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वुडलैंड, अडीडॉस, नाईकी आदि-आदि को कॉम्प्लैक्स हो गया है।

बात ही कुछ ऐसी है।

हवाई चप्पल घर वापस आ गया है और क्या खूब वापस आया है। हवाई चप्पल की घर वापसी हो गई है, उसके दिन फिर गए हैं।

मोची और खादिम की रत्न जड़ित चप्पलों में अब वो मजा नहीं रहा जो अब हवाई चप्पलों में है। हवाई चप्पल आज के युग का नया फैशन स्टेटमेंट है। नई टेक्नोलॉजिकल क्रांति है।

अब तक आप हवाई चप्पल डाल कर कहीं निकलते थे, भले ही चिकित्सकीय मजबूरीवश ही सही, लोग-बाग आपकी फटीचरी हैसियत का अंदाजा दूर से ही लगा लेते थे।

तब के युग में, भले ही आपकी जेब में लाख रुपये हों, वो भी असली और नए वाले, अगर आपके पैरों में हवाई चप्पल होता था तो उस रकम की असल फ़ेस वैल्यू कोई मानता ही नहीं था, वह शून्य होता था, और उसे नोट बंदी के ठीक बाद के नोटों के जैसा महज कागज का टुकड़ा माना जाता था।

यूं कहें कि माथे पर कोहिनूर हीरा भले ही लटका लो पर यदि आपके पैरों में हवाई चप्पल रहता था तो कोहिनूर हीरे की भी कोई पूछ परख नहीं होती थी ।

पर अब हवाई चप्पल में हैसियत के पंख लग गए हैं। कल ही की तो बात है। दुकालू अपनी एकमात्र फटीचर हवाई चप्पल, जिसकी बद्दी टूट गई थी और जिसे आधा दर्जन बार पहले ही जोड़ा जा चुका था, पहनकर पंसारी की दुकान पर पहुंचा तो न केवल उसे दुकानदार ने बिना हील-हुज्जत के, इज्ज़त के साथ उधारी दे दी, किसी अपरिचित व्यक्ति ने उससे, बड़े अदब से हवाई अड्डे का रास्ता भी पूछा। अब ये दीगर बात है कि दुकालू के गांव में हवाई अड्डा तो क्या हवाई पट्टी भी नहीं है। परंतु हवाई चप्पल पहने व्यक्ति के लिए हवाईअड्डे की जानकारी रखना बहुत जरूरी है। अबकी छठ पूजा के समय पैतृक गांव जाने के लिए अगर पैसेंजर ट्रेन में जगह नहीं मिली तो हवाई यात्रा का बेहतर, प्राथमिक विकल्प सामने जो रहेगा।

दुकालू के गांव में तो खास हवाई चप्पलों का मेगास्टोर खुलने वाला है। तमाम हाइपरमार्केटों और मॉल में एक सेक्शन विशेष हवाई चप्पलों के लिए समर्पित किया गया है। नए नए ब्रांड लॉन्च हो रहे हैं। बीइंग हवाई चप्पल नाम का ब्रांड जिसे एक बड़े बॉलीवुड अभिनेता ने लॉन्च किया है अच्छा खासा लोकप्रिय हो चुका है।

जर्मनी और इटैलियन कंपनियों मसलन आईकिया आदि ने अपनी प्रॉडक्ट लाइनों में तेजी से बदलाव किए हैं और उन्होंने आर एंड डी का अच्छा खासा हिस्सा हवाई चप्पल पर लगाया है नतीजतन नित नए नायाब किस्मों के हवाई चप्पल बाजार में जारी होने लगे हैं। आईओटी उपकरणों में हवाई चप्पल पहली पसंद बन गया है और इनमें अविश्वसनीय क्षमताएं जुड़ रही हैं। एक चीनी कंपनी ने एक ऐसा हवाई चप्पल बाजार में जारी किया जिसमें सीरी, एलेक्सा, कोर्टाना और गूगल एआई का सम्मिलित पॉवर है। जाहिर है कि यह हवाई चप्पल फ्लैश सेल में 30 सेकंड के भीतर पूरा बिक गया और आउट आफ स्टॉक हो गया। कहा जाता है कि इस संस्करण को हवाई चप्पल में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की इतनी क्षमता है कि इसे पहन कर बोर्ड मीटिंग करते समय यह अलग तरीके से वाइब्रेट कर आपको पूरी सटीकता से सचेत कर सकता है कि अगले तीन मिनट के भीतर आपके अंदर से गैस का गोला निकलने वाला है, जिसमें बदबू की स्तर 3 या 5 होगा, अतः पूर्व तैयारी कर लें!

