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यदि यह सरकारी पोस्ट होती, और इसके लिए टेंडर से पढ़ने का हिसाब होता, तो यकीनन यह लाख रुपए से कम का पोस्ट नहीं होता. वह भी मान्य कानूनी, विधिक और कार्यालयीन प्रक्रिया पूर्ण करने के उपरांत, ताकि ऑडिट में किसी तरह के पेंच और फंसने फंसाने की कोई गुंजाइश न रहे.

निविदा तंत्र (टेंडर सिस्टम) ने देश का इतना नुकसान किया है ( और, उतना ही भला भ्रष्ट - अफसरों, व्यापारियों, नेताओं का) जितना किसी और ने नहीं.

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व्यंज़ल

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कहाँ कहाँ तो नहीं हैं निविदाएँ

रिश्तों में भी घुसी हैं निविदाएँ

 

मुहब्बत में होना  था असफल

नकार दी तमाम हैं निविदाएँ

 

शीर्ष पर बैठे लोगों ने बताया

सीढ़ियाँ ही होती हैं निविदाएँ

 

सीखना होगा सबको यह खेल

जीवन में जरूरी हैं निविदाएँ

 

बेचने चला है देश अपना रवि

हम भी निकालते हैं निविदाएँ

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(व्यंग्य चित्र - कीर्तीश भट्ट)

एक दलबदलू नेता भवसागर को प्राप्त हुए. वे इतने सफल थे कि अमूनन हर सरकार में मंत्री रहे. वे अच्छे खासे लोकप्रिय भी थे. इतने, कि पहले तो उनके तमाम समर्थकों ने, राज्य और देश की मासूम जनता ने, प्रारंभ में यह मानने से ही इंकार कर दिया कि वे भवसागर को प्राप्त हो चुके हैं. परंतु जब अस्पताल के प्रमुख चिकित्सक ने लिखित में प्रमाणपत्र जारी कर दिया कि भई, आपके नेता सचमुच नहीं रहे हैं, और कोई दस दिन पहले से नहीं रहे हैं, तब उस प्रमाण पत्र के जारी होने के कोई हफ़्ते भर बाद लोगों को यकीन हुआ. महीने भर प्रांत की जनता गम में डूबी रही. इतनी अधिक डूबी रही कि सार्वजनिक स्थलों पर उनका रोना कूटना, दुःख में अपने आप को चोट पहुँचाकर अपने आप को और दुःखी कर लेने आदि जैसा प्रदर्शन जारी रहा.

एक विकट समस्या और थी कि उन स्वर्गीय लोकप्रिय नेता ने अपने पीछे कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था, लिहाजा उनकी वसीयत के लिए खोजबीन चहुँ ओर भयंकर रूप से चली. उन्होंने दो नंबर की स्थिति पर किसी को भी नहीं चढ़ने दिया. क्या पता कोई दो-नंबरी उन्हें खिसका कर उन्हें बेदखल कर दे. तो किसी ने कहा कि उनकी कुर्सी, जिन पर वे पिछली अर्ध शती से बैठते आ रहे थे, को जांचा परखा जाए, शायद उसमें कोई गुप्त खांचा हो और वहाँ से कुछ मिले. पर, प्रशंसकों ने तो विरासत और स्मरण के नाम पर उस कुर्सी के ऊपर उन नेता की फोटो रखकर उसकी पूजा प्रारंभ कर दी थी, तो उसमें हाथ लगाना असंभव कार्य था.

पर, इधर भारतीय न्यायालयों के लिए असंभव कुछ भी नहीं. न्यायालयों के मार्फत यह सिद्ध हो जाता है कि मृतक की हत्या हुई ही नहीं – या शायद वो मरा ही नहीं. तो, नेता के एक भक्त को अक्ल आई और उसने न्यायालय में अर्जी दाखिल कर दी. मामला उन स्वर्गीय लोकप्रिय नेता से जुड़ा था, जन-भावनाओं से जुड़ा था, तो तुरत फुरत न्याय भी हासिल हो गया और कुर्सी के पुर्जे अलग कर सुराग ढूंढने के आदेश दिए गए. वैसे भी, भारतीय अदालतें अमीर, पहुँच वाले और रसूखदारों को निराश करने का जोखिम नहीं ले सकतीं. लिहाजा यहाँ भी अदालत ने निराश नहीं किया, तो कुर्सी ने भी निराश नहीं किया. कुर्सी के पुर्जे-पुर्जे अलग किए गए तब वहाँ के एक गुप्त खांचे से नेता जी का एक पत्र बरामद हुआ जिसके महत्वपूर्ण अंश कुछ यूँ थे -

“...तमाम उम्र मुझ पर लांछन लगते रहे दलबदलू का. परंतु इन्हें नहीं पता कि एक नेता का दिल कैसा होता है. उसका दिल तो बस कुर्सी के लिए ही समर्पित होता है. उसका दिल वहीं लगा होता है. जहाँ कुर्सी वहाँ नेता. नेता दल बदलता है, परंतु अपना दिल नहीं. तो, जब जब भी जिस भी दल की सरकार रही, मैं सरकार में उसी दल में रहा. मेरा दिल, मेरी भावना, मेरा समर्पण कुर्सी के प्रति शत प्रतिशत रहा. लोगों ने इसका गलत अर्थ निकाला, गलत व्याख्याएँ की. असल व्याख्या, असल अर्थ तो यह है – जिसकी ओर उन निरे मूर्खों का ध्यान नहीं गया - कि मेरा समर्पण, मेरी एक-निष्ठा कुर्सी के प्रति रही, न कि किसी दल विशेष के प्रति.

जो नेता दल विशेष के प्रति समर्पण और निष्ठा की बात करता है, वो दरअसल नेता ही नहीं होता. वो तो दोगला होता है. उसका कहना कुछ और करना कुछ और, और चाहना कुछ और होता है. नेता वही है जो कुर्सी के प्रति समर्पण रखे. दल तो आते जाते रहते हैं, बनते बिगड़ते रहते हैं, टूटते फूटते रहते हैं. इस नश्वर संसार में, हाइड्रोजन-7 के बाद, अगर अति नश्वर कोई चीज है तो वो राजनीतिक दल है, राजनीतिक पार्टी है. ऐसे नश्वर, तुच्छ चीज के साथ निष्ठा बना कर रखने वाला निरा मूर्ख ही होगा. राजनीति में जो चीज शाश्वत है वह सिर्फ एक और एकमात्र है – कुर्सी, पद. और एक नेता की निष्ठा इसी के लिए रहनी चाहिए. वैसे भी, राजनीति में सब नाजायज, जायज है. मेरा दिल, मेरी जान, मेरा शरीर सब कुछ इसी कुर्सी के लिए ही तो था. मैं गर्वित हूँ कि मैं आजीवन सच्चा कुर्सी भक्त रहा. वैसे भी, आज सफल नेता वही है जो कुर्सी के प्रति समर्पित हो. दल के प्रति नहीं. और, जनता के प्रति तो कतई नहीं.

जब भी मुझे लगा कि मेरी कुर्सी हिलने वाली है, उस पर खतरा है, उसकी आबरू उतर सकती है, तो मैंने हमेशा सही एक्शन लिया. हर बार मैंने अपनी कुर्सी की लाज बचाने की खातिर दल बदला. क्या कुर्सी की लाज बचाना गुनाह है?

पत्र के मजमून ने देश भर में भूचाल मचा दिया. अर्णबों और रवीशों ने अपने टीवी शोज़ में हफ़्तों इस पर चर्चाएँ करवाईं. अखबारों ने पन्ने रंगे और फ़ेसबुक-ट्विटर पर अभूतपूर्व स्टेटसों की बाढ़ आई. एक्टिविस्टों के धरना प्रदर्शन हुए. इतनी कि सरकार की कुर्सी हिलने लगी. लिहाजा अध्यादेश के जरिए, पिछली तिथि से दलबदल को न केवल कानूनी मान्यता प्रदान कर दी गई, बल्कि किसी भी नेता के चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक अर्हताओं में न्यूनतम 3 दलबदल को अनिवार्य भी कर दिया गया. और, ये कहने की बात नहीं है कि उन लोकप्रिय नेता को उनके दल-बदल-बदल-कर-ताउम्र देश सेवा के एवज में मृत्योपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा गया.

अब इस देश में, जाहिर है, कोई नेता दलबदलू नहीं होता है.

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(विश्व पुस्तक मेला - चित्र अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक पृष्ठ से साभार)

इस बार जब जुगलबंदी लिखने बैठा, तो पहले तो विषय ही समझ में नहीं आया. थोड़ा-बहुत ध्यान किया, दिमाग लगाया, और जब सफल नहीं हुआ तो अंततः शब्दकोश-डॉट-कॉम की शरण में गया. पता चला, ओह! सब्जैक्ट तो रिलेटिवली ईज़ी है, और बुकफ़ेयर्स ऐंड बुक्स पर है. नहीं नहीं, शायद बुकफ़ेयर एंड बुक पर है. हद है! इतनी सड़ी सी बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी. मगर क्या कीजिए, मानव मन है. धीर गंभीर बातें तो वो जल्द आत्मसात कर लेता है, मगर सड़ी सी बात जेहन में ही नहीं आती, गले से नीचे ही नहीं उतरती. वैसे भी, एलियन भाषा समझने में टाइम तो लगता है. बात नई वाली हिंदी में कही जाती तो बात कुछ और थी. पुरानी हिंदी तो कब की निकल ली है. इलेक्ट्रॉनिकी, कॉन्वेंटी युग में यदि हिंदी में नवोन्मेष न आए तो फिर किसमें आए!

तो, लीजिए, पेश है बुकफ़ेयर एंड बुक पर मेरा मारक व्यंग्य. भई, ‘मारक’ मेरे ‘अपने स्टैंडर्ड’ के मुताबिक है, और हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र वासी हैं, हमें अपने स्टैंडर्ड और स्टैंड दोनों ही तय करने के अधिकार हैं.

वैसे भी, बुक एंड बुकफ़ेयर में जो ग्लैमर है, जो एक्सेप्टेबिलिटी है, जो दम है, जो मास अपील है, वो किताब और मेला में नहीं है. मेला से यूं लगता है जैसे कि किसी गांव देहात के मेले में जा रहे हों और पांच रुपए की चकरघिन्नी में एक चक्कर लगा कर और दो रुपए का बरफ गोला खाकर चले आ रहे हों. मेला से न स्टेटस उठता है और न ही स्टेटमेंट. सॉलिड स्टेटमेंट सहित सॉलिड स्टेटस के लिए बुकफ़ेयर ही ठीक है. मेला यहाँ ऑडमैनआउट है. और, बुकफ़ेयर भी वर्ल्ड किस्म का हो, राजधानी का हो, लोकल न ही हो तो क्या बात है.

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यूँ, होने हवाने को तो हमारे इधर भी साल में एकाध बार पुस्तक मेला लग जाता है. पर, चूंकि एक तो वो लोकल होता है, वर्ल्ड वाला नहीं, और दूसरा पुस्तक मेला किस्म का होता है बुकफ़ेयर किस्म का नहीं तो वो आमतौर पर हम वर्ल्ड-क्लास की बातें करते रहने वाले लेखकों के लिए कोई काम-धाम का नहीं होता. न तो वहाँ कोई धीर-गंभीर साहित्यिक विमर्श-उमर्श होता है, न कोई सॉलिड किस्म का लोकार्पण. होता भी होगा तो हम वर्ल्ड-क्लासी लोग उन्हें सिरे से खारिज कर देते हैं. कुल मिलाकर वो पक्का, चुस्त-दुरुस्त पुस्तक मेला ही होता है. नॉन ग्लैमरस. इसलिए इसका न कोई हो हल्ला होता है और न ही फ़ेसबुक-ट्विटरादि में चर्चा और स्टेटस अपडेट. और, इस कलियुग के जमाने में यदि किसी चीज – वह भी मेले जैसी चीज – की चर्चा और स्टेटस अपडेट सोशल-मीडिया में नहीं होती है तो उसे किसी भी किस्म की घटना मानने से इंकार कर देना ही उचित होता है.

लोग लोकल पुस्तक-मेले में जाते हैं तो यह ध्यान रखते हैं कि कहीं कोई देख न ले, और गलती से भी उनकी सेल्फी या फोटो सोशल मीडिया में अपलोड न होने पाए. आखिर, इज्जत का सवाल जो होता है. कोई क्या कहेगा! इस लेखक का स्तर इस बात से जाना जा सकता है कि यह लोकल पुस्तक मेले में पाया जाता है! इसके उलट यदि लोग गलती से भी वर्ल्ड बुकफ़ेयर में पहुंच जाते हैं तो यह सुनिश्चित करते हैं कि खोज-बीन कर, आविष्कार कर, उद्घोषणाएँ-घोषणाएं कर लोगों से मिला-जुला जाए, सबको देखा-दिखाया जाए, बहु-कोणों, बहु-स्टालों, बहु-लेखकों, बहु-प्रकाशकों के साथ उनकी सेल्फियाँ, ग्रुप-फ़ोटोज़ बहु-सोशल-मीडिया में बहु-बहु-बार आए.

पुस्तक या किताब तो बेचारा सादगी से किसी अल्पज्ञात समारोह में या किसी स्थानीय मेले में विमोचित-लोकार्पित हो लेता है, मगर ‘बुक’ वर्ल्ड बुकफ़ेयर में ही विमोचित-लोकार्पित होता है और ऐसे चर्चित होता है. हिंदी बुक्स में बेस्टसेलर की अवधारणा भले ही हो न हो, ‘वर्ल्ड बुकफ़ेयर में विमोचित, लोकार्पित’ की अवधारणा बहुत लंबे समय से लोकप्रिय है. इसलिए बहुत सी किताबें “बुक” बनने की ख्वाहिश में कभी-भी, कहीं-भी विमोचित-लोकार्पित होने से मना कर देती हैं और वर्ल्ड बुकफ़ेयर के शुभ-मुहूर्त का इंतजार करती हैं. वर्ल्ड बुकफ़ेयर के शुभ मुहूर्त का आतंक कई की लेखनी में भी समाया होता है, और इस कदर समाया होता है कि उनकी लेखनी में सृजन का चक्र कुछ इस तरह समन्वयित होता है कि वे जब जब भी रचते हैं, वर्ल्ड बुकफ़ेयर में ही विमोचित-लोकार्पित होते हैं अन्यत्र कहीं नहीं.

यूँ तो मैंने ऊपर जो विवरण दर्ज किए हैं, बहुत कुछ आत्मकथात्मक किस्म के हैं. मगर, यदि, आप ये समझते हैं कि ये आप जैसे सर्वहारा हिंदी लेखक की बायोग्राफ़ी से मिलते जुलते हैं, तो इसे केवल संयोग ही समझें!

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