टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

August 2004

ये न्याय है या कु-न्याय
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पिछली पोस्टिंग में बात न्याय में देरी के विषय में थी. बात आगे बढ़ाते हैं. उमा भारती को जेल के बजाए गेस्ट हाउस में ही रखा गया है. राज्य सरकार ने गेस्ट हाउस को जेल का दर्जा दे दिया है. आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या यह सुविधा किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को हासिल हो सकती है? इसीलिए, सिर्फ इसीलिए लोग राजनीति को अपना रहे हैं जिनमें शामिल हैं विजय मलैया से लेकर अंबानी बंधु भी, और इसीलिए वीरप्पन से लेकर चंबल के निर्भय गुज्जर तक राजनीति में आने के लिए फ़ीलर्स भेजते रहते हैं. इसी लिए राजा भैया जेल में बन्द होकर भी पार्टी देते हैं, और आम आदमी की क्या कहें, जिस आईपीएस अधिकारी ने कभी राजा भैया के विरूद्ध प्रकरण बनाया था, सरकार बदलते ही उस अधिकारी के विरूद्ध प्रताड़ना प्रकरण बनाए गए जिस हेतु सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा.

भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में कुछ और गंभीर आंकड़े-

।। लगभग १.८ लाख क़ैदी हवालात में बंद हैं जो अपनी अधिकतम सजा से भी अधिक समय का हवालात पहले ही भुगत चुके हैं. उनका फ़ैसला कब होगा पता नहीं. बेचारे ग़रीब जमानतें भी नहीं करवा सकते.

।। भारतीय जेलों में उनकी निर्धारित क्षमता से कई गुना अधिक क़ैदियों को ठूंसा जाता है. उदाहरण के लिए, एक वक्त गोपालगंज, बिहार के जेल में ५० क़ैदियों की क्षमता वाले जेल में ६५० क़ैदी थे.

।। उच्च न्यायालयों में ३४ लाख प्रकरण निपटारे के लिए पड़े हैं, तथा इसके विरूद्ध न्यायाधीशों के निर्धारित संख्या के ४०% पद खाली पड़े हैं, जो अर्से से भरे नहीं गए हैं. नतीजतन, प्रतिवर्ष १.५ लाख प्रकरण लंबित सूची में और भी जुड़ जाते हैं.

ये न्याय है या कु-न्याय?
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ग़ज़ल
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इस व्यवस्था में जीने के लिए दम चाहिए
सबको अब राजनीति के पेंचो-ख़म चाहिए

ज़र्द हालातों में अब सूख चुकी भावनाएँ
पूरी बात समझने आँखें ज़रा नम चाहिए

नशेड़ियों में तो कबके शुमार हो गए वो
दो घड़ी चैन के लिए भी कुछ ग़म चाहिए

शांति की बातें सुनते तो बीत गई सदियाँ
बात अपनी समझाने के लिए बम चाहिए

बातें बुहारने की बहुत करता है तू रवि
उदर-शूल के लिए तुझे कुछ कम चाहिए

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न्याय, अन्याय और अ-न्याय
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आइये डालते हैं पिछले दिनों की घटनाओं पर एक नज़रः
।। झारखंड में केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन को दो दशक से अधिक पुराने किसी केस में वारंट तामील किया गया, नतीजतन उन्हें अपनी कुर्सी खोना पड़ी.
।। हुबली के एक अदालत ने दस साल पुराने प्रकरण में मध्य प्रदेश की मुख्य मंत्री को १५ दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा. मज़े की बात यह कि उसी सिलसिले के बाकी अन्य अभियुक्तों के प्रकरण राज्य सरकार द्वारा वापस ले लिए गए.
।। बिहार के एक केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के विरूद्ध एक प्रकरण में वारंट तामील हो जाने के बाद आनन फानन में राज्य सरकार ने जन हित में उस प्रकरण को ही वापस ले लिया.
।। मध्य प्रदेश के एक अदालत में विधायक कैलाश विजयवर्गीय बरसों पुराने किसी आंदोलन प्रकरण के सिलसिले में वारंट तामील हो जाने से उन्हें पहले अपनी जमानत करवानी पड़ी तब फिर वे जाकर मंत्री पद की शपथ ले सके.

