टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

October 2004

रोड ब्लॉक
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क्या आप विश्वास करेंगे कि मेरे घर से रेलवे स्टेशन तक की कुल 2.5 कि. मी. सड़क में 12 स्पीड ब्रेकर्स बने हुए हैं, और इससे तीन गुना अधिक छोटे बड़े गड्ढे हैं. आवारा पशुओं (माफ़ कीजिएगा, इनमें हमारी गाय माता प्रमुख है), स्ट्रीट वेंडर्स और असभ्य वाहन चालकों (मैं भी शामिल हूँ) की वजह से रास्ता नरक की ओर सैर का वास्तविक अहसास कराता है.



और, यह स्थिति कमोवेश भारत के सभी सड़कों में है, चाहे वह मेरे यार के घर की गली हो या कोई नेशनल हाइवे हो.

प्लानिंग कमीशन की तथा कुछ अन्य रपट के अनुसार, भारत की खराब, खस्ता हाल, अपर्याप्त सड़कों के कारण प्रतिवर्ष 10,000 करोड़ रुपयों का नुकसान भारत को होता है. इसके अलावा प्रतिवर्ष 75000 से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं. जहाँ ट्रकों का वैश्विक औसत 600 से 800 कि.मी. प्रतिदिन चलने का है, भारत में यह औसत मात्र 250 से 300 कि.मी. प्रतिदिन है. सड़कों के स्पीड ब्रेकर और गड्ढों के अलावा साथ में जगह-जगह अवैध वसूली के बैरियर और भी बाधा डालते हैं.


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ग़ज़ल
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जन्नत को समझे थे यार की गली
उम्र गुज़ारी ढूंढने में बहार की गली

इंकलाब इतिहास की बात है शायद
बन्द किए हैं सबने सुविचार की गली

दर्द की तफ़सील तो वो ही बताएगा
जो चला है किसी प्यार की गली

याद दिलाने का शुक्रिया दोस्त पर
आज कौन चलता है करार की गली

रवि बताने चला है रंगीनियाँ पर वो
चला ही नहीं किसी त्यौहार की गली

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संभावनाओं से परिपूर्ण भारत देश
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जो लोग भारत देश में उपलब्ध संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं, उनके लिए प्रस्तुत है कुछ नई, ताजातरीन संभावनाएँ.
1. वी. जे. कुरियन ने देश का पहला निजी क्षेत्र का वायु अड्डा कोच्चि में बनाया. पर यह कोई संभावना नहीं हुई. दरअसल बड़ी संभावना यह हुई कि इस निजी क्षेत्र के वायु अड्डे को बनाने के लिए उन्हें ट्रेड यूनियनों को आइडलनेस मनी देना पड़ी ताकि वे उपद्रव नहीं मचाएँ और वायु अड्डा बनाने के काम में रोड़े नहीं अटकाएँ. यह हुई बड़ी संभावना. अब आप भी कोई ट्रेड यूनियन बनाइये या बने हुए का पालनहार बनिए और आइडलनेस मनी प्राप्त करने की नई नई संभावनाएँ तलाश करिए. भारत में बहुत संभावनाएँ हैं.
2. फिर से, बिहार में ईजाद की हुई संभावना जो पूरे देश में लागू की जा सकती है. पटना में 600 करोड़ रूपयों के एनएससी और किसान विकास पत्र ट्रांजिट के दौरान गुम हो गए. गुमे हुए एनएससी और किसान विकास पत्र वहाँ के कुछ ठेकेदारों द्वारा सरकारी कोषालयों में मार्जिन मनी के रूप में जमा करवाए जाने के रूप में काम में लिए जाने लगे. चूंकि यह सिर्फ एक काग़ज़ ही होता है, और इसका अंतिम भुगतान संभव नहीं (शायद कहीं यह संभावना भी पूर्ण हो गई हो) अतः इसका उपयोग कॉशन मनी / मार्जिन मनी के रूप में धड़ल्ले से किया जाता है. जाली स्टाम्प पेपर्स की संभावना तो इतर ही है. (जिसमें हजारों करोड़ रूपए के घोटाले किए गए और जिसमें नामी राजनीतिज्ञ से लेकर उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी तक लिप्त बताए जाते हैं.)
3. ऊपर दी गई संभावनाओं में हो सकता है कि आपको कोई मजा नहीं आए. तो लीजिए आपके लिए एक अनूठी संभावना. भारत के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट मुम्बई में अकसर भयानक भीड़ और ट्रकों का जाम लग जाता है, चूंकि यहाँ भी इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है. माफिया के कुछ लोग और ट्रस्ट के कुछ कर्मचारी मिलकर जो ट्रक ड्राइवर उन्हें एन्ट्री फीस देते हैं उनकी माल ढुलाई प्राथमिकता से करते हैं, बाकी 10-15 दिनों तक (हे भगवान!) अपनी बारी का इंतजार करते हैं. यहाँ आपको संभावना नज़र नहीं आई ? अरे भाई आप भी ऐसी जगहों पर बैठिए (ढेरों मिलेंगे) जहाँ जाम लगता हो, कुछ सांठ गांठ करिए. बस संभावनाएँ ही संभावनाएँ.
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ग़ज़ल
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लहरें गिनने में सुनी संभावनाएँ हैं
ख़ून के रिश्तों ढूंढी संभावनाएँ हैं

