छींटे और बौछारें

टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

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साराह से प्राप्त संदेशों को दुनिया सगर्व अपने फ़ेसबुक, वाट्सएप्प, ब्लॉग आदि आदि पर डाल रही है. प्रकटतः बड़ी ईमानदारी से. परंतु हमारे पास एआई (कृत्रिम बुद्धि) युक्त एक ऐसी हैकिंग मशीन आ गई है जिससे उनके साराह संदेशों में की गई छेड़छाड़ का पता लग जाता है. हमारी मशीन ने ये पता लगा लिया है कि अब तक सार्वजनिक प्रकाशित साराह संदेशों में से अधिकांश में छेड़छाड़ की गई है और नक़ली संदेश छापे गए हैं. हमारी हैकिंग मशीन ने साराह में सेध लगा ली है और असली संदेशों को प्राप्त कर लिया है.

प्रस्तुत है बिना छेड़छाड़, साराह से प्राप्त कुछ असली संदेश, जिसे, जाहिर है, लोगों ने सार्वजनिक जाहिर नहीं किया.


(दिया गया कोई भी)

एक वरिष्ठ कवि -

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एक और -

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एक वरिष्ठ व्यंग्यकार -

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एक वरिष्ठ कहानीकार -

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एक वरिष्ठ समीक्षक -

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एक और -

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एक वरिष्ठ उपन्यासकार -

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एक वरिष्ठ संपादक -

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एक और -

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(क्रमशः अगले अंकों में - साराह से छेड़छाड़ जारी है...)

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आइए, साराह (या, सारा या सराहा?) करें

यह तो स्वयंसिद्ध है कि दुनिया बड़ी पॉलिश्ड है. मुंह में राम बगल में छुरी टाइप. नहीं?

अभी की ही बात ले लो. सुबह आपकी दाल में नमक जरा ज्यादा हो गई थी. परंतु आपने कहा – वाह! दाल तो बहुत बढ़िया बनी है. भले ही यह बात कहते कहते आपका मुँह कसैला हो रहा होगा.

छोड़िए, चलिए, दूसरी बात करते हैं. हैरी साडू को कभी हैरी साडू बोला है? अरे भाई, अपने बॉस को कभी उसकी औकात दिखाई है?

या, कभी अपने मित्र को सीधे, उसके मुँह पर कभी बोला है कि यार थोड़ा सा डियो लगा लिया करो, या फिर – मोजे तो गाहे-बगाहे धो लिया करो!

नहीं न?

आपने जब भी वास्तविक, सही, ठोस, वाजिब बात कहने की सोची, आपके संस्कार, आपका संकोच और न जाने क्या क्या सामने आ गया. और आपने फ़ावड़े को फ़ावड़ा कहने की हिम्मत नहीं दिखाई. इसी तर्ज पर, लोग सत्य बात को पचाने, स्वीकारने की भी हिम्मत नहीं दिखा पाते.

अब आप पूरी हिम्मत कर सकते हैं. सच को सच कह सकते हैं, किसी के मुँह पर कह सकते हैं. एक बड़ी राहत की बात यह है कि आप अपनी पहचान, अपनी आइडेंटिटी जाहिर किए बगैर, बताए बगैर कह सकते हैं. साथ ही, सब को सही बात कहने के लिए आमंत्रित भी कर सकते हैं. पता तो चले कि आपमें क्या क्या खामियाँ हैं.

उदाहरण के लिए, क्या मेरे एक्टिव फैब्रिक कंडीशनर से ताज़ा धुले मोजे में भी बदबू आती है जो आपको असहनीय लगती है? तो कृपया अपनी जान-पहचान जारी किए बगैर मुझे मेरे साराह खाते पर जरूर बताएँ.

साराह. हाँ, एक नई सुविधा जो इंटरनेट/डेस्कटॉप पीसी और आपके स्मार्टफ़ोनों पर ऐप्प के माध्यम से हासिल हुई है और दुनिया दीवानी हुई जा रही है. आखिर दुनिया को भी हक है उसकी खुद की असलियत जानने का. चिकनी-चुपड़ी बातों से किनारा करने का.

साराह – भी वाट्सएप्प की तरह एक बेहद सरल किस्म का, नौ-नॉनसेंस मैसेंजिंग ऐप्प है, जो मूलतः संदेश प्राप्त करने के लिए बनाया गया है. इसमें संदेश पाने वाले के पास संदेश भेजने वाले का किसी तरह का सूत्र या अता पता नहीं होता, जब तक कि स्वयं भेजने वाला संदेश में न लिखे. यानी भेजने वाला पूरी तरह गुप्त रहता है. जो मर्जी संदेश भेजो, यदि आप नहीं चाहेंगे तो आपका पता कोई नहीं लगा सकेगा. इसका इंटरफ़ेस बहुत ही संक्षिप्त व सरल है, और इसमें खाता बनाना बेहद आसान. जल्द ही लोग – गूगल किया क्या? की तर्ज पर, साराह किया क्या कहने लगेंगे.  डेस्कटॉप पर खाता बनाने के लिए sarahah.com पर जाएँ अथवा स्मार्टफ़ोन पर प्लेस्टोर पर sarahah ऐप्प सर्च करें. यूँ स्मार्टफ़ोन पर डेस्कटॉप संस्करण भी बढ़िया काम करता है.

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मैंने अपना साराह खाता यहाँ बनाया है - जिस पर आप मुझे अपने बेबाक संदेश भेज सकते हैं -  https://raviratlami.sarahah.com/

वहां पर यूँ तो आपको लिखा मिलेगा कि कोई सृजनात्मक संदेश भेजें, परंतु आपके हर तरह के संदेशों का स्वागत है. दिल-खोल दीजिए. मैं भी जानना चाहूंगा कि मेरे बारे में लोगों की बेबाक, किस-किस्म की कैसी-कैसी राय हो सकती है, जिनसे मैं अब तक वंचित रहा था. :)

आप भी अपना एक साराह खाता बनाएँ, और मुझे उसका पता बताएँ. मुझे भी आपके बारे में बहुत सी बातें ऐसी कहनी हैं जो आज तक कह नहीं सका. अब अनामी बनकर तो मैं सफेद को सफेद कह सकूंगा.