-- इनमें बिहार के प्रकरण को छोड़कर (जो क्रिमिनल केस था, और जिसे राज्य हित में वापस ले लिया गया!) बाकी सभी राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े प्रकरण रहे हैं. ऐसे, या कोई भी प्रकरण न्याय पाने की उम्मीद में न्यायालय में लगाए जाते हैं पर भारतीय न्यायालय इस मामले में काफी कुख्यात हैं कि एक एक प्रकरण के निपटारे में दशकों लग जाते हैं. लोग कहते हैं कि दस रूपए देकर न्यायालय के बाबू से पेशी की अगली तारीख़ ले ली जाती है. ये न्याय है, अन्याय है या फिर अ-न्याय?

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ग़ज़ल
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कोई ख्वाब देखे जमाना गुज़र गया
क्या आया और क्या क्या गुज़र गया

चमन उजड़े दरख़्तें गिरीं नींवें हिलीं
भला हुआ वो एक गुबार गुज़र गया

मुश्किलें कुछ कम थीं तेरे मिलने पे
न सोचा था वो सब भी गुज़र गया

इन्सानियत तो अब है अंधों का हाथी
वो बेचारा कब जमाने से गुज़र गया

एक बेचारा रवि भटके है न्याय पाने
इस रास्ते पे वो सौ बार गुज़र गया

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अशआरों में अर्थ नहीं
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मेरी ग़ज़लों को लेकर पाठकों की यदा कदा प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती रहती हैं. जो विशुद्ध पाठक होते हैं, वे इन्हें पसंद करते हैं चूंकि ये क्लिष्ठ नहीं होतीं, किसी फ़ॉर्मूले से आबद्ध नहीं होतीं तथा किसी उस्ताद की उस्तादी की कैंची से कंटी छंटी नहीं होतीं. वे सीधी, सपाट पर कुछ हद तक तल्ख़ होती हैं.

परंतु कुछ रचनाकार पाठक और विशुद्धतावादी ग़ज़लकारों को मेरी कुछ ग़ज़लें नाग़वार ग़ुज़रती हैं और वे इनमें से कुछेक को तो ग़ज़ल मानने से ही इनकार करते हैं.

मैं यहाँ मिर्जा ग़ालिब के दो उदाहरण देना चाहूँगा, जो उन्होंने अपने तथा अपने ग़ज़लों के अन्दाज़ के बारे में कभी कहे थे. मुलाहिज़ा फरमाएँ-

न सतायश की तमन्ना न सिले की परवा,
गर नहीं है मेरे अशआर में माने न सही.

तथा यह भी-

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या.

साथ ही यह भी, कि जब ग़ालिब, दीवाने ग़ालिब के लिए अपनी ग़ज़लों की छंटाई कर रहे थे, तो उन्होंने अपने लिखे हुए करीबन २००० से अधिक अशआरों को नष्ट कर दिया चूंकि उनमें शायद वज़नों की कुछ कमी रह गई थी.

बहरहाल मैंने तो अभी लिखना शुरू ही किया है. मेरे अशआर दो हजार से ऊपर हो जाएंगे, तो मैं भी अपने कुछ कम वज़नी अशआरों को नष्ट कर ही दूंगा, ऐसा सोचता हूँ ),

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एक माइक्रॉन मुस्कान
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क्या आपको किसी ऐसे धनाढ्य आदमी का पता है जो अपने पास चार रॉल्स रायस रखता हो? चारों दिशाओं के लिए एक-एक.

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हो गया ओलंपिक
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हम भारतीय, एथेंस ओलंपिक में सिर्फ एकाध मेडल लेकर खुश हो रहे हैं कि भारत का ५७ सालों का व्यक्तिगत ओलंपिक पदक नहीं पाने का रेकॉर्ड टूटा. पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भारतीय कु-व्यवस्था. एक सच्ची घटना प्रस्तुत है जिससे खेलों के भारतीय चलताऊ दृष्टिकोण का परदाफाश करेगी और यह बताएगी की हम ओलंपिक में एक भी पदक क्यों नहीं ले पाते.