जब से छोड़ा है ईमान का दामन
मिलीं संभावनाएँ ही संभावनाएँ हैं

माँ तेरे दूध में भी अब तेरे बच्चे
तलाश लेते ढेर सी संभावनाएँ हैं

मेरी हयात का ये नया रंग कैसा
कैसे तो दिन कैसी संभावनाएँ हैं

अब कोई और ठिकाना देख रवि
चुक गई यहाँ सारी संभावनाएँ हैं

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कंप्यूटर जगत में हिंदी का एक और ठोस कदम
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विगत दिवस इंडलिनक्स हिंदी का एक नया संस्करण 0.9 उन्नति जारी किया गया. यह संस्थापन योग्य स्क्रिप्ट तथा आवश्यक फ़ाइलों का समूह है जो कि indlinux-hindi-0.9.tar.gz नाम से टार फ़ाइल के रूप में https://sourceforge.net/project/showfiles.php?group_id=11495&package_id=74293&release_id=276634 से या http://www.indlinux.org/downloads/ से डाउनलोड किया जा सकता है. इसे केडीई 3.2 संस्थापित किसी भी लिनक्स सिस्टम यथा रेडहेट / फ़ेदोरा कोर 2, मेनड्रेक 10, नॉपिक्स 3.4 / 3.6, डेबियन, सूसे इत्यादि में आसानी से संस्थापित किया जा सकता है. संस्थापना हेतु जानकारी/निर्देश टार फ़ाइल में सम्मिलित है.
इस संस्करण में केडीई 3.2 का लगभग संपूर्ण वातावरण वातावरण हिंदी में (90% से अधिक) उपलब्ध है. इसमें खासियत यह है कि आपको कंप्यूटिंग के आवश्यक अन्य ढेरों अनुप्रयोग जो केडीई 3.2 में उपलब्ध हैं, वे भी हिंदी भाषा में ही उपलब्ध होते हैं.

निश्चित ही यह हिंदी कम्प्यूटिंग जगत के लिए एक वामन पग है.

प्रदूषित होती आस्थाएँ – भाग 2

हमारी प्रदूषित होती आस्थाओं का एक और हृदय-विदारक दृश्यः



मैंने अपने पिछले किसी ब्लॉग में लिखा था कि हम अपने धार्मिक पाखंडों के चलते वातावरण में कितना अधिक प्रदूषण फैलाते हैं. सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की बात तो अलग ही है. बिना किसी सामाजिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक दृष्टिकोण के, हम अपने धार्मिक पाखंडों में नित्य नए आयाम भरते जा रहे हैं. पिछले दिनों अहमदाबाद के एक झील में लाखों की तादाद में मछलियाँ मर गईं (ऊपर चित्र देख कर अपने किए पर फिर से आँसू बहाइये). प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बने तथा हानिकारक रंगों से पुते सैकड़ों की संख्या में गणेश प्रतिमाओं के झील में विसर्जन के फलस्वरूप हुए प्रदूषण को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है. स्वयं भगवान श्री गणेश इन लाखों मछलियों की अकारण, अवांछित, असमय, अकाल मौत पर आँसू बहा रहे होंगे.