आने वाले दिनों में, केवल और केवल दो किस्म की जनता होगी - एक जिसका साराह खाता होगा और दूसरा जिसका नहीं होगा. जिसका नहीं होगा, उसे लोग कहेंगे - देखो - वो जा रहा है, उसमें हिम्मत ही नहीं है सच सुनने की - उसका साराह खाता ही नहीं है!

आप किस किस्म के जीव हैं जी?

चहुँओर हल्ला मचने के बाद, जैसी कि संभावना थी, ताज़ा खबर ये है कि  आर्काइव.ऑर्ग पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है.

इस घटना से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है.

यहाँ, भारत में, जिसके पास पैसा है, पहुँच है, वो हाई-सुप्रीम-कोर्ट में पहुँच कर उल्टे-सीधे जिरह सामने रख कर माननीय न्यायाधीशों से मूर्खता भरे कोर्ट-आदेश निकलवा सकता है जिसमें शामिल है - आर्काइव.ऑर्ग के संपूर्ण डोमेन पर प्रतिबंध - बिना कोई आर्काइव.ऑर्ग की बात पहले से सुने, या उनके बारे में जाँच-पड़ताल किए या कोई साक्ष्य हासिल किए!

इस संबंध में आर्काइव.ऑर्ग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की तो मीडिया-नामा ने कोर्ट-ऑर्डर की प्रतिलिपियाँ सार्वजनिक रूप से, सबके डाउनलोड के लिए टांग दीं. (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ )

उस कोर्ट-ऑर्डर में आर्काइव.ऑर्ग समेत उन 2600 साइटों के वेब पते हैं जिन पर प्रतिबंध लगाया गया था.

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(मद्रास उच्चन्यायालय के वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश की प्रति का स्क्रीनशॉट)

आप देख सकते हैं कि मासूम वेब उपयोगकर्ता के पास अब एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, बल्कि छब्बीस सौ से अधिक ऐसी वेबसाइटों के पते हैं जहाँ से वो पायरेटेड फ़िल्में और गाने और गेम्स, प्रोग्राम आदि डाउनलोड कर सकता है!

ये है उलटे बांस बरेली को. कहाँ तो प्रतिबंध लगाने की बात हो रही थी, यहाँ तो प्रतिबंधित वेबसाइटों की मार्केटिंग हो रही है, प्रचार प्रसार हो रहा है! ये सभी साइटें वीपीएन, प्रॉक्सी आदि के माध्यम से बखूबी काम कर रही हैं.

प्रतिबंध तभी प्रभावी काम करेगा, जहाँ इंटरनेट हो ही नहीं. डिजिटल इंडिया के जमाने में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा लो अब!

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भारतीय सरकारी बाबुओं ने एकबार फिर से अपनी शुतुरमुर्गी जड़ता और मूर्खता को सार्वजनिक प्रतिपादित किया है.

आर्काइव.ऑर्ग जैसी एक शानदार वेबसाइट और संकल्पना को बंद कर उसने अपने आप को न केवल उपहास का पात्र बनाया है, बल्कि अपनी संकीर्ण सोच और मंद बुद्धि का एक और परिचय दिया है.

इसका चहुँओर प्रतिकार, हो हल्ला होना चाहिए ताकि इस तरह के अर्थहीन प्रतिबंधों पर लगाम लगे. इस मूर्खता भरे प्रतिबंध तो तत्काल हटाया जाना चाहिए.

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शुक्र है कि विभिन्न तकनीकों के सहारे हमारे-आपके लिए इस शानदार और खूबसूरत साइट (रचनाकार.ऑर्ग जैसी साहित्यिक साइटों की बहुत सी साहित्यिक सामग्री आर्काइव.ऑर्ग पर होस्टेड हैं) को अबाधित रूप से उपयोग करने के ढेरों, आसान तरीके उपलब्ध हैं. प्रॉक्सी, वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क, जिसमें किसी तरह की बंदिश आदि काम नहीं करती) आदि का प्रयोग कर आप आराम से इस प्रतिबंध का प्रतिकार कर सकते हैं - हालाकि यह समाधान नहीं होगा, फिर भी.

यदि आपको प्रॉक्सी, वीपीएन आदि की तकनीकी जानकारी  अधिक नहीं है, तो इसके लिए हम आपके लिए एक बहुत ही सरल सा समाधान लाए हैं. यह हर प्लेटफ़ॉर्म पर काम करेगा.


ओपेरा ब्राउज़र का नवीनतम संस्करण डाउनलोड करें. इस ब्राउज़र में वीपीएन अंतर्निर्मित है.

ओपेरा ब्राउजर को इंस्टाल करने के बाद इसकी सेटिंग में जाएँ. वहाँ प्राइवेसी और सेक्यूरिटी टैब में जाएं और वीपीएन शीर्षक के नीचे दिए गए इनेबल वीपीएन चेकबॉक्स पर सही का निशान लगाएँ. बस. हो गया.


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अब ओपेरा ब्राउजर में एड्रेस बार पर वीपीएन का चिह्न दिखेगा. उस पर क्लिक कर वीपीएन को चालू या बंद कर सकते हैं. वीपीएन चालू करें और आर्काइव.ऑर्ग या अन्य कोई भी बंद साइट का यूआरएल डालें.


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प्रतिबंधित आर्काइव.ऑर्ग का आनंद लें ! --- >

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वीपीएन से हो सकता है कि कुछ लोकेशन आधारित साइटें ठीक से काम न करें, मगर, तात्कालिक हल तो प्राप्त हो ही जाता है.

ओपेरा ब्राउज़र को आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -

http://www.opera.com/hi/download

लिंक को खोलने के लिए अपने ब्राउज़र में कॉपी पेस्ट करें. या गूगल / प्लेस्टोर में ओपेरा डाउनलोड सर्च करें. ओपेरा, मोबाइल के लिए ब्राउज़र तथा ऐप्प - दोनों रूप में उपलब्ध है.