इधर, हवाई चप्पलों में तकनीकी सुविधाओं के साथ-साथ समस्याएं भी आईं हैं। एक राष्ट्रीय चैम्पियन पर आरोप है कि उसने हैक किए हवाई चप्पल पहन कर दौड़ में जीत पर जीत हासिल की। जबकि आम धारणा है कि हवाई चप्पलें हैक नहीं हो सकतीं।

इतना सबकुछ पढ़कर आपको कुछ हुआ या नहीं? हुआ? तो फिर जल्द ही बाजार की ओर दौड़ क्यों नहीं लगाते – अपने लिए एक अदद सर्वथा नवीन किस्म की हवाई चप्पल खरीदने?

आप कहेंगे कि इनका क्या संबंध है?

संबंध है भाई. पर, पहली बात.

मोदी भक्तों में एक बड़ा नाम जुड़ा है. और कोई हवा हवाई नहीं. महान् बिल गेट्स. तमाम फैक्ट शीट और 360 डिग्री वर्चुअल रीयलिटी वीडियो सहित.

आप उनका मूल ब्लॉग अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं.

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अब आगे.

हाल ही में गूगल ने अपने मशीनी भाषाई अनुवाद तंत्र में अच्छा-खासा सुधार किया है. और यह वाकई बड़ा आश्चर्यकारी है. मैंने बिल गेट्स के पोस्ट को गूगल के नए अनुवाद तंत्र से हिंदी में अनुवादित किया और उसे जस का तस नीचे छापा है. आप मूल अंग्रेज़ी पढ़ें (शायद जरूरत भी नहीं है!) और नीचे अनुवाद पढ़ें. चमत्कारी.

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(बिल गेट्स के मूल अंग्रेज़ी ब्लॉग पोस्ट का गूगल मशीनी स्वचालित हिंदी अनुवाद - )

भारत मानव अपशिष्ट पर इसका युद्ध जीत रहा है

बिल गेट्स द्वारा | 25 अप्रैल, 2017

लगभग तीन साल पहले, भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एक दमदार टिप्पणी की जिसमें मैंने कभी एक निर्वाचित अधिकारी से सुना है। आज भी इसका एक बड़ा प्रभाव रहा है।

उन्होंने भारत के स्वतंत्रता दिवस की स्मृति के दौरान अपने पहले भाषण के दौरान टिप्पणी की। मोदी ने कहा: "हम 21 वीं सदी में रह रहे हैं। क्या यह कभी हमें परेशान किया है कि हमारी मां और बहनों को खुले में शौच करना है? ... गांव के गरीब महिलाएं रात की प्रतीक्षा कर रही हैं; जब तक अंधेरा उतरता है, तब तक वे मलबे को बाहर नहीं जा सकते क्या शारीरिक यातना वे महसूस करना चाहिए, कितनी बीमारियों कि पैदा हो सकता है engender क्या हम अपनी मां और बहनों की गरिमा के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं? "

मैं एक और समय के बारे में नहीं सोच सकता जब एक राष्ट्रीय नेता ने इस तरह के एक संवेदनशील विषय को इतनी स्पष्ट रूप से और इतनी सार्वजनिक रूप से उभारा है। इससे भी बेहतर, मोदी ने अपने शब्दों को क्रियाओं के साथ समर्थन दिया। उस भाषण के दो महीने बाद उन्होंने स्वच्छ भारत (हिंदी में "स्वच्छ भारत") नामक एक अभियान का शुभारंभ किया, जिसमें अब पूरे देश में 75 मिलियन शौचालय स्थापित करने के लिए 201 9 तक देश भर में खुले शौचालय खत्म करना शामिल है -और यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई इलाज नहीं है कचरे को पर्यावरण में फेंक दिया जाता है

मेरी सबसे हाल ही में भारत की यात्रा पर, मैंने इस अद्भुत उपक्रम के बारे में एक छोटी आभासी वास्तविकता की वीडियो बनाई:

मोबाइल उपयोगकर्ताओं

नीचे आभासी वास्तविकता फिल्म देखने के लिए, यहां क्लिक करें YouTube में खोलने के लिए

नोट: यह एक वर्चुअल रिएलिटी फिल्म है जिसे आप एक वीआर हेडसेट, या अपने ब्राउज़र में 360 ° वीडियो के रूप में देख सकते हैं। अधिक जानें →

