.
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ग़ज़ल
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ईमान का रास्ता और था
मैं चला वो रास्ता और था

चला तो था दम भर मगर
मंजिल का रास्ता और था

तेरी वफा की है बात नहीं
हमारा ही रास्ता और था

क…

हिन्दी समूह

जालघरकेहिन्दीसमूह


जालघर के समूहों की अपनी दुनिया है. भांति-भांति केलोगों ने भांति-भांति के समूहों का सृजन जालघर में किया हुआ है. यहाँ किसी समूहमें आपको किसी क्लिष्ट विषय पर गहन चर्चा में रत लोग मिलेंगे तो वहीं किसी अन्य समूह में हल्के फुलके हास परिहास की बातें चल रही होंगी. कहीं इतिहास पर शोध की
बातें हो रही होंगी तो कहीं तकनालॉजी पर बहसें हो रही होगीं. और यह भी संभव है कि किन्हीं समूहों में स्तरहीन विषयों पर स्तरहीन चर्चाएँ चल रही हों. फिर भी, जालघर के समूह न केवल व्यक्ति के ज्ञान को परिमार्जित करने का अच्छा खासा कार्य रहे हैं बल्कि विचारों के आदान-प्रदान के लिए विश्व-स्तर पर मौलिक मंच प्रदान कर रहे हैं.
जालघर के समूह दरअसल वैश्विक गोष्ठी स्थल हैं जहाँ आप बेझिझक अपनी बात चार लोगों के बीच कह सकते हैं और चार लोगों की बेबाक बातें भी जान सकते हैं.अपनी बात कहने के लिए या अपने विचारों से मिलते जुलते बातों के बारे में जानने के लिए आप भी जुड़ सकते हैं जालघर के किसी ऐसे समूह से जिसे आप समझते हैं आपकी रुचि का है. और अगर आपको आपकी रुचि से मिलता जुलता कोई समूह नहीं भी मिलता है, तो भी कोई बात …
एक और हिंदी ब्राउज़र
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लगता है सचमुच, प्यारी बहना हिंदी के दिन फिर गए हैं. विश्व का सबसे आधुनिक, सबसे ज्यादा सुरक्षित और सबसे ज्यादा तेज़ी से लोकप्रियता की ओर अग्रसर होता हुआ ब्राउज़र- मोज़िला फ़ायरफ़ाक्स 1.0 हिंदी में जारी किया जा चुका है.
इस मर्तबा भी, संयोग से इसके जारी करने वाले हैं छत्तीसगढ़ (पूर्व मध्यप्रदेश) के भिलाई-दुर्ग के पंकज ताम्रकार. इसके हिंदी अनुवाद में पंकज का सहयोग दिया है आसिफ इकबाल ने.

स्क्रीनशॉट देखें

इसी के साथ ही ई-मेल क्लाएंट मोजिला थंडरबर्ड (थंडरबर्ड नाम का तूफ़ानी पंछी अनुवाद शायद ठीक नहीं है पंकज भाई) भी हिंदी में जारी किया गया है.

पंकज को उनके इस गंभीर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई. हिंदी अनुवाद में मात्रा की कुछ ग़लतियाँ तो हैं हीं जिन्हें फिर भी छोड़ा जा सकता है, परंतु अनुवादों में कई मेन्यू शब्दों को माइक्रोसोफ्ट तथा लिनक्स हिंदी से बिलकुल ही अलग, प्रायः सीधा अनुवाद दे दिया गया है जिससे इसके उपयोग में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है. उदाहरण के लिए, बुकमार्क को माइक्रोसोफ्ट तथा लिनक्स में पसंद तथा पसंदीदा शब्द दिया गया है, परंतु थंडरबर्ड में स्मरण संकेत. उम…

कतरनें

कतरी हुई कतरनें
इस ब्लॉग में उपयोग की गई कतरनें प्रायः लोगों को रुचिकर प्रतीत होती हैं. हालाँकि इन कतरनों का प्रयोग संदर्भ वश किया जाता है, परंतु कभी-कभी कतरनों के मूल अवयव ज्यादा ही रोचक होते हैं. कुछ पाठकों ने कतरनों को अधिक स्पष्ट बड़े और पढ़े जा सकने लायक आकार में शामिल करने की मांग की है. बड़े आकारों के चित्रों को लिंक के रूप में देने की कोशिश रहेगी ताकि वेब पृष्ठ अनावश्यक रूप से भारी न हो जाए.