How to visit blocked site archive.org through vpn प्रतिबंधित साइट आर्काइव.ऑर्ग को वीपीएन / ओपेरा ब्राउज़र से कैसे उपयोग करें


अपडेट - चहुँओर हो हल्ला मचने के बाद अब इस साइट पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया है. अलबत्ता आर्काइव.ऑर्ग के इस आलेख और मीडियानामा की इस पड़ताल (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ ) से सिद्ध होता है कि भारतीय कोर्ट और भारतीय बाबुओं ने मिलकर किस तरह से भारत का नाक इंटरनेट जगत में कटवाया है और ये सिद्ध किया है कि हम भारतीय निरे मूर्ख हैं !

उम्मीद करें, कि ऐसी मूर्खता भविष्य में देखने को न मिलें!

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इधर उसने चोटीकटवा की खबर पढ़ी, और उधर उसकी बांछें, शरीर में जहाँ कहीं भी हों, खिल गईं.

उसके दिमाग में बत्ती जो जल गई थी.

आदमी को कुछ चीजें, नामालूम रूप से, बिना किसी कारण, बेवजह, यूँ ही, बेहद पसंद होती हैं तो कुछ चीजें बेहद नापसंद.

मामला कुछ-कुछ मीठा, खट्टा या नमकीन नुमा होता है.

कोई मिठाई का दीवाना होता है तो कोई नमकीन का. किसी को घी की खुशबू बर्दाश्त नहीं होती तो किसी को पेट्रोल की, और इन खुशबुओं के दीवानों की भी कोई कमी, दुनिया में नहीं है.

इसे खुदा का कहर ही समझो, वो जिस जमात में जन्मी, जिस जमात में पली-बढ़ी उस जमात में उसने जन्म से ही, चहुँओर, अपने आसपास दाढ़ीजारों को देखा. अलबत्ता कुछ गिनती के तरक्कीपसंद भी आसपास होते थे जिनके न दाढ़ी होती थीं न मूछें. उसे, नामालूम रूप से, बेवजह, जन्मजात, दाढ़ीजारों की दाढ़ियों से सख्त नफ़रत थी जिनमें उनके प्रिय अब्बा भी शामिल थे. और, जब उसकी शादी एक ऐसे शख़्स से हुई जो सफाचट किस्म का था, तो उसने अपने भाग्य को सराहा था, ईश्वर का धन्यवाद किया था.

पर, इधर कुछ महीनों से उसका पति पता नहीं क्यों अपनी दाढ़ी बढ़ाए जा रहा था. और, वो उन्हीं महीनों से उसे कह रही थी दाढ़ी कटा ले दाढ़ी कटा ले. ऊपर से यह दाढ़ी उसके भरे चौड़े चेहरे पर बिलकुल नहीं जमती. उसकी दाढ़ी देखते ही उसे कुछ हो जाता था. तन-बदन में आग लग जाती थी. आसपास की सामान्य सी चीजें भी उसे उस्तुरा, ब्लेड, चाकू, कैंची आदि आदि नजर आने लग जाती थीं और वो उन्हें उठा लेती थी उसकी दाढ़ी काटने. पर, जाहिरा तौर पर यह प्रयास असफल ही होता क्योंकि चश्मे के केस, पेन, पेंसिल, कंप्यूटर के माउस आदि से दाढ़ियाँ नहीं कटतीं, और वो अपनी इस पागल-पन भरी हरकत पर खुद ही हंस पड़ती. हाँ, शायद वो दढ़ियलों की दाढ़ियों को लेकर जन्मजात पागल थी.

इधर, चोटीकटवा की घटनाएँ चहुँओर फैलती जा रही थीं. चोटी-कटवा तमाम औरतों की चोटियाँ काटे जा रहा था. उसके अपने  मुहल्ले में पिछली रात ये घटना हो गई थी. अब तो उसे भी कुछ-न-कुछ करना ही होगा, उसने सोचा. शाम होते होते उसने पुख्ता प्लानिंग कर ली.

अगली सुबह जब उसका प्यारा पति उठा तो उसने अपने बिस्तर के आसपास बालों के गुच्छों को बिखरा पाया. उसकी बीवी बेसुध सो रही थी. पहले तो उसे लगा कि उसकी बीवी की चोटी कट गई है. उसने ध्यान से देखा. उसकी बीवी की चोटी तो वैसी ही भरी पूरी लंबी है. फिर ये बाल कहाँ से आए?  बेसाख्ता उसके हाथ अपनी दाढ़ी पर चले गए. उसे अपनी दाढ़ी थोड़ी अजीब लगी. उसने टटोला तो पाया कि उसकी दाढ़ी के बाल गायब थे, जो जाहिरा तौर पर नीचे बिस्तर पर फैले हुए थे. उसने सोचा, कहीं उसकी बीवी ने तो नहीं... पर, जल्द ही उसने यह ख़याल अपने दिल से निकाल दिया, और जोर से चीखा.

चहुँओर हल्ला मच गया. घर में, मुहल्ले में, शहर में और फिर समाचार के जरिए देश में. चोटी-कटवा के बाद दाढ़ी-कटवा ने आमद दे दी थी. दाढ़ी-कटवा की घटनाएँ जल्द ही पूरे देश में फैल गईं. उधर, बहुत से दाढ़ी-जारों ने दाढ़ी-कटवों के डर के मारे, खुद ही अपनी दाढ़ियाँ साफ कर लीं.

उधर, वो हर बार अपनी हँसी दबाने में कामयाब रही - जब भी दाढ़ी-कटवों का जिक्र होता, या उनकी खबर चलती.

आपको क्या लगता है? इसी तर्ज पर, घूंघट-कटवा, जनेऊ-कटवा, बुरखा-कटवा आदि आदि की घटनाएँ नहीं होनी चाहिएँ?

क्या पता, किसी दिन ये भी शुरू हो जाएँ. इंतजार करें, शुभ दिन का!