आइए, इन निर्दोष मछलियों की मृत्यु पर इनकी आत्मा को श्रद्धांजलि देने हेतु हम भी एक मिनट का मौन धारण करें.

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ग़ज़ल
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घड़ियाली आँसुओं के ये दिन हैं
घटिया पाखण्डों के ये दिन हैं

आइए आपका भी स्वागत है
पसरती रूढ़ियों के ये दिन हैं

दो गज़ ज़मीन की बातें कैसी
सिकुड़ने सिमटने के ये दिन हैं

अर्थहीन से हो गए शब्दकोश
अपनी परिभाषाओं के ये दिन हैं

कोई तेरी पुकार सुने क्यों रवि
चीख़ने चिल्लाने के ये दिन हैं

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धन्य धान्य धर्माचार्य…
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दोस्तों, अब इस ख़बर पर सरसरी नज़र दौड़ाइएः



जनाब असगर अली इंजीनियर साहब, उम्मीद है आपने भी यह दिल जलाने वाली खबर पढ़ी होगी. कुछ अरसा पहले यहाँ रतलाम में भी खबर उड़ी थी

कि आसाराम साम्राज्य ने यहाँ का एक अत्यंत विशाल धर्मस्थल करोड़ों में खरीदा है. सिंहस्थ 04 उज्जैन में किसी साधु के द्वारा करोड़ों रुपए के चेक

बैंक में जमा किए जाने की खबर उड़ी थी. धर्माचार्यों की अपनी दुकानें निर्बाध चलती रहें, शायद इसीलिए विश्व भर में धर्माचार्यों द्वारा अपने अपने धर्म

के पाखंडों को जीवित रखने के पूरे प्रयास किए जाते हैं, तथा धर्म में आधुनिक, प्रगतिशील, विज्ञानवादी दृष्टिकोण घुसने नहीं देते. यही वजह है कि

इस तरह के पैरासाइट, हजारों लाखों निठल्लों का मजमा लगाए बैठे रहते हैं और लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर, स्वर्ग तथा आत्मा की मुक्ति का

रास्ता दिखाने इत्यादि बातों में लगाए रखते हैं, जो जाहिर है, उन्हें भी मालूम नहीं होता.

सच है- जब तक हम जैसे बेवक़ूफ़ रहेंगे, होशियार हमारे ज़क़ात से अपनी कोठियाँ बनाते रहेंगे.

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ग़ज़ल
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धर्म की कोई दुकान खोल लीजिए
सियासत के सामान मोल लीजिए

सफलता के नए पैमानों में लोगों
थोड़े से झूठे मुस्कान बोल लीजिए

उस जहाँ की खरीदारी से पहले
अपने यहाँ के मकान तोल लीजिए

रौशनी दिखाने वालों के अँधेरों के
जरा उनके भी जान पोल लीजिए

गाता है कोई नया सा राग रवि
अब आप भी तान ढोल लीजिए

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भारतीय शर्मागार पार्ट 2
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हम कुरूप भारतीय:


मित्रों, जग सुरैया के टाइम्स ऑफ इंडिया (सोमवार, 4 अक्तूबर) में लिखे गए लेख पर एक नज़र डालिएः



उन्होंने सच ही लिखा है कि हम भारतीय दुनिया में सबसे ज़्यादा कुरूप (शारीरिक नहीं) लोगों में से हैं. हम भारतीयों में अनुग्रह और अच्छे सामाजिक व्यवहार की जन्मजात कमी होती जा रही है. ग्राफिक डिटेल में बताते हुए वे आगे लिखते हैं कि भारत की उन्नति (जितनी होनी चाहिए थी उतनी हुई है क्या ?) कारक प्रतीकों यथा फ़ाइव स्टार होटल, भव्य चमकीले शॉपिंग माल इत्यादि के बावजूद सड़कों के गड्ढे, सार्वजनिक स्थलों पर कचरों के अम्बार, आवारा कुत्तों, विचरती गायों के बीच खुले आम थूकते-मूतते भारतीय, हमको विश्व के सबसे कुरूप लोगों में शुमार करते हैं. और, उनका यह भी कहना है कि इस कुरूपता के लिए भारत की गरीबी कतई जिम्मेदार नहीं है, बल्कि एक निपट गांव का निष्कपट ग़रीब तो इन मामलों में निश्चित ही खूबसूरत होता है.
प्रश्न यह है कि क्या यह क्रमशः बढ़ती कुरूपता कभी कम होने की ओर अग्रसर होगी?