यदि आप सोच रहे हैं कि प्रधान मंत्री एक ऐसे विषय पर एक स्पॉटलाइट क्यों डालेगा, जो कि हम में से ज्यादातर सोच भी नहीं लेंगे, आंकड़ों पर नज़र डालें। दुनिया भर में 1.7 मिलियन लोगों में से प्रत्येक वर्ष असुरक्षित जल, स्वच्छता और स्वच्छता से मर जाते हैं, 600,000 से अधिक लोग भारत में हैं एक चौथाई युवा लड़कियों को स्कूल से बाहर निकलता है क्योंकि वहां कोई शौचालय उपलब्ध नहीं है। जब आप मौत, बीमारी, और खो दिया मौका का कारण बनते हैं, तो खराब स्वच्छता भारत को 106 अरब डॉलर से ज्यादा सालाना खर्च करती है।

दूसरे शब्दों में, इस समस्या को सुलझाना हर साल सैकड़ों हजारों लोगों को बचाएगा, लड़कियों को स्कूल में रहने में सहायता करेगा और देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। स्वच्छता में सुधार हमारी नींव के लिए एक बड़ा ध्यान है, और हम अपने लक्ष्यों के समर्थन में भारतीय सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

स्वच्छ भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दो चाबियाँ हैं एक व्यक्ति को एक सुव्यवस्थित प्रबंधित शौचालय तक पहुंच प्रदान करना शामिल है, जिसका अर्थ है कि रोगियों को बीमार करने के लिए सभी कचरा (या तो साइट पर या उपचार सुविधा में) का इलाज किया जाता है पूरी प्रक्रिया सही करने के लिए, एक टॉयलेट में कचरे को इकट्ठा करना, इसे इकट्ठा करने, आवश्यकतानुसार परिवहन, और इसके इलाज के लिए महत्वपूर्ण है। यदि श्रृंखला में एक लिंक विफल रहता है, तो लोग अभी भी बीमार हो जाते हैं

दुर्भाग्य से, कई जगहों में, सीवर पाइपों को डालना या उपचार की सुविधा का निर्माण करना संभव नहीं है। यही कारण है कि भारतीय शोधकर्ता विभिन्न प्रकार के नए उपकरणों का परीक्षण कर रहे हैं, जिनमें पुनर्निर्मित शौचालय शामिल हैं, जिन्हें सीवर सिस्टम की आवश्यकता नहीं होती है और मानव कचरे का इलाज करने के लिए उन्नत तरीके हैं।

अब तक, प्रगति प्रभावशाली है। 2014 में, जब स्वच्छ भारत शुरू हुआ, तो सिर्फ 42 प्रतिशत भारतीयों को उचित स्वच्छता का उपयोग किया गया। आज 63 प्रतिशत लोग करते हैं और सरकार 2 अक्टूबर, 201 9 तक महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ की नौकरी खत्म करने की एक विस्तृत योजना है। अधिकारियों को पता है कि कौन से राज्य ट्रैक पर हैं और जो पिछड़ रहे हैं, एक मजबूत रिपोर्टिंग प्रणाली के लिए धन्यवाद जिसमें फोटोग्राफिंग और प्रत्येक नए स्थापित शौचालय जियोटैगिंग शामिल है।

एक मजबूत रिपोर्टिंग प्रणाली में प्रत्येक नए स्थापित शौचालय की तस्वीरें और जियोटैगिंग शामिल है।

लेकिन लोगों को शौचालय तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है आपको शौचालयों का उपयोग करने के लिए उन्हें मनाने की भी ज़रूरत है यह भारत को साफ करने की दूसरी कुंजी है, और कुछ मायनों में यह पहले की तुलना में भी कठिन है। लोग पुरानी आदतों को बदलने के लिए अनिच्छुक हो सकते हैं

स्वच्छ भारत में उस समस्या से निपटने के सरल तरीके हैं। कुछ समुदायों में, बच्चों के समूह एक साथ बैंड को एक साथ कॉल करने के लिए कहते हैं, जो खुले में शौच कर रहे हैं और उन्हें सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। एक पायलट प्रोजेक्ट में अगले साल विस्तार किया जाएगा, सरकार ने Google के साथ काम किया ताकि 11 शहरों में उपयोगकर्ता निकटतम सार्वजनिक शौचालयों के लिए ऑनलाइन खोज कर सकते हैं, निर्देश प्राप्त कर सकते हैं, और अन्य उपयोगकर्ताओं द्वारा समीक्षा पढ़ सकते हैं। पूरे देश में सड़कों पर, बिलबोर्ड यात्रियों को याद दिलाते हैं- मिशन के द्वारा बॉलीवुड फिल्मों और क्रिकेट टीमों के सितारे टीवी और रेडियो पर बोलते हैं यहां तक ​​कि भारत की मुद्रा में स्वच्छ भारत लोगो भी शामिल है।