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पवित्र भारत भूमि में, जुलाई के महीने में सदियों से बाढ़ आती रही है और आगे अनंत-काल तक आती रहेगी. तमाम सरकारें आईं और गईं, तमाम साम्राज्य आए और नेस्तनाबूद हो गए या भारत छोड़ गए, मगर हर वर्ष जुलाई में बाढ़ की स्थिति वही रही, और, जब से हवाईजहाज का आविष्कार हुआ है, अफ़सरों नेताओं का बाढ़ की स्थिति का हवाई सर्वेक्षण और जायजा लेने का चक्र भी बदस्तूर जारी है और जारी रहेगा. जहाँ एक ओर पर्यावरण को बचाने की, प्रकृति को बचाने की दुनियाभर में जमकर सफल-असफल कोशिशें हो रही हैं, भारत भूमि के अधिनायकों और भाग्य-विधाताओं ने कम से कम इस मामले में बढ़िया काम दिखाया है – उन्होंने प्रतिवर्ष-हरवर्ष की बाढ़ और उसकी संभावना को अक्षुण्ण बनाए रखा है, उसका विनाश नहीं किया है, उसे समाप्त नहीं किया है. इस तरह से हम भारतीयों ने प्रकृति को बचाने में बड़ी सफलता पाई है. संपूर्ण ब्रह्मांड इसके लिए हमारा सदैव शुक्रगुजार रहेगा.

जबकि, नदियों में जुलाई के महीने में आने वाली बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, जो भारत भूमि की साम्प्रदायिक सद्भाव, सर्वे भवन्तु सुखिनः को आदर्श मानने वाली जनता प्रतिवर्ष, और यदि टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो बड़े उत्साह से झेलती-स्वीकारती है, और अगले वर्षों के लिए फिर-फिर कमर कस लेती है; एक दूसरी आपदा इस वर्ष और आई है वो है राजनीतिक गठबंधनों की बाढ़. और, इसे भी भारतीय जनता, टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो, बड़े उत्साह से स्वीकार रही है.

जब बाढ़ आती है तो नदी के किनारे के छोटे मोटे पेड़ पौधे अपने जड़-जमीन से उखड़ जाते हैं और धारा में बहने लगते हैं. इतने में कहीं कोई बड़ा सा वृक्ष का तना या लट्ठ बहता हुआ आता है तो ये सब छोटे मोटे पेड़ पौधे और जीव जंतु अपनी जान बचाने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए उस बड़े लट्ठ के चहुँओर चिपक जाते हैं, उसके ऊपर बसेरा बना लेते हैं. राजनीतिक गठबंधनों के भी यही हाल हैं. किसी बड़े दल में यदि चुनावी वैतरणी पार करने की संभावनाएँ दिखती हैं तो छोटे मोटे दल, निर्दलीय, क्षेत्रीय दल उस बड़े दल में गठबंधन के नाम पर चिपक जाते हैं. लाइफ आफ पाई की तरह फिर एक दूसरे के जान के दुश्मन विरोधी पार्टियाँ – आदमी और शेर किस्म की पार्टियाँ – जो पहले एक दूसरे को देख कर गुर्राते थे, मारने – काटने को दौड़ते थे, वे भी प्रेम-पूर्वक साथ रह लेते हैं, मिल-बांट-कर खाने लगते हैं. गठबंधन के असर से एक दूसरे के लिए, पूर्व के साम्प्रदायिक दल राष्ट्रवादी बन जाते हैं, तो सामाजिकता का नारा बुलंद करने वाले दल भ्रष्टाचारी बन जाते हैं, आम आदमी आज विशिष्ट हो जाता है और कल का विशिष्ट, आज निरीह जनता बन जाता है.

इधर साहित्यिक गठबंधनों – यानी लेखकों-पाठकों-अनुसरणकर्ताओं की भी बाढ़ आई हुई है. सोशल मीडिया ने इस गठबंधनी बाढ़ को बड़ी हवा दी है. 1-1 लेखक के लाखों फॉलोअर हैं. लेखक को वर्तनी का व नहीं आता, कि और की कहाँ लगाना है वो यह नहीं जानता, नहीं और नही में फर्क (या, फ़र्क़?) नहीं कर सकता वो चार लाइन लिख देता है – बहुधा समकालीन राजनीति, या राजनीतिक व्यक्ति या धर्म के बारे में – और उसे मिलते हैं लाखों हिट्स, हजारों लाइक्स, सैकड़ों कमेंट. और, बेचारा सारगर्भित, शुद्ध, सुसंस्कृत, शोध-पूर्ण लेख लिखने वाला लेखक 1-1 पाठक को तरसता रहता है. कट-पेस्टिया और चुटकुलों-पंचतंत्रीय-कहानियों को नए रूप में ढालकर लिखने वाले लेखकों के तो और भी मजे हैं. कवियों का तो कहना ही क्या! आजकल व्यंग्यकारों के भी गठबंधन हैं – कुछ पंच मार उड़ा रहे हैं, कुछ सार तत्व, सरोकार और मार्मिकता ढूंढ रहे हैं तो कुछ को व्यवस्था को गरियाना व्यंग्य लगता है तो कुछ को नहीं! एक दूसरे की नजर में ये गठबंधन कुछ को एवरेज टाइप लगते हैं तो कुछ को श्रेष्ठ और कुछ को महा-श्रेष्ठ. जाहिर सी बात है, बहुतों को निकृष्ट भी लगते होंगे, पर, फिर, पंगा कौन मोल ले?

वैसे तो मेरे दिमाग में विचारों की बाढ़ आई हुई है इस मसले पर, परंतु दिमाग-और-उंगलियों का गठबंधन कीबोर्ड पर उन्हें टाइप नहीं करने दे रहा - एक टी ब्रेक मांग रहा है. इसलिए यहीं बंद करते हैं. और, इस बात का भी तो खतरा है कि अगर इस किस्से को एकता कपूर के सीरियल की तरह लंबा खैंच दूं तो मेरा आपका लेखक-पाठक गठबंधन टूट कर किसी और ब्लॉग के पन्ने की बाढ़ की ओर क्लिक/टैप तो न हो जाएगा!