मैंने फ्लिकर, हैलो, पिकासा इत्यादि का उपयोग किया है तथा ये साइटें पता नहीं क्यों चित्रों को फिर से कॉम्प्रेस कर देती हैं जिससे कि वे स्पष्ट नहीं रह पाते. जो जोकर जैसा मेरा चित्र बाजू में दिख रहा है, वह फ्लिकर का किया धरा है. लोगों का कहना है कि मैं इस चित्र में जैसा दिखता हूँ उससे कहीं ज्यादा बेहतर दिखता हूँ :)

बड़े आकारों के सुस्पष्ट चित्रों को मुफ़्त होस्ट करने वाली अन्य उचित साइटों के बारे में अगर आपको पता हो तो कृपया मुझे खबर करें.

हिंदी ब्राउज़र

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गाँव-देहातसेआयाहिंदीमेंब्राउज़रःडांगीसॉफ़्टआई-ब्राउज़र++
कौन कहता है कि आसमान में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों. मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे, गंज बसौदा के रहने वाले जगदीप सिंग डांगी ने कम्प्यूटर जगत के आसमान पर वो पत्थर उछाला है, जिसके फलस्वरूप प्रकाश की जो किरणें फूट रही हैं, वे भारतीय कम्प्यूटर उपयोक्तताओं के कार्य के माहौल को आने वाले दिनों में न सिर्फ खासा प्रभावित करेंगी, आम ग्रामीण जन तक कम्प्यूटरों तथा जालघर की पहुँच को अति आसान भी बनाएँगी. और ग़ज़ब बात यह है कि एक साधारण से किसान के बेटे जगदीप भले ही थोड़े से फ़िजीकली चैलेन्ज्ड हैं, परन्तु मानसिक रूप से बिलकुल नहीं. उनके सभी सहपाठी इंजीनियर बंधु तक यह स्वीकार करते हैं कि जहाँ वे विभिन्न एमएनसीज् में अपना भविष्य बनाने में लगे हैं, निपट देहात में जन्मे-जमे जगदीप निःस्वार्थ भाव से जन-कल्याण के सॉफ़्टवेयर विकसित करने में लगे हैं. उनका सपना है हिंदी में आपरेटिंग सिस्टम तैयार करने का.जगदीप ने गंज बसौदा जैसे छोटे से जगह में रहते हुए ही तीन वर्षों के अथक परिश्रम से हिंदी भाषा इंटरफेस युक्त एक वेब ब्राउज़र तथ…

करोड़ पति नेता

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करोड़ पतिएमपी - एमएलए

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महाराष्ट्र के पिछले चुनाव में एक तिहाई एमएलए ऐसे विजयी हुए हैं जो करोड़ पति हैं. करोड़ो रुपयों की संपत्ति जो उन्होंने मजबूरन घोषित की है वह चुनाव आयोग की अनिवार्यता के कारण घोषित की है. भारत के मौजूदा एमपी के बारे में इंडिया टुडे, आउटलुक और इंडियन एक्सप्रेस जैसे समाचार पत्र पत्रिकाओं ने पहले ही प्रकाशित किया है कि इनमें से सौ से ऊपर ऐसे हैं जिनके ऊपर किसी न किसी वजह से मुक़दमे चल रहे हैं और कइयों पर तो हत्या जैसे गंभीर अपराधिक प्रकरण चल रहे हैं. वैसे भी अब एक चुनाव में लड़ने के लिए जहाँ लाखों रुपयों की आवश्यकता होती है, एक आम आदमी के किसी चुनाव में खड़ा होकर उसका जीत पाना अब असंभव हो गया है. ऐसी स्थिति में अगर हमारे एमपी और एमएलए करोड़ पति या बाहुबली नहीं होंगे तो और क्या होंगे. आम आदमी की स्थिति तो एक सच्चे वोटर की भी नहीं रह गई है. जब वह वोट देने जाता है तो पता चलता है कि उसका वोट तो कोई लठैत पहले ही डाल चुका है, या उस आम आदमी का वोट एक एद्धा दारू की बोतल में पहले ही बिक चुका है या फिर उस आम आदमी का वोट जाति, धर्म, क्षेत्रवाद ने पहले ही खरीद लिया है.
चल…

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