कड़ी मेहनत बंद हो रही है आज भारतीय गांवों के 30 प्रतिशत से अधिक गांवों को 2015 में 8 प्रतिशत से मुक्त खुली मलजल घोषित कर दिया गया है। (आप इस काम डैशबोर्ड पर प्रगति को ट्रैक कर सकते हैं।)

स्वच्छ भारत के बारे में मुझे क्या पसंद है, यह है कि यह एक बड़ी समस्या की पहचान करता है, हर कोई इस पर कार्य करता है, और यह दिखाने के लिए माप का उपयोग कर रहा है कि चीजें अलग-अलग करने की आवश्यकता है। जैसा कि पुरानी कहावत है, जो मापा जाता है वह हो जाता है यदि आप महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित नहीं करते हैं और अपनी प्रगति को चार्ट करते हैं, तो आप सामान्य रूप से व्यापार के लिए बसने को समाप्त करते हैं- और इस मामले में, सामान्य रूप से व्यापार का मतलब है कि स्वच्छ स्वच्छता हर साल करीब पांच लाख भारतीयों की हत्या करता है।

उच्च लक्ष्य से, भारत के लोग परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, और वे इसे होने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। यह अन्य देशों के लिए एक बढ़िया उदाहरण है और हमारे सभी के लिए एक प्रेरणा है जो विश्वास करते हैं कि स्वस्थ, उत्पादक जीवन में हर किसी को मौका मिलना चाहिए।

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(चित्र – साभार – डॉ. अरविंद मिश्र का फ़ेसबुक पृष्ठ)

परकाया प्रवेश विधा का उपयोग कर मैं एक वरिष्ठ आईएएस अफ़सर के शरीर में घुस गया था. बड़े दिनों से तमन्ना थी कि लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद लूं. परंतु ये क्या! इधर मैंने परकाया प्रवेश किया और उधर नोटबंदी की तरह लाल-बत्ती बंदी हो गई.

मैंने सोचा, चलो, एक वरिष्ठ आईएएस के शरीर में प्रवेश किया है जो अब तक लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद उठाता फिरता था, उसके नए, गैर-लाल-बत्ती वाले अनुभव को एक दिन जी कर देख लिया जाए –

“आज सुबह जब मैं उठा तो मुंह सूजा और आँखें फूली हुई थीं. मैंने मन में ही सोचा क्या शक्ल हो गई है एक वरिष्ठ अफसर की. पूरी रात करवटें बदलते गुजरी जो थीं. पूरी रात सपने में लाल-बत्ती वाली गाड़ियां अजीब अजीब शक्लों में, रूपाकारों में आती रहीं और डराती रही थीं तो नींद बार बार टूट जो जाती थी. जैसे लाल-बत्ती ने मुंह का पूरा नूर नोच लिया है लगता था. वैसे भी आज आफिस जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. जैसे तैसे आलस्य को त्यागकर तैयार होकर बाहर निकला, तो बिना लाल-बत्ती के अपनी सरकारी गाड़ी को देख कर दिल धक्क से हो गया और बुझ गया. लगा, जैसे गाड़ी विधवा हो गई है, उसके सिर का सिंगार, सुहाग चिह्न जबरदस्ती उतार लिया गया हो. गाड़ी पूरी तरह बेनूर हो गई थी. इधर ड्राइवर का हाल भी बुरा था. ड्राइवर का भी सबकुछ बुझा हुआ सा लग रहा था. मुझे लगा कि वो जल्दी ही इस बोरिंग, बिना लाल-बत्ती वाली गाड़ी की उतनी ही बोरिंग गाड़ी से पीछा छुड़ाने वाला है. आखिर, सड़कों पर मुझसे ज्यादा सैल्यूट और सम्मान मेरा ड्राइवर पाता था जो उसे केवल और केवल लाल-बत्ती वाली गाड़ी की वजह से हासिल था. जब मैं गाड़ी में बैठा, तो लगा कि ड्राइवर बस रो ही देगा. मैं स्वयं उसे तसल्ली देने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि भीतर से रो तो मैं भी रहा था.