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संदर्भ- अमेरिका के वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट का बच्चों पर किए शोध का नतीजा-

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भारत ही नहीं दुनिया के प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को साफ-सुथरा, सुरक्षा व कीटाणु रहित वातावरण देना चाहते हैं, जिससे उनके बच्चे गंदगी की चपेट में आकर बीमार न पड़ें। लेकिन अब माता-पिता इसे लेकर आश्वस्त हो सकते हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी बच्चों के लिए हानिकारक नहीं है, बल्कि उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं को टीम के अगुवा वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट ने मिट्टी और बच्चों पर यह शोध किया है। दो बच्चों के पिता गिलबर्ट ने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो से माइक्रोबॉयलॉजी परिस्थितिकी तंत्र की पढ़ाई की है। वे खोज कर रहे हैं कि मिट्टी और उसमें पाए जाने कीटाणु किस तरह बच्चों को प्रभावित करते हैं। गिलबर्ट ने मिट्टी में पाए जाने वाले ‘जीवाणुओं से फायदे, बच्चों का विकास और प्रतिरक्षा‘ नाम से एक किताब लिखी है। 

जी हां..., अब नई खोजों और प्रयोगों से यही हकीकत सामने आ रही है कि हाथ धोकर सफाई के पीछे पड़ना मानव जीवन के लिए खतरा है।  अब नए अनुसंधान तय कर रहे हैं कि हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से जो सूक्ष्म जीव, मसलन जीवाणु (बैक्टीरिया) और विषाणु (वायरस) प्रविष्ट होते हैं, वे बीमारियां फैलाने वाले दुश्मन न होकर बीमारियों को दूर रखने वाले मित्र भी होते हैं। इसीलिए गिलबर्ट ने कहा है कि कई बार जमीन पर खाना गिरने के बाद उसे फेंक देते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि वह गंदा हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। खाने में लगे कीटाणु बच्चे के लिए फायदेमंद होंगे। बच्चों को मिट्टी में खेलने से एलर्जी इसलिए होती हैं, क्योंकि हम उन्हें कीटाणु से बचाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। जीवाणु की कमी की वजह से बच्चे अस्थमा, फूड एलर्जी जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। 

प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव निवासरत हैं, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत व काया को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। हमारे शरीर में जितनी कोशिकाएं हैं, उनमें 10 प्रतिशत हमारी अपनी हैं, बाकी कोशिकाओं पर 9 करोड़ सूक्ष्म जीवों का कब्जा है। जो शरीर में परजीवी की तरह रहते हैं। तय है, हमें इनकी उतनी ही जरूरत है, जितनी की उनको हमारी। बल्कि अब तो वैज्ञानिक यह भी दावा कर रहे हैं कि मानव और सूक्ष्म जीवों का विकास साथ-साथ हुआ है। मनुष्य ने जीनोम को अब अक्षर-अक्षर पढ़ लिया गया है। इससे ज्ञात हुआ है कि हमारे जीनोम में हजारों जींस का वजूद जीवाणु और विषाणुओं की ही उपज है।

       नए अनुसंधान वैज्ञानिक मान्यताओं को बदलने का काम भी करते हैं और धीरे-धीरे नई मान्यता प्रचलन में आ जाती है। बीसवीं सदी के पहले चरण तक यह धारणा थी कि सूक्ष्मजीव ऐसे शैतान हैं, जो हमारे शरीर में केवल बीमारियां फैलने का काम करते हैं। इसीलिए इनसे दूरी बनाए रखने का आसान सा तरीका अपनाए जाने की नसीहत सामने आई कि यदि चिकित्सक अपने हाथों को साबुन से मल-मलकर धोने की तरकीब अपना लें तो इस एकमात्र उपाय से अस्पताल में इलाज के दौरान मर जाने वाले लाखों मरीजों की जान बचाई जा सकती है ? अलबत्ता नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी वैज्ञानिक इल्या मेचनीकोव ने अपने शोध से इस अवधारणा को बदलने का काम किया। जब 1910 के आसपास मेचनीकोव बुल्गारिया के निरोगी काया के साथ लंबी उम्र जीने वाले किसानों पर शोध कर रहे थे, तब किसानों की लंबी आयु का रहस्य उन्होंने उस दही में पाया जिसे आहार के रूप में खाना उनकी दिनचर्या में शामिल था।

              दरअसल खमीर युक्त दुग्ध उत्पादों में ऐसे सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारे जीवन के लिए जीवनदायी हैं। सूक्ष्मजीव हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण पर होते हैं। ये समूह शरीर में प्रविष्ट होकर पाचन तंत्र प्रणाली में क्रियाशील हो जाते हैं। इस दौरान ये लाभदायी जीवाणुओं की वृद्धि को उत्तेजित करते हैं और हानिकारक जीवाणुओं का शमण करते हैं। इन्हें चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘अनुजीवी‘ या ‘प्रोबायोटिक्स‘ कहते हैं। अब अनुजीवियों को सुगठित व निरोगी देह के लिए जरूरी माना जाने लगा है। इन्हें प्रतिरोधक के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह भी आहार वैज्ञानिक देने लगे हैं। ‘प्रोबायोटिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है। जिसका सरल सा भावार्थ है ‘स्वस्थ्य जीवन के लिए उपयोगी’। प्रोबायोटिक्स शब्द को चलन में लाने की सबसे पहले शुरूआत लिली एवं स्टिलवैल वैज्ञानिकों ने की थी। इसका प्रयोग उन्होंने तब किया जब वे प्राटोजोआ द्वारा पैदा होने वाले तत्वों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि इसमें ऐसे विचित्र तत्व विद्यमान हैं, जो तत्वों को सक्रिय करते हैं। हालांकि यह कोई नया पहलू नहीं था। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रंथों में जीवाणुओं के संबंध में विस्तृत जानकारियां हैं। आयुर्वेद दुग्ध के सह-उत्पादों के गुण-लाभ से भरा पड़ा है। अर्थववेद और उपनिषदों में भी सूक्ष्म जीवों के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट के फारसी संस्करण में उल्लेख है कि अब्राहम ने खट्टे दूध व लस्सी के सेवन से ही लंबी आयु हासिल की थी। 76 ईसापूर्व टिलनी नामक रोमन इतिहासकार ने जठराग्नि (गेस्ट्रोइंटीराईटिस) के उपचार के लिए खमीर उठे दूध के उपयोग को लाभकारी बताया था। इन जानकारियों से तय होता है कि अनुजीवियों के अस्तित्व और महत्त्व से आयुर्वेद के वैद्याचार्य बखूबी परिचित थे।

       सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार होने से पहले तक हम इस वास्तविकता से अनजान थे कि 10 लाख से भी अधिक जीवन के ऐसे विविध रूप हैं, जिन्हें हम सामान्य रूप से देखने में अक्षम हैं। इस हैरतअंगेज जानकारी से चिकित्सा विज्ञानियों का साक्षात्कार तब हुआ, जब लुई पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने एक दल के साथ सूक्ष्मदर्शी उपकरण को सामान्य जानकारियां हासिल करने के लिए प्रयोग में लाना शुरू किया। जब इन सूक्ष्म जीवों को पहली मर्तबा सूक्ष्मदर्शी की आंख से देखा गया तो वैज्ञानिक हैरानी के साथ परेशान हो गए और वे इन जीवों को मनुष्य का दुश्मन मानने की भूल कर बैठे। जैसे इंसान की मौत का सबब केवल यही जीव हों। लिहाजा इनसे मुक्ति के उपाय के लिहाज से दूध उत्पादों से इनके विनाश की तरकीबें खोजी जाने लगीं। और विनाश की इस प्रक्रिया को ‘पाश्चरीकरण‘ नाम से भी नवाजा गया। प्रति जैविक या प्रतिरोधी एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण और उनके प्रयोग का सिलसिला भी इनके विनाश के लिए तेज हुआ। लेकिन 1910 में इस अवधारणा को इल्या मेचनीकोव ने बदलने की बुनियाद रखी और फिर मनुष्य के लिए इनके लाभकारी होने के शोधों का सिलसिला चल निकला।

       सूक्ष्मजीव इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक ग्राम मिट्टी में लगभग दो करोड़ जीवाणु आसानी से रह लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इनकी करीब 10 हजार प्रजातियां हैं। ये हरेक विपरीत माहौल में सरलता से रह लेते हैं। इसीलिए इनका वजूद धरती के कण-कण में तो है ही, बर्फ, रेगिस्तान, समुद्र और जल के गर्म स्रोतों में भी विद्यमान है। हाल ही में स्कॉटलैण्ड के सेंट एंड्रयूज विश्व विद्यालय के शोधकर्त्ताओं ने अफरीकन जनरल ऑफ साइंस में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि नमीबिया के ऐतोशा राष्ट्रीय उद्यान में जीवाश्मविदों ने खुदाई की। इस खुदाई के निष्कर्षों में दावा किया गया है कि उन्होंने सबसे पहले अस्तित्व में आए सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों को खोज निकाला है। ये जीवाश्म 55 करोड़ से लेकर 76 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं। ये ओटाविया ऐंटिक्वा स्पंज जैसे जीव थे। जिनके भीतर ढेर सारे छिद्र बने हुए थे, जो जीवाणु, विषाणु और शैवालों को खुराक उपलब्ध कराने में मदद करते थे। शोधकर्ताओं का दावा है कि हिमयुग से पहले के समय में पनपने वाले ये बहुकोशीय जीव हिमयुग के कठोर बर्फानी मौसम को भी बर्दाश्त करने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने इन जीवों को बेहद पुराना बताते हुए कहा है कि पृथ्वी पर सभी जीवों की उत्पत्ति इन्हीं जीवों से हुई होगी ? इससे तय होता है कि इनकी जीवन रक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है।

       मानव शरीर के तंत्र में अनुजीवियों का जीवित रहना जरूरी है। क्योंकि ये सहजीवी हैं और इनका संबंध भोजन के रूप में ली जाने वाली दवा से है। दही में ‘बाइफिडो बैक्टीरियम’ वंश के विषाणु पाए जाते हैं। इन्हें ही लेक्टोबेसिलस बाईफिडस कहते हैं। ये हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण मसलन आंतों में पल्लवित व पोषित होते रहते हैं। इसे ही आहार नाल कहा जाता है। यह लगभग 30 फीट लंबी व जटिल होती है। आहार को पचाकर मल में तब्दील करने का काम जीवाणु ही करते हैं। इस नाल में जीवाणुओं की करीब 500 प्रजातियां मौजूद रहती हैं। जिन्हें 50 विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। इन सूक्ष्म जीवों की कुल संख्या करीब 1011 खरब है। मनुष्य द्वारा शौच द्वार विसर्जित मल में 75 फीसदी यही जीवाणु होते हैं। शरीर में जरूरी विटामिनों के निर्माण में भागीदारी इन्हीं जीवाणुओं की देन है। यही अनुजीवी शरीर में रोग पैदा करने वाले पैथोजनिक जीवाणुओं को नष्ट करने का काम भी करते हैं। शरीर में रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद चिकित्सक जो प्रतिरोधक दवाएं देते हैं, उनके प्रभाव से बड़ी संख्या में शरीर को लाभ पहुंचाने वाले अनुजीवी भी मर जाते हैं। इसीलिए चिकित्सक दही अथवा ऐसी चीजें खाने की सलाह देते हैं, जिससे लेक्टोबेसिलस अनुजीवियों की बड़ी तादाद खुराक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाए।