हाल ही में नीमच में अंतर्महाविद्यालयीन क्रास कंट्री दौड़ स्पर्धा आयोजित की गई, जिसमें सफल विद्यार्थी को राष्ट्रीय अंतर्विश्वविद्यालयीन स्पर्धा में हिस्सा लेने हेतु पात्रता मिल जाती है. स्पर्धा के आयोजक एक प्रोफेसर को बना दिया गया जिसे खेलों का कोई अनुभव नहीं था. खिलाड़ियों को स्पर्धा के प्रारंभिक स्थल से ४ कि.मी. दूर ठहराया गया और स्पर्धा स्थल तक उन्हें पैदल आना पड़ा चूंकि खिलाड़ियों के लिए ट्रांसपोर्टेशन की कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती. स्पर्धा प्रारंभ होने का समय सुबह आठ बजे बताया गया था. परंतु ऐन मौके पर पानी गिरना प्रारंभ हो गया तो अज्ञानी आयोजक ने स्पर्धा दो घंटे के लिए आगे बढ़ा दी. जो प्रतियोगी वार्मअप हो चुके थे, जाहिर है उनका तो नुकसान होना ही था. काफी बहस के बाद अंततः साढ़े नौ बजे स्पर्धा प्रारंभ हुई. कुछ नीमच के स्थानीय प्रतियोगी भी थे.

बाद में प्रत्यक्ष दर्शियों ने बताया कि स्पर्धा के दौरान एक दो स्थानीय प्रतियोगियों को वाहनों के द्वारा ढोया गया और उनके राष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लेने के हक सुनिश्चित किए गए. निर्णय के समय काफी हो हल्ला मचा और घोषणा बाद के लिए रोक दी गई, पर कहा जाता है कि अंततः उन स्थानीय खिलाड़ियों को क्वालीफ़ाई कर दिया गया.

ऐसे हालातों में, जो भारत के प्रायः सभी हिस्सों में दोहराए जाते हैं, क्या हम कभी ओलंपिक में कोई पदक जीत पाएंगे? कभी नहीं. कभी भी नहीं. और हमें तो इस बारे में सोचना भी छोड़ देना चाहिए.

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ग़ज़ल
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ज़लालत है ज़िदगी क्या छोड़ देना चाहिए
अब अंधी गली में कोई मोड़ देना चाहिए

क्या मिला उस बुत पे घंटियाँ टुनटुनाने से
मिथ्या संस्कारों को अब तोड़ देना चाहिए

कब तक रहोगे किसी के रहमो-करम पे
ज़ेहाद का कोई नारियल फोड़ देना चाहिए

क्यों नहीं हो सकतीं अपनी एक ही दीवारें
खंडित आस्थाओं को अब जोड़ देना चाहिए

बहुत शातिराना चालें हैं तेरी बेईमान रवि
कहता है कहीं तो कोई होड़ देना चाहिए

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57 साल और केंचुए की चाल
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इंडिया टुडे ने अपने स्वतंत्रता दिवस विशेष में भारत की दयनीय स्थिति, उनके कारण और निवारण के बारे में विस्तार से लिखा है. अरूण पुरी अपने संपादकीय में भारत की भयानक सत्यता बताते हैं कि अभी भी भारत के आधे घरों में बिजली नहीं है. तीन में से दो घरों में नल का पानी नहीं है. १० में से ६ घरों में शौचालय सुविधाएँ नहीं हैं. एक लाख जनसंख्या के विरूद्ध सिर्फ ४८ डॉक्टर की सेवा उपलब्ध है. हममें से हर तीसरा भारतीय अशिक्षित है. और सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, हस्पताल इत्यादि ज़रूरत से ज्यादा कम हैं, और अगर हैं भी तो खस्ताहाल. बड़े शहरों तथा मेट्रो में रहने वालों की भी यही समस्या है, चूंकि स्लम्स में ही अधिसंख्य जनता रहती है, ऊपर से अनियंत्रित भीड़ और सुविधाओं का अभाव परिस्थितियों को और भी विकराल बना देती है.