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ग़ज़ल
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अपनी कुरूपताओं का भी गुमाँ कीजिए
दूसरो से पहले खुद पे हँसा कीजिए

या तो उठाइये आप भी कोई पत्थर
या अपनी क़िस्मत पे रोया कीजिए

सफलता के पैमाने बदल चुके हैं अब
भ्रष्टाचार भाई-भतीजावाद बोया कीजिए

मुल्क की गंगा में धोए हैं सबने हाथ
बढ़िया है आप भी पोतड़े धोया कीजिए

खूब भर रहे हो अपनी कोठियाँ रवि
उम्र चार दिन की क्या क्या कीजिए

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भारतीय शर्मागार में आपका स्वागत है...

कुछ लोगों का कहना है कि मीडिया अच्छी बातों को इतनी तरजीह नहीं देता जितनी बुरी बातों को. ठीक है, जो घोर आशावादी हैं, उनका यह कहना सही हो सकता है. परंतु बुरी बातों को सामने लाने से कम से कम हम अपनी कमजोरियों पर निगाह डाल कर उसे सुधारने का संकल्प तो ले ही सकते हैं.
प्रस्तुत है एक और बुरी ख़बरः



कितनी बुरी बात है कि भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय में भारत के पुरातन दस्तावेज़ रख रखाव के अभाव में सड़ते जा रहे हैं. भवन में पिछले चार साल से बरसाती पानी चू रहा है! हद की भी कोई सीमा होती है. इन दस्तावेज़ों की सामग्रियों को माइक्रोफ़िल्मों के द्वारा सहेजा जाना तो संस्थान के लिए शायद दूर की कौड़ी लाना होगी.


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ग़ज़ल
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कब तक लूटोगे यारों कुछ तो शर्म करो
चर्चा में आने को कोई उलटा कर्म करो

छिपी नहीं हैं आपकी कोई कारगुजारियाँ
थोड़ा रहम करो अपने अंदाज नर्म करो

जमाने ने छीन ली है रक्त की रंगीनियाँ
बस अपने पेट भरो अपनी जेबें गर्म करो

भाई चारे की तो हैं और दुनिया की बातें
लूट पाट दंगे फसाद का नया धर्म करो

साधु के वस्त्रों में रवि उड़ने लगा जेट से
ये क्या हुआ कैसे हुआ लोगों मर्म करो

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समझदार की रेवड़ी
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दोस्तों, एक दोहा तो आपने भी सुना - पढ़ा होगा. अंधा बाँटे रेवड़ी... परंतु अब रेवड़ी समझदार लोग देख-परख कर बाँटा करते हैं (रेवड़ी, वह भी बाँटने के लिए, भाई, आजकल समझदारों के पास ही होती है) और जाहिर है समझदार रेवड़ी किसको किसको बाँटेगा?



दो जजों की कमेटी ने जाँच के उपरांत पाया है कि जब बीजेपी सरकार में थी, तो उस दौरान जितने भी पेट्रोल पंपों के आबंटन हुए थे, उनमें से ७० प्रतिशत का आबंटन बीजेपी सरकार के सदस्यों के सम्बन्धियों और दोस्तों को अवैध रूप से दिए गए थे.

यह कोई नई बात है? यह तो जग जाहिर है कि सरकार में रहने के लिए, सरकार बनाने के लिए अधिसंख्य लोग लालायित क्यों रहते हैं? देश सेवा के लिए? क्या मज़ाक है!

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ग़ज़ल
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अपने अपने हिस्से काट लीजिए
अपनों को पहले जरा छाँट लीजिए

हाथ में आया है सरकारी ख़जाना
दोस्तों में आराम से बाँट लीजिए

प्याले भ्रष्टाचार के मीठे हैं बहुत
पीजिए साथ व दूरियाँ पाट लीजिए

सभी ने देखी हैं अपनी संभावनाएँ
फिर आप भी क्यों न बाँट लीजिए

सार ये बचा है रवि कि देश को
काट सको जितना काट लीजिए

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