       जिन जीवाणु और विषाणुओं को शरीर के लिए हानिकारक माना जाता था, वे किस तरह से फायदेमंद हैं, यह अब नई वैज्ञानिकों खोजों ने तलाश लिया है। कुछ समय पहले तक यह धारणा प्रचलन में थी कि छोटी आंत में अल्सर केवल तनावग्रस्त रहने और तीखा आहार लेने से ही नहीं होता, बल्कि इस रोग का कारक ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु है। इस सिद्धांत के जनक डॉ. बैरी मार्शल और रॉबिन वारेन थे। किंतु न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के स्कूल अॉफ मेडिसिन के डॉ. मार्टिन ब्लेसर ने इस सिद्धांत को एकदम उलट दिया। उन्होंने अपने अनुसंधान में पाया कि ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु मनुष्य जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं। यह करीब 15 करोड़ सालों से लगभग सभी स्तनधारियों के शरीर में एक सहजीवी के रूप रोग प्रतिरोधात्मक की भूमिका का निर्वहन करता चला आ रहा है। इसकी प्रमुख भूमिका पेट में तेजाब की मात्रा को एक निश्चित औसत अनुपात में बनाए रखना है। यह पेट में बनने वाली अम्लीयता का इस तरह से नियमन करता है कि वह जीवाणु और मनुष्य दोनों के लिए ही फलदायी होता है। किंतु जब जीवाणु का ही हिस्सा बने रहने वाला सीएजी नाम का जीव उत्तेजित हो जाता है तो शरीर में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं। बहरहाल,हेलिकोबैक्टर पायलोरी की आंतों में मौजूदगी,अम्ल के नियमन की प्रक्रिया जारी रखते हुए, प्रतिरक्षा तंत्र को ताकतवर बनाने का काम करती है। इसलिए ज्यादा मात्रा में प्रतिरोधक दवाएं लेकर इन्हें मारना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

       इस बाबत् एक और बानगी देखें। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में एक महिला उपचार के लिए आई। दस्तों के चलते इसके प्राण ही खतरे में पड़ गए थे और दवाएं बेअसर थीं। तमाम नुस्खे आजमाने के बाद चिकित्सा दल ने एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया और इस महिला को निरोगी व्यक्ति के मल में मौजूद जीवाणुओं की सिलसिलेवार खुराकें दीं। प्रयोग आश्चर्यजनक ढंग से सफल रहा। 48 घंटों के भीतर दस्त बंद हो गए। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञानियों में जिज्ञासा जगी कि अनुजीवियों और प्रतिरक्षा तंत्र के सह-अस्तित्व आधारित उपचार प्रणालियां विकसित की जाएं। इस परिकल्पना को ही आगे बढ़ाते हुए दमा रोग के उपचार का सिलसिला स्विस इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एण्ड अस्थमा रिसर्च में काम शुरू हुआ। इस संस्था के प्रतिरक्षा तंत्र वैज्ञानिकों ने उपचार के नए प्रयोगों में पाया कि टी कोशिकाओं में गड़बड़ी के कारण एलर्जी रोग उत्पन्न होते हैं। अब पौल फोरसाइथ जैसे वैज्ञानिक इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, इस कोशिश में लगे हैं कि वे कौन सी कार्य-प्रणालियां हैं जिनके जरिए अनुजीवी प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नियमन रखते हुए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसी कड़ी में 2010 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि क्लॉस्ट्रडियम परफ्रिंजेंस नाम का जीवाणु बड़ी आंत का निवासी है। यह जीवाणु जरूरत पड़ने पर टी कोशिकाओं में इजाफा करता है। यही कोशिकाएं रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों से लड़कर उन्हें परास्त करती हैं।

       अनुजीवियों के महत्व पर नए अनुसंधान सामने आने के साथ-साथ चिकित्सा-विज्ञानियों की एक शाखा कीटाणुओं पर अनुसंधान करने में जुट गई। हालांकि इसके पहले शताब्दियों से यह अवधारणा विकसित होती चली आ रही है कि शरीर में मुंह के जरिए प्रविष्ट हो जाने वाले कृमि मानव समाज में बीमारियों के जनक हैं ? 1870 में तो पूरा एक ‘कीटाणु सिद्धांत’ ही वजूद में आ चुका था। जिसका दावा था की प्रत्येक बीमारी की जड़ में वातावरण में धमा-चौकड़ी मचाए रखने वाली कृमि हैं। इस सिद्धांत के आधार पर ही बड़े पैमाने पर कीटाणुनाशक प्रतिरोधक दवाएं वजूद में आईं। पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने का काम करने वाले कीटाणुओं को रोग का कारक मानते हुए, इन्हें नष्ट करने के अभियान चलाए जाने लगे। परिवेश को संपूर्ण रूप से स्वच्छ बनाए रखने के साथ मानव अंगों को भी साफ-सुथरे रखने के अभियान इसी सिद्धांत की देन हैं। लेकिन इस सिद्धांत को पलटने का काम रॉबर्ट कोच, जोसेफ लिस्टर और फ्रांस्सेको रेडी जैसे वैज्ञानिकों ने किया। इन्होंने पाया कि कृमि प्रजातियों में कई प्रजातियां ऐसी भी हैं,जो रोगों को नियंत्रित करती हैं। अब तो यह दावा किया जा रहा है कि कोलाइटिस क्रोहन और ऑटिज्म जैसे रोग अतिरिक्त सफाई का माहौल रच दिए जाने के कारण ही बढ़ रहे हैं।

       इस सिलसिले में यहां एक अनूठे उपचार को बतौर बानगी रखना जरूरी है। अयोवा विश्वविद्यालय में कृमियों के महत्व पर शोध चल रहा है। यहां एक ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे को उपचार के लिए लाया गया। ऑटिज्म एक ऐसा बाल रोग है, जो बच्चों को बौरा (पगला) देता है। वे खुद के अंगों को भी नाखून अथवा दांतों से काटकर हानि पहुंचाने लगते हैं। अपनी मां के साथ भी वे ऐसी ही क्रूरता का व्यवहार अपनाने लग जाते हैं। जब दवाएं बेअसर रहीं तो ऐसे बच्चों के इलाज के लिए अयोवा विश्वविद्यालय में जारी कृमि-शोध को प्रयोग में लाया गया। चिकित्सकों की सलाह पर इन बच्चों को ‘ट्राइचुरिस सुइस’ कीटाणु के अण्डों की खुराकें दी गईं। बालकों के पेट में अण्डें पहुंचने पर ऑटिज्म के लक्षणों में आशातीत बदलाव दिखाई देने लगा और धीरे-धीरे इनके अतिवादी आचरण में कमी आती चली गई।

       इन प्रयोगों ने तय किया है कि धवल स्वच्छता के अतिवादी उपाय मनुष्य के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं ? मनुष्य और जीवों का विकास प्रकृति के साथ-साथ हुआ है। जिस तरह से खेतों में कीटनाशकों का बहुलता से प्रयोग कर हम कृषि की उत्पादकता और खेतों की उर्वरा क्षमता खोते जा रहे हैं, उसी तर्ज पर ज्यादा से ज्यादा एंटी बायोटिकों का प्रयोग कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करते हुए उसे बीमारियों का अड्ढा बना रहे हैं। जीवाणु, विषाणु और कीटाणु मुक्त जल और भोजन को जरूरी बना दिए जाने की मुहिमें भी खतरनाक बीमारियों को न्यौत रही हैं। दुर्भाग्य से सफाई का दारोमदार अब कारोबार का हिस्सा बन गया है और मनुष्य को जीवन देने वाले तत्वों को निर्जीवीकृत करके आहार बनाने की सलाह दी जा रही है। सूक्ष्मजीवों से दूरी बनाए रखने के ये उपाय दरअसल जीवन से खिलवाड़ के पर्याय बन जाने के नाना रूपों में सामने आ रहे हैं। लिहाजा ज्यादा स्वच्छता के उपायों से सावधान रहने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्री राम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

फोन- 09425488224&9981061100Qksu 07492 404524

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने पुनर्जन्म लिया और एक बार फिर वो भारत की यात्रा पर निकल लिया. पेश है उसकी सन् 2017 की भारत यात्रा का अति-संक्षिप्त विवरण –

जैसे ही मैं इंदिरा गांधी एयरपोर्ट टर्मिनल पर उतरा, सामने दैत्याकार बोर्ड पर चीनी मोबाइल ब्रांड वीवो का विज्ञापन लगा था और लिखा था – वीवो वेलकम्स यू इन इंडिया! मुझे तब से ही लग गया था कि इस बार की भारत यात्रा भी अच्छी खासी मजेदार, दिलचस्प रहने वाली है.

मैं एक्ज़िट गेट की तरफ आगे बढ़ा. एक बेहद विशालकाय, ह्यूआवेई के 4-K टीवी स्क्रीन पर कोई भारतीय पसंदीदा शो चल रहा था. देखने वालों की भीड़ लगी थी. सोचा मैं भी देखूं. जैसे ही देखने के लिए मैंने अपना मुंह घुसाया, एक ब्रेक आया और विज्ञापन आया – ओप्पो प्रेजेंट्स द अनलाफ़्टर शो!

अचानक मुझे याद आया कि चलो इंडिया पहुँच गए हैं यह बात घर वालों को बता दी जाए. मैंने एयरपोर्ट की मुफ़्त वाई-फ़ाई सेवा का लाभ उठाने के लिए साइट खोली. वहाँ प्रकट हुआ – वेलकम टू एयरपोर्ट फ्री हाई स्पीड वाई-फ़ाई सर्विसेज. स्पांसर्ड बाई अलीबाबा एंड मैनेज्ड बाई जेडटीई.

मैंने एयरपोर्ट का लंबा गलियारा पैदल नापने के बजाय उपलब्ध इलैक्ट्रिक व्हीकल से पार करना चाहा. साफ सुथरा और आरामदायक इलैक्ट्रिक वाहन था वो. उत्सुकतावश, वाहन के नाम-पट्ट पर स्वयमेव निगाह चली गई. नाम पत्र पर शेनडांग ज़ूफ़ेंग व्हीकल कं लिमिटेड चाइन का नाम नजर आया. ओह!

मेरे सामने एक सुंदरी अपने टैब पर यू-ट्यूब पर साई का नया डांस वीडियो देख रही थी. उसके टैब का रंग बड़ा अच्छा था. कुछ-कुछ नीली आभा लिए. मैंने यूँ ही पूछ लिया – कौन सा टैब है यह?

शियामी नोट 6 – उसने गर्व से उत्तर दिया.

सामने एक गिफ़्ट और सोवेनियर शॉप दिखा तो मैं वहाँ चला गया. की-रिंग व की-चेन से लेकर रिमोट कंट्रोल्ड ड्रोन व हेलिकॉप्टर खिलौने सब कुछ थे वहाँ. मैंने एक दो पैकेट उठाए और कीमतें और निर्माता आदि का नाम देखा. कीमतें तो विविध थीं, जेब-जेब के मुताबिक, परंतु निर्माता-देश एक ही छपा नजर आया – मेड इन चाइना. शायद इनके पैकेटों में प्रिंटिंग मिस्टेक आ गया होगा जिसकी वजह से हर पैकेट पर मेड इन चाइना छपा था. खिलौने भी, चॉकलेट भी, प्रतीक चिह्न भी – सबकुछ मेड इन चाइना. वो भी भारत में?

मैं बाहर निकला तो ट्रैफ़िक जाम में फंस गया. रक्षाबंधन का समय था तो सड़कों बाजारों में वैसे भी बहुत भीड़ पहले से थी, ऊपर से एक बड़ा भारी जुलूस भी निकल रहा था. जिसमें लोगों ने पोस्टर बैनर टांग रखे थे – स्वदेशी अपनाओ, चीनी रक्षाबंधन का बहिष्कार करो!

मेरी पिछली यात्रा में दिल्ली के ठगों की खूब धूम थी. पता नहीं इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद उन बिरादरी का क्या हाल हुआ होगा. एक से यूँ ही बातों बातों में पूछा, तो उसने संसद भवन का पता बताया और टीप दी कि अब वहाँ केवल दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के ठग मिलते हैं.

मैंने अपनी भारत यात्रा वहीं समाप्त कर दी – आगे की यात्रा में मेरी दिलचस्पी खत्म हो गई. हाँ, एकमात्र दिलचस्प बात यह मिली कि भारत विचित्रताओं का देश अभी भी बना हुआ है - नाम यूँ हिन्दुस्तान है, सामान सब चीनी भरा है, और भाषा अंग्रेज़ी है!









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