भारत ५७ सालों में कहाँ पहुँचा है? केंचुए की चाल जिसमें कोई दिशा नहीं, कोई तेज़ी नहीं और कोई लक्ष्य नहीं. कारण? बहुतायत में. पर प्रमुख है- अमेठी, अयोध्या और मधेपुरा जैसे स्थानों को लेकर बनाई गई राजनीतिक योजनाएँ, जिनमें भारत की खुशहाली के लिए कोई स्थान नहीं.

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ग़ज़ल
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क्या बताएँ कि ये दिल हमेशा रोता क्यूँ है
बता तो जरा तेरा बहस तल्ख़ होता क्यूँ है

कभी दीवानों को जान पाएंगे जमाने वाले
वो मन का कीचड़ सरे आम धोता क्यूँ है

लगता है भूल गए हैं लोग सपने भी देखना
नहीं तो फिर किस लिए जमाना सोता क्यूँ है

लोग पूछेंगे कि ये कौन नया मसखरा आया
जानकर भी भाई-चारे का बीज बोता क्यूँ है

तू भी क्यों नहीं निकलता भीड़ के रस्ते रवि
बेकार बेआधार बिनाकाम चैन खोता क्यूँ है

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हृदयहीन राजनीति
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हैदराबाद में पिछले दिनों बीमार बच्चों के कोमल हृदय को लेकर राजनीति का अजीब खेल खेला गया. कुछ नेताओं ने जिनमें मादिगा, तेलुगुदेशम तथा भाजपा के लोग शामिल थे, आंध्रा के २३ जिलों के एक हजार से अधिक हृदय-रोग पीड़ित बच्चों को सरकार द्वारा मुफ़्त शल्यचिकित्सा दिलाए जाने का आश्वासन देकर रैली निकाली और भाषण बाजी, धरना आन्दोलन किए. इसमें सबसे दुःखदायी बात यह रही कि हृदयरोग से पीड़ित बच्चों को तीन किलोमीटर लंबी रैली में, भीषण गर्मी में पैदल चलाया गया. तदुपरांत किसी हाल में जहाँ वेंटिलेशन की कमी थी, इन हजारों बच्चों तथा उनके पालकों को ठूंस कर भाषण पिलाने का अभियान जारी रखा गया जिससे हाल के भीतर ही, रैली की थकान तथा ऑक्सीजन की कमी से एक हृदयरोगी बच्चे की मृत्यु हो गई. हृदयहीनता की पराकाष्ठा यह थी कि उस मृत बच्चे को स्टेज पर रख कर भाषणों के दौर जारी रखे गए.

अज्ञानी नेताओं को क्या यह पता नहीं था कि एक हृदयरोगी की शल्यचिकित्सा में औसतन एकलाख रूपए खर्च तो आता ही है, साथ ही अति आधुनिक चिकित्सा संस्थानों की कुल क्षमता भी इतने सारे बच्चों के एकसाथ इलाज हेतु पर्याप्त नहीं है. अतः इस हेतु समयबद्ध प्लानिंग की आवश्यकता है.

पर नहीं. ये सब समझते हैं. ये अपनी राजनीति का भला भली प्रकार समझते हैं. इस रैली के फलस्वरूप खबर है कि तीन बच्चों की मृत्यु तो हो ही चुकी है, बहुत से गंभीर अवस्था में भिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं. रहा इनके इलाज का, तो भले ही उन्हें यह न मिले, इसमें शामिल नेताओं की राजनीति को नई जीवनदायिनी चिकित्सा तो मिल ही चुकी है.

अब हमें किसी और अकल्पनीय विषय पर टुच्ची राजनीति के खेल का इंतजार करना होगा.

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ग़ज़ल
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सियासत में सारे हृदयहीन हो गए
नफ़ा नुकसान में तल्लीन हो गए

कोई और दौर होगा मोहब्बतों का
अब तो सारे रिश्ते महीन हो गए

अजनबी भी पूछने लगे हाले दिल
यकायक कुछ लोग जहीन हो गए

ज़ेहन में यह बात क्यों आती नहीं
बड़े बड़े शहंशाह भी जमीन हो गए

जीना है बिखरे हृदय के साथ रवि
हर दर और दीवार संगीन हो गए

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बारिश में भीगता देश का भविष्य
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मेरे शहर में पंद्रह अगस्त के दिन सुबह से मूसलाधार बारिश हो रही थी. पंद्रह अगस्त के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बाबूराज की शासकीय अनिवार्यता ने स्कूली बच्चों को किस कदर परेशान हलाकान किया इसकी बानगी देखिए. स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम के दौरान सारे बच्चे स्टेडियम में खुले में बारिश में सारे समय भीगते खड़े रहे. जो छोटा सा शामियाना लगाया गया था वह हर जगह टपक रहा था. अधिकारी तो छातों की छांव में बचते रहे, पर बच्चों की सुध किसी ने नहीं ली. ठीक है कि हम सभी बच्चे-बूढ़े बारिश में भीगने का आनंद लेते हैं, परंतु मजबूरन, भीगने की अनिवार्यता, वह भी अव्यवस्था के कारण, तो यह कतई बर्दाश्त नहीं की जाना चाहिए. आयोजकों के चलताऊ एटीट्यूड के चलते स्वतंत्रता दिवस के इस गरिमामयी आयोजन में देश का भविष्य भीगता रहा. और, प्रायः ऐसी स्थिति हर जगह है.

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ग़ज़ल
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भीगे भविष्य बिखरे बचपन यहाँ सब चलता है
लूट -पाट फ़िरौती-डकैती यारों सब चलता है

किस किस का दर्द देखोगे जख़्म सहलाओगे
क़ौमों की रंजिश और हों फ़ायदे सब चलता है

इस जमाने में फ़िक्र क्यों किसे किसी और की
अपने गुल खिलें चाहे जंगल जलें सब चलता है

दिन ब दिन तो बढ़ता ही गया दायरा पेट का
दावत में कुल्हड़ हो या हो चारा सब चलता है

तू भी शामिल हो बची खुची संभावनाओं में रवि
ज़ूदेव, शहाबुद्दीन या हो वीरप्पन सब चलता है

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ओलंपिक में नाउम्मीदी...
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फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंग ने भारत के ओलंपिक प्रदर्शनों पर टिप्पणी की है कि भारत में खेलों को राजनीति ने नाच गानों में डुबो दिया है. उनका यह कहना है कि भारत में खेलों के विकास के लिए कुछ भी ढंग से नहीं किया गया और इस दिशा में जो भी कार्य हुए वे राजनीति, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रीयता और आरक्षण की मार से मर गए. स्थिति यह है कि क्रिकेट के अलावा भारत में किसी अन्य खेल हेतु कोई प्रायोजक हैं ही नहीं. ले देकर सरकार बचती है, तो एक ओर उसके नेताओं के पास अपनी क्षेत्रीय-राजनीति से फ़ुर्सत नहीं है तो दूसरी ओर बाबूराज (ब्यूरोक्रेसी) राजनीतिज्ञों तथा बाबा आदम के जमाने के फ़ाइलों और पुरातन सर्कुलरों के बोझ में दबी हुई है. लिहाजा ओलंपिक में भारत को आखिर क्या हासिल होना है?

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ग़ज़ल
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नाच गानों में डूब गई उम्मीदें हैं
नाउम्मीदी में भी बड़ी उम्मीदें हैं

ज़लज़लों को आने दो इस बार
कच्चे महल ढहेंगे ऐसी उम्मीदें हैं

जो निकला है व्यवस्था सुधारने
उस पागल से खासी उम्मीदें हैं

देख तो लिया दशकों का सफ़र
अब पास बची सिर्फ उम्मीदें हैं

तू भी क्यों उनके साथ है रवि
बैठे बैठे लगाए ऊंची उम्मीदें हैं

*-*-*

ओलंपिक में नगण्य भारतीय संभावनाएँ
कुछ दिनों पश्चात एथेंस में ओलंपिक खेलों का आयोजन होने जा रहा है. लगता है कि हम भारतीय इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करने जा रहे हैं कि ओलंपिक खेलों में जीतना या पदक प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं बल्कि भाग लेना ही महत्वपूर्ण है. भारत के खाते में इस ओलंपिक में भी शायद ही कोई भूला भटका पदक हाथ आ जाए, वरना तो कोई उम्मीद ही नहीं है.
ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ खिलाड़ी नहीं हैं. खिलाड़ी तो हैं, पर व्यवस्थाएँ ऐसी हैं कि खेलों को कोई प्रोत्साहन ही नहीं है. क्रिकेट (जहाँ फ़िक्सिंग से लेकर चयन समितियों को घूसखोरी तथा सट्टा तक की संभावनाएँ हैं) के अलावा अक्खा इंडिया में किसी भी खेल में कुछ नहीं रखा है. अंजू जॉर्ज जो भारतीय दल का नेतृत्व करेंगी, और जिनसे किसी पदक की उम्मीद है, वे भी अपनी स्वयं की लगन और मेहनत के बल पर वहाँ पहुँची हैं, और जिसमें भारतीय व्यवस्था का कोई योगदान नहीं है. खेल भी यहाँ क्षेत्रीयता और आरक्षण की भेंट चढ़ गए हैं.

ग़ज़ल

मंज़िल पाने की संभावना नगण्य हो गई
व्यवस्था में जनता और अकर्मण्य हो गई

जाने कौन सा घुन लग गया भारत तुझे
सत्यनिष्ठा ही सबसे पहले विपण्य हो गई

इतराए फ़िरते रहिए अपने सुविचारों पर
अब तो नकारात्मक सोच अग्रगण्य हो गई

हीर-रांझों के इस देश को क्या हुआ कि
दीवानों की संख्या एकदम नगण्य हो गई

अब तक तो तेरे कर्मों को थीं लानतें रवि
क्या होगा अब जो सोच अकर्मण्य हो गई
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भास्कर के रस रंग में ख्वाहिश पर ग़ज़ल मांगी गई. मैंने थोड़ीसी सी अक्ल लगाई और जोड़-तोड़ कर अपनी ख्वाहिश यूँ पेश की. अब यह जुदा बात है कि वे अपने पृष्ठों पर छापेंगे कि नहीं. बहर हाल, अपना ब्लॉग पृष्ठ तो है ही. मुलाहजा फ़रमाएँ...

ग़ज़ल
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ख्वाहिशें

ये उम्र और तारे तोड़ लाने की ख्वाहिशें
व्यवस्था ऐसी और परिवर्तन की ख्वाहिशें

आदिम सोच की जंजीरों में जकड़े लोग
और जमाने के साथ दौड़ने की ख्वाहिशें

तंगहाल घरों के लिए कोई विचार है नहीं
कमाल की हैं स्वर्णिम संसार की ख्वाहिशें

कठिन दौर है ये नून तेल और लकड़ी का
भूलना होगा अपनी मुहब्बतों की ख्वाहिशें

जला देंगे तुझे भी दंगों में एक दिन रवि
फ़िर पालता क्यूँ है भाई-चारे की ख्वाहिशें

*****

पाठशाला बनाम भोजनशाला
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मैंने अपने पिछले कुछेक ब्लॉग्स में अदूरदर्शी नीति द्वारा पाठशाला को भोजनशाला बना दिए जाने के परिप्रेक्ष्य में कुछ प्रश्न उठाए थे. उसके समर्थन में कुछ नई घटनाएँ-
--जिला शाजापुर, म.प्र. के एक स्कूल में मध्याह्न भोजन में छिपकली गिर जाने से ९० बच्चे बीमार हो गए.
--सीहोर, म.प्र. के एक स्कूल में खराब सब्जी खाने से लगभग सवा सौ बच्चों की तबीयत बिगड़ गई.

शायद हमें कुछ और भी भयानक हादिसों के लिए तैयार रहना होगा...

ग़ज़ल
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गुजरे ऐसे कि हादिसे आदत बन गए
मदरसे हर प्रयोग के शहादत बन गए

ग़ली के गंवारों को न जाने क्या हुआ
सड़क में आकर बड़े नफ़ासत बन गए

रक़ीबों की अब किसको ज़रूरत होगी
अपने विचार ही जो खिलाफ़त बन गए

इश्क इबादतों का कोई दौर रहा होगा
धन दौलतें अब असली चाहत बन गए

प्रेम का भूख़ा रवि दर-दर भटका फिरा
क्या इल्म था इंसानियत आहत बन गए

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