गाड़ी का इंजन आज अजीब आवाज कर रहा था. बिलकुल मरियल. आज तो गाड़ी की चाल में भी दम नहीं दिख रहा था. यकीनन उसे भी अपनी लाल-बत्ती गंवाने का दुःख हो रहा था. आगे बढ़े तो सरकारी कॉलोनी के मुहाने पर बने चेकपोस्ट के चौकीदार ने कोई तवज्जो नहीं दी, और उसका ध्यान खींचने के लिए ड्राइवर को हॉर्न बजाना पड़ गया. इससे पहले ऐसा हादसा कभी नहीं हुआ था. गाड़ी के ऊपर डुलबुग जलती लाल-बत्ती को देखते ही चौकीदार दौड़कर बैरियर हटाता था. आज जब चौकीदार बैरियर हटा रहा था तो उसमें वह फुर्ती तो ख़ैर दिखी ही नहीं, उल्टे उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान अलग तैर रही थी जो बड़ी दूर से महसूस की जा सकती थी. लगा कि वो जानबूझ कर देर से और बड़े आराम से बैरियर हटा रहा है ताकि उसके चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान को ठीक से पढ़ा समझा जा सके.

आगे बढ़े तो जैसी आशंका थी, वही हुआ. चौराहे पर ट्रैफ़िक सिपाही ने उलटे तरफ का ट्रैफ़िक क्लीयर करने के चक्कर में अपनी गाड़ी रोक दी. सैल्यूट मारना तो दूर की बात थी. लाल-बत्ती रहती तो ट्रैफ़िक की ऐसी-तैसी बोल वो पहले तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी को एक शानदार सैल्यूट ठोंकता, इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि गाड़ी के भीतर कोई बैठा भी है या नहीं, या बैठा है तो कोई अफ़सर है नेता है या कोई अपराधी जो नक़ली लाल-बत्ती लगाए घूम रहा है, और फिर वो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए पहले रास्ता क्लीयर करता. पूरे रास्ते यही हाल रहा और दस मिनट में नित्य ऑफ़िस पहुंचने वाले रास्ते में आज पूरे पैंतालीस मिनट लग गए. लगा कि भारत में जनता और गाड़ियों की भरमार हो गई है और इस पर नियंत्रण के लिए हम जैसे अफसरों को ही कुछ करना होगा. इन नेताओं के भरोसे बैठे रहे तो बस लाल-बत्ती लाल-बत्ती खेलते रह जाएंगे.

आफिस में विशिष्ट वीआईपी पार्किंग के हाल बुरे थे. कोई रौनक नहीं थी, कोई एटीट्यूड नहीं था, कोई गर्व नहीं था, कोई रौब नहीं था. कहीं लाल-पीली-नीली बत्ती का नामोनिशान नहीं था तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक सारी गाड़ियाँ मारूती 800 की तरह बेजान, एक-सी नजर आ रही थीं. प्रधान सचिव की पर्सनल मर्सिडीज़ बैंज, जिस पर वे शान से लाल-बत्ती लगाया करते थे, रोती हुई-सी प्रीमियम पार्किंग में खड़ी थी. और कुछ इस तरह खड़ी थी जैसे वह पार्किंग उसे धकिया रहा हो – कलमुंही परे हट, यह स्थल तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए आरक्षित है. तू बिना बत्ती के यहाँ कैसे खड़ी है?

ऑफ़िस के अपने चैम्बर में घुसा तो अर्दली को हमेशा की तरह दरवाजे पर स्वागत में नहीं पाया. वो दरअसल खिड़की से नीचे झांक रहा था. जहाँ से प्रीमियम पार्किंग का दिलकश नजारा दिखाई देता था. आज उसकी निगाह में अलग चमक थी, जो स्पष्ट प्रतीत हो रही थी, और मुख पर थी संतुष्टि और प्रसन्नता के साथ व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट. उसे मेरी स्थिति का आभास नहीं था. मैंने टेबल पर निगाह मारी. धूल की परत जमी हुई थी. प्रकटतः उसने आज टेबल साफ नहीं किया था.

मैंने अपनी गर्दन मोड़ी और दीवार की और मुख किया. मेरी निगाह कैलेंडर को खोज रही थी. मैं अपने रिटायरमेंट के बचे-खुचे दिन गिनने लगा